शुक्रवार, 14 जून 2024

एकल कविता पाठ






आज से दस दिन पहले आकाशवाणी में मेरा कविता पाठ था। आज आकाशवाणी के इन्द्रप्रस्थ चैनल पर उसका प्रसारण हुआ। परिवार और साथियों के साथ मैंने अपनी कविताएँ सुनीं। सुनकर लगा, इतना बुरा भी नहीं बोलती। कविताएँ भी ठीक लगीं। रिकॉर्डिंग मिलते ही साझा करूँगी।


गुरुवार, 6 जून 2024

गर्मी की छुट्टियाँ




गर्मियों की छुट्टियाँ हुईं तो हमेशा की तरह दादा-दादी के पास गाँव जाना तय हुआ। हर साल जिस दिन स्कूल का आखिरी दिन होता, उसी शाम का रिजर्वेशन होता। बिट्टू को इस समय का खासा इन्तज़ार रहता था। शहर में तो माँ स्कूल के अलावा कहीं जाने ही नहीं देती थीं। घर में भी बस पढ़ाई पढ़ाई और खेल के नाम पर लूडो या साँप सीढ़ी, 20 मिनिट के लिये मोबाईल और बस हो गया खेलना। पर गाँव में तो क्या खूब मस्ती होती! दादाजी के साथ खेत में जाना, खेत से सब्ज़ी तोड़कर लाना, पेड़ पे चढ़ना, नदी में मस्ती करना, बैलगाड़ी और ट्रैक्टर में बैठना, मेले में जाना और खूब खाना। दादी पता नहीं क्या क्या बनाकर खिलातीं! रात को कहानी भी सुनातीं। इतना सब शहर में कहाँ? यहाँ तो बस पढ़ाई और डांट। पर वहाँ तो पापा मम्मी को भले ही डांट पड़ जाए पर बिट्टू को? सवाल ही नहीं। दादा-दादी का चहेता जो था। यही सब सोच के बिट्टू फूला नहीं समा रहा था। उसका बस चले तो वो तो हमेशा गाँव में ही रहे।

छुक छुक करती ट्रेन भागी जा रही थी। पेड़, खेत, खंबे और पता नहीं क्या क्या सब पीछे छूटता जा रहा था। पर ये क्या ट्रेन की स्पीड कम हो रही थी और धीरे-धीरे ट्रेन रुक गई। कोई स्टेशन आया था। इधर पापा को पता नहीं कैसे पता चल गया था कि उसे आईस्क्रीम खानी है! वो तीन आईस्क्रीम और उसकी फेवरिट चिप्स भी ले आए थे। वाह! मज़ा आ गया था। पर ट्रेन चल क्यों नहीं रही थी! अब दादा जी के पास कब पहुंचेंगे! बिट्टू बेचारा उदास होकर बोला। तभी पापा ने उसे गोद में बिठाकर कहा- गाड़ी बेचारी थककर सो गई है। तुम ऐसा करो कि अपनी सीट की तरफ़ से गाड़ी को धक्का लगाओ, गाड़ी जाग जाएगी। 

अच्छा ऐसा भी होता है, अभी लगाता हूँ और बिट्टू ने गाड़ी को जैसे ही धक्का लगाया, कुछ ही क्षणों में गाड़ी चल पड़ी। मम्मी-पापा और पास बैठे अंकल आंटी ने भी बिट्टू की बहुत तारीफ़ की। बिट्टू की आँखों में भी खुशी की चमक आ गई। आज पहली बार उसे अपनी ताकत का एहसास जो हुआ था।

ट्रेन फिर चल पड़ी। लेकिन पता नहीं कब उसे नींद आ गई थी। सुबह हुई तो.. ये क्या? अरे वाह! बिट्टू अपनी दादी की गोद में था। दादाजी, मम्मी पापा सब वहीं बैठे थे। बिट्टू खुशी के मारे अपनी दादी से लिपट गया। दादाजी बोले- दादू के पास नहीं आना तुझे? मैं तो मेले में जाने के बारे में सोच रहा था..

चलना है ना दादाजी, कहते हुए उसने दादाजी का हाथ पकड़ लिया।

तो अब उठकर दादी से नहा-धो लो, कुछ खा लो, दादी ने बहुत बढ़िया चीज़ बनाई है तुम्हारे लिये।

बस फिर क्या था बिट्टू कुछ ही देर में राजा बेटा बन गया था। दादी ने उसे मलाई बर्फी खिलाई, पुलाव और मज़ेदार आम की चटनी। दादी ने अपने हाथ से बनाए हुए, नये कपड़े भी पहनाए। अब बस मेले जाने की देर थी। बैलों के गले की घन्टियाँ बज रहीं थीं मतलब बैलगाड़ी तैयार थी। मम्मी, पापा दादी के पास रुके रहे, पूरे साल भर बाद जो मिले थे। इसलिये बिट्टू और दादाजी अकेले ही मेले को चल पड़े। मेले में झूला सबसे बड़ा आकर्षण था। ऊँचा हिंडोले वाला। बिट्टू झट से उसमें बैठ गया। पर जैसे ही झूला चला, बिट्टू चिल्लाया- दादाजी..दादाजी मुझे उतारो, मुझे डर लग रहा है... दादाजी इशारा करते रहे कि बैठो कोई डर की बात नहीं है पर बिट्टू कहाँ मानने वाला था। आखिरकार झूले वाले ने उसे उतार दिया। पर ये क्या? दादाजी बोले- यहीं रुको मैं अभी आता हूँ, और झूले में बैठ गए। 

बिट्टू विस्फारित आँखों से झूला झूलते दादाजी को देखता रहा। कुछ ही देर में झूले के चक्कर पूरे हो गए और दादाजी झूले से उतर आये।

आश्चर्यचकित बिट्टू बोला- दादाजी आप झूले पर बैठे? आपको डर नहीं लगा?

दादाजी हँसकर बोले- डर किस बात का? झूले पर तो सबको अच्छा लगता है..और फिर अपन ने उसे पैसे भी तो दिये हैं, तो वो न वसूल करते! बिट्टू को दादाजी की जितनी भी बात समझ आई, पर वो दादाजी के साथ  खिलखिलाकर हँस पड़ा।

 

शनिवार, 1 जून 2024

सियार

 कुछ आदमी होते हैं सियार

भटकती आत्मा से

वे घूमते हैं हर तरफ़

ताज़े गोश्त की तलाश में

उन्हें नहीं होता अपनी हड्डियांँ टूटने 

या इज़्ज़त का घड़ा फूटने

का डर 

बल्कि वो तो

बुढ़ाती देह में भी

कमर कस, चेहरे पे रोगन पोत

जवानी की आस लिये

 लपलपाते हैं जीभ

निपोरे रहते हैं दाँत

इन्हें नहीं होता जूते खाने का भय

बल्कि वो तो समझते हैं इसे

अपनी वीरता का प्रसाद ही

इन सियारों को खूब आता है

 उपदेश देना चरित्र के

और स्त्रियों की विशेषताएँ गिनाना

अच्छी और बुरी स्त्री  का

अंतर समझाना 

पर अफसोस

होता नहीं खुद इनके पास चरित्र का 'च' भी

माँ, बहन, बेटी जैसे रिश्ते

होते हैं इनके लिये हथियार या चिड़िया का दाना भर

जिसे फेंक ये पकड़ सकते हैं

किसी भी स्त्री का हाथ 

या फेर सकते हैं 

किसी भी स्त्री की पीठ पर हाथ 

वासना के ये पापी

पनपते जा रहे हैं खरपतवार से

हर जगह हर ओर

काश कि एक धारदार

तलवार हाथ में आए 

और ये सियार धूल में मिल जाएँ 

 खत्म हो जाएँ कुनबे सहित

 मैं सोचती हूँ कि तब

ये दुनिया

 कितनी सुंदर हो जाएगी! 




गुरुवार, 30 मई 2024

रामचरितमानस की विश्व व्याप्ति

 


भारत ही नहीं, समग्र विश्व साहित्य में रामचरितमानस का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे कालजयी ग्रंथ की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने विक्रमी संवत 1631 में अवधी भाषा में रामनवमी के दिन अयोध्या में आरंभ की थी। उसे  पूरा करने में उन्हें 2 वर्ष 7 माह और 26 दिन का समय लगा था। संवत् 1633 में मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम जानकी विवाह के दिन इसे उन्होंने पूरा किया था। अपनी इस रचना में उन्होंने भक्ति, ज्ञान और लोक कल्याण की भावना के अद्भुत समन्वय को संस्कृत, अवधी, अरबी, फारसी और तुर्की के शब्दों का प्रयोग कर एक अन्यतम अनुकरणीय ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रंथ का महत्व कितना है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि भक्ति, जीवन दृष्टि, साहित्य, दर्शन, लोकोन्मुखता और भाषा, रस, लालित्य, कलात्मकता आदि सभी दृष्टियों से यह ग्रंथ आज भी प्रासंगिक है और विश्व साहित्य में अपनी जगह बनाए हुए है। हिंदी भाषा के विद्वान और बहु चर्चित पुस्तक ‘लोकवादी तुलसीदास’ के रचयिता डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार- 
“रामचरितमानस के महत्व, लोकप्रियता और प्रासंगिकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि विश्व में सर्वाधिक शोध रामचरितमानस पर हुए हैं और विश्व की विविध भाषाओं में इस ग्रंथ का अनुवाद हुआ है।” 
यह सत्य है कि देश विदेश की अनेक भाषाओं में रामचरित मानस पर शोध और अनुवाद दोनों हुए हैं। असल में  मानस का जिसने भी अध्ययन किया वह उससे प्रभावित हुए बिना न रह सका। यही कारण है कि विश्व भर के विद्वानों ने अपनी अपनी भाषाओं में इसका अनुवाद किया। फ्रेडरिक सालमन ग्राउस जिन्होंने सर्वप्रथम रामचरितमानस का अंग्रेजी में अनुवाद किया। एटकिंस ने भी अंग्रेजी में रामचरितमानस का पद्यानुवाद किया। उर्दू में नूरुल हसन नकवी ने रामचरितमानस का अनुवाद किया। फ्रांसीसी विद्वान और ‘द ला लितरेतूर एंदुई एनदुस्तानी’ के लेखक ‘गारसां द तासी’ ने सुंदरकांड का अनुवाद किया, फ्रांसीसी लेखिका शारतोल वादवेली ने भी फ्रेंच भाषा में रामचरित मानस का अनुवाद किया। रूसी विद्वान वरान्निकोव द्वारा किया गया रामचरितमानस का पद्यानुवाद भी बहुत चर्चित रहा। इसी प्रकार जे एम मैंक्फी ने जब रामचरित मानस का अनुवाद किया तो मानस की लोकप्रियता को देखते हुए उन्होंने इसे उत्तर भारत की बाइबिल कहा। उनके अनुसार-
“हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह उत्तर भारत की बाइबिल है और यह आपको हर गाँव में मिलेगी। इतना ही नहीं जिस घर में यह पुस्तक होती है, उसके स्वामी का आदर पूरे गाँव में होता है, जब वह इसे पढ़ता है।”  
ये सब इसी बात के प्रमाण हैं कि रामचरितमानस की ख्याति केवल भारत तक ही सीमित न रही, बल्कि विश्व भर में इस पुस्तक का मान है। हाल ही में मंगोलिया के उलानबटार में ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ की दसवीं आम बैठक में रामचरितमानस को दो अन्य भारतीय ग्रंथों ‘सहृदय लोकन’ और ‘पंचतंत्र’ के साथ यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में सम्मिलित किया गया है। इस संबंध में संस्कृति मंत्रालय के एक बयान के अनुसार –
“इन साहित्यिक उत्कृष्ट कृतियों का सम्मान करके समाज न केवल उनके रचनाकारों की रचनात्मक प्रतिभा को श्रद्धांजलि देता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि उनकी गहन बुद्धि और कालातीत शिक्षाएँ भावी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहें।”   
वास्तव में रामचरित मानस के रूप में गोस्वामी तुलसीदास ने भारतीय संस्कृति का एक ऐसा विश्वकोश प्रस्तुत किया है, जिसमें भारतीय मनीषा की श्रेष्ठता और सौम्यता का साक्षात्कार होता है। यहाँ एक ओर पाठक रामचरित रूपी मानसरोवर में अवगाहन करता है, भक्ति के माध्यम से जीवन दर्शन, करणीय-अकरणीय और विविध जीवन-स्थितियों में व्यावहारिक संतुलन की सीख लेता है तो वहीं दूसरी ओर मानस के अद्भुत विधान से भी रोमांचित होता है। 
इस संबंध में रामचरित मानस के रूसी अनुवादक विद्वान वरान्निकोव ने अपनी पुस्तक मानस की रूसी भूमिका में लिखा है- 
“तुलसीदास की समस्त कृतियों में सबसे अधिक लोकप्रिय रामचरितमानस या रामायण प्रतीत होती है। मध्ययुगीन भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में तुलसीदास का सम्मान इस कृति के आधार पर ही आधारित है। इस कारण तुलसीदास की यह कृति रूसी भाषा में अनुवाद के लिए चुनी गई है। इसके अध्ययन से हम केवल इस कवि की सर्जनात्मक प्रतिभा से ही परिचित नहीं होते, प्रत्युत सामान्यतया भारतीय क्लासिकल साहित्य की विशिष्टताओं से भी परिचित होते हैं।”    
ये वरान्निकोव ही हैं जो रामचरित मानस में प्रतिपादित शाश्वत भारतीय जीवन मूल्यों से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने रूसी जनता को भी उससे परिचित कराने के लिए इस ग्रंथ के अनुवाद का निश्चय किया और अपने अनुवाद के द्वारा रामचरितमानस को रूस में भी लोकप्रिय बनाया। इनके द्वारा किया गया रामचरितमानस का पद्यानुवाद 1948 में प्रकाशित हुआ था जिसके लिए वरान्निकोव को सोवियत संघ के सर्वोच्च पुरस्कार ऑर्डर ऑफ लेनिन से भी सम्मानित किया गया था। 
‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ के लेखक फादर कामिल बुल्के ने भी रामचरितमानस की महत्ता को रेखांकित किया है। बेल्जियम में जन्मे इस विद्वान ने अपनी उक्त पुस्तक में पृष्ठ संख्या 250 में डॉ रामकुमार वर्मा को उद्धृत करते हुए कहा है -
“हिंदी रामकथा साहित्य में तुलसीदास का एक प्रकार से एकाधिकार है। तुलसी की प्रतिभा और काव्यकला इतनी उत्कृष्ट प्रमाणित हुई कि उनके बाद किसी भी कवि की रामचरित संबंधी रचना उनके मानस की समानता में प्रसिद्धि प्राप्त न कर सकी, मानस के सामने कोई भी प्रबंध काव्य आदर की दृष्टि से न देखा गया।”   
यह वास्तविकता है कि जो प्रभाव रामचरितमानस का रहा, अन्य रामकथाओं और राम आख्यानों में कोई भी उसकी समता न कर सका। यही कारण है कि विश्व भर में रामचरित मानस का प्रचार और प्रसार हुआ। रामचरित मानस की दार्शनिकता, रसात्मकता, भाषा-सौष्ठव, भाव-पक्ष निरूपण की सरल, सौम्य और कलात्मक शैली, भक्ति भावना और लोक संग्रह का भाव इसे अपढ़ से अपढ़ और ज्ञानी से ज्ञानी, सभी के लिए एक समान प्रिय बना देता है। इसी कारण भारत और भरत वंशियों में रामचरितमानस को पूजा भाव के साथ पढ़ा जाता है और इसकी एक-एक पंक्ति को मंत्र के समान माना  जाता है। राम चरितमानस के बालकांड में तुलसीदास स्वयं कहते हैं-  
“मंत्र महामनि बिषय ब्याल के  
मेटत कठिन कुअंक भाल के
 (विषय रूपी सांप का विष उतारने के लिए मंत्र और महामणि हैं। ये ललाट पर लिखे हुए कठिनता से मिटने वाले बुरे लेखों (दुर्भाग्य) को मिटा देने वाले हैं)” 
रामचरितमानस की एक-एक पंक्ति मंत्र के समान इसी कारण प्रभावकारी है क्योंकि इसमें विशुद्ध चित्त से समग्र जगत को ही ‘सियाराम मय’ मानकर अपने भक्तिमय उद्गारों के साथ प्रणाम निवेदित किया गया है। साथ ही तुलसी का यह भी मानना है कि ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहँ हित होई’। कीर्ति, साहित्य और ऐश्वर्य गंगा के समान सबका हितकारी होना ही चाहिए। रामचरितमानस में आद्यंत यही भाव व्याप्त है। यही लोकमंगल रामकथा और रामचरित मानस का सार है। यही कारण है कि मानस में आम आदमी अपनी सभी समस्याओं का समाधान पाता है। गाँव का एक अनपढ़ किसान और मजदूर भी बात बात में मानस की चौपाइयों का उदाहरण देता है। विश्व भर के मानस मर्मज्ञ भी इसे अपने हृदय के निकट पाते हैं। इसकी एक-एक पंक्ति जैसे उनकी जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर देती है। 
इस संबंध में जगद्गुरु रामभद्राचार्य कहते हैं कि-
“रामायण तो बहुत लिखी गईं हैं, लेकिन तुलसीदास ने जो रामायण लिखी है, उससे ऐसा लगता है जैसे राष्ट्र की समस्याओं को ध्यान में रखकर ही रामायण लिखी गई है। रामचरितमानस भारतवर्ष की समस्त ज्वलंत समस्याओं के समाधान का शोध स्रोत है।”  
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रामचरितमानस में व्याप्त लोकमंगल और रचयिता की विशेषता को बताते हुए, अपने इतिहास ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के अंतर्गत भक्ति काल प्रकरण चार में कहा है कि- 
“इनकी भक्ति रस भरी वाणी जैसी मंगल कारिणी मानी गई है वैसी और किसी की नहीं। तुलसी की भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता है सर्वांगपूर्णता। भक्ति की चरम सीमा पर पहुँचकर भी उन्होंने लोक पक्ष को नहीं छोड़ा, लोक संग्रह उनकी भक्ति का एक अंग था।” 
भक्ति की यही सर्वांगपूर्णता और लोकनिष्ठा रामचरितमानस में सतत् प्रवहमान है जो उसे एक श्रेष्ठ ग्रंथ सिद्ध करती है। तुलसी के राम अत्यंत सरल और सौम्य हैं। वे शील, शक्ति और सौन्दर्य का समन्वय हैं। नकारात्मकता उन्हें छू तक नहीं गई है। यही कारण है कि वे सबके प्रिय हैं और सबके अपने हैं। इतने अपने हैं कि उनके राजा न बन पाने और वनवास की सूचना मात्र से अयोध्या के सभी निवासी व्याकुल हो जाते हैं। रथ के घोड़े तक आँसू बहाते हैं। यह हैं राम। राजा बनते-बनते जिसे 14 वर्ष का वनवास मिल जाए, वो भला प्रसन्न कैसे हो सकता है? उसके हृदय में खिन्नता भला कैसे न होगी? पर राम के मन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं क्योंकि वे राम हैं। अयोध्याकाण्ड के आरंभ में गोस्वामी तुलसीदास अपने आराध्य राम की स्तुति करते हुए कहते हैं-
“प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। 
मुखाम्बुजश्री रघुनंदनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा।।”    
राम तो हर स्थिति में सहज प्रसन्न रहने वाले हैं, वनवास उनके लिए दुःखकारक नहीं है। अतः वे अपने पिता दशरथ को ढाँढ़स बँधाते हुए कहते हैं-
“आयसु पालि जनम फलु पाई
ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई
बिदा मातु सन आवउँ मागी
चलिहउँ बनहिं बहुरि पग लागी
(आपकी आज्ञा पालन करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा। अतः कृपया आज्ञा दीजिए। माता से विदा माँग आता हूँ फिर आपके पैर लगकर वन को चलूँगा।)” 
जब हृदय में विषाद और खिन्नता नहीं तो फिर किसे के प्रति वैर का भी प्रश्न नहीं पैदा होता। इसीलिए भरत के प्रति उनके हृदय में किसी भी प्रकार से स्नेह कम नहीं होता, साथ ही माता कैकेयी के प्रति भी उनके हृदय में सम्मान और प्रेम कम नहीं होता। भरत जब तीनों माताओं सहित राम को लौटाने वन को जाते हैं तो राम तीनों माताओं में सबसे पहले माता कैकेयी से ही मिलते हैं। वन में भी राम सबके हृदय के राजा हैं। राम के वन आगमन के विषय में जानकर वन निवासी कोल-किरात ऐसे प्रसन्न हो जाते हैं मानो उन्हें नवनिधि प्राप्त हो गई हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि राम राजा राम हैं। वे लोक के हृदय के राजा हैं। लोक हृदय ही उनकी वास्तविक अयोध्या है। इसीलिए अयोध्याकाण्ड में जब लक्ष्मण माता सुमित्रा से वन-गमन की अनुमति के लिए आते हैं, तो वे उन्हें राम जानकी को माता पिता जान साथ जाने की अनुमति देती हैं और सीख भी देती हैं कि- “अवध तहाँ जहँ राम निवासू।”  
वस्तुतः राजा वही होता है जिसका चरित्र सात्विक और सरल हो, जिसके हृदय में सदैव ही लोक और लोक के प्रति प्रेम बसता हो। यही अथाह प्रेम राम का वैशिष्ट्य है जो सबको आकर्षित करता है और त्वरित भाव से अपना बना लेता है। यही लोक नायकत्व है, जो राजा राम को सबका प्रिय, सबके हृदय का राजा बनाता है। इसीलिए तुलसीदास कहते हैं-
रामहि केवल प्रेमु पिआरा जानि लेउ जो जाननिहारा 
राम श्रेष्ठ नायक हैं। उन्हें उनके जीवनकाल में ही लोग ईश्वर का अवतार मानने लगे थे। इस लोकमान्यता के बाद भी वे विनम्र हैं। कुछ भी निर्णय करने से पहले वे नीति निपुण राजा की भाँति सबकी सम्मति लेते हैं। जहाँ रावण अप्रिय सलाह पर सलाह देने वाले का उपहास करके उन्हें अपमानित करता है, वहीं राम विभीषण की समुद्र से विनती करने की और सुग्रीव की विभीषण को बंधक बनाने की अनुपयुक्त सलाह को भी सम्मान देते हैं। वे किसी का उपहास नहीं करते, बल्कि सबका मान रखते हैं। रामचरितमानस का पूरा कथ्य इसी प्रकार के अद्भुत प्रसंगों से भरा हुआ है। मानस के सभी पात्र अनूठे हैं। कथा का मुख्य खलनायक रावण भी राम से इसीलिए उलझता है क्योंकि कहीं न कहीं उसे भी राम के ईश्वरत्व का आभास है। 
“सुर रंजन भव भंजन भारा, जौ भगवंत लीन्ह अवतारा।
तौ मैं जाइ बयर हठ करिहऊँ, प्रभु सर प्रान तजें भव तरिहऊ।”
राम के चरित्र का यही औदात्य इस ग्रंथ को विशिष्ट बनाता है और इसी ने उसे विश्व भर में लोकप्रियता प्रदान की है।  इसी ने रामचरित मानस की चौपाइयों को अनपढ़ ग्रामीणों का कंठहार बनाया और इसी के प्रभाव के विषय में हिंदी साहित्य के इतिहास ‘लिंगविसटिक सर्वे ऑफ इंडिया’ के लेखक जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने रामचरित मानस को करोड़ों लोगों की बाइबिल कहा था। 
रामचरित मानस की वैश्विकता के संबंध में इसके अंग्रेजी अनुवादक एवर्ट ग्राउस द्वारा मानस के अनुवाद का उल्लेख करना भी आवश्यक है। ग्राउस के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना एशियाटिक सोसायटी जर्नल में 1876 में प्रकाशित हुई तथा 1877 में पश्चिमोत्तर शासन के सरकारी प्रेस से इसके पहले खंड बालकांड का प्रकाशन हुआ। 1880 तक मानस का पूरा अनुवाद छपते ही वह लोकप्रिय हो गया था। किसी भी भारतीय और मानस प्रेमी के लिए निश्चित तौर से यह गर्व की बात थी। श्रीधर पाठक ने उनके विषय में लिखा था-
“संस्कृत हिंदी रसिक विविध विद्यागुन मंडित
निज वानी में कीन्हीं तुलसीकृत रामायन
जासु अमी रस पियत आज अंग्रेजी बुधगन” 
 उन्हीं ग्राउस ने अपनी पुस्तक द रामायण ऑफ तुलसीदास में लिखा है- 
“तुलसीदास मिल्टन की तरह एक कवि मात्र नहीं थे, वह एक कानून निर्माता एवं मुक्तिदाता थे। जब देश मुस्लिम आतताइयों के अत्याचारों से पीढ़ित था और हिंदुओं पर न जाने कैसे-कैसे अत्याचार हो रहे थे, तो यह तुलसी ही थे जो आशा और मुक्ति लाए थे।”  
जब एक बड़ा लेखक लिखता है तो, वह अपने समय को भी अपनी लेखनी के माध्यम से शब्दबद्ध करता है। रामचरितमानस में भी वह युग उतर आया है, जिसमें संघर्ष था, पीड़ा थी, असह्य वेदना थी। इस सबके भोक्ता थे तुलसीदास और लोक में रमा हुआ उनका भक्त चित्त। अंग्रेज़ी विद्वान ग्राउस ने मानस के अध्ययन में उसी रमे हुए चित्त को समझा और व्यापक लोक को उससे जोड़ने के लिए मानस का अनुवाद किया। 
तुलसी ने भी जब राम रामचरितमानस को लिखा तो लोक कल्याण, भक्ति की सर्वजन सुलभता और भक्ति का वास्तविक अर्थ समझाना उनका मन्तव्य था। वे धर्म, नीति, भक्ति से सम्बद्ध व्यापक विभ्रमों को समाज से दूर करना चाहते थे। यही कारण है कि मानस लिख भर देना ही उनका उद्देश्य नहीं था। अतः उन्होंने रामलीला के माध्यम से इसे लोक-मानस के हृदय में उतारने का भी काम किया। इसी सब का प्रभाव था कि रामचरितमानस से प्रभावित होकर बहुत से ग्रंथ लिखे गए, विविध बोलियों में भी मानस के आधार पर लोकगीत और आख्यान रचे गए। यहाँ तक कि संतान के जन्म, विवाह आदि शुभ अवसरों पर घरों की दीवारों को मानस की चौपाइयाँ लिखकर सजाया जाने लगा। अखंड मानस पाठ, सुंदरकांड का पाठ, मानस अंताक्षरी और इन सबके माध्यम से लोक की जुबान पर राम, लोकभाषा में राम और लोक के मुहावरों में राम रमते चले गए। 
तुलसी ने रामचरित मानस के माध्यम से लोक को श्रद्धा और विश्वास से भी जोड़ा और भक्ति का सही अर्थ समझाया। इस संबंध में मानस के बालकांड का दूसरा छंद जो कि मानस में वर्णित 7 anushtup छंदों में से एक है, उल्लेखनीय है, जिसके अनुसार श्रद्धा और विश्वास ही शिव और पार्वती हैं। जब तक हृदय में श्रद्धा-विश्वास रूपी भवानी-शंकर की कृपा नहीं होती, तब तक सिद्ध महात्मा लोग भी अपने अंदर स्थित परमात्म तत्त्व का साक्षात्कार नहीं कर पाते। - 
“भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणो
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वांतः स्थमीश्वरम”
इसी सब का प्रभाव रहा कि किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचाव और शुभ की प्राप्ति के लिए अथवा किसी भी मंगल आयोजन के अवसर पर रामचरितमानस के अखंड पाठ की परंपरा चल पड़ी। अखंड मानस पाठ के लिए मंडलियाँ भी बनीं। यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि निरंतर आगे बढ़ता गया। इस प्रकार केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के कई देशों में रामलीला और अखंड मानस पाठ की परंपरा पहुंची। फ़िजी, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिटाड, इंडोनेशिया, जमैका, मलेशिया गुयामा आदि देशों में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गए हजारों श्रमिकों के लिए विदेशी भूमि पर और आततायी शासन में रामचरितमानस की यह पोथी ही उनकी संजीवनी बनी रही। गिरमिटियों के लिए राम और रामचरितमानस का क्या महत्व है, इस संबंध में विदेश में अंग्रेज़ी समेत विभिन्न विदेशी भाषाओं में रामकथा कहने वाले ‘संत ब्रह्मदेव उपाध्याय’ का यह कथन उल्लेखनीय है-
“अंग्रेज समुद्री टापुओं पर उपनिवेशों में मुफ़्त की मजदूरी के लिए भारतीयों को गुलाम बनाकर पानी के जहाज से ले गए। वे अपनी मातृभूमि छोड़ते वक्त जो सबसे कीमती वस्तु थी, उसे सीने से लगाकर ले गए और वह थी श्री रामचरितमानस या रामायण।”  
इस संबंध में मॉरीशस में प्रधानमंत्री के सलाहकार रहे श्री सुरेश रामवर्ण का कथन भी उल्लेखनीय है-
“दादा जी तो अब नहीं रहे लेकिन वह अपने बचपन की बात बताया करते थे। वे लोग खेत में काम कर रहे थे, तभी अंग्रेज गाड़ियों से आए और खेतों में काम करने वालों को रस्सी से बांध दिया। जबरन उनको उनके खेत, घर, गाँव देश से सुदूर ले जाने की प्रक्रिया आरंभ हुई तो हड़बड़ी में जो मिला, ले लिया। ज्यादातर लोगों ने अपने हाथ में रामचरित मानस की पोथी उठाई और पानी के जहाज में बैठा दिए गए... अपनी मातृभूमि, अपने तीर्थ ओझल होते गए लेकिन हमने अपने आराध्य, अपनी परंपराओं और संस्कृति को अपने सीने से लगाए रखा।”  
इस प्रकार भी मानस की विश्व यात्रा जारी रही। अब आज की स्थिति में देखें तो विदेशों में व्यापक स्तर पर रामचरित मानस पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की गोष्ठियाँ होती हैं। वहाँ कई मंडलियाँ भी हैं जो विभिन्न अवसरों पर रामचरितमानस का पाठ करती हैं। रामलीलाओं का आयोजन भी वहाँ बहुत ही भव्य ढंग से किया जाता है। मानस के प्रति प्रवासी भारतीयों का लगाव और पूजा भाव इतना है कि निरंतर इस पर शोध कार्य और रामचरित मानस को आधार बनाकर कुछ न कुछ करने का भाव उनमें रहता है। भारतीय मूल के एक अंग्रेजी विद्वान जिनका नाम प्रोफेसर शिवप्रकाश के अग्रवाल है,उन्होंने रामचरित मानस की शब्द अनुक्रमणिका तैयार की है। इस इंडेक्स में उन्होंने रामचरितमानस के प्रत्येक शब्द का सुलभ एवं विस्तृत संदर्भ दिया है। इस पुस्तक में लेखक ने ऐसी अनूठी पद्धति का प्रयोग किया है, जिससे मानस के किसी भी संस्करण में शब्दों को आसानी से खोजा जा सके।   इस प्रकार के कई रचनात्मक कार्य रामचरितमानस को आधार बनाकर किए जा रहे हैं। 
ऐसा माना जाता है कि तुलसी के रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने का भी प्रयास किया गया था। यह तो सर्व विदित ही है कि तुलसी को अपने समय में बहुत विरोध सहना पड़ा था। तो पांडुलिपि को नष्ट करने के प्रयास की बात अविश्वसनीय नहीं लगती। इस संबंध में भारत के पूर्व राजनयिक और भारतीय समाज और संस्कृति के गहन अध्येता श्री पवन कुमार वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेटेस्ट ‘ओड टु लॉर्ड राम :तुलसीदास राम चरितमानस’ में लिखा है-
“तुलसीदास ने रामचरित मानस की पांडुलिपि की एक कॉपी अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक और वित्त मंत्री टोडरमल को दे दी थी ताकि वह सुरक्षित रहे। काशी के पंडे इस बात से नाराज थे कि तुलसीदास राम को देवभाषा संस्कृत से अलग क्यों कर रहे हैं। तुलसीदास का जीवन सफर एक अनाथ और आम रामबोला से गोस्वामी तुलसीदास बनने का है।”  
सीधी सी बात है कि तुलसीदास को बहुत विरोध भी सहन करना पड़ा किन्तु मानस में व्याप्त लोकमंगल और भक्ति साधना का जो मार्ग उन्होंने प्रशस्त किया, उसने मानस के महत्व को कम नहीं होने दिया बल्कि इसकी लोकप्रियता को वैश्विक आधार प्रदान किया और यही भाव मानस प्रेमियों में भी निरंतर व्यापता रहा। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि यह वैश्विक आधार यूँ ही नहीं है। राम विश्व रूप हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में राम के विश्व रूप की ही परिकल्पना प्रस्तुत की है। राम सम्पूर्ण चराचर विश्वरूप है। लंका कांड में मंदोदरी राम के विषय में कहती है-
“पद पाताल सीस अज धामा, अपर लोक अंग अंग विश्रामा...” 
स्वयं राम भी अपने अनन्य भक्त की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि-
“सो अनन्य जाकैं अस मति न टरई हनुमंत, मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत” 
कहने का तात्पर्य यही है कि जब कथा नायक स्वयं परमात्म तत्त्व ‘रामाख्यम् जगदीश्वरम् ’ हैं तो उनकी कथा राम चरितमानस की विश्वव्याप्ति भी स्वयं सिद्ध और स्वाभाविक ही है। 


सोमवार, 13 मई 2024

कविता




 मैं जब चुपचाप होती हूँ

वो बोलती है

अन्तर्मन के गहरे कपाट खोलती है

वो घूम आती है विश्व

और उसकी परतों की बुनावट

और बे-क़लम ही 

उन्हें उकेर देती है

वो अंदर बहुत अंदर उतर

चेतनाओं को भी सुन आती है

और गढ़ देती है उनके संवाद 

वो तैरती भी है और

हवाओं सी घुल 

पहुँच जाती है हर ओर

वो बरस पड़ती है रेगिस्तानों में छमाछम 

और खिल उठती है 

रुके हुए पानी में भी

वो बहती है आत्माओं में भी

और उभर आती है 

सशरीर

वो बोलती है न जाने कितनी बोलियाँ गुपचुप

और मैं पकड़ती रह जाती हूँ

उनमें छिपी कितनी ही 

अनसुनी ध्वनियाँ 

जो कविता  

 बोलती है

 अनगिनत भाषाओं में...



 

गुरुवार, 9 मई 2024

 Institute of Liver and Biliary Sciences एक बड़ा नाम है और इसके साथ नाम है डॉ एस.के. सरीन का। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ सरीन  विश्व-विख्यात डॉक्टर हैं। इसलिये  उनसे मिलना भी आसान नहीं। मरीज़ हर प्रकार की असुविधा झेलकर भी ILBS पहुँचते हैं, उनसे इलाज की तलाश में।

मैं भी पिछले दिनों अस्पताल में भर्ती थी। फिर सोचा डॉ सरीन को भी दिखा लिया जाए।

डॉक्टर साहब से मिलना हुआ। पहले जूनियर डॉक्टर और फिर डॉ सरीन से। दोनों ही डॉक्टर्स ने पुरानी फाइल देखीं। जो दवाइयाँ ले रही थी, वो भी देखीं। उन्हें दवाइयाँ ठीक लगीं। हां एक दवाई pedamet 120MG पर उन्होंने कहा- ये स्टेरॉयड है हम इसे 80 MG कर रहे हैं। फिर 60, 40, 20 पर लाकर इसे हटा देंगे। ठीक हो जाओगी। कोई परहेज़ नहीं है। रोज़   बैडमिंटन  खेलो और जीतो। ओके? ओके, थैंक यू डॉक्टर साहब कहकर मैं आश्वस्त भाव से बाहर आ गई। सोचा दवाइयाँ भी यहीं से ले लेती हूँ। पर 80 MG का स्टेरॉयड नहीं मिला। अब कॉलेज के पास से दवाई लेने की सोची। दवाइयाँ मिल गईं। तभी बिलिंग सेक्शन पर केमिस्ट ने कहा-  मैडम पेशेन्ट कौन है? Pedamet 80  MG तो आती ही नहीं है। ये बहुत हाई है आपको किसने लिखी है?

8 और 4 MG की दे रहा हूँ। आपको इतनी गोलियां खानी हैं कि टोटल 80 MG हो जाए। अब मेरा माथा ठनका कि 80 MG की नहीं  आती फिर मैं 120 MG की कैसे खा रही हूँ! फौरन घर  फोन किया। सब चिल्लाए, घर आओ। डॉ सरीन से बड़ी डॉक्टर बनने की ज़रूरत नहीं, कैमिस्ट की बात पर यकीन कर रही हो! 

पर मन नहीं माना और मैं उस डॉक्टर के पास पहुँची जिसने 120 MG की स्टेरॉईड लिखी थी। डॉक्टर नहीं था इसलिये अस्पताल की फार्मेसी पर गई जहाँ से अन्य दवाओं के साथ 120 MG की स्टेरॉयड ली थी। वहाँ पता चला कि कि ये दवा 8 MG से ऊपर नहीं आती।  ये गलत लिख गया है। 12 MG लिखना था। 8 और 4 की दो गोली जो दी जा रही थीं, वो यही 12 MG की दवा है। 

आश्चर्य इस बात का है कि पहले डॉक्टर ने जो गलती की उसे डॉ  सरीन नहीं पकड़ पाए! डॉ सरीन  को क्या उस दवा की समझ नहीं थी? और अगर 80 MG का वो स्टेरॉयड मैं खा लेती? शायद अब तक होती ही ना और अगर होती भी तो न जाने किस स्थिति में। 

ये निश्चित तौर पर मेडिकल ब्लंडर है। पर डॉ सरीन जैसे सीनियर डॉक्टर से ये ब्लंडर हो सकता है, सोच के परे है। वो मुझे 80 MG का pedamet कैसे लिख सकते हैं!

मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

हनुमान जयंती पर

 


हनुमान जी के जन्मदिवस पर कुछ बुंदेली में🌹🌹


जब सैं होश सम्भालो हमने

जौई जी मैं जानो 

कै सब मौड़ी-मौड़न के तुम

बड़के बब्बा आनौ।

घर में तुमईं हो सबसे जेठे 

सब बूढ़न बड़कन सैं

सो सब निर्णय तुमईं लैहो

ब्याओ, धरम-करम के

बैसैं भी प्रभु राम सिया के

तुमईं लाड़-लड़ैते

बसे तुमाये रोम रोम में

राम सिया चित चेते

तुमनौं चिट्ठी पाती दैबो

भगवान राम खाँ दैबो

तुमखाँ बिपत सुनाबो

सीधे राम सिया सैं कैबो

ऐसे महाबीर बब्बा तुम

रहियो हम पै सूदे

मूढ़न मैं मूढ़ हम आँएं

करियौ भलो जो सूझे

आज तुमाओ जनमदिवस है

का दै दैं हम तुमखौं 

उलटे हम तौ माँगन बारे

दै दो तुम कछु हमखौं

ज्ञान, प्रेम, बुद्धि और साहस

दो कष्टन सैं मुक्ति

और भली जो तुमैं लगत हो

दै दो ऐसी तृप्ति

जे ई हमाई गोल मिठाई

जे ई सब परसाद

जे ई हमाए लक्ष जीवन के

जे ई लोकाचार

दै दो बब्बा जल्दी सैं

अब और नईं कछु चानैं

हाथ तुमाओ रये मूड़ पै

बस इत्तौ ई चानैं

महाबीर बब्बा तुमैं जन्मदिन की भौत भौत शुभकामनाएँ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏💐💐💐💐💐💐 

चुम्बक





कोर्ट परिसर में लगातार चहल कदमी करते लोग। जिनमें शामिल थी खिचड़ीनुमाँ जमात। कुछ मज़दूर और निम्न वर्गीय लोग, कुछ आम घर परिवारों के नौकरी पेशा क़िस्म के लोग, कुछ उद्यमी और व्यवसायी लोग। अधेड़, उम्रदराज़ हर उम्र के लोग- कहीं कहीं इनके साथ घिसटते बच्चे भी और... इन सबके बीच सफेदी को स्याह रँग ओढ़ाए इधर से उधर भटकती एक खास सियारी क़िस्म भी। 

इन आम लोगों के चेहरों पर एक विचित्र सी मायूसी थी। कुछ के चेहरों पर यह मायूसी मुर्दनी की हद तक जमी दिख रही थी। पर ये लोग न जाने किस प्रतीक्षा में अब तक मुर्दा नहीं हुए थे और न जाने कितने समय से इस परिसर में खिंचे चले आ रहे थे। यह चले आना ऐसा था कि  लगता था कि यहाँ की दीवारें, फ़र्श, बैंचें, सीढ़ियाँ और घूरती छत भी अब उन चेहरों और दौड़ते-भागते क़दमों को पहचानती होगी। लियो तॉलस्तॉय की कहानी द कोब्लर की तरह जिसमें मोची जो अपनी छोटी सी खिड़की से आने- जाने वालों के जूते देखकर उन्हें पहचान लेता था। ये सब भी शायद वैसे ही हर किसी को जानती होंगी। सबके रूप रेख, सफ़ेद सतखिर्रे होते बाल और झुर्रियों को भी पहचानती होंगी.. पर इस पहचान का कोई अर्थ? 

अधिकांश पहचानें निरर्थक होतीं हैं। शायद ये भी उसी प्रकार की हों! 

मेरी घूमतीं निगाहें एक तेज़ चाल से आती महिला पर टिक गईं। उसकी उम्र शायद 35-40 के आस पास होगी। मध्यम कद-काठी, छरहरा शरीर, चेहरा साफ़। सिलेटी पतलून और काला टॉप। गले में सुरुचिपूर्ण ढंग से लपेटा गया बादामी रंग का शॉल। उसके चेहरे पर भी वही भाव। या यूँ कहें भावहीन चेहरा। वो हताश सी कुछ देर कोर्ट रूम के बाहर टहलती रही। साथ ही उसकी आँखें जैसे भरी बेंचों में एक अदद खाली सीट तलाश रहीं थीं।किस्मत से एक सीट खाली हुई, महिला लपककर उस सीट पर बैठ गई। इत्तेफाक़ से उसकी बगल वाली सीट भी खाली हो गई थी, जिस पर एक अधेड़  उम्र की महिला अपने ग्राम्य अंदाज़ में फैलकर बैठ गई। अधेढ़  महिला का शॉल उस 35-40 वर्ष की महिला को छू न जाए, यह सोचकर ही वह थोड़ा सा और खिसक गई। पर ग्राम्य महिला को उससे जैसे कोई फ़र्क न पड़ा, वह और आराम से बैठ गई और अपने मुँह को पूरे विस्तार के साथ खोलकर जम्हाई लेने लगी।अधेड़ आयु की वह महिला  जितनी बार भी जम्हाई लेती, बगल में बैठी महिला कुछ और असहज हो जाती। मैं देख पा रही थी कि जब जब ग्राम्य वेशभूषा की उस महिला का मुँह खुलता, पतलून वाली महिला अपने मुँह और नाक को अपने शॉल से ढँक लेती। साफ़ था कि वो उसे निहायत ही नापसंद कर रही है। मैं सोच रही थी कि कैसी विवशता है। ये महिला उस फूहड़ महिला को नहीं झेल पा रही है। उसके बार-बार खुलते-बंद होते मुँह से निकलती बदबू से त्रस्त हो रही है, फिर भी वहीं बैठी है! 

ओह! क्या ये वाकई सच है कि कई बार विवशताएँ ऐसी असहज स्थितियाँ उत्पन्न कर देती हैं कि इंसान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। इंसान वाकई कठपुतली ही तो नहीं?

मैं चहल कदमी करते हुए कुछ दूर निकल आई। ऐसी जगह पर कोई कब तक ठहर सकता है भला? शायद तब तक जब तक नियति ही उसे किसी स्थान से न जोड़ दे। घड़ी 11 बजा रही थी। मुझे वापस उसी परिसर में लौटना था। लौटकर जो देखा वो हैरान करने वाला था। पतलून वाली महिला अब उस ग्राम्य महिला के हाथ को अपने हाथ में लिये उसे सांत्वना दे रही थी! ओह ये तो अभी कुछ देर पहले तक...

मैं फिर सोच में डूब गई कि इसे क्या कहेंगे नियति या जीवन?



रविवार, 21 अप्रैल 2024

बुन्देली में रामकथा

 


  

रामाख्यान विश्व का सबसे बड़ा आख्यान है। विश्व की विभिन्न भाषाओं में राम कथा अपने अलग-अलग कलेवर के साथ उपस्थित है। ऐसा इसलिए क्योंकि राम कथा लोक से जुड़ा हुआ आख्यान है। इसमें जिस सौन्दर्य के साथ लोक, जीवन और आदर्श का निदर्शन है, वह ऐसे ही गांभीर्य और औदात्य के साथ अन्यत्र दुर्लभ है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय जनमानस के संस्कार राम से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि राम लोक की भाषा में हैं। लोक के मुहावरे में हैं, जन जीवन, जगत में राम हैं। भारत के प्रत्येक अञ्चल में राम हैं। जब हर स्थान राममय है तो पुण्य भारत की वह पुण्य भूमि जहाँ आदि कवि वाल्मीकि ने विश्व के प्रथम महाकाव्य में लोक के राम को लोक के समक्ष प्रस्तुत किया था, वह अञ्चल विशेष भला राममय कैसे न होगा! 


     चित्रकूट गिरि यहाँ,

 जहाँ प्रकृति प्रभुताद्भुत 

वनवासी श्री राम

 रहे सीता लक्ष्मण युत

हुआ जनकजा स्नान

 तीर से जो अति पावन

जिसे लक्ष्य कर रचा गया

 धाराधर धावन

यह प्रभु पद

 रजमयी पुनीत प्रणम्य भूमि है

रमे राम बुंदेलखंड

 वह रम्य भूमि है


ओरछा के अंतिम राजकवि स्व. मुंशी अजमेरी, जिनका वास्तविक नाम श्री प्रेम बिहारी था, की उपर्युक्त पंक्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि बुंदेलखंड के कण-कण में राम बसते है। 

सप्तकुल पर्वतों में ज्येष्ठ विंध्याचल, जिसकी महिमा का वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व में भी है, से आच्छादित भारत का हृदयस्थल जिसके उत्तर में यमुना, दक्षिण में नर्मदा, पश्चिम में काली सिंध, चम्बल और बेतवा नदी के साथ और पूर्व में टोंस और सोन नदी प्रवाहित है, बुन्देलखंड है। चंदेल और फिर बुन्देल राजाओं की शासनस्थली होने के कारण इस क्षेत्र का नाम बुंदेलखंड पड़ गया और यहाँ बोली जाने वाली बोली बुन्देलखंडी कही जाने लगी। 

बुंदेलखंड तपस्वियों की धरती है। यही कारण है कि इस भूमि का रामकथा से भी गहरा नाता है। कहते हैं कि यदि श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या नगरी है तो बुन्देलखंड ही वह प्रदेश है, जहाँ श्री राम ने पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अपने वनवास का समय बिताया। अयोध्याकाण्ड का वह प्रसंग जब श्री राम जानकी, अनुज लक्ष्मण और गुह के साथ ऋषि भरद्वाज जी के आश्रम में पधारते हैं और उनसे मार्ग पूछते हैं-

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं

नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं

तब भरद्वाज जी मन ही मन हँसकर श्री राम जी से कहते हैं कि आपके लिए तो सभी मार्ग सुगम हैं और अपने चार ब्रह्मचारियों को उन्हें मार्ग बताने के लिए साथ भेजते हैं। जहाँ गाँव जंगल होते हुए, गाँव के लोगों से बोलते-बतियाते राम वाल्मीकि आश्रम पहुंचते हैं। वहाँ जाकर वे वाल्मीकि जी से कहते हैं-

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ

सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ

तहँ रचि रुचिर परन तृन साला

बासु करौं कछु काल कृपाला

और वाल्मीकि जी कहते हैं-

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ 

मैं पूँछत सकुचाउँ

जहँ न होहु तहँ देहु 

कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ 

और फिर वे चित्रकूट जहाँ अत्रि आदि मुनियों का निवास है, पवित्र मंदाकिनी नदी जहाँ प्रवाहित है, का महात्मय बताते हैं और वहीं निवास करने के लिए राम को कहते हैं-

चित्रकूट गिरि करहु निवासू

तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू


और फिर राम पधारते हैं इस विन्ध्याचल की भूमि पर। बुंदेलखंड की भूमि पर। विंध्याचल पर्वत शृंखला से घिरी यह बुंदेलखंड की भूमि जितनी वन संपदा से आच्छादित है, उतनी ही ऊबड़-खाबड़ और पथरीली भी है। इन घने जंगलों और पर्वतों की गहन दुर्गम कन्दराओं में न जाने कितने योगी, यति, तपस्वी साधनारत रहते हैं। जो श्री राम के आगमन से स्वयं को बड़ा ही पुण्यभागी मानते हैं। कवितावली के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास जी बड़े ही रोचक ढंग से, रस लेकर यह वर्णन करते है कि किस प्रकार राम के आने से सब तपस्वी प्रसन्न हो गए है।   


बिंध्य के बासी उदासी

तपोब्रतधारी महा बिनु नारी दुखारे

गौतमतीय तरी तुलसी,

सो कथा सुनि भे मुनिबृंद सुखारे

ह्वै हैं सिला सब चंद्रमुखी 

परसे पद मंजुल कंज तिहारे 

कीन्हीं भली रघुनायक जू 

करुना करि कानन को पगु धारे 

तो कहने का तात्पर्य राम और रामकथा से बुंदेलखंड का गहरा संबंध है। बल्कि यदि यह कहा जाए कि बुन्देलखड़ ही राम कथा का उत्पत्ति का केंद्र है तो अन्यथा न होगा।  

वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों का ही इसी भूमि से संबंध रहा। आदि कवि वाल्मीकि का आश्रम लालापुर गाँव में चित्रकूट से कुछ पहले ही स्थित है और तुलसीदास भी चित्रकूट में राजापुर के निवासी थे। 

इन्हीं की परंपरा में ग्वालियर निवासी विष्णुदास का भी नाम आता है। विष्णुदास ने तुलसीदास से लगभग 100 वर्ष पूर्व बुन्देली मिश्रित ब्रज भाषा में ‘रामायन कथा’ लिखी। ‘रामायन कथा’ में तीन कांड (बाल कांड, सुंदरकांड और उत्तरकाण्ड) और 51 सर्ग हैं। ‘रामायन कथा’ के प्रथम कांड में राम जन्म से किष्किन्धा कांड तक की कथा है। सुंदरकांड में राज्याभिषेक तक की कथा है और उत्तरकाण्ड में राम के स्वर्गारोहण तक की कथा का वर्णन है। कह सकते हैं कि ‘रामायन कथा’ बुन्देलखंड का पहला महाकाव्य है। रामायन कथा से एक उदाहरण दृष्टव्य है-

रोग शोक आपदा न होई विधवा नारि न दीखत कोई

परजा चरन सकल विधि धरै परधन लोभ न कोउ करै

मीत्रु अराज होइ नहिं काल नित माँगे धन बरसै धन माल

कछू अनीति न होइ अकाज, सात दीप मँह पाजत राज

15 वी शताब्दी में ही ग्वालियर के ही जैन कवि रईधू ने सोनगिरि में रहकर पद्मपुराण नाम से अपभ्रंश में रामकथा की रचना की। कविवर कन्हरदास जिनका समय 1580 माना जाता है, की फुटकर रचनाएँ भी महत्वपूर्ण हैं। इनके बाद गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के विषय में तो कहा ही क्या जाए, वो तो बुंदेलखंड ही नहीं, पूरे भारत का कंठकार है। इसके पश्चात संवत 1658 में ओरछा के राजकवि केशवदास ने राम चंद्रिका नामक प्रबंध काव्य का सृजन किया। अपनी पुस्तक रसिक प्रिया में वे राजा राम की नगरी ओरछा का महत्व बताते हुए कहते हैं

नदी बेतवै तीर जहँ तीरथ तुंगारन्य

नगर ओढछों बहुबसै धरनीतल मैं धन्य

केशवदास का ग्रंथ रामचंद्रिका तो है ही महत्वपूर्ण, जिसमें एकदम अलग ढंग से उन्होंने रामकथा का प्रणयन किया है। इसी प्रकार कवि मोहन दास मिश्र कृत रामअश्वमेध, मुंशी अजमेरी कृत श्री रामचरित नाटक भी उल्लेखनीय हैं। जानकी प्रसाद रसिक बिहारी का राम रसायन ग्रंथ भी उल्लेखनीय है। गोप कवि कृत रामचंद्राभरण जैसा ग्रंथ भी महत्वपूर्ण रचना है जिसमें राम के ऐश्वर्य का चित्रण है। इस प्रकार से और भी कई ग्रंथ राम कथा को आधार बनाकर लिखे गए। ओरछा की रानी वृषभानु कुंअरि कृत राम भक्ति परक पद भी बुन्देलखंड में बहुत उत्साह से गाए जाते हैं। 

कुछ ऐसा भी संयोग है कि 4 अप्रैल सन् 1574 ई. के दिन ही जबकि रामभक्त तुलसीदास जी ने रामचरित मानस का प्रणयन आरंभ किया था, उसी दिन ओरछा की महारानी गणेश कुंअरि ने अयोध्या से लाई गई राम लला की प्रतिमा की अपने महल में प्रतिष्ठा कराई थी। तभी से राम लला ओरछा के राम राजा सरकार बने। प्रसिद्ध कवि गदाधर भट्ट ने इसे कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया है-

   


मधुकर महीप महिमा विसाल

सु गनेस कुँवर रानी नृपाल

तिहि न्हात अवध सरजू अमंद

प्रगटे सुभक्ति लखि रामचंद्र

ऐसी भी मान्यता है कि भगवान श्री राम प्रातः से संध्याकाल तक ओरछा में निवास करते हैं और रात्रि समय अयोध्या में निवास करते हैं। कहा जाता है कि जब सरयू में रानी जी को श्री राम का विग्रह प्राप्त हुआ तो ओरछा चलने हेतु उन्होंने तीन शर्तें रखीं थीं। एक तो अयोध्या से ओरछा तक की यात्रा पुष्य नक्षत्र में ही होगी, राम जी एक बार जिस स्थान पर स्थापित हो जाएंगे, वहाँ से फिर कहीं नहीं जाएंगे और तीसरी शर्त यह थी कि जहाँ वो रहेंगे, वह स्थान उजाड़ हो जाएगा। ऐसी स्थिति में गोस्वामी तुलसीदास जी के साथ पंचायत हुई। इस पंचायत में यह निर्णय लिया गया कि राम अकेले ही ओरछा पधारें। माता सीता अयोध्या में ही विराजेंगी अतः प्रभु श्री राम को वापस अयोध्या पधारना ही होगा। तभी से यह कहा जाता है कि-

राम राजा सरकार के दो निवास हैं खास

दिवस ओरछा में रहत रैन अयोध्या वास

कहते हैं कि ओरछा में राम लला के आगमन पर ओरछा के राजा श्री मधुकर शाह जू देव ने अपना राज्य श्री राम राजा के चरणों में समर्पित कर दिया था। कारण कि एक राज्य के दो अधिपति होना असंभव है। अतः भगवान श्री राम ओरछा के राम राजा सरकार हो गए और ओरछा के राजा मधुकर शाह जू देव ओरछा के कार्यवाहक नरेश। यही कारण है कि आज भी राम राजा की आरती के समय पुलिस गार्ड द्वारा विधिवत् सलामी दी जाती है। 

तुलसीकृत रामचरित मानस और ओरछा में राम राजा की प्रतिष्ठा ये दो ऐसी घटनाएँ थीं, जिन्होंने बुंदेलखंड को राम कथा का क्षेत्र ही घोषित कर दिया। बुन्देली लोक मानस की वाणी में यह कथा विविध रूपों में बसी हुई है-

एक राम एक रवन्ना

वे छत्री वे बाभन्ना

उन्ने उनकी नार हरी

उन्ने उनकी कुगत करी

बातन बड़ गयो बातन्ना

तुलसी रच दओ पोथन्ना

बुन्देली लोक कवि ईसुरी ने भी रामभक्ति परक चौकड़ियाँ लिखी हैं-

जाके राम चंद्र रखवारे को कर सकत तगारे

बड़े भए प्रह्लाद बचाये हिरनाकुस खों मारे

राना जहर दओ मीरा खों प्रीतम मान समारे

मसकी जाय ग्राह की गर्दन गह गजराज निकारे

ईसुर प्रभु ने गाज बचायी सिर पै गिरत हमारे

पन्ना दरबार के राजकवि पंडित कृष्णदास ने जिस प्रकार का काव्य रचा उसका विषय या तो श्री राम रहे या राम भक्त हनुमान जी। इनकी रचनाएँ भी लोक में अत्यंत प्रसिद्ध हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य है-

राजन के राजा महराजन के महाराज

साहन के शाह बात ऐन के लखैया हौ

देवन के देव सर्व सेवन के महासेव

धर्मिन के धर्म कर्म कर्म के रखैया हौ

कृष्ण कवि वीरन के वीर, धीर धीरन के

परम कृपालु दीन दास के सहैया हो

भानुकुल तिलक सुजान वरदायक हौ

भानुकुल तिलक भानु सो हमारे रघुरैया हौ

इसी प्रकार राम कथा गायक रामसखे, रसिकबिहारी कृत राम रसायन आदि भी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। लोक काव्य और लोकगीतों में भी राम कथा विषयक प्रसंगों को आधार बनाकर जीवन की व्याख्या की गई है। बुंदेलखंड के भित्तिचित्रों लोककथाओं यहाँ तक कि स्थापत्य में भी रामकथा से सबंधित वृत्तान्त मिलते हैं। फिर भला लेखकों-साहित्यकारों की लेखनी रामकथा से कैसे अछूती रह सकती है। 





संदर्भ ग्रंथ 


साक्षी : अंक 20, भारतीय भाषाओं में रामकथा: बुन्देली, संपादक डॉ योगेंद्र प्रताप सिंह, वाणी प्रकाशन 

तुलसीदास कृत रामचरितमानस :  गीताप्रेस गोरखपुर  

कवितावली, गीताप्रेस गोरखपुर

विश्वनाथ मिश्र, संपादक केशव ग्रंथावली, खंड 2, हिन्दुस्तानी अकादमी इलाहाबाद  

ईसुरी, महक बुन्देली माटी की, गोइल गौरव ग्रंथ, पृष्ठ संख्या 421 

बुंदेलखंड की छंदबद्ध काव्य परंपरा, डॉ बहादुर सिंह परमार, आदिवासी लोककला अकादमी 


रविवार, 14 अप्रैल 2024

चलते- चलते

 सुनिये, सम्भल के बोलिये

वरना नहीं दिक्कत कोई   

बात करना छोड़िये।

आज की तारीख में

 मँहगा सलीका हो गया

जानते हैं हम, तो अब 

सलीकेदार बनना छोड़िये

है किसे अब वक्त

देखे दोष भी अपने कभी

दूसरों के दोष गढ़-गिन 

भगवान बनना छोड़िये

रात अंधियारी अगर है

वक्त की दरकार ये

हर सुबह और रोशनी को

 जागीर कहना छोड़िये

हो बहुत ऊँची

 मगर है रेत की दीवार ही

आंधियों से वैर लेकर

सर छुपाना छोड़िये

मुट्ठियों में ले चले हम 

भूमि और आकाश भी

हम से अब यूँ दायरों की

बात करना छोड़िये


शनिवार, 9 मार्च 2024

जगन्नाथ पुरी


  

भारत के पूर्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से आठवां बड़ा राज्य है उड़ीसा। इसी उड़ीसा का एक प्रमुख नगर है जगन्नाथ पुरी।

 आम बोलचाल में इसे पुरी भी कहते हैं। हालांकि युगों से जगन्नाथ जी की इस नगरी के कई  नाम रहे हैं। जैसे- नीलगिरी, नीलाद्रि, नीलांचल, पुरुषोत्तम, शंखक्षेत्र, श्रीक्षेत्र, जगन्नाथ धाम, ‘स्वामी जू’ की नगरी और जगन्नाथ पुरी। आस्था की यह नगरी सनातन धर्म में चार धामों में से एक धाम के रूप में भी ख्यात है। 

 जगन्नाथ जी की इस नगरी से मेरा प्रथम परिचय मेरे घर से ही हुआ। चैत्र माह आने से पूर्व ही घर में भले बिराजे जू की चर्चा आरंभ हो जाती थी। यह भले बिराजे जू कोई और नहीं, बल्कि पुरी में विराजमान भगवान जगन्नाथ अर्थात् कृष्ण जी का ही हमसे परिचय था जो, अपने बड़े भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ युगों का भ्रमण करते हुए (सतजुग छोड़ी मथुरा नगरी, द्वापर छोड़ी काशी, कलियुग में तौ आन बिराजे बिन्द्राबन के बासी) उड़ीसा में आन विराजे हैं। हिंदू वर्ष यानी चैत्र मास का आरंभ हमारे यहां जगन्नाथ जी के आगमन और उनकी पूजा से ही होता है। जबसे स्मृति है चैत्र मास के हमारे प्रमुख अतिथि होते भगवान जगन्नाथ। जिनकी आवभगत में प्रति सोमवार भगवान जी का अलग भोग होता। पहला चना गुड़, फिर गुरधानी, फिर पंचमेर (5 प्रकार का मिष्ठान्न), चौथा छप्पन भोग और पांचवा सोमवार यदि पड़ता था, तो भटा गकरिया। इसके साथ चुरुआ (गुड़ का पानी) ज़रूर होता, जो पुरी से लाए बड़े से पीतल के लोटे में रखा जाता, उसमें पुरी से ही लाए गए,पाँच बेंत रखे जाते जो कथा के दौरान खड़काए जाते और पूजा के बाद पाँच-पाँच बार भेँटे जाते। एक पीतल की थाली भी पूजा में पुजती, जिस पर लोटे के समान ही भगवान जगन्नाथ जी का चित्र अंकित होता। खास टेसू के फूलों से भगवान को सजाया जाता और फिर विधि-विधान से पूजा होती। बाई (पड़दादी) कथा सुनातीं स्वामी जू की, प्रभु श्री जगन्नाथ जी की। इस पूरी कथा में भाट-भाटिन, राजा-रानी, किसान, श्रमिक, और न जाने कितने जीव-जन्तु, वृक्ष और तालाब अपनी व्यथा और पीड़ाओं के साथ आते। अपनी अक्षमता या असमर्थता के कारण वे तो जगन्नाथ जी के धाम  न जा पाते पर यात्रा पर निकले भाट को अपने संदेसे भेजते और अंततः समाधान पाते। अन्ततः बाई कहतीं जैसे भाट भिखारी की सुनी, सबकी सुनी सो ऊसी हमाई भी सुनियो।

 और... इन सबके साथ आता लहराता विशाल समुद्र। समुद्र का जो वर्णन बाई करतीं, वो हमें भी यात्री बनाने के लिये बहुत था। क्योंकि समुद्र हमारे लिये साधारण नहीं था, वो तो समुद्र देवता थे जो जगन्नाथ जी के चरण पखारते थे। उनके दर्शन को मंदिर तक खिंचे चले आते थे। पर जब समझाने पर भी न माने तो हनुमान जी की  हर ओर तैनाती कर दी गई। पर जब वह भी जगन्नाथ जी के आकर्षण में मंदिर चले आए और पीछे-पीछे नगर को बहाता समुद्र भी। तो जगन्नाथ जी ने हनुमान जी को बेड़ी में बांध दिया। मतलब यह तय था कि वहाँ भगवान जगन्नाथ जी मिलते हैं। इसलिये समुद्र बचपन से ही मेरी स्मृतियों में अपने हेड़ों (लहरों) के साथ बस गया था। यही कारण था कि बचपन की जो पहली यात्रा स्मृति में सजी वो पुरी की ही थी। पहला समुद्र दर्शन भी पुरी का ही था, विशाल लहराता सुंदर पुरी का समुद्र। या भूगोल की भाषा में कहें तो तीन ओर भू भाग से घिरी बंगाल की खाड़ी। जहाँ मिलते हैं सबका न्याव करने बैठे, सबकी सुनने वाले, जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ। 

जगन्नाथ पुरी के विषय में हरि अनंत हरि कथा अनंता के समान ही अनंत कथाएँ हैं। रथ यात्रा और 6 बार के भोग की भी कथाएँ हैं, मंदिर में उल्टी लटकी एकादशी की भी कथा है और भी न जाने कितनी कथाएँ हैं जो पुरी में प्रवेश के साथ ही अनुभव जगत का जीवंत अंग बन जाती हैं। रक्षक की भूमिका में अलग-अलग दिशाओं में जगन्नाथ जी की आज्ञा से तैनात बैठे हनुमान जी, और उनमें भी बेड़ी हनुमान जी मन में जो भाव भरते हैं, उसे अनुभव करने के लिये भाट सी गठरियन संदेसे भरी यात्रा ज़रूरी है।  भाट तो पैदल चला था और महिनों बाद स्वामी जू नौं पहुँचा था। पर आज कुछ घंटों में ही पुरी की यात्रा संभव है। पर हाँ कहते हैं कि पुरी में तीन दिन और तीन रात से अधिक ठहरे तो स्वामी जी की छड़ी लगना तय है और जो इतना ही रुके तो जगन्नाथ जी की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति सुनिश्चित है। अत: कहते हैं कि  समय से लौट आएं पर संदेसे ज़रूर लेकर जाएं और स्वामी जू को सब सुनाकर भी आएं। नहीं तो पता है न भाट भिखारी की कहानी का वो अंश जब वो संदेसे भूल गया था?

एक अनुभव यह भी रहा कि मुझे लगता था, समुद्र से सुंदर कुछ नहीं, मंदिर भी इतना आकर्षक नहीं हो सकता। कभी गरजती, कभी नाचती, कभी हिंडोले सी बन जातीं लहरों का ऐसा मोहक नृत्य दुर्लभ है। पर सत्य यह है कि मंदिर में जगन्नाथ जी का जो आकर्षण समाया हुआ है, वह अवर्णनीय है। मंदिर दर्शन और जगन्नाथ जी के दर्शन के सामने समुद्र इस विश्व के समान कृष्ण की मुरली की तान पर थिरकता सा लगता है। ऐसे में अभिभूत आत्मा नतमस्तक हो कह उठती है- स्वामी भले बिराजे जू।

  


रविवार, 14 जनवरी 2024

 आज जीवन के उस पड़ाव पर हूँ, जब विगत को विश्लेषक बुद्धि के साथ देख रही हूँ। क्या खोया, क्या पाया सब समझ पा रही हूँ। अपनी मूर्खताओं को भी समझ और देख पा रही हूँ। दुनिया को अब थोड़ा बेहतर समझ पा रही हूँ। और अब जब समझी हूँ, तो कष्ट होता है कि पहले क्यों नहीं समझी? समझ का विकास इतना धीमी गति से क्यों होता है? पर साधारणत: यही होता है।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि नीच और पापी बुद्धियों का विनाश हो। शुभ कर्म फलें-फूलें। सरलता का मार्ग प्रशस्त हो।