शनिवार, 15 जून 2024

मुस्कुराहटों के बीज

 जो होते मेरे पास

सूरजमुखी के फूल जैसे

 मुस्कुराहटों के बीज

तो मैं बो लेती

 उन्हें संभालकर

अपने मन की पोली

 ज़मीन में

जो मिल जाता मुझे कहीं से

खुशियों का पानी

तो भर लेती उसे

अपनी साँसों की रीतती जाती

 बाल्टी में

और छलक देती उसे

अपनी बुवी ज़मीन पर

जो होती मेरे पास 

थोड़ी सी ताज़ी धूप

मैं उसे संभाल कर

रख लेती

 रोशनी बटोरती

अपनी पलकों की सीप में

और खिला देती 

 नवांकुर

ये सब कुछ मैं कर लेती

कुछ ऐसे जैसे 

टूटती सी आस 

थामती है उम्मीद

और

सूखी माटी सहेजती है जल

क्योंकि मैं जानती हूँ

कि एक दिन

वो बीज

जब पनपेंगे और खिल जाएंगे

तो

उनकी सुगंध से 

दुनिया बदल जाएगी

पर मैं हैरान हूँ

 कि जादुई बीज, 

अस्तित्व का अमृत और 

ज़िंदगी की धूप

सब व्यापते तो हैं 

पर मिलते कहीं नहीं..








14 टिप्‍पणियां:

कुलभूषण शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़िया हार्दिक बधाई

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

Shukriya Kulbhushan ji🙏

Dr. A K Mittal ने कहा…

Very Nice
Congratulations Vibha ji

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

Thanks Akash ji

डॉ शचि ने कहा…

बहुत सुंदर, बधाई विभा👏❤️

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

Shukriya shachi ji❤

MANOJ KAYAL ने कहा…

सुन्दर सृजन

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना

Anita ने कहा…

शायद जब हर चाहत खो जाती है तब मिल जाते हैं वे !! सुंदर रचना

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

जी अनीता जी

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया आलोक जी

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया मनोज जी

बेनामी ने कहा…

Waah bahut sundar

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

Shukriya🙏