शनिवार, 9 मार्च 2024

जगन्नाथ पुरी


  

भारत के पूर्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से आठवां बड़ा राज्य है उड़ीसा। इसी उड़ीसा का एक प्रमुख नगर है जगन्नाथ पुरी।

 आम बोलचाल में इसे पुरी भी कहते हैं। हालांकि युगों से जगन्नाथ जी की इस नगरी के कई  नाम रहे हैं। जैसे- नीलगिरी, नीलाद्रि, नीलांचल, पुरुषोत्तम, शंखक्षेत्र, श्रीक्षेत्र, जगन्नाथ धाम, ‘स्वामी जू’ की नगरी और जगन्नाथ पुरी। आस्था की यह नगरी सनातन धर्म में चार धामों में से एक धाम के रूप में भी ख्यात है। 

 जगन्नाथ जी की इस नगरी से मेरा प्रथम परिचय मेरे घर से ही हुआ। चैत्र माह आने से पूर्व ही घर में भले बिराजे जू की चर्चा आरंभ हो जाती थी। यह भले बिराजे जू कोई और नहीं, बल्कि पुरी में विराजमान भगवान जगन्नाथ अर्थात् कृष्ण जी का ही हमसे परिचय था जो, अपने बड़े भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ युगों का भ्रमण करते हुए (सतजुग छोड़ी मथुरा नगरी, द्वापर छोड़ी काशी, कलियुग में तौ आन बिराजे बिन्द्राबन के बासी) उड़ीसा में आन विराजे हैं। हिंदू वर्ष यानी चैत्र मास का आरंभ हमारे यहां जगन्नाथ जी के आगमन और उनकी पूजा से ही होता है। जबसे स्मृति है चैत्र मास के हमारे प्रमुख अतिथि होते भगवान जगन्नाथ। जिनकी आवभगत में प्रति सोमवार भगवान जी का अलग भोग होता। पहला चना गुड़, फिर गुरधानी, फिर पंचमेर (5 प्रकार का मिष्ठान्न), चौथा छप्पन भोग और पांचवा सोमवार यदि पड़ता था, तो भटा गकरिया। इसके साथ चुरुआ (गुड़ का पानी) ज़रूर होता, जो पुरी से लाए बड़े से पीतल के लोटे में रखा जाता, उसमें पुरी से ही लाए गए,पाँच बेंत रखे जाते जो कथा के दौरान खड़काए जाते और पूजा के बाद पाँच-पाँच बार भेँटे जाते। एक पीतल की थाली भी पूजा में पुजती, जिस पर लोटे के समान ही भगवान जगन्नाथ जी का चित्र अंकित होता। खास टेसू के फूलों से भगवान को सजाया जाता और फिर विधि-विधान से पूजा होती। बाई (पड़दादी) कथा सुनातीं स्वामी जू की, प्रभु श्री जगन्नाथ जी की। इस पूरी कथा में भाट-भाटिन, राजा-रानी, किसान, श्रमिक, और न जाने कितने जीव-जन्तु, वृक्ष और तालाब अपनी व्यथा और पीड़ाओं के साथ आते। अपनी अक्षमता या असमर्थता के कारण वे तो जगन्नाथ जी के धाम  न जा पाते पर यात्रा पर निकले भाट को अपने संदेसे भेजते और अंततः समाधान पाते। अन्ततः बाई कहतीं जैसे भाट भिखारी की सुनी, सबकी सुनी सो ऊसी हमाई भी सुनियो।

 और... इन सबके साथ आता लहराता विशाल समुद्र। समुद्र का जो वर्णन बाई करतीं, वो हमें भी यात्री बनाने के लिये बहुत था। क्योंकि समुद्र हमारे लिये साधारण नहीं था, वो तो समुद्र देवता थे जो जगन्नाथ जी के चरण पखारते थे। उनके दर्शन को मंदिर तक खिंचे चले आते थे। पर जब समझाने पर भी न माने तो हनुमान जी की  हर ओर तैनाती कर दी गई। पर जब वह भी जगन्नाथ जी के आकर्षण में मंदिर चले आए और पीछे-पीछे नगर को बहाता समुद्र भी। तो जगन्नाथ जी ने हनुमान जी को बेड़ी में बांध दिया। मतलब यह तय था कि वहाँ भगवान जगन्नाथ जी मिलते हैं। इसलिये समुद्र बचपन से ही मेरी स्मृतियों में अपने हेड़ों (लहरों) के साथ बस गया था। यही कारण था कि बचपन की जो पहली यात्रा स्मृति में सजी वो पुरी की ही थी। पहला समुद्र दर्शन भी पुरी का ही था, विशाल लहराता सुंदर पुरी का समुद्र। या भूगोल की भाषा में कहें तो तीन ओर भू भाग से घिरी बंगाल की खाड़ी। जहाँ मिलते हैं सबका न्याव करने बैठे, सबकी सुनने वाले, जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ। 

जगन्नाथ पुरी के विषय में हरि अनंत हरि कथा अनंता के समान ही अनंत कथाएँ हैं। रथ यात्रा और 6 बार के भोग की भी कथाएँ हैं, मंदिर में उल्टी लटकी एकादशी की भी कथा है और भी न जाने कितनी कथाएँ हैं जो पुरी में प्रवेश के साथ ही अनुभव जगत का जीवंत अंग बन जाती हैं। रक्षक की भूमिका में अलग-अलग दिशाओं में जगन्नाथ जी की आज्ञा से तैनात बैठे हनुमान जी, और उनमें भी बेड़ी हनुमान जी मन में जो भाव भरते हैं, उसे अनुभव करने के लिये भाट सी गठरियन संदेसे भरी यात्रा ज़रूरी है।  भाट तो पैदल चला था और महिनों बाद स्वामी जू नौं पहुँचा था। पर आज कुछ घंटों में ही पुरी की यात्रा संभव है। पर हाँ कहते हैं कि पुरी में तीन दिन और तीन रात से अधिक ठहरे तो स्वामी जी की छड़ी लगना तय है और जो इतना ही रुके तो जगन्नाथ जी की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति सुनिश्चित है। अत: कहते हैं कि  समय से लौट आएं पर संदेसे ज़रूर लेकर जाएं और स्वामी जू को सब सुनाकर भी आएं। नहीं तो पता है न भाट भिखारी की कहानी का वो अंश जब वो संदेसे भूल गया था?

एक अनुभव यह भी रहा कि मुझे लगता था, समुद्र से सुंदर कुछ नहीं, मंदिर भी इतना आकर्षक नहीं हो सकता। कभी गरजती, कभी नाचती, कभी हिंडोले सी बन जातीं लहरों का ऐसा मोहक नृत्य दुर्लभ है। पर सत्य यह है कि मंदिर में जगन्नाथ जी का जो आकर्षण समाया हुआ है, वह अवर्णनीय है। मंदिर दर्शन और जगन्नाथ जी के दर्शन के सामने समुद्र इस विश्व के समान कृष्ण की मुरली की तान पर थिरकता सा लगता है। ऐसे में अभिभूत आत्मा नतमस्तक हो कह उठती है- स्वामी भले बिराजे जू।