रविवार, 12 नवंबर 2023

मेरा घर

 मेरे घर,

मेरे जादुई घर

मुझे तुझसे बेहद प्यार है

जब मैं नहीं होती तेरे साथ

तू तब भी होता है मेरे पास

 दुआओं और फिक्र की तरह

जब होती हूँ घबराई और अकेली सी

 थकी हारी और निराश सी

तेरा सुकून मुझे देता है सहारा

तू बनता है ढाल और खड़ा करता है मुझे

एक अव्यक्त ऊर्जा से

पर मैं 

कुछ भी तो नहीं कर पाती तेरे लिये

 तुझे ढंग से सजा तक तो पाती नहीं

जी चाहा भी तुझे रख तो पाती नहीं

बल्कि बिखरा ही देती हूँ तुझे 

अपनी आदतों की तरह

फिर भी अनगढ़ चाह सा

तू सजा रहता है मेरे दिल में

ओ मेरे करिश्माई घर

जब अल्फाज़ सिमट कर ठहर जाते हैं

तू मुझसे गहरे बतियाता है

और मैं सब समझ जाती हूँ

उदासी में भी मुस्कुरा जाती हूँ






शनिवार, 11 नवंबर 2023

ऐसी हो सबकी दीपावली








 मनमोहक पावन दीपावली 

सुभग-ज्योति से बुनी दीपावली 

जगमग कर दे घर-आँगन-मन 

रंगोली बन सजे दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

अंधकार और क्लेश मिटें सब

ओठों पर मुस्कान खिले बस

घर-बाहर आनंद रहे अब

जीवन में उत्साह भरे नव

बने स्नेह की डोर दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

पाप, दुष्टता, रोग नष्ट हों

लालच और अन्याय नष्ट हों

भ्रष्ट आचरण, कुत्सित-वृत्ति

जीवन के अभिशाप नष्ट हों

बने नया वरदान दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

फिर से जीवन सरल बने अब

फिर से कोमल भाव खिलें सब

मर्यादा हो राम-राज्य सी

लक्ष्मी-विनायक बनें रहें घर

बने महा-आशीष दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

ऐसी हो सबकी दीपावली।





शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

 



सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

सोमवार, 6 नवंबर 2023

हिरन मन

 



मैं उसे रोकती हूँ,

उम्र का तकाज़ा देकर टोकती हूँ

करती हूँ सलीके और समाज की बात

 समझाती हूँ उसे सौ-सौ बार

बहलाती हूँ उसे

दुनियावी किस्सों से

 डराती हूँ उसे सख्त उसूलों से

दिखाती हूँ उसे भविष्य का विद्रूप  भी

पर नज़रंदाज़ करता 

वो मेरी हर बात

मुस्कुराकर

फिसलता जाता है

मेरी हर गिरफ्त से

और

मेरी आवाज़ की गूँज

मेरी नज़र की सीमा से कहीं आगे 

वो पहुँच जाता है 

ऊँचे आसमानों में

असीम दिशाओं में

पर्वत, समतल, जंगल, मरुस्थल

 गहरे महासागर और 

स्मृति-विस्मृति के सूक्ष्म अन्तरालों में भी..

और तब बुज़ुर्गियत सी ओढ़े मैं

ठहर जाती हूँ हैरान

अपने...

हिरन मन की कुलाँच पर....




रविवार, 5 नवंबर 2023

हाइकू -कविता

1 मन खिलौना 

उस नियति का जो

अवश्यंभावी।

2 अनजाने में 

 कुछ जानकर भी

सह आवेग।

3 इक अनोखी

लघु कथा सा कुछ

लिखा दे प्राण।

4 महा वृत्तांत

 जो है अपरिमित

अलिखित भी।

5 या कि है कुछ 

और ही परीक्षा सा

भगवान की।

6 वह नियति

की कल्पना भर जो

लिखा स्वत: ही।

 7 खिलौना वह

उस ही नियति का

संभाव्य है जो।






सोमवार, 30 अक्तूबर 2023

ध्वनि



मैं रोज़ जीती हूँ एक कविता

और रोज़ पी जाती हूँ उसे 

वायु में घोलकर।

मैं रोज़ जीती हूँ एक जीवन

और दिन ढलने के साथ ही

मरोड़कर रख लेती हूँ उसे

अपने तकिये के नीचे।

मैं रोज़ उम्र के धागों से 

बुनती हूँ ख्वाब

और उधेड़ देती हूँ उन्हें अगली सुबह तक।

प्रत्येक क्षण मैं 

समेटती हूँ अनंत सृष्टि

और एक नि:श्वास के साथ ही 

मैं हो जाती हूँ आकाश।

मेरी आँखें बनातीं हैं एक पुल 

बाहर और अंदर 

हृदय की रेतीली ज़मीन दरक जाती है गहरे और गहरे।

नक्षत्रों के आगे, स्वप्नों से भी तीव्र

ब्रह्मांडीय अस्तित्व से सुदूर

कोई व्यतिक्रम खेलता

 बैठकर चुपचाप।

फिर भी 

मैं उकेरती हूँ विश्व 

समेटती जाती हूँ 

आकाश-पृथ्वी की परतें

और देखती हूँ खुद को घुलते जाना

 आकाश और

पृथ्वी होते जाना

यूँ ही मैं रोज़ 

जीती हूँ अस्तित्व

और बिखरा देती हूँ उसे

कविता के अस्फुट शब्दों में..






 


 

मंगलवार, 15 अगस्त 2023

जय हिंद

 





मुझे तुमसे मोहब्बत है

तुम्हें मैं प्यार करती हूँ

तुम्हारे नाम पर भारत

मैं दिल कुर्बान करती हूँ।

तुम्हारी ही धरा पर मैं 

पली हूँ शान से अब तक 

तुम्हारी ही धरा से मैं

चली हूँ चाँद पर अब तक

रहे जीवन तुम्हारे ही लिये

सदा यह चाह रखती हूँ

तुम्हारे नाम पर भारत 

मैं दिल कुर्बान करती हूँ

यही आशीष सी मिट्टी

जहाँ है कृष्ण का बचपन

धनुर्धारी सिया के राम 

का आदर्श है पग-पग

सजे चन्दन तिलक सी शीष पर

यही अरमान रखती हूँ

तुम्हारे नाम पर भारत

मैं दिल कुर्बान करती हूँ

यहीं हैं साधनारत पितृ सम 

योगी हिमालय भी

भगीरथ कर्म को साधे

नित पाप हरतीं माँ त्रिपथगा भी

शिवालिक से निविड़ जीवन

शिवोऽहम् भाव को भरते

तेन त्यक्तेन भुंजीथा:

निरंतर साक्ष्य यह धरते 

करूँ धारण हृदय में ज्ञान यह 

कामना निष्पाप करती हूँ

तुम्हारे नाम पर भारत मैं दिल कुर्बान करती हूँ

जय हिंद🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳







रविवार, 13 अगस्त 2023

ज्ञान वाणी

अरे सुन सपना, सब से कह दे कि शाम ठीक चार बजे पहुँच जाएँ। आज का कार्यक्रम तेरे जिम्मे। समझ गई न तू?
हाँ माँ आप चिंता मत करो, आपकी ही तो बेटी हूँ, सब संभाल लूँगी। कहते हुए, महिला सेवा समिति की सदस्य और रूपल जी की बेटी सपना अपने काम पर लग गई। हाथ में कॉपी पैन लिये वह जाँच रही थी कि सब ठीक तो है, कुछ छूटा तो नहीं कि अचानक फोन झनझना उठा! आज के कार्यक्रम की अध्यक्षा जी का फोन था।
सपना जी, ज़रा लोकेशन बताएंगी क्या?
जी, जी अभी भेज ही देती हूँ आपके व्हाट्स एप पर। वैसे मेन रोड से उल्टे हाथ की तरफ़ चौथी गली में आकर सीधे हाथ की तरफ़ जो चौथी बिल्डिंग है न, गुलाबी रंग की उसी में पहले माले पर आना है.....
जी...जी... ठीक चार बजे।
कट....
उफ्फ!!! अरे मैं कहाँ थी... हाँ रिफ्रेश्मेंट, मेंहदी, कुर्सियाँ... और...और...
और म्यूज़िक सिस्टम। उसका अरेंजमेंट किया कि  नहीं??
पीछे से रूपल बोली।
नहीं माँ वो तो.....
भूल गई... क्यों? चल अभी फोन लगा मानुषी जी को, वो करा देंगी। 
सपना ने राहत की साँस ली। मानुषी जी के पति ठहरे एडवोकेट। अर्धान्गिनी जी के एक आदेश पर इधर फोन गया उधर काम हुआ समझो। 
बढ़िया म्यूज़िक सिस्टम भी आ गया, चार घन्टे के लिये 2000 में। अध्यक्षा जी भी और सब बढ़िया। 
कुछ ही देर में विधि-विधान के साथ अध्यक्षा जी का सम्बोधन हुआ। महोदया जितना पढ़ कर आई थीं सब ज्ञान देकर विराज गईं। फिर शुरू हुआ नाच-गाना, खेल, पहेली, म्यूजिकल चेयर खाना पीना। इतने सब में चार घन्टे न जाने कब खर्च हो गए, पता ही न चला। कार्यक्रम अभी भी चालू था।  इतने में रूपल जी भी आईं। समिति की वरिष्ठ सदस्य और सर्वे-सर्वा। भला उनके ज्ञान के बिना कुछ संभव था? बहुत अच्छे से उन्होंने बताया कि महिलाओं को अभी खुद पर बहुत काम करने की ज़रूरत है। समाज और राष्ट्र् से पहले खुद को सुधारो। गरीबों की जिस तरह हो सके वैसी मदद करो। किसी का भी अहित न हो। 
भाषण भी खत्म हुआ और कार्यक्रम भी।
कुल मिलाकर चार घन्टे का कार्यक्रम 8 घन्टे पर निबटा ही था कि म्यूजिक सिस्टम वाला बोला- 3 हज़ार रूपये।
सपना तो दे ही देती कि रूपल ने आँखें तरेरीं, 
हां भैया? काहे के तीन हज़ार?
मैडम 4 घन्टे की बात हुई थी, मालिक ने कहा था चार के ऊपर हज़ार रुपया होगा। आपने तो और चार घन्टे लगा दिये!
सुन हम तुझे नहीं देंगे 1500 के ऊपर, समझ ले तू। रूपल चिल्लाई। 
अरे कैसी बात करती हो मैडम, मालिक नौकरी से निकाल देगा!! तो हम क्या करें? हो जाता है थोड़ा ऊपर-नीचे। समझ ले सब तेरी बहन-बेटियाँ हैं..
आगे और भी कार्यक्रम हैं, कह दियो अपने मालिक से।
अरे ऐसे मत करो मैडम, म्यूज़िक सिस्टम वाला गिड़गिड़ाया।
पर महिला प्रमुख कहाँ मानने वाली थीं! जानती थीं कि पैसे कहाँ और कैसे बचाने हैं। उधर म्यूज़िक सिस्टम वाला भी गाँव-घर छोड़कर शहर आया, सीधा सा आदमी था। शहरी गुण्डई अभी उसने सीखी नहीं थी, अत: कुछ बोल न सका।
उधर मैडम ने 1500 रुपये उसके म्यूज़िक सिस्टम पर पटके और पलटन के साथ रुखसत हो गईं।




सोमवार, 31 जुलाई 2023

जंगल का न्याय






एक समय की बात है। एक जंगल में भेड़ियों का शासन हुआ करता था। यूँ तो सभी भेड़िये माँसाहारी थे और हर तरह का माँस खाते थे। पर सीधी, सरल, शाकाहारी बकरियाँ उन्हें बेहद पसंद थीं। बकरियाँ उन्हें आसानी से मिल भी जाती थीं। इधर-उधर घूमतीं, हरी-हरी घास चरतीं बेफिक्र बकरियों पर जब भेड़ियों की लपलपाती नज़र पड़ती, तो बेचारियों की जान तो दूर की बात, हड्डियांँ तक न बचतीं।

धीरे-धीरे बकरियों की संख्या कम होने लगी। उन्हें समझ आने लगा कि भेड़ियों के रहते उनका रहना संभव नहीं। बड़ी-बूढ़ी बकरियों ने भी यही समझाया कि भलाई यही है कि घर में रहो। घर से बाहर का काम बकरे कर लेंगे। बकरों को भी समझाया कि बकरियों की आन, बान और मान की रक्षा बकरों को करनी होगी और बकरियों को भी समझना होगा कि अगर इतने के बाद भी उन्होंने बात नहीं मानी और लक्ष्मण रेखा पार की तो भेड़ियों से तो कोई कुछ नहीं कहेगा, 'वो तो होते ही भेड़िये हैं', पर तुम बकरियों की खैर नहीं! अधिकतर बकरियों ने सहमति जताई। कुछ बकरियों ने अपनी आज़ादी का प्रश्न उठाया पर मौत के भय से वो भी कसमसाकर, और अगले जनम मोहे बकरी न कीजो गुनकर चुप  हो गईं। पर अल्हड़ और मासूम बकरियों को कौन समझाए! हज़ार समझाने पर भी वे चोरी-छिपे कुलाँचें भरती हुई निकल तो जातीं पर फिर घर न लौट पातीं। थक-हारकर सब बकरे-बकरियों ने जंगल छोड़ने का फैसला किया। 

एक बुज़ुर्ग बकरी ने यह भी सुझाया कि भेड़ियों से लड़ना है तो छोड़ो ये बकरियों का रूप रँग। भेड़ियों जैसी बनो। कुछ बकरियों को ये सुझाव पसंद आया, पर कुछ उम्रदराज़ बकरियों को लगा, भेड़िये बूढ़ी हड्डियों को चबाकर क्या करेंगे, हम तो ऐसे ही भले। नई बकरियों के आगे पूरी ज़िंदगी पड़ी है, उनके लिये ये सुझाव ठीक है। पर जब बूढ़ी हड्डियांँ और बकरों को भी भेड़ियों ने नहीं छोड़ा तो सबके होश फ़ाख्ता हो गए और विचार बदलते देर न लगी।

अब आक्रोश बढ़ा और समझ आया कि जंगल छोड़ना विकल्प नहीं। भेड़िये तो हर जंगल में होंगे, बकरियांँ कहाँ-कहाँ भागेगीं? इसलिये तय हुआ कि बकरियों को ट्रेनिंग दी जाए, सशक्त बनाया जाए, जिससे वो भी निर्भीक होकर भेड़ियों की बराबरी कर सकें।

इधर भेड़ियों के कई खबरी थे, अत: उन्हें भी कुछ भनक लगी और सूचना भेड़ियों तक पहुँची।

बकरियांँ न रहेंगी तो कैसे काम चलेगा! भेड़िये सकते में आ गए। 

कुछ गुर्राए- @#$% हम से बचके कहाँ जाएंगी...!

सबको चुप कराते हुए, अबकी बुज़ुर्ग भेड़ियों ने समझाया- देखो बेटा, हम भी कभी तुम्हारी उमर के थे। पर हम तुम्हारी तरह नहीं थे। हम तुम्हारी तरह अक़्ल से पैदल नहीं थे। समझ आई बात? एक तरीका होता है, बकरियांँ पकड़ने का। हमारे जमाने में तो कभी ऐसा नहीं हुआ, कि बकरियाँ भेड़ियों की तरह रहने की बात करें, जंगल छोड़ के कहीं और बस जाएँ! ये तुम्हारी कमी है। तुम्हें बकरियों को संभालना नहीं आया!

सारे भेड़िये बेचारे मुँह लटकाकर रह गए। बात सही भी थी। इसलिए क्या कहते। हिम्मत साधकर एक भेड़िया बोला- तो बताओ न चचा अब क्या करें???

बूढ़ा भेड़िया अब गुस्से में चिल्लाया- अबे चुप कर! ये करेंगे! करना होता तो बकरियाँ आज जाने की बात न कर रही होतीं। अब जो भी करना होगा हम करेंगे।

भेड़िया अपना सा मुँह लेकर रह गया।

बुज़ुर्ग भेड़ियों को अपनी बुद्धि पर बड़ा भरोसा था अत: उन सबने तय किया कि बातचीत से सब ठीक होता है तो क्यों न बकरियों से बात की जाए, और वो तो होती ही हैं कम अक़्ल! सब अपने पक्ष में होगा, सही होगा।

आनन-फानन में संदेश बकरियों के पास भिजवाया गया। घिसे नाखून और उखड़े दाँतों वाले चार भेड़ियों को बकरियों के खेमे में भेजा गया। उनके साथ भविष्य के शान्ति दूत के प्रतीक रूप में एक हट्टा-कट्टा भेड़िया भी सरल और चुपचाप मुद्रा में भेजा गया।

बकरियांँ पहले तो ठिठकीं पर भेड़ियों की उम्र को देख मन में स्वाभाविक दया उपज आई। आवभगत के बाद बातचीत शुरू हुई।

भेड़ियों ने कहना शुरू किया-

देखो जंगल की शान आप बकरियों से ही है। जंगल की रौनक आप बकरियों से ही है, नहीं तो हम भेड़ियों को कौन पूछ्ता है! आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि बकरियांँ जंगल छोड़कर जाने की बात करें!

बूढ़ा भेड़िया अपनी बात पूरी कर पाता कि एक बकरी बोली- पहले हम बकरियों पर ऐसे अत्याचार भी नहीं हुए!!

बूढ़ी बकरी उसे बरजने ही वाली थी कि बुज़ुर्ग भेड़िया बोला-

सही कह रही हो बेटी। लेकिन अपनी दादी नानी से पूछो, अपनी माँ से पूछो, उनका जीवन भी कभी आसान नहीं था। 

कुछ बकरियों ने हामी में सिर हिलाया।

बूढ़े भेड़िये ने अपनी बात कहना जारी रखा-

फिर भी कभी अपना देश, अपना संस्कार नहीं छोड़ा। अब दूसरा भेड़िया बोला- भेड़ियों की वेशभूषा बना लेने से भेड़िया तो नहीं बन जाओगी, अपनी संस्कृति और संस्कार को छोड़ने से कुछ नहीं होगा। 

भेड़िये की बात सुनकर बूढ़ी बकरी बोली- दादा बस बकरियों को ही उपदेश देने आए हो! देखते नहीं कि बकरियों का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया है? आपकी उमर का लिहाज़ करके हम बात करने को राज़ी हुए थे, पर लगता है गलती कर दी।

भेड़ियों ने दाँत निपोरे। एक भेड़िया बोला- जंगल अकेले बकरियों या भेड़ियों से नहीं चलता। इस बात को मानो कि हमारे डर से बहुत से खूंखार जानवर यहाँ नहीं आ पाते, नहीं तो सोचो क्या होता?

क्या होता? जो भी होता इतना बुरा न होता। आप अपने बनकर हम बकरियों को धोखा देते आए हो, पर अब नहीं सहेंगे। एक अधेड़ उमर की बकरी ने कहा। भेड़िये मन ही मन गुर्राए।

अब एक भेड़िया बोला-

जो हुआ सो हुआ। अब हम अपनी बहन-बकरियों के सम्मान की रक्षा का प्रण लेते हैं। 

पीछे से आवाज़ आई- ऐसा ही है तो कटवा लो न अपने नाखून और तुड़वा लो नुकीले दाँत!

भेड़ियों की आँखों में खून उतर आया। वे फिर गुर्राए... पर बूढ़े भेड़िये ने फिर चुप होने का इशारा किया और उठते हुए कहा- जो हमारी बहने-बकरियांँ कहेंगी, वही होगा।

बकरियांँ चकित थीं। भेड़िये जा चुके थे। 

घर आकर भेड़िये चिल्लाए- दादा खुद के तो हैं नहीं अब हमारे भी तुड़वाओगे! वाह!

टूटे हैं तो क्या खाते नहीं हैं? समझो, अब नाखून और दाँतों को सब्र दो। मैं कब कहता हूँ कि तुड़वाओ? हैं?? हम भेड़ियों की यही तो पहचान है।

पर अब पैंतरा बदलो, छुपा लो अपने दाँत और नाखून, सीखो कुछ। अब यह दिखाओ कि तुमसे बड़ा हितैषी कोई नहीं है बकरियों का। करो कुछ ऐसा कि बकरियांँ खुद चली आएं...समझे? कहते हुए भेड़िये ठठाकर हँस पड़े। बकरी फँसाने की नई योजना सब भेड़ियों को समझ आ गई थी।

इधर बकरियों की ट्रेनिंग जारी थी। उन्होंने अपने सींग पैने और सीधे कर लिये थे, खुरों को और मज़बूत कर लिया था और अपने दाँतों को भी उन्होंने तीखा और नुकीला बना लिया था। यहाँ तक कि उनकी मिमियाहट भी ऐसी हो गई थी, कि एक क्या दस भेड़ियों को हार्ट-अटैक आ जाए!

परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में जंगल की तबियत बदल गई। डरना तो कब का हवा हुआ, अब बकरियाँ घास के साथ भेड़ियों के माँस का भी लुत्फ़ उठाने लगीं! भेड़िये चिल्ला उठे- घोर कलयुग! ये जंगल अब रसातल की ओर जा रहा है....

पर अफसोस बकरियों के आगे उनकी एक न चली

मरते क्या न करते, वे अब इस  खयाल में थे कि किसी दूसरे जंगल की बकरियों पर दाँव आज़माया जाए, पर असलियत में बकरियों के सामने उनकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी।












सोमवार, 17 जुलाई 2023

श्रावण

 




श्रावण तुम्हारा स्वागत है

सब पलकें बिछाकर राह देखते हैं तुम्हारी

मानो पूरी सृष्टि ही जैसे प्रतीक्षा करती हो तुम्हारी,

तुम्हारे आते ही बदल जाती है, मौसम की रंगत

श्यामल सज जाता है आकाश और करता है शंखनाद।

 बूँदें छम छम करती हैं नृत्य,

कूकती है कोयल और थिरकते हैं मोर

तपस्विनी धरती भी धो लीप लेती है अपना आँगन

और हरियाती आत्मा से कर उठती है मंद्रित स्वर मन्त्रोच्चार।

नदी और सागर भी नहीं ठहर पाते अपनी ही जगह 

और उमग आते हैं,

जैसे हो जाना चाहते हों वो भी कृतार्थ

कर पाद-प्रक्षालन उस अनंत का।

सोचती हूँ 

 ये परिवर्तन नहीं संयोग भर,

यहाँ तो याचना है, प्रार्थना है परित्राण की,

उस आदियोगी से जिसने सहज ही पी लिया था विष हलाहल,

सृष्टि के उद्धार को

और हो गए थे ध्यानस्थ।

श्रावण मैं देखती हूँ 

 तुम्हारा आना नहीं साधारण

वह तो अवसर है, सृष्टि के ओंकाररूप हो खुद को पा लेने का,

निर्दोष

इसलिए

 हर बार जब तुम आते हो,

प्रकृति पूर लेती है चौक और 

हो जाती है नतमस्तक

करती आत्मस्थ मन्त्रोच्चार- 

शिवोअहं शिवोअहं शिवोअहं...













सोमवार, 5 जून 2023

एक अविस्मरणीय दिन




 आज विश्व पर्यावरण दिवस भी है और आदरणीय प्रोफेसर के पी सिंह सर का जन्म दिवस भी। इस अवसर पर सर को अपनी पुस्तक भी भेंट की।
सर को जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएँ। 💐💐🎂🙏

पर्यावरण दिवस पर कुछ हाइकू





1. जब तक जीते हो
प्राण देते हो
हमें श्वास से।
2.जब तक जीते हो
छाँह देते हो
धूप सह के।
3. जब तक जीते हो
फूल फल से
कष्ट हरते।
4. जब तक जीते हो
आश्रय बन
रक्षण देते।
5. जीवन पर्यंत यूँ
सीख देते हो
उदारता की।
6. जीवन के बाद भी
काष्ठ बनके
मोक्ष देते हो।
7. राख बनकर भी
सब साध के
काम देते हो।
8. कायर मनुज क्यों
तब भी नहीं
कुछ सीखता।
9. बस जानता वह
शुष्क करना 
हरीतिमा को।
10. स्वार्थी दानव बन 
चाहता बस
स्वार्थ सिद्धि।








मंगलवार, 30 मई 2023

तजुर्बा

 बात निकली थी कि

तजुर्बा ज़िंदगी जीना सिखाता है

ज़िंदगी का क्या सलीका है, यह बताता है

तजुर्बेकार होना फ़क्र की है बात

क्योंकि तजुर्बा आदमी को आदमी होना सिखाता है

सही सब कुछ,

नहीं इसमें शिकायत है ज़रा सी भी

मगर क्यों चाल मंथर है तजुर्बे की, असर क्यों देर से अपना दिखाता है

नज़र के सामने अक्सर यही है

कि जब ज़िंदगी जीने की पक्की चाह होती है,

सहज निश्छल हृदय की ऊँची उड़ान होती है,

तजुर्बेकार मिलते हैं मगर तजुर्बा ढूँढने से भी नहीं मिलता

खुशी से नाचता मन जब किसी की भी नहीं सुनता,

तजुर्बा किस गुफा में, कंदरा में है छुपा रहता

मगर जब चोट खाता है सरल मन

वृद्ध सा उपदेश देता होता प्रकट है

समय के साथ जो आता, भला क्या तब नहीं होता

 समय के बाद आने का मनुज को लाभ ही क्या है?

द्वेष रखता है सरल चंचल हृदय से

आह! कैसा है तजुर्बा!


 



रविवार, 28 मई 2023

उफ ये मटर का दाना!

...तो समझ आया स्टूडेंट्स, हमें सबकी रिस्पेक्ट करना चाहिये। कभी किसी का दिल नहीं ब्रेक करना चाहिये। नहीं तो हमें भी उसका इम्पैक्ट झेलना ही होगा, ओके?.... बाकी अब अगली क्लास में। 

कहते हुए हिंदी की शिक्षिका नीरू खेड़ा चेयर से उठ खड़ी हुईं, जिस पर आराम से पसर कर वे बच्चों का ज्ञान-वर्धन कर रही थीं। बच्चों ने भी ओके मैम कहते हुए राहत की सांस ली। आखिर यह वह क्लास थी जिसमें सिलेबस से ज़्यादा नीतिशास्त्र पढ़ाया जाता था वो भी अधकचरी अंग्रेज़ी में। 

हिंदी की शिक्षिका होकर भी खेड़ा जी हिंदी से पल्ला झाड़ती नज़र आती थीं और भरसक अपने पहनावे और ज़बान पर जम चुके बनावटी लहज़े से खुद को इन्ग्रेजी की असली वारिस घोषित करने का प्रयास करती थीं। ये अलग बात है कि इस चक्कर में बेचारी न तो हिंदी की ही रह पायी थीं और अंग्रेज़ी ने तो उन्हें कभी पूछा ही नहीं। 

क्लास से निकल कर नीरू अभी आगे बढ़ी ही थीं, कि परम मित्र मीता वर्मा जैसे उन्हीं का इन्तज़ार कर रही थीं। दोनों एकदम सगी मित्र। इसलिये दोनों एक दूसरे को देख बच्चों सी प्रसन्न हो गईँ। 

नीरू खेड़ा- तू क्या मेरा ही वेट कर रही थी?

और नहीं तो क्या? मीता ने मुस्कुराते हुए कहा। अच्छा सुन वो जो नया लड़का आया है न, क्या नाम है.... अरे यार क्या नाम है....

नीरू खेड़ा- अरे मनोज.. वही तो आया है, तेरी भूलने की बड़ी बीमारी है, कुछ कर इसका। अब  बता क्या हुआ?

मीता वर्मा- अरे हाँ वही तो मनोज, मुझे तो बिल्कुल नहीं पसंद। अजीब सा लगता है, पता नहीं क्या सोचता रहता है!

नीरू- मुझे भी नहीं पसंद। मुझे तो उसकी शकल ही नहीं पसंद। वैसे तो मुँह बना के बैठा रहेगा और कुछ बात हो तो अचानक से बड़ा खुश हो जाएगा। मैंने तो उसे बोल भी दिया था कि ज़्यादा खुश मत हुआ कर।

मीता- हाँ ठीक किया ...पता नहीं क्या है! सुना है कुछ परेशान है, घर की हालत कुछ ठीक नहीं है, इसीलिये रोता रहता है बैठकर!

नीरू- भाड़ में जाए मेरी तरफ़ से। कल मैंने कहा कि ज़रा मेरी क्लास ले ले, मुझे ज़रा शॉपिंग  पर जाना है, तो साफ़ मना कर दिया! बोला आज मैम ज़रूरी काम है! बताओ है किसी कोंटरेक्ट पर काम करने वाले की इतनी हिम्मत कि मना कर दे! मेरा बस चले तो लात मार के निकाल दूँ इसे।

मीता- रमेश को रखना चाहिये था, पर इसे रख लिया, मैंने तो रमेश का नाम भी भेज दिया था, पर मिसिज़ चन्दानी कह रहीं थीं कि इंटरव्यू बड़ा अच्छा गया था इसका। अच्छा है लड़का, टॉपर है, अपने समय का, लिखता पढ़ता भी है कुछ....

नीरू- एँह...छोड़ो न, मुझे तो एकदम बचकाना लगता है,  कोई उन्हीं का जानकार होगा। फैमिली प्रॉब्लम के नाम पर लगा लिया..हमने कोई अनाथाश्रम थोड़े ही खोला हुआ है कि रख लें किसी को भी...

मीता वर्मा- और क्या?

नीरू खेड़ा-  तू छोड़! ऐसी उतारकर रखेंगे कि दो दिन में ही भाग जाएगा। 

मीता वर्मा- अरे तुझे पता है शनिवार को मिसिज़ चंदानी ने सेमिनार रखा है और सारा काम इसे ही सौंपा है?

नीरू खेड़ा-  हाँ कल कह तो रहीं थीं, देखते हैं क्या करता है, कहते हुए दोनों स्टाफ रुम की ओर चल दीं।

सेमिनार वाला दिन भी आ गया। मनोज अपने भरसक प्रयत्न से इस कार्यक्रम को सफल बनाना चाहता था। आखिर उसका आगे का सफ़र आज के कार्यक्रम पर ही तो तय था। इधर से उधर भाग-दौड़ करता मनोज सोच रहा था कि आज अपने विरोधियों के भी दिल जीत लेगा। उधर विरोधी खेमा इस ताक में था कि कैसे उसे नीचा दिखाए। 

कुछ ही पलों में अतिथि महोदया का आना हुआ। मनोज उनके साथ ही था। उधर प्राचार्या महोदया, वरिष्ठ और अति विशिष्ट अतिथि साहित्यकार के साथ मनोज उन सठियायी महिलाओं को कहाँ रास आने वाला था? अत: मीता वर्मा ने चिढ़ते हुए नीरू खेड़ा से कहा- तू देख रही है, कितने मिजाज़ चढ़ गए हैं इसके... कितना लपर-लपर कर रहा है..

नीरू- हाँ, तू चिंता मत कर, अभी इसकी औकात दिखाती हूँ। चल वहीं चलते हैं। कहते हुए नीरू और मीता अपनी सधी चाल में वहाँ पहुँचीं जहाँ, मनोज समेत बाकी सभी लोग थे। अपनी कुटिल मुस्कान पर सौम्यता का परदा डाले दोनों ने अतिथि महोदया को नमस्कार किया और बहुत सहज भाव से नीरू खेड़ा ने मनोज की ओर इशारा करते हुए कहा- आजकल के बच्चों में इतनी भी तहज़ीब नहीं रह गई है कि पहले बड़े लोगों को मिल लेने दें, बस बिना आगे पीछे देखे चापलूसी में लग जाते हैं।  अतिथि महोदया कुछ कह पातीं कि मीता वर्मा ने चतुराई से दूसरी बात छेड़ दी-  आपकी ये टसर सिल्क की साड़ी बहुत सुंदर है, मेरे पास भी बिल्कुल ऐसी साड़ी  है। टॉपिक अचानक से चेंज!

दोनों अधेड़ औरतें अतिथि महोदया के निकट बैठ गईं थीं। मनोज स्तब्ध था उसे नहीं समझ आ रहा था कि क्या कहे। कुछ समझ पाता, इससे पहले ही नीरू खेड़ा अपने पैर के पास पड़े मटर के दाने की ओर इशारा करके बोलीं- मनोज ये मटर का दाना, मुझे बहुत देर से परेशान कर रहा है, इसे उठाकर बाहर फेंक दो...मनोज स्तम्भित सा, कुछ समझ पाता, इससे पहले ही मीता वर्मा बोलीं-  अरे बेटा, तूने सुना नहीं, फेंक दे न उठाकर। अच्छा लगता है, गैस्ट के सामने गंदा? अतिथि महोदया के चेहरे पर भी एक विस्मय मिश्रित मुस्कान थी।

आत्मा तक अपमान से तर-बतर मनोज ने कांपते हाथों से ज़मीन पर पड़े मटर के दाने को उठाया और अपनी उँगलियों के बीच भींच लिया। 

इस अप्रत्याशित घटना से मनोज का चेहरा तीखी धूप में मुरझाई कोंपल सा हो गया।

उधर अपने शत्रु का बिना हथियार के ही ज्यों काम-तमाम कर दिया हो, उसी प्रसन्नता से दोनों अधेड़ महिलाओं ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दीं।


 


शुक्रवार, 12 मई 2023

कविता बुनते हाइकू





 विनम्रता है

ज़रूरी बहुत ही

तुम्हारे लिये।

तभी तो रौब  

झेलोगे हमारा यूँ

 सदा के लिये।

नहीं हमको

सुहाता है शुरू से 

सुख तुम्हारा।

रहो चुप यूँ

जैसे मिट गया हो

मन बेचारा।

तुम्हारी हँसी 

चुभती है आँखों को

रहो क्लांत ही।

खिलोगे गर

तो मर जाएंगे यूँ

बेवजह ही।

सरल मन 

टूटता बेचैन हो

करे अब क्या?

समझता है

विषैली आत्माओं को

तड़प कर।

समझता है

अंतिम समय ये

   यातनाओं का।   

पिशाची आत्मा

होती सदा से रुग्ण,

कुंठित प्राण।

पिशाची आत्मा

कष्ट देना जानती 

यही सच है।

मगर सच

आखिरी एक यह  

मिटेगा पाप।

जलेंगी आत्मा

बेचैन होकर, जो

कलुषित हैं।

अस्तित्वहीन 

भटकेंगी व्याकुल

चिर-समय।

पश्चाताप में 

जलतीं निरंतर

माँगतीं क्षमा..



रविवार, 2 अप्रैल 2023

स्वामी भले बिराजे जू- भाग 3

अब चले तो पैलो सोमवार एक जंगल में परो। उतै एक दाँय वालो दाँय हाँक रओ तो। भाट नैं कई तनक हमाई किसा सुन लो। 

दाँय वालो बोलो- कै जब तक तुमाई किसा सुनै, हमाई दाँय कौ का हुइये? भाट नैं कई ठीक है भैया ना सुनो। जैसईं भाट आगे बढ़ो सो ऊकी दाँय फर-फर बरन लगी। अब दाँय वालो चिल्लाओ - भैया तुमनैं का जादू कर दओ कै हमाई दाँय फर-फर  बरन लगी। भाट बोलो- कै हम का जानैं। जानैं तो हमाए स्वामी जू जानैं। 

दाँय वालो बोलो- भैया हमैं सुना दो अपने स्वामी जू की कथा।

भाट नैं कथा सुनाई औ ज्यों द्योलन और गुड़ को भोग लगाओ औ चुरुआ छिड़को सो दाँय दूनी चौगुनी हो गई। 

अब भाट आगे चले। चलत-चलत अब दूसरों सोमवार परो। सो जंगल में एक गड़रिया भेड़ें चरा रओ तो। भाट नैं कई कै भैया तनक हमाई किसा सुन लैयो। भाट की बात सुन कैं गड़रिया बोलो- जब तक हम तुमाई किसा सुनै हमाई भेड़ें न भग जैं? भाट नैं कई कै ठीक है भैया न सुनो। ऐसो कह कैं भाट आगे चले सो गड़रिया की सब भेड़ें हिरा गईं। अब गड़रिया चिल्लानों - ए भैया रुक जाओ, सुना दो अपनी किसा। भाट नैं पूजा बिस्तारी। गुरधानी को भोग लगाओ औ ज्यों चुरुआ छिड़को सो सब भेड़ें जईं की तईं हो गईं। 

अब भाट चलत-चलत और आगे बढ़े सो तीसरो सोमवार बड़ी बिटिया के इतै परो। सो भाट नै कई बड़ी बिटिया सें कैं बेटा पूजा करनें सो तनक व्यवस्था कर लो। बिटिया बोली कै तुम जौई सब करत करत गए ते औ जौई करत-करत आ गए।  इतै कोऊ नइयाँ भूखो प्यासो अबै तक। 

बिटिया की बात सुन कैं भाट नै कई कै ठीक है। कह कैं भाट आगे चले सो रस्ता में एक कोढ़ी मिलो। भाट नै कई कै भैया तनक हमाई किसा सुन लो। भाट की बात सुन कैं कोढ़ी बोलो- भैया सुना दो। 

अब भाट नै कोढ़ी के पेट पै जवा रख दये। पँचमेर कौ भोग लगाओ औ स्वामी जू की किसा कैबो शुरू करी। अब ज्यों किसा पूरी भई कोढ़ी की काया एक दम अच्छी हो गई। कोढ़ी हाथ जोर कैं बोलो- भैया तुमनै का जादू कर दओ कै हमाए सब कष्ट मिट गए!

कोढ़ी की बात सुनकैं भाट बोलो कै भैया हम का जानें, जानैं तौ हमाए स्वामी जू जानें औ हाथ जोर कैं आगे बढ़ गए।  

अब भाट चलत-चलत आगे पहुंचे सो चौथे सोमवार खां छोटी बिटिया कैं पहुंचे। बिटिया नै कई कै पिताजी जो व्यवस्था करने हो सो बता दो। भाट नै बताओ कै अब छप्पन भोजन कौ भोग लगनें। सो जो जैसो बन सके सो बना लो। तुम नदिया में नहा कैं आ जाओ। औ जो तुमाई धोती रेशम की हो जाए औ लोटा सौने को हो जाए सो चौकियो ना। बिटिया नै हओ कई औ चल दई नदिया। बा ज्यों नहा कैं निकरी सो खूब अच्छी धोती और सोने को लोटा हो गयो। बिटिया की आर्थिक हालत ठीक ना हती। सो बा अपने मौड़ा खां बनिया के इतै बिठार कैं पूजा की सब सामग्री औ छप्पन भोजन कौ सामान लै आई ती। इतै बनिया आओ सो बोलो- बैन तुमाए मौड़ा मैं तो जानै का जादू है,  हमाई तो आज खूब बिक्री भई। इत्ती तौ कबहुँ मइना भर मैँ नईं भई। 

अब भाट नैं पूजा बिस्तारी। किसा कही औ जो बेंत खड़के औ चुरुआ छिड़को सो छोटी बिटिया को घर महल सो हो गऔ। ऊकी दसा पलट गई। 

अब भाट आगे चले सो चलत चलत अब अपने गाँव की गैल आ गए। उनै दो ग्वालिन मिलीं। भाट नै उनसैं कई कै जाके कह तो भाटिन सैं कै आ गए तुमाए भाट। औ पूरे गाँव में न्योतउआ टिरउआ करा दो कैं भोज है, भाट कैं। अब जा खबर जब भाटिन खां मिली, कै भाट आ गए, सो बा तौ खुसी के मारें पागल हो गई। इत्ते में भाट पहुँच गए। भाटिन सैं पहलें तौ कछू बोलत ना बनो खुसी कैं मारें, फिर तनक संभली सो बोली- कैसो न्योतउआ टिरउआ। पहले तनक पिसन दो, दरन दो। 

भाट नै कई कै नईं। तुम तौ करा दो न्योतउआ टिरउआ सँगै। 

राजा खां भी न्योतो पहुँचो। राजा तौ ना पहुंचे पर खूब जनता पहुंची। सबनै खूब तारीफ करी। जनता कत जाए कै ऐसो भोज तो ना दओ राजा रहीस नैं, जैसो भोज दओ, भाट भिखारी नैं।  

अब राजा को दिमाग ठनको कै, भाट भिखारी खां ऐसो कौन सो खजानो हाथ लग गयो! रानी सैं बोले कै चलो, अपन तनक चल कैं देखें तौ। अब आए राजा भाट भिखारी कैं। भाट नैं जो बेंत खड़के, चुरुआ छिड़को सो, राजा समझ गए कैं इनईं बेंतन मैं कछू है। सो उनने रानी खां इसारो कर दओ। इतै रानी नैं कुँवर खां चूँटी लै लई। सो कुँवर रोन लगे। 

अब भाट नै कई कै महाराज कुँवर काय रोउत? अब राजा बोले कै अंदर जो बज रओ, कुँवर ऊके लाने रो रये। तुम बा चीज फौरन ल्या कै दै दो तुम कुँवर खां। अब भाट बिचारो का करतो, सो ऊनें स्वामी जू के पाँव परे औ दै दये बेंत। 

अब राजा नै गाँव भर मैं कबा दई कै राजा कै भोज है। सब जनता राजा के इतै पहुंची। अब राजा नै जो बेंत खड़काए सो खूब धुआँ होय और बेंत उचट-उचट कै लगें राजा-रानी और सब जनता खां। और राजा रानी को सब बिला गयो बौ अलग। उतै सैं बिटिया दमाद आ गए, उनको सब बिला गयो तो। सबनैं कई कै ऐसो का टोटका कर दओ कै हम औरन को सब बिला गयो। 

भाट बोलो कै हम का जानें, जानै सो स्वामी जू जानै। सब जनें बोले कै चलो स्वामी जू कैं। 

अब सब जनें चले सो सब खां पाँवन में कांटे लगें और खूब धूप लगै। पर भाट के पाँवन तरें मखमली घास होत जाए औ मूड़ पै बादल छाँह करत जाएँ। अब बिटिया दामाद और और राजा रानी बोले कै तुमई जाओ हम औरन के बस की नइयाँ। 

अब भाट पहुंचे जगन्नाथ जी कैं और फिर चिल्लाए- स्वामी जू स्वामी जू। 

भक्त की गुहार सुन कैं भगवान फिर आए औ बोले- काय रे भटुआ तैं ने तौ गैलई देख लई। बताओ अब का हो गयो। भाट नै सब बात बताई और कई कै तुमाओ दओ न राजा रानी के मारें कहा पाउत न बिटिया दमाद के मारें खा पाउत। 

भाट की बात सुन कैं भगवान हँसे। बोले- जाओ- राजा रानी कौ राजा रानी खां दओ औ बिटिया दामाद कौ बिटिया दमाद खां दओ औ तुमाओ तौ है ई सात पीढ़ियन खां। 

किसा हती सो हो गई।  

रविवार, 26 मार्च 2023

स्वामी भले बिराजे जू भाग-2

 अब भाट नै कई, हम कैसें जानें कै तुम जगन्नाथ जी हो, कच्चे सूत में से झूल जाओ तौ जानें।

अब सच्चे भक्त के लाने तौ भगवान कछू भी कर सकत, सो बे झूल गए कच्चे सूत सें।

भाट खाँ अबै भी भरोसो नईं भओ सो बौ बोलो- करवा की टोंटी से निकल जाओ, तौ जानें। सो जगन्नाथ जी भाट भिखारी कै लाने करवा की टौंटी से झूल गए। अब जब भाट खाँ हो गओ भरोसो सो बौ जगन्नाथ जी के चरणन में गिरो औ चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू। स्वामी जू बोले अब तुम जाओ और भंडार सें ढाई-ढाई चुटकी आटा, दाल, चावल लो और भोग बनाओ, खाओ।

अब भाट जू चले। अब भंडार में उन ने सोची कै ढाई ढाई चुटकी सै का होत। सो खूब बिलात-बिलात भर लओ। अब जैसईं बना कैं हाथ धोन गए, सो फिर कुचिया, रुटिया। अब भाट हीर चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू। 

अब स्वामी जू फिर आए बोले काय रे भाट, अब का हो गओ?

भाट बोलो- एई के मारें तौ हम घर-बार छोड़ कैं तमाए इतै आये। एक गाँव माँगत तो कुचिया रुटिया हो जात औ चार गाँव माँगत तो कुचिया रुटिया हो जात!

भाट की बात सुनकैं स्वामी जू हँसे और बोले- नियत तौ नईं डुगाई ती?

स्वामी जू की बात सुन कैं भाट बोलो- हओ डुगाई तौ हती। हमनैं कई कै ढाई चुटकी सैं का होत सो हमनैं बिलात-बिलात लै लओ सब।

अब स्वामी जू बोले- एई सैं। नियत नईं डुगानैं। अब जाओ और ढाई-ढाई चुटकी लो सब कछू।

अब स्वामी जू की बात सुन कैं, भाट नैं फिर गओ भंडार घर मैं और अब ऊनैं ढाई की जगा एक-एक चुटकी लई औ बनाओ भोग। सो जैसईं भोग लगाओ सो बौ इत्तौ हो गओ कै बड़ाए ना। अब भाट फिर परेसान, चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू ..

स्वामी जू फिर आए, बोले अब का हो गओ?

भाट बोलो- स्वामी जू, तुमनैं जितनौं कई ती हमनैं तौ ऊसैं भी कम लओ, पर अब इत्तौ हो गओ कै, संभर नईं रओ।

भाट की बात सुनकैं स्वामी जू हन्सै और बोले- गरीबन खाँ खबाओ, मछरियन का डारौ औ फिर बचै तौ, उल्टे-सीधे हाथ पटकौ, सो सब बिला जै।

भाट नैं ऐसईं करो। अब तीसरो दिन भओ सो घरैं जाएं की छड़ी लगी। सो भाट नैं जगन्नाथ जी कौ आशीर्वाद लओ। स्वामी जू बोले कै, जाओ सो पाँच बेंत तोड़ लो और एक थाली और लोटा लै लो। भाट गओ बेंत तोड़बे, सो फिर मन मैं लालच आ गओ। ऊनें सोची कै पाँच काए, तनक बिलातअई तोड़ लैं। सो जैसईं ऊनैं पाँच सैं ऊपर तोड़े,, बौ उतईं बाँसन मैं फँस कैं रै गओ। सो फिर चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू।

अब फिर आए स्वामी जू। बोले- काय रे भाट अब का हो गओ?

भाट बोलो स्वामी जू हम निकरई नईं पा रये। 

स्वामी जू बोले- फिर सैं नियत डुगाई ती का?

अब भाट रै गओ। बोलो हओ स्वामी जू, डुगाई तौ हती। 

भगवान बोले- जब-जब नियत डुगाहो, सो फँस हो। ई सैं गाँठ बाँध लो कै नियत नईं डुगानै। अब जाओ, छूट गए तुम।

भाट भगवान कैं पाँव पर कैं, जौँ चलैं का भओ सो आँखन से कछू दिखाए ना। पाँव उतईं कैं उतईं जम गए। सो भाट फिर चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू।

स्वामी जू बोले- अब का हो गओ? काय खाँ चिल्लात? 

भाट बोलो- आँखन सैं कछू दिखात नैयाँ। पाँव जाँ कै ताँ रै गए, बढ़तई नैयाँ आगे!

कोऊ के संदेसे तौ नैयाँ? 

भाट बोलो- हैं तो स्वामी जू, गठरियन!

गठरियन? तौ बताओ फिर।

अब भाट नैं पैलो संदेसो कई- गैया ऊ पार, बच्छा ई पार। मिलईँ नईं पाउत।

अब स्वामी जू नैं कई- पिछ्ले जनम मैं अपने बच्चा खाँ तो खूब प्यार करो, दूसरे के खाँ दुत्कार दओ। तुम छू लैयो सो मिल जैन हैं।

दूसरौ संदेसो- आधो सांप बामी मैं आधो बामी के बाहर?

स्वामी जू बोले- पिछ्ले जनम कौ कायस्थ आए। अपनी दूसरे की बिद्या तो लै लई पर अपनी नईं दई। तुम छू लैयो सो ठीक हो जै।

तीसरौ संदेसो- उबीनौ घोड़ा, ऊपै कौऊ नईं बैठत।

स्वामी जू बोले- अपने मालिक खाँ रण में अकेलो छोड़ कैं भग याओ। तुम बैठ कैं पाँच कदम चल लैयो, सो सब बैठन लगैं।

चौथो संदेसो- एक आम को पेड़, जी के फल कोऊ नईं खात।

मामा आएं पिछ्ले जनम के। भनैज कौ लै लओ और लौटाओ नैयाँ। तुम पाँच आम तोड़ लैयो, सो सब जनैं टोरन लगैं।

पाँचवौ संदेसो- एक घर सबेरे बनत साम कैं टूट जात?

जमींदार अपनो तो महल बनवा रओ और ओई के गाँव में गरीब की मौड़ी कौ ब्याओ नईं हो पा रओ। मौड़ी कौ ब्याओ करा दे जमींदार, औ तुम छू दैयो घर ना टूटै फिर।

दो तलैयाँ जिनमें कीरा बिलबिलात?

पिछ्ले जनम की द्योरानी-जिठानी आएं। इन्नैं न उनैं ढाँक कैं बायनों न उन्नै इनैं। तुम ई कौ पानी ऊ मैं और ऊ कौ पानी ई मैं कर दैयों सो सब पियन लगैं।

अगलो संदेसो मूड़ पै मौरिया धरें, उतरतई नैयाँ?

स्वामी जू बोले- अपनों बोझा तो उतरवा लओ, दूसरे को चढ़ो रन दओ। तुम हाथ लगा दैयो सो उतर जै।

मूड़ पै कैलिया औंधाए। निकरतई नैयाँ।

जौन बरतन मैं बनाओ ओई मैं खान लगीं। तुम छू दैयो सो उतर जै।

कमर सैं पीढ़ा चिपको, निकलतई नैयाँ।

स्वामी जू बोले- बड़े आए और मान मैं बैठे रये उठे नईं। तुम छू दैयो सो निकर जै।

अब संदेसे कह कैं भगवान के पाँव पर कैं लौटे भाट जू। 

क्रमश:



क्रमश:

रविवार, 19 मार्च 2023

स्वामी भले बिराजे जू भाग -1






चैत्र का महिना लग गया पिछ्ली 8 तारीख को। इस चैत्र से जीवन के तार जुड़े हैं। इसी चैत्र माह में राम नवमी यानी राम लला के जन्मोत्सव से ही भारतीयों का नववर्ष आरंभ होता है। अखंड मानस पाठ, नवाह पाठ से सब कुछ भक्तिमय हो जाता है। पके गेंहूँ की फसल भी इसी चित्रा नक्षत्र में घर भरती है। इसी के साथ इसी माह में हमारे घर पधारते हैं स्वामी जू और उनके सम्मान में प्रेम और भक्तिमय स्वर गूँज उठते हैं-
स्वामी भले बिराजे जू, 
उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में 
भले बिराजे जू....
प्रतिवर्ष इसके साथ ही मेरा बचपन अपने एक खास दृश्यखंड के साथ मेरी स्मृतियों में जीवंत हो उठता है, कानों में आरती गातीं, 'किसा' कहतीं आवाज़ों के साथ मेरी पड़दादी फिर से मुझे याद आ जातीं हैं। मुझे याद आता है कि किस तरह चैत्र के प्रत्येक सोमवार को, हर बार अलग प्रसाद के साथ अम्मा, मम्मी और बाई (पड़दादी) जगन्नाथ जी की पूजा करती थीं। अम्मा के ही कमरे में  या कभी आँगन में पानी से लीप कर, मम्मी चौक पूरती थीं। फिर पटले पर आसन बिछा भगवान जगन्नाथ जी को बिठातीं। पीतल की एक थाली जिस पर जगन्नाथ जी का चित्र बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी के साथ उकेरा गया होता था, वह स्थापित करतीं। जगन्नाथ जी के दाईं ओर इन्हीं तीनों के चित्र से उत्कीर्ण एक लोटा रखा जाता, जिसमें गुड़ का जल और पाँच बेंत रखे जाते। (ये पाँच बेंत, जगन्नाथ जी की फोटो, चित्र उत्कीर्ण थाली और लोटा, सब पुरी से ही लाए गए होते थे।)
मैं देखती थी कि भले ही पिताजी के प्यार से सींचे गुलाब कितने ही क्यों न फूले हों पर, बाई जगन्नाथ जी को एक गुलाब न चढ़ाने देतीं, पर टेसू के फूलों से उन्हें पूर देतीं। जब मैं पूंछती कि ऐसा क्यों? तो वो बतातीं- भगवान के जगन्नाथ रूप को टेसू के फूल बहुत भाते हैं। बात सच है चैत्र में टेसू खूब फूलते हैं। खिले-खिले टेसू के आगे सभी फूलों की खूबसूरती फीकी लगती है।
भाट जब जगन्नाथ जी के द्वार गया था, तो खूब टेसू खिले हुए थे। वही फूल उसने जगन्नाथ जी को भी अर्पित किये थे। तभी तो जगन्नाथ जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये थे, सब दुख दूर किये थे।
मेरा बालमन जगन्नाथ जी से मिलने की कल्पनाएँ कर उठता। मम्मी, अम्मा जब तक पूजा की तैयारी कर रहीं होतीं, बाई अपनी स्मृतियों को मुझसे खोलते हुए कहतीं- "हम तो बहुत बार गए जगन्नाथ जी कें।" 
पण्डा के इते रुके दो बार। बाकी तो रेलवे के गेस्ट हाऊस में रुकत्ते...बाई बोलते-बोलते चुप हो जातीं, ऐसा लगता कि कोई स्मृति खंड पिघलकर बाई की आँखों में बह आया हो, क्या पता बब्बा याद आ जाते हों, क्या पता! इतने में अम्मा कहतीं- बाई कओ किसा (कहानी) और बाई जय जगन्नाथ जी कहकर किसा कहना आरंभ करतीं। मम्मी बाई, अम्मा और हम बच्चों के हाथ में जौ थमा देतीं।
(कथा बाई ही कह रहीं हैं, तो मैं खड़ी बोली में कैसे लिख सकती हूँ)
एक हतो भाट। बौ एक गाँव माँगे सो कुचिया, रुटिया रह जाये, औ चार गाँव माँगे सो कुचिया रुटिया रह जाबे। बेचारो बड़ो परेसान। अब एक बार ऊकी औरत ने कई कै बिटिया-दमाद को न्योतो करने। आज तनक बिलात माँग ले आइयो। भाट ने कई हओ।
भाट जू चले। एक की जगा चार गाँव माँग ल्याये। लेकिन फिर बेई बात। खाना बनो सो फिर कुचिया-रुटिया रह गई। अब ऊकी औरत नै कई कै अब का करें? बड़ी बेज्जती की बात। मौड़ी की तौ कछू नईं, पर लाला जू का कैं हैं?
भाट बेचारो भोत दुखी भओ। ऊने कई कै अपने भाग खराब हैं तो का करें। कुचिया मौड़ी खों खबा दो औ रुटिया लाला जू खों, औ हम तौ अब जा रये जा मोह-माया छोड़ कैं।  
और भाट चल दओ। चलत-चलत भाट जू एक जंगल में पहुँचे। उतै एक बारी पत्ता तोड़ रओ तो। भाट नै कई भैया का कर रये तुम ई घने जंगल मैं?
बारी नै कई राजा कै इतै भोज है सो पत्तल के लाने पत्ता तोड़ रये। भाट नैं कई कै हम टुरुआ दैं? बारी नैं कई टुरुआ लो भैया, तुमाई जै हो जाबै। 
भाट नै कई कै हओ और टुरुआन लगो पत्ता।
अब बारी नैं पत्तल बना कैं पहुँचा दईं। राजा ने पूरे गाँव भर खाँ भोज दओ और पूँछी कै कोऊ ऐसो तौ नैयाँ जो भूखो-प्यासो हो? सो बारी ने बता दओ, के महराज एक भाट है, ऊने पत्ता टुरुआबे मैं हमाई मदद करी ती, सो ऊने नई खाओ कछू। 
राजा नैं कई कैं ऐसो है तो बुलाओ और खबाओ खाना।
अब आये भाट। सो बे ऊँची-नीची जघा ढूँढेँ। राजा के लोगन नैं जो देख कैं कई, काय भैया का बात है?
भाट बोले- भैया का करें, बहुत छुद्द्या (क्षुधा) है। 
सो का भई। तुम दो पत्तलें डार लो। भाट नें ऐसई करो। सो एक पत्तल भोज खाओ औ दूसरी पत्तल घड़ा में धर लई। भोज से आये सो रस्ता मैं उनैं उनई के गाँव की दो औरतें मिलीं, सो भाट ने बौ घड़ा उनै दै कैं कई, कै हमाई भाटिन खाँ दै दैयो, और कह दैयो कै चिंता ना करें, हम जगन्नाथ जू कैं जा रये।
अब उन दोई औरतन नैं सोची, कै ई भाट भिखारी नैं काआ भेजो भाटिन खाँ, तनक देखें तौ। सो जैसई बे देखन लगीं, उनके हाथ घड़ा मैं चिपक गये और आँखन से कछू दिखाए ना और कानन सैं कछू सुनाए ना।
अब बे घबरानी औ बोलीं- ओ राम अब न झाँकें दूसरे के मैं। अपनी तरफ़ से और जो गाँठ में हुइये सो डार दें। पर ठीक कर दो। सो बे ठीक हो गईं और संदेसे के संगे, उन्नें बौ घड़ा भाटिन खाँ दै दओ औ जो उनके संगे भओ सो बौ भी बता दयो।
अब जो भाटिन नैं देखो- सो ऊमैं हीरा-मोती! भाटिन नैं सोची कै भाट नैं ऐसो का करो कै इत्ते हीरा-मोती भेजे! जे तौ राजा के आएं। सो भाटिन बौ घड़ा लै कैं राजा के इतै पहुँची। 
अब राजा नैं जो घड़ा देखो, सो ऊमेँ राजा खाँ खाना दिखो। अब राजा बोलो- भाटिन! हम भूकन आ मरत, जो तुम हमैं खाना दैबे आईं इतै?
फिर भाटिन ने राजा खाँ पूरी बात बताई, कै महराज हमाए इतै तो जे हीरा-मोती बन जात, आपके इतै भोजन बन जात। 
अब राजा बोले कै देखो भाटिन, भगुआन ने जौ तमाए लानैं आ दओ सो खाओ-बिलसो, कन्याअन के ब्याओ कराओ। भाटिन नें कई कै ठीक है महराज। 
 अब इतै भाट तौ चले जा रये ते जगन्नाथ जू की गैल। सो उनैं चलत-चलत दो आम के पेड़ मिले। पेड़न ने पूँछी- किते आ जा रये भाट जू?
भाट ने कई कै हम तौ जा रये जगन्नाथ जू नौ।
सो बे बोले, ए तो हमाओ संदेसो कै दैयो- कै आम फरत कोऊ खातई नैयाँ।
हओ कै दैबी। कह कैं भाट आगे चले। अब रस्ता में दो तलैयाँ मिलीं। बे बोलीं कै हमाओ संदेसो कै दैयो- कै कीरा बिलबिलात रत, कोऊ पीतई नैयाँ पानी।
आगे चले सो एक उबीनो घोड़ा मिलो। ऊ नै कई कै हमाओ संदेसौ कह दैयो- कै कोऊ बैठत नैयाँ।
आगे चले सो- गैया ऊ पार, बच्छा ई पार। उन्ने कई हमाओ संदेसो कह दैयो कै मिलई नईं पाउत।
आगे चले सो आधो साँप बामी मैं आधो बामी से बाहर। उन्ने कई कै हमाओ संदेसो कह दैयो- कै फंसे धरे बीच में। न इताएँ जा पाउत न उताएँ।
आगे चले सो पिड़ी (पीढ़ा) से चिपकी बैठी एक औरत मिली। ऊने कई कै हमाओ संदेसौ कह दैयो कै उठई नईं पाउत।
आगे चले सो मूड़ पै कैलिया (भोजन पकाने का बरतन) औंधाए एक औरत मिली, ऊने कई हमाओ संदेसौ कह दैयो, कै कैलिया मूड़ से उतरत नैयाँ।
आगे चले सो एक घर मिलो। ऊने कई हमाओ संदेसो कह दैयो कै दिन मैं बनत, रात में टूट जात।
आगे चले सो एक जनीं मूड़ पै मौरिया (लकड़ियों का गट्ठर) धरें मिलीं। ऊनैं कई कै हमाओ संदेसो कह दैयो कै मौरिया उतरत नैयाँ।
भाट अब सब संदेसे लैकें पहुँचे पुरी। सो समुद्र के हेड़न से समझ गए, कै आ गए जगन्नाथ जी कै इतै। अब उतैं से चिल्लान लगे भाट स्वामी जू, स्वामी जू।
अब भक्त की आवाज़ सुन कैं आ गए भगवान। बोले- काय रे भटुआ  काय चिल्ला रओ?
अब भाट नें देखो कें जे कोआ आ गए? ऊने नई पहचानों...
शेष कल