बुधवार, 29 सितंबर 2021

आकाश और आँखें

 


झरोखे में सिमटा आकाश जैसे आँखों में उतर आया था सिया की। नीरव, गहरा और निस्तब्ध! उस ज़िंदगी की तरह जो अचानक से सिमट गई थी झरोखे के इर्द गिर्द ही। आकाश की ओर टकटकी लगाए उसकी आंखें जैसे जबरन कैद कर दी गई ज़िंदगी को आज़ाद करना चाह रहीं थीं,  बिल्कुल खुले आकाश की तरह पर कैसे? कोई उत्तर न पाकर जैसे वो और उदास हो गईं थीं और कब आकाश से फिसल कर हथेली पर सिमट आईँ थीं, पता ही नहीं चला। निस्तब्धता जैसे और गहरा गई थी.......

पर ये क्या? झरोखे से आई एक छोटी सी किरण ने सिया की झुकी आँखों को अपनी नरमीली चमक से जैसे गुदगुदा दिया। निस्तब्धता उसी क्षण जैसे हवा हो गई और किर्णीली चमकीली आँखें मुस्कुराहट के साथ फिर से खुले आकाश से मिल  गईं। उन्हें उत्तर जो मिल गया था...

सोमवार, 27 सितंबर 2021

बाल मन


 


बच्चा लगातार अपनी माँ से साथ खेलने की ज़िद कर रहा था। माँ थी फोन में व्यस्त। बार बार बच्चे को झिड़क देती। बच्चा फिर भी नहीं मान रहा था। अबकी माँ ने चिल्लाते हुए कहा- भाग यहाँ से, नहीं खेलना मुझे।

बच्चे को ऐसी प्रतिक्रिया की आशा न थी। कुछ क्षण वो यह सोचते हुए माँ को देखता रहा, कि क्या सचमुच मुझे डांट पड़  गई है! जब माँ ने उसकी ओर सिर उठाकर नहीं देखा, तो वो समझ गया कि हां डांट पड़ गई है। बच्चे ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना मुँह ढँक लिया और सोफे पर औंधा लेट गया। अभी दो सैकेण्ड ही हुए होंगे कि वह माँ की ओर देखकर बोला- मुझसे मत बोलो!!

माँ ने फोन में नज़र गड़ाए हुए ही कहा- कौन बोल रहा है?

बच्चे ने फिर सर झुका लिया और कुछ सैकेण्ड बाद फिर बोला- मुझसे मत बोलो...माँ ने अपनी हंसी दबाते हुए अबकी उसकी ओर देखकर कहा-  कौन बोल रहा है?

बच्चा अब रुआंसा मुँह बनाकर बगल में पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। गुस्से वाली आंखें और होंठों को बत्तखनुमा बनाकर वो फिर माँ से बोला- मुझसे मत बोलो।

अब हंसी रोक पाना असंभव था- माँ ने अपना फोन एक ओर रखते हुए बच्चे से कहा- अक्कड़ बक्कड़ खेलें......?

बच्चे के मुख पर चांदनी खिल गई और वो किलककर बोला हाँ चलो। झूठमूठ का गुस्सा काफूर हो गया था।

शनिवार, 25 सितंबर 2021

सत्यमेव जयते! गिद्ध


 


 

भाई साहब आप चिंता न करें बिल्कुल भी। हम हैं न। हम आखिर बैठे किस लिए हैं? आप और आप जैसों की मदद के लिए ही तो भगवान ने हमे भेजा है, ये मानिए आप। और हाँ आपकी बेटी मेरी बेटी। अब ये लड़ाई अकेले आप भर की नहीं है, मेरी भी है। मेरा तो ... क्या कहूँ आप मानेंगे नहीं पर सच है कि मैंने तो इन ..... को सीधा करने के लिए ही वकालत के पेशे में कदम रखा है, वरना क्या बुरी थी सरकारी नौकरी!

चुँधियाईं आँखों और चौथाई से भी कम लागत से अधबना आदमी सा वह वकील शर्मा साहब को यकीन दिलाने की भरसक कोशिश कर रहा था कि उससे बेहतर वकील उन्हें कोई और नहीं मिल सकता। शर्मा साहब भी कातर आखों से उसे कृतज्ञता ज्ञापित करते जा रहे थे। और करते भी तो क्यों न? आखिर उनकी बेटी की ज़िंदगी का जो सवाल था। हँसती खेलती बेटी को शादी के नाम पर सौदा करने वालों ने आखिर मसल कर जो रख दिया था। पिछले 5 वर्षों में कितनी चुप, निराश और हताश हो गई थी उनकी बेटी। वो करते भी तो क्या? कुछ भी तो नहीं कर पाए थे। पाँच साल बीत गए 8 लाख से ऊपर खर्च हो गए, और मुकद्दमा वहीं का वहीं। तो अब वकीलों के आगे कातर मन हो ही आता, भगवान जो खोज रहे थे वकीलों में। आखिर फिर एक बार तीन लाख पर बात करके शर्मा जी लौट आए और सोफ़े पर निढाल हो गए।

पत्नी पानी लेकर पास बैठ गई। क्या हुआ कुछ बात बनी?

क्या बात बननी है? तीन लाख देने हैं इस नए वकील को।

तीन लाख! पत्नी लगभग चीखी। 8 लाख से ऊपर खर्च हो चुके हैं, और अब फिर तीन लाख?

ये दूसरा वकील है। पिछले वाले ने आने से मना कर दिया।

मना कर दिया! तो उससे कहो कि पैसे वापिस करे।

तुम बकवास बंद करो। कौन वकील पैसे वापिस करता है? इनका ये रोज का काम है। किस्मत तो अपनी खराब है। बेटी की ज़िंदगी खराब कर दी और जमा पूंजी सब बही जा रही है। केस का भी कुछ आता पता नहीं। शर्मा जी का हृदय जैसे चीत्कार कर उठा।

मतलब? यह बेटी का स्वर था।

कुछ मतलब नहीं। तुम जाकर अपना काम करो, तुम्हारे मतलब की बात नहीं है।

पापा क्या क्या कह रहे हो आप? मैंने सब सुन लिया है। नहीं देने दूँगी किसी को इतना पैसा। पहले ही सब कुछ लुट गया है, अब और नहीं।

तो कैसे होगा निबटारा। देना पड़ता है वकीलों को।

वकील? ये वकील हैं ! ये तो गिद्ध हैं! आपके और मेरे आँसू देखकर लार टपकने लग जाती है इनकी। एक ने भी ठीक से काम किया है?

नहीं किया तो क्या करें? अबकी पिता झल्ला उठे।

बेटी की आँखों में आँसू आ गए। नहीं पापा आप परेशान मत हो। कोई रास्ता निकल आएगा। हम सरकारी वकील की अर्जी लगाएंगे।

पिता कुछ नहीं बोले।

अगले ही दिन सरकारी वकील की व्यवस्था हो गई। किस्मत से वकील एक महिला थी। शर्मा जी के चेहरे पर पहली बार सुकून झलका। बेटी ने भी चैन की सांस ली कि अब सब ठीक होगा, आखिर एक महिला महिला के दर्द को न समझे ऐसा होता है क्या?

शर्मा जी ने पूरे विश्वास के साथ महिला वकील को फ़ाइल पकड़ाते हुए कहा  – हो सके तो जल्दी निबटवा दीजिए, हमें कुछ नहीं चाहिए।

शर्मा जी की बात सुनकर महिला वकील जोर से हँसते हुए बोली- मोटी पार्टी हो। तभी कुछ नहीं चाहिए। सुनो प्राइवेट वकीलों को खूब खिला पिला चुके अब जरा मेरी भी सेवा कर दो। ज़्यादा नहीं ढाई लाख अकाउंट में जमा कर दो, नहीं तो फिर केस ऐसा लटकाऊँगी कि पानी मांगते भी नहीं बनेगा। शर्मा जी और उनकी बेटी निस्तब्ध एक दूसरे का चेहरा देखते रह गए...

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

सत्यमेव जयते !

 


इतनी पढ़ी लिखी और इतनी सुंदर लड़की कहीं मिल जाए तो बताओ। कहते हैं बर्तन माँजना नहीं आता, रोटियाँ गोल नहीं बनतीं, झाड़ू लगाती है तो कूड़ा पड़ा रहता हैं! ये भी कोई बात है। इतना ही था तो ढूंढ लाते कोई घर के काम काज में दक्ष। हम पीछे पड़े थे क्या? या हमारी बेटी की शादी नहीं हो रही थी। पति को आवेश में चीखते हुए देख पत्नी ने कहा – मैं न कहती थी कि घर का काम काज भी आना चाहिए। पर आपने मेरी एक न सुनी तो अब सुनना पड़ रहा है तो बुरा लग रहा है!

चुप रहो तुम। माँ होकर भी तुम भी उन गुंडों की भाषा बोल रही हो?

तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे बस तुम्हारी ही बेटी है वो। कितना सीना फटता है जानते हो तुम। रात रात भर सो नहीं पाती। जैसे तुम जागते हो मैं भी जागती रहती हूँ। पर क्या करें कुछ समझ नहीं आता।

कुछ समझ न आए तो चुप रहा करो।

मैं क्या करूँ बेटी का फोन आया था तब वही कह रही थी कि माँ लड़कियों के लिए पढ़ाई लिखाई नहीं घर का काम काज जरूरी होता है, तुमने क्यों नहीं सिखाया मुझे?

मुझे समझ ही नहीं आया था कि क्या कहूँ रोना आ गया था। वही बात मेरे मुंह से भी निकल गई।

पत्नी की बात सुनकर पति के माथे पर पसीने की बूंदे आ गईं। ये नौबत आ गई, इतना बेबस कर दिया उन्होंने मेरी फूल सी बेटी को।

दोनों पति पत्नी एक दूसरे का हाथ थामें सुबक पड़े।

बैठे बैठे कितनी रात बीत गई कुछ पता ही न चला। अचानक झनझनाते फोन से तंद्रा टूटी।

पापा क्या करूँ इन्होंने मुझे कमरे में बंद कर दिया है। बहुत अंधेरा है। मैं क्या करूँ।

हैं .. तू चिंता मत कर सीधा पुलिस को फोन कर। मैं सीधा करता हूँ इन्हें...   

शादीशुदा बेटी घर आ गई। पिता ने घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा दिया बेटी को आश्वासन दिया कि सब ठीक हो जाएगा।

कोर्ट के चक्कर काटते हुए दस वर्ष बीत चुके हैं। पिता अब गुस्से में चीखते नहीं हैं, वकीलों के सवालों ने उनकी बोलती बंद कर दी है। सुना है लड़के ने चुपके से दूसरी शादी कर ली है, बेटी आत्महत्या की तीन कोशिशों के साथ अब भी जिंदा है,,,,

 

 

 

 

 

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

जादूगर

 


 

मन में उठता है ये सवाल कि कौन है ये गीतकार

जिसने गीतों में पिरोया है इस सृष्टि के ताने बाने को

झमकती बूंदों को थिरकना सिखाया है अपनी तानों पर

और

घुमड़ते बादल, चमकती बिजली

और लहराती हवा को

गुनगुनाना सिखाया है अपने अव्यक्त छंदों पर

मैं सोचती हूँ

कि सागर में जब लहरें उठती हैं

तो क्या वो उस अदृश्य का संदेश मुझसे कहती हैं

या फिर कुछ अपनी ही धुन पर गुनगुनाती हैं

सोचती हूँ तो यह पाती हूँ

कि ये सृष्टि

जैसे गीतों की खेती है

जहां

प्रकृति के हर कण में भरा है गहरा संगीत

जो घुला है मेरी और तुम्हारी ज़िंदगियों में

चलती हुई साँसों में, हँसी में, खिलखिलाहट में और आंसुओं में भी

मैं क्या कहूँ उस अव्यक्त, अदृश्य गीतकार को

जो सिर्फ गीतकार ही नहीं,

एक अनोखा जादूगर भी है,

जिसे आता है अपने गीतों में सबकुछ भुला कर

कठपुतली बना देना इस विश्व को..

बुधवार, 22 सितंबर 2021

स्टेरलाइज़ेशन

 

                                                   

 

 

ऑफिस में जबसे रोज़ आने का फरमान जारी हुआ था तब से हर ओर अफरा तफरी का माहौल था। रोज़ नये नये सरकारी फरमान बाबुओं को दफ्तरगिरी सिखा रहे थे। हर जगह चिल्ल-पों उठा पटक, गहमा-गहमी गरमा गरमी। सबसे ज़्यादा कोई उछल रहा था तो वो थे अनुबंध पर वेतन पाते लोग। क्या होगा? कैसे होगा? कोई नहीं यूनियन है न देख लेंगे। हर जगह यही स्वर यही बातें..

इस बीच आवारा कुत्तों की तादाद कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी। ऑफिस जब ठीक चलता था तो कुछ बाबू उन्ह्रे रोटी भी खिलाते। कई तो अफसरों के भी मुँहलगे। और क्यों न हो कुत्ते से ज़्यादा वफ़ादार भला कौन? पर सुना है नए अफसर को इतनी बड़ी संख्या में वफ़ादारी भाई नहीं। इसीलिये 5 दिन के अंदर ही कुत्तों को एम सी डी के डॉग केपचर टीम की हवा खिला दी। वफ़ादार कुत्तों की जो धर पकड़ हुई उससे सभी का कलेजा सहम गया। यह सब देख एक बाबू ने दूसरे बाबू से कहा- ये इतना चिल्लाते क्यों हैं स्टेरालाईज करके छोड़ देंगे मार थोड़ी न रहे हैं। दूसरे ने बड़ा नपा तुला जवाब दिया इतनी समझ होती तो ये वफ़ादार कुत्ते होते क्या?

<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-8059963875680164"

     crossorigin="anonymous"></script>

सोमवार, 20 सितंबर 2021

बत्ती गुल

 

अखबार में जबसे एक बड़े नेता के साथ सुरेश की तस्वीर देखी, तबसे पता चला है कि सुरेश दब्बू नहीं बड़ा तेज है, बड़े बड़े लोगों के बीच उसका उठना बैठना है। तभी से कंपनी में खुद को परम पद का अधिकारी मानने वालों की जैसे बत्ती ही गुल हो गई थी। समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें! जिससे कभी सीधे मुंह बात तक नहीं की उसे सीधी नजर से देखें भी तो कैसे! साले हम तो फब्तियाँ ही कसते रह गए और ये तो चुप रह के हमें ही पोपट बना गया!

बस इत्ती सी बात! नाहक घुटना खुजलाने की तो जैसे आदत ही पड़ गई है तुम लोगों को। बैठे ठाले की रोटी अब हजम नहीं होती तुमको शायद। सक्सेना जी तिनक कर बोले। जे 4 महीने में ससुरे सुरेसवा को पुरानी औकात पे न ला दिया तो नाम बदल देना हमरा।

बस फिर क्या था। अगले ही दिन से सक्सेना जी सुरेश के पक्के मित्र बन गए। उठना-बैठना, खाना-पीना तो ठीक लघुशंका निराकरण में भी साथी बन गए सुरेश के। घंटों बतियाते, झूठ मूठ का दुखड़ा रोते। कंपनी के लोग सक्सेना साहब की फितरत से वाकिफ तो थे पर इतनी मोहब्बत देखकर वो भी सकते में आ गए।

 सुरेश भी चकित, सोचा कि हृदय परिवर्तन हो गया लगता है, आखिर 6 वर्ष हो गए उसे यहाँ काम करते हुए, सोचा होगा कि इंसान बनके रहना हर तरह से बेहतर है और फिर आँसू झूठ नहीं बोलते, सच में सुधर गए हैं सक्सेना जी  तभी तो कितना शर्मिंदा हुए थे अपने और अपने साथियों के पिछले व्यवहार पर।

सक्सेना जी सचमुच शर्मिंदा थे। आखिर महीना पाँचवा जो लग गया था। पर देर आए दुरुस्त आए। एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उन्हीं नेता को आमंत्रित किया गया था जो तस्वीर में सुरेश के साथ थे, पर सुरेश! सुरेश तो नहीं दिख रहा ... उसका डिपार्टमेंट चेंज करा दिया है! हैं...  तो भाई ये सब किया किसने ?.. भीड़ में से आवाज़ें आई और सक्सेना जी के कान में घुस गईं।

घुसी आवाज़ों के पेंच को कान से खींचकर निकालते हुए, आँखें तरेर के और मूँछों से गुर्राते हुए सक्सेना साब बोले-

अबे हट सुरेशवा के चाचा! हम बुलाए हैं। हमरे बहुत खास हैं।

सक्सेना ग्रुप ने चैन की सांस ली। आखिर आदरणीय सक्सेना जी ने गुल हुई बत्ती की मरम्मत जो करा दी है...