रविवार, 12 नवंबर 2023

मेरा घर

 मेरे घर,

मेरे जादुई घर

मुझे तुझसे बेहद प्यार है

जब मैं नहीं होती तेरे साथ

तू तब भी होता है मेरे पास

 दुआओं और फिक्र की तरह

जब होती हूँ घबराई और अकेली सी

 थकी हारी और निराश सी

तेरा सुकून मुझे देता है सहारा

तू बनता है ढाल और खड़ा करता है मुझे

एक अव्यक्त ऊर्जा से

पर मैं 

कुछ भी तो नहीं कर पाती तेरे लिये

 तुझे ढंग से सजा तक तो पाती नहीं

जी चाहा भी तुझे रख तो पाती नहीं

बल्कि बिखरा ही देती हूँ तुझे 

अपनी आदतों की तरह

फिर भी अनगढ़ चाह सा

तू सजा रहता है मेरे दिल में

ओ मेरे करिश्माई घर

जब अल्फाज़ सिमट कर ठहर जाते हैं

तू मुझसे गहरे बतियाता है

और मैं सब समझ जाती हूँ

उदासी में भी मुस्कुरा जाती हूँ






शनिवार, 11 नवंबर 2023

ऐसी हो सबकी दीपावली








 मनमोहक पावन दीपावली 

सुभग-ज्योति से बुनी दीपावली 

जगमग कर दे घर-आँगन-मन 

रंगोली बन सजे दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

अंधकार और क्लेश मिटें सब

ओठों पर मुस्कान खिले बस

घर-बाहर आनंद रहे अब

जीवन में उत्साह भरे नव

बने स्नेह की डोर दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

पाप, दुष्टता, रोग नष्ट हों

लालच और अन्याय नष्ट हों

भ्रष्ट आचरण, कुत्सित-वृत्ति

जीवन के अभिशाप नष्ट हों

बने नया वरदान दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

फिर से जीवन सरल बने अब

फिर से कोमल भाव खिलें सब

मर्यादा हो राम-राज्य सी

लक्ष्मी-विनायक बनें रहें घर

बने महा-आशीष दीपावली 

ऐसी हो सबकी दीपावली।

ऐसी हो सबकी दीपावली।





शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

 



सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

सोमवार, 6 नवंबर 2023

हिरन मन

 



मैं उसे रोकती हूँ,

उम्र का तकाज़ा देकर टोकती हूँ

करती हूँ सलीके और समाज की बात

 समझाती हूँ उसे सौ-सौ बार

बहलाती हूँ उसे

दुनियावी किस्सों से

 डराती हूँ उसे सख्त उसूलों से

दिखाती हूँ उसे भविष्य का विद्रूप  भी

पर नज़रंदाज़ करता 

वो मेरी हर बात

मुस्कुराकर

फिसलता जाता है

मेरी हर गिरफ्त से

और

मेरी आवाज़ की गूँज

मेरी नज़र की सीमा से कहीं आगे 

वो पहुँच जाता है 

ऊँचे आसमानों में

असीम दिशाओं में

पर्वत, समतल, जंगल, मरुस्थल

 गहरे महासागर और 

स्मृति-विस्मृति के सूक्ष्म अन्तरालों में भी..

और तब बुज़ुर्गियत सी ओढ़े मैं

ठहर जाती हूँ हैरान

अपने...

हिरन मन की कुलाँच पर....




रविवार, 5 नवंबर 2023

हाइकू -कविता

1 मन खिलौना 

उस नियति का जो

अवश्यंभावी।

2 अनजाने में 

 कुछ जानकर भी

सह आवेग।

3 इक अनोखी

लघु कथा सा कुछ

लिखा दे प्राण।

4 महा वृत्तांत

 जो है अपरिमित

अलिखित भी।

5 या कि है कुछ 

और ही परीक्षा सा

भगवान की।

6 वह नियति

की कल्पना भर जो

लिखा स्वत: ही।

 7 खिलौना वह

उस ही नियति का

संभाव्य है जो।