रविवार, 26 जून 2022

चक्र





 बहुत छोटी सी बात है ये शायद

एक साधारण अति साधारण सी घटना है शायद

कि एक पौधे को माली ने

कर दिया उसी मिट्टी के हवाले

जिसमें एक दिन वो हुआ था अंकुरित

पौधा जब नन्हा सा था

मिट्टी के ही रंग में रँगा था

जब वो कुछ बड़ा हुआ

 तब भी मिट्टी का रंग उस पर साफ़ था

एक ओर वो कोंपलों से भरा था

तो गहरे बहुत गहरे वो मिट्टी में सना था

उसकी आधी हरी देह जैसे संजोए थी मिट्टी का संदेश

कि तुम रहो ऊर्ध्वगामी पर त्यागना न धात्री को

नहीं तो क्षत-विक्षत कर जाएंगी तुम्हें तेज़ हवाएँ 

 भी

और कुछ न कर  पाओगे तुम

संदेश पूरा था पर स्वीकार्यता थी कम

तभी तो पेड़ के उठान के साथ ही

निकल आईँ थीं जड़ें, छूट गई थी ज़मीन

और एक दिन गिर पड़ा वो औंधे मुँह....

 मिट्टी का आँचल है कितना गहरा और कितना कठोर, जितना प्रेममय उतना ही निर्लिप्त

निर्विकार सी नज़र आती मिट्टी ने सुला लिया है उसे अपनी गोद में 

शायद फिर से जिवाने के लिये..

...



बुधवार, 22 जून 2022

मँहगाई




दो पैग देसी ठर्रे के चढ़ाने के बाद मगरू को होश आया कि बीवी ने सब्जी लाने को कहा था। चुन्धियाई आँखों के सामने ही किस्मत से सब्जी के ठेले खड़े थे। फुटपाथ से उठकर मगरू एक ठेले वाले के पास पहुँचा- अबे आलू कैसे दिये?
20 का किलो।
हैं?? 20 का किलो? अबे शरम नहीं आती इतना महँगा बताते हुए?
शरम? साहेब ठर्रा चढ़ा के खुद चले आ रहे हो और हमें ज्ञान दे रहे हो? जाओ इससे सस्ता कहीं और मिल जाए तो ले लो जाके।
मगरू को ऐसे जवाब की आशा न थी अत: खिसियाते हुए बोला- अबे चल बैठा रह, कोई नहीं खरीदेगा तुझसे।
लड़खड़ाते क़दमों से मगरू आगे बढ़ा कि एक और आलू की रेहड़ी थी।
अबे कैसे दिये आलू?
50 का ढाई किलो...
मगरू के मुँह से निकला- क्या 50 का ढाई किलो??
मगरू ने जेब में हाथ डाला। पत्नी के दिये 100 रुपये में से शराब पीने के बाद केवल 20 रुपये ही बचे थे। मगरू मन ही मन बुदबुदाया- साली पैसे भी ऐसे गिनकर देती है, जैसे खुद कमाती हो। फिर सब्जी वाले से बोला-अबे ठीक लगा ले चाचा। पीछे 20 का किलो दे रहा है, और तुम तो सीधे 50 पे पहुँच गए! ज़्यादा नहीं तो 20 का किलो लगा ले चाचा..
एक ठर्रा ठेले वाला भी चढ़ा कर बैठा था, अत: शराबी की बात सुन बोला- इससे कम नहीं होगा।
मगरू ने घूरकर सब्जी वाले की ओर देखा फिर दार्शनिक अन्दाज़ में बोला- इतनी मँहगाई में लोग कैसे सब्जी खाएँ भला!  वो 20 का किलो, ये 50 का ढाई किलो.....शरीफ़ आदमी क्या कमाए क्या खाए, बड़बड़ाते हुए मगरू थोड़ा और आगे बढ़ा कि किस्मत से सामने ही देसी शराब की सरकारी दुकान दिख गई। मगरू की  बाँछें खिल गईं। उसने बिना देर किये, बचा 20 का नोट दुकान के काउंटर पर पटका और चैन के घूँट चढ़ाकर फुटपाथ पर गिर गया।

रविवार, 19 जून 2022

फ़ादर्स डे पर ..

 मैंने सोचा है कई बार

पर हर कोशिश के बाद जाना है यही

कि मैं नहीं लिख सकती 

आप पर कोई कविता

उठती ही नहीं क़लम

मिलते ही नहीं शब्द

मिलते भी हैं तो फीके और अधूरे

अभिव्यक्ति सिमटी और सिकुड़ी सी लगती है

कुछ नज़र आता है तो बस

भावनाओं का ज्वार

 आद्यंत

जिसमें तैरती, गोते लगाती 

नज़र आतीं हैं इन्द्र धनुषी स्मृतियाँ 

मेरा बचपन, मेरा जीवन 

और समग्र ग्राह्यताएँ-अग्राह्यताएँ 

और मेरी खुशियों मुस्कुराहटों

से खिलता मुस्कुराता

मेरी तक़लीफों में बेसब्र हो उठता 

 आपका जीवन

 हतप्रभ सी मैं सिमट जाती हूँ

चित्रपट सी इस विराटता के आगे 

वरदान सदृश इस सौंदर्य के आगे

प्रथम पाठशाला के आगे 

बुज़ुर्ग क़लम और नाक़ाम कोशिशें 

तब मुझे समझातीं हैं

 कि करो प्रयास पर

कुछ अनुभूतियों और भावनाओं का सौन्दर्य

अनभिव्यक्ति में है

और यही अनभिव्यक्ति 

वात्सल्य है।

तुम लाख समेटो 

अभिव्यक्ति अधूरी ही रहेगी.. 






मंगलवार, 14 जून 2022

😔





यूँ भी यहाँ का हाल होगा, सोचा न था

यूँ शहर बदनाम होगा सोचा न था

बुदबुदाते लबों पर आयतें होंगी ज़रूर  

 दिल में नफरत, हाथ में हथियार होगा सोचा न था

चलो माना फ़क्र हो अपने अक़ीदे पे, यह ठीक है

पर और के ईमान पे उँगली उठेगी! सोचा न था

हो चुकी इंसानियत अब हर तरह से शर्मसार

अल्लाह तेरे नाम पर बद ज़ुबानी बद नीयति और क़त्ले आम होगा! सोचा न था

क़त्लो गारत, संगसारी, सिर क़लम करना कहाँ की मज़हबी यह रीत है?

ऐ खुदा तेरी इबादत का यही अंजाम होगा! सोचा न था

है कहाँ छिपकर तू बैठा सामने आता नहीं 

'अल्लाह हु अक़बर' खौफ़ का आगाज़ होगा सोचा न था






बुधवार, 8 जून 2022

मायका







पूरे पाँच साल बाद बिट्टू मायके आ रही थी, इसलिए माँ-बाबूजी बहुत खुश थे। पिताजी ने तो घोषणा कर दी थी कि जब तक बिट्टू रहेगी, सब उसी के हिसाब से होगा। श्याम तुम चाहो तो बस से चले जाना या ऑफिस से गाड़ी मँगा लेना। घर की गाड़ी बिट्टू के लिये रहेगी और सुनो खाने में जो भी बिट्टू को पसंद है वही बनेगा। किसी को नहीं पसंद तो अपनी नापसंदगी अपने पास रखना। बहू सुनो, दीदी आ रही हैं कोई ऐसी-वैसी बात मत करना कि उसका दिल दुखे या बुरा लगे। सबने मुँह बना सिर झुका के पिताजी की बात सुन ली। 

रात को श्याम ने अपनी पत्नी से कहा- दीदी आएंगी तो खर्चा भी तो होगा। उनके दो बच्चे और सुना कि जीजाजी भी तो आ रहे हैं।

अब आ रहे हैं तो क्या करें? सुना नहीं पिताजी ने क्या कहा- कि जो भी होगा बिट्टू दीदी के हिसाब से ही होगा। पत्नी ने मुँह बनाते हुए कहा।

तो बताओ अब क्या करें? कहो तो तुम्हारी तबियत का बहाना बनाकर तुम्हारे मायके चल पड़ते हैं वैसे भी तुम्हारा चौथा महीना चल रहा है? श्याम ने सोचते हुए कहा।

2-3 हज़ार बचाने के चक्कर में 6-7 हज़ार फूँकोगे? अकल क्या घास चरने गई है तुम्हारी? और मेरी माँ तुम्हारी माँ की तरह फ़ालतू नहीं हैं जो बस बेटी-दामाद की बाट जोहती रहें। पत्नी तिनककर बोली। 

तो क्या करें? बाबूजी तो यही कहेंगे कि तुम करो सब कुछ। गाड़ी ले जाने तक से तो मना कर दिया, सुना नहीं  तुमने? श्याम ने मुँह बनाते हुए कहा।

तो कौन सी नई बात है? तुम्हारे माँ-बाप ने कभी चाहा है तुम्हें? उनका बस चले तो तुम्हारे कपड़े तक उतरवा लें।

सच कहा तुमने। अरे कपड़ों से याद आया कि मेरे और हमारी छुटकी के जन्मदिन पर अच्छे ब्राण्डेड कपड़े भेजे थे दीदी ने, 6-7हज़ार से तो क्या कम होंगे। और तुम्हारे लिये भी तो साड़ी भेजी थी।अब हमारा भी तो कुछ लौटाना बनता है न?

अबकी पत्नी उठकर बैठ गई और बोली- कौन सी बहन नहीं करती अपने भाई के लिये? और इन्होंने ऐसा क्या कर दिया जो तुम ऐसे मरे जा रहे हो?इतना है कि चोर भी लूट ले जाए तो कमी न पड़े। हमारे कौन सा खज़ाना गड़ा है?

अच्छा? मेरी तनखा जीजाजी और दीदी दोनों से जादा है, पता नहीं है क्या तुम्हें? श्याम ने पत्नी से मुस्कुराते हूए कहा।

अबकी पत्नी ने सर पीटते हुए कहा- पता नहीं किस निखट्टू से पाला पड़ा है। अरे तुम्हीं ने तो कहा था कि प्रमोशन हुआ है, तनखा 2 लाख हो गई है ये किसी को मत बताना। अब खुद ही गाए जा रहे हो? पता नहीं क्या कि दीवारों के भी कान होते हैं? 

अरे तुम नाहक गुस्सा होती हो मैं तो मज़ाक़ कर रहा था। इतना गुस्सा तुम्हारे लिये अच्छा नहीं। पति ने पत्नी को दुलारते हुए कहा।

हटो जी! ऐसी ही परवाह होती तो मेरा जी न जलाते।

कहाँ जलाता हूँ मेरी जान चलो अब सो जाओ जो होगा सुबह देखेंगे।

इधर सुबह हुई नहीं कि बाबूजी ने श्याम को आवाज़ लगा दी- श्याम बेटा जा स्टेशन से लिवा ला अपनी बहन को।

जम्हाई लेते हुए श्याम आ तो गया पर बोले बिना न रह सका - क्या बाबूजी! ये भी कोई समय है आने का। दीदी भी कुछ सोचती नहीं हैं शाम की ट्रेन से भी तो आ सकती थीं, अब जाओ लिवाने... 

बेटे की बात सुनकर पिता जैसे खून का घूंँट पीकर रह गए। सिर्फ इतना कहा- बेटा सम्मान करना सीख। फिर 1000 रुपये उसके हाथ में थमाते  हुए बोले- ये ले गाड़ी में पेट्रोल भरवा लियो,  2-4 दिन पीछे बहू कह रही थी कि तुझे दो महिने से तनखा नहीं मिली। मुझे बताना भी तूने ज़रूरी नहीं समझा आखिर बाप हूँ तेरा, चल अब जा बहन को ले आ बाकी बातें बाद में  करते हैं।

श्याम को नहीं सूझ रहा था कि क्या कहे। उसने बिना कुछ कहे पैसे जेब में डाले और पत्नी के साथ स्टेशन की ओर चल पड़ा। गनीमत यह रही कि ट्रेन आने से पहले ही दोनों स्टेशन पहुँच गए। दोनों भांजियों ने जैसे ही देखा तो मामा मामी से लिपट गईं। श्याम ने भी यथासंभव दोनों को दुलारा फिर  दीदी का बैग उठाते हुए कहा- चलो दीदी जल्दी करो, मुझे ऑफिस भी जाना है।

अरे नहीं श्याम, अचानक ऑफिस के काम से इन्दौर जाना है 15 दिन के लिये। तुम्हारी दीदी भी चलेंगी। कल रात ही ऑर्डर आया है। माँ-बाबूजी को तुम समझा देना, जीजाजी ने बैग वापस लेते हुए कहा।

अरे लेकिन...श्याम कुछ कह पाता इससे पहले ही बिट्टू ने एक बड़ा सा बैग भाभी को पकड़ाते हुए कहा- सोचा था 5 साल बाद मायके जा रही हूँ तो सबकी पसंद का कुछ सामान ले लिया था कि  सबको अपने हाथों से दूँगी.... मगर ....अब देखो कब आना होता है। तुम तो समझदार हो, माँ बाबूजी को समझा लेना.. मैं उनसे फोन पर बात कर लूँगी। चलती हूँ... अपना ध्यान रखना....

इतने में अब चलो, दूसरे प्लेटफॉर्म पर गाड़ी आ चुकी है, छूट जाएगी तो लेने के देने पड़ जाएंगे..... अरे चल तो रही हूँ.....बाय मामा, बाय मामी की आवाज़ों के साथ दीदी आँख से ओझल हो गई थीं. . 



  

 

 


रविवार, 5 जून 2022

केले का पेड़




मेरे गमले में लगा केले का पेड़

बन गया है दादा

इसलिये नहीं कि वो हो गया है सबसे बुज़ुर्ग

 न कि इसलिए कि उसमें खिल उठे हैं कई और कदली अंकुर

बल्कि इसलिए क्योंकि वो बन गया है

छतनार

उसके छत्र से हरे पत्ते फैल गए हैं सब दिशाओं में 

जिनकी छाया में सुकून पा जीवन रस ले रहे हैं

बहुत से पौधे और नवांकुर

पुदीना और हरिया गया है

बारहमासी भी मुरझाना भूल गई है

करीपत्ते में भी आ गई है खूबसूरत लहक

खिल रही हैं गुड़हल की सारी कलियाँ बिना कुम्ह्लाए 

तुलसी भी झूम उठी है हरियाली

और

मनीप्लांट तो अभिभूत हो लिपट ही गया है दादा से 

धूप अब जलाती नहीं

 बल्कि खेलती है आँख मिचौली 

और

 पौधे करते हैं धूप को धप्पा!

मैं देख रही हूँ सबको साधते-पालते दादा 

और हरियाते जा रहे हैं...






बुधवार, 1 जून 2022

मुस्कुराना ज़रूरी है..



 मुस्कुराना बेहद ज़रूरी है

भले ही

 आप जी रहे हों गम के साये में 

या फिर घेर रखा हो दिल को 

किसी खौफ के साये ने

बच्चे फाके कर रहे हों, और न मिली हो पगार

पर मुस्कुराना बेहद ज़रूरी है।

आप भले ही चोट खाए हों,

अपने अपनों से धोखा खाए हों,

नहीं समझ आता हो जीवन का कोई अर्थ,

और हों दिग्भ्रमित मगर,

मुस्कुराना बेहद ज़रूरी है।

नहीं फ़र्क पड़ता 

अगर आप भूल गए हो हँसना भी,

भले ही न याद हो

आप कभी हँसे थे खुलकर भी,

पथरायी आँखें भूल गईं हों चमकना, 

और दिल में सुलगता हो शोला भी,

 पर हुजूर मुस्कुराना ज़रूरी है।

मुस्कुराना ज़रूरी है, बहुत ज़रूरी है

 क्योंकि

रहते हैं आप एक सभ्य समाज में 

और समाज को पसंद हैं

 नशीली आँखें, मुस्कुराते चेहरे

नहीं सुहाता उसे रोना-गाना,

न ही समय है उसके पास

 कहानियाँ सुनने का

आपकी उठा-पटक की।

अब न हो ये ज्ञान,

तो आप क़रार कर दिये जाएंगे,

झट ही मनोरोगी, बीमार

इसलिये मुस्कुराना ज़रूरी है।

तो-

नहीं आता मुस्कुराना,

तो खींच लीजिये तस्वीरें,

 कुछ सामाजिक मुस्कुराहटों की

और सीख लीजिये उनसे मुस्कुराना 

क्योंकि मुस्कुराना

 एक सामाजिक आवश्यकता है..