शनिवार, 25 दिसंबर 2021

जिजीविषा


 ट्रैफिक में मुर्गों से भरा एक ठेला जा रहा था। ठेले वाला अपने भरसक दम से ठेला चला रहा था। लोहे के सींखचेदार डिब्बों में करीब दर्ज़न भर से कुछ अधिक ही मुर्गे बंद थे। सामान की तरह एक के ऊपर एक ठुँसे मुर्गे। इतने में एक जोर का झटका लगने से मरे से प्रतीत हो रहे मुर्गे कुनमुना कर जाग गए-

कराहती सी आवाज में एक मुर्गा चिल्लाया-  मरा जानबूझ के ऐसे चलाता है कि हम सब ऐसे ही मर जाएँ!

दूसरा मुर्गा हँसते हुए बोला- अरे काका अभी भी जीने की इच्छा है क्या?

इससे पहले कि पहला मुर्गा कुछ बोल पाए कोने में दुबका एक मुर्गा बोला- अबे क्या पगलेट सी बातें करता है, जब तक मौत नहीं आती, तब तक हर कोई जीने की इच्छा रखता है। काका कोई अनोखे हो गए क्या? तेरी कमर नहीं टूटी क्या झटके से, जो जादा बातें बना रहा है?

दूसरे  मुर्गे को शायद ऐसे जवाब की अपेक्षा न थी इसलिए अपनी आँखें फैलाकर गर्दन गोल घुमा कर उसने जवाब देने वाले मुर्गे की ओर देखा। एक मरियल सा, टूटे पंख वाला मुर्गा उसे इतना लेक्चर दे गया, वो भी मुश्किल से आधे घंटे की बची ज़िंदगी के लिए! वाह भाई वाह! मुर्गा क्वाक क्वाक करके हँस पड़ा। 

कोने में दुबका मुर्गा इस अपमानजनक व्यवहार पर कुछ नहीं बोला और गर्दन घुमा कर बाहर की ओर देखने लगा। इतने में दूसरा मुर्गा फिर बोला- भाई बात तो सही कही तुमने। पर जिस ज़िंदगी की तुम बात कर रहे हो वो कुछ ही क्षणों की मेहमान है क्योंकि आज तक तो डिब्बों में भरकर जाते मुर्गों को जिंदा लौटते मैंने तो देखा नहीं। 

यह बात सुनकर सभी मुर्गों के माथे पर चिंता की रेखाएं खिंच गईं। सच बात थी कि जो भी मुर्गा इस तरह से गया उसे फिर कहाँ देखा? सभी मुर्गे मन ही मन अपने बचपन के साथियों को याद करने लगे। साथी तो साथी उनके माता-पिता, चाचा-ताऊ तक तो उनके सामने ऐसे ही डिब्बों में भरकर गए, पर फिर उन्हें कभी नहीं देखा! सभी मुर्गे मार खाई सी नजर से एक दूसरे को देख रहे थे कि क्या करें?

डिब्बे में व्याप्त इस मातम को तोड़ते हुए काका मुर्गा बोले- मौत का डर कैसा? वो तो आनी ही है। आज नहीं तो कल आएगी। हमारे बाप दादों को आई थी तो हम बच जाएंगे क्या? 

अब तक डिब्बे से बाहर झाँक रहा मुर्गा बोला - काका यह बात नहीं जमी तुम्हारी। ऐसा ही था तो काहे को कराहे थे? लुढ़क लेते मजे में। 

मौके की नजाकत को समझते हुए दूसरा मुर्गा बोला- देखो भाई मैं यही तो कह रहा हूँ कि हम सब चाहे जितनी भी बड़ी बड़ी बातें कर लें पर सच्चाई ये है कि हम सभी जीना चाहते हैं। देखो एक तरफ से डिब्बा टूटा हुआ है, हम चाहें तो उसमें से निकल कर अपनी जान बचा सकते हैं... क्यों क्या कहते हो सब?

कुछ मुर्गों ने पंख फड़फड़ाए, क्वाक क्वाक की आवाज़ें फिर उठीं कि काका गुर्राए-

अबे चल शोहदों का चाचा, गुंडा मवाली। उलटी रीत सिखाता है, शर्म नहीं आती तुझे? तू बचाएगा इन्हें? इत्ती गाड़ियाँ  जो खुद इंसान तक पर रहम नहीं करतीं हम सबको बख्श देंगी? जब मरेंगे तब मरेंगे तू तो हमे अभी मरवा देगा!

 ज्यादातर मुर्गों ने अपनी गर्दन हिलाकर और हिकारत भरी नज़रों से ज्यादा समझदार बनते मुर्गे को घूरकर काका मुर्गा के साथ अपनी सहमति व्यक्त की। आखिर उम्र और अनुभव भी तो कोई चीज है, इस बात को बाकी मुर्गे समझ रहे थे। 

इतने में मरियल मुर्गा बोला- काका कुछ भी कहें, मैं तो मोटे की बात से सहमत हूँ। हमें जान बचाने की कोशिश करनी चाहिए। 

इतने में एक और मुर्गा मरियल मुर्गे से बोला- देख बेटा ज्यादा बचपना ठीक बात नहीं। तेरी हालत तो वैसे ही ठीक नहीं। किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो क्या होगा?

और जो बच गया तो? वहाँ पहुँच कर तो मरना तय ही है। अबकी मोटे मुर्गे ने मरियल का पक्ष लिया। 

डिब्बे में एक बार फिर नीरवता छा गई। 

मरियल और मोटा दोनों मुर्गे अब दोस्त बन चुके थे अतः मौका पाकर दोनों ने बचने की कोशिश करना ज्यादा मुनासिब समझा। मोटा मुर्गा चूंकि हट्टा कट्टा था अतः बड़ी आसानी से उसने नजदीक के एक पेड़ पर पनाह ले ली पर मरियल मुर्गे की ऐसी किस्मत कहाँ थी, वह अधिक ऊँचा न उड़ पाया और घिसट कर बगल में उगी झाड़ियों में उसे पनाह लेनी पड़ी। बच वह भी गया था। 

उधर डिब्बे में बंद बाकी मुर्गे इन दोनों मुर्गों की चिंता में दुबले हुए जा रहे थे कि एक दुकान के आगे ठेला रुक गया।ठेले वाले के साथ मिलकर दुकानदार ने मुर्गों का डिब्बा नीचे पटक दिया।  इत्तफाक से मुर्गे कटने का ऑर्डर भी आ गया था,  सभी मुर्गों की आँखों के सामने लपलपाती मौत और दिमाग में ज़िंदगी की उड़ान भरते दोनों मुर्गे थे... 




रविवार, 28 नवंबर 2021

राम की शक्ति पूजा : एक विश्लेषण


 

                                                        

                             

सन् 1936 में छपी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ महाकाव्यात्मक औदात्य, प्रबंधात्मक योजना और नाटकीय विधान से युक्त लंबी कविता है। 8 दिनों के देशकाल से संबंधित यह  कविता एक ही स्थान पर घटित होती है और आठ दिनों की अवधि को अपने में समेटे है। कुल मिलाकर संकलन त्रय (घटना, काल और स्थान) की पूरी योजना इस कविता में घटित होती है।

कविता की कथावस्तु सुपरिचित घटना राम रावण के युद्ध पर आधारित है। जिसमें संघर्ष, द्वन्द्व और पराजय के भाव से विजय की ओर प्रयाण है। साधना से सिद्धि की ओर प्रयाण है। यहाँ प्रतीकों और व्यंजनाओं के साथ जीवन साधना, जीवन संघर्ष और अंततः महानंद से युक्त जीवन सिद्धि की एक नई व्याख्या प्रस्तुत है और यह व्याख्या पौराणिक कथा का वह स्वरूप प्रस्तुत करती है जो आज की स्थितियों में भी प्रासंगिक है और मानव एवं महामानव के बीच एक सूत्र स्थापित करती है।

पूरी कविता दो खंडों में बँटी नजर आती है। कविता का आरंभ होता है, सूर्यास्त होने से। यहाँ अस्त हुआ सूर्य केवल संध्या वेला या एक दिन के युद्ध की समाप्ति का ही संकेतक नहीं है बल्कि सूर्यवंशी राम के हतोत्साहित होने का भी संकेतक है। राम अकेले नहीं हैं, उनके साथ उनके कुल की मर्यादा भी जुड़ी हुई है। अतः उनकी पराजय केवल उनकी पराजय नहीं है बल्कि उनके साथ रघुवंशियों की ख्याति भी दाँव पर लगी है। सूर्यवंशी हारते नहीं हैं, अन्याय हारता है। अब तक यही होता आया था। पर इस बार स्थिति अलग है। जहाँ न्याय के समक्ष अन्याय को परास्त होना था, वहाँ समर अनिर्णीत ही रह गया! न्याय अन्याय के युद्ध का अनिर्णीत रह जाना धर्म और न्याय पर आस्था की भी पराजय है। और आस्था की पराजय किसी भी समाज के लिए सबसे बुरी घटना है। यही कारण है कि हर परिस्थिति में स्थिर चित्त रहने वाले राम विचलित हो गए हैं। उनके मन में अपनी विजय के प्रति आशंका उत्पन्न हो गई है। राम को लग रहा है कि रावण का पक्ष प्रबल हो गया है। उसे हराना संभव नहीं। आज के युद्ध में उन्होंने अपने अमोघ, मंत्रपूत अस्त्रों का प्रयोग किया था। पर वे बाण जो कभी लक्ष्य भ्रष्ट नहीं होते थे वे भी आज विफल हो गए! रावण को उनसे कोई हानि नहीं पहुंची जबकि रावण की ओर से चलाए गए अस्त्रों से राम की पूरी सेना हताहत हो गई! हनुमान के अतिरिक्त सभी दल नायक रावण की सेना का सामना करने में असमर्थ रहे हैं। स्वयं राम भी क्षत-विक्षत हैं। ऐसा होना अप्रत्याशित था। पर ऐसा हुआ क्योंकि स्वयं शक्ति रावण की रक्षा कर रही थीं!-

आया न समझ में यह दैवी विधान

रावण अधर्म रत भी, अपना मैं हुआ अपर-

                                  यह रहा शक्ति का खेल समर, शंकर शंकर!

 वेदना का यही कारण है कि स्वयं शक्ति रावण का रक्षण कर रही हैं!

देखा है महाशक्ति रावण को लिए अंक

लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक

ईश्वर भी जब अन्याय के साथ हैं फिर न्याय, सत्य और नीति का क्या अर्थ हुआ? यही कारण है कि स्फटिक शिला पर बैठे राम सुग्रीव से कहते हैं कि-

 मित्रवर विजय होगी न समर

यहीं निराला के राम अलग धरातल पर आ जाते हैं। विजय के प्रति शंकित होना उन्हें सबसे अलग बनाता है और मानवीय धरातल पर ले आता है। साथ ही अब तक की राम कथाओं से एक सर्वथा भिन्न राम को उपस्थित कर देता है। कहीं न कहीं निराला का अपना व्यक्तित्व, उनका अपना आत्मसंघर्ष भी राम के साथ एकाकार हो जाता है। कविता के कई स्थल ऐसे हैं जहां ऐसा लगता है जैसे राम की छवि में निराला भी प्रतिबिंबित होने लगते हैं। फिर चाहे वह राम की रूपाकृति का वर्णन हो-

दृढ़ जाता मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल,

फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर वक्ष पर विपुल

अथवा राम द्वारा प्रथम स्नेह के वर्णन के साथ सीता की स्मृति हो -

                              ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत

जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत

या फिर अपने संघर्ष को याद करते हुए राम का अपने जीवन को धिक्कारना हो-

धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध

धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध

रामाख्यान के माध्यम से निराला अपना और अपने युग का संकेत भी देते चलते हैं।

निराला तुलसीदास से प्रभावित हैं। पर उनके राम तुलसी के राम की प्रतिकृति नहीं हैं। तुलसी के राम कहीं भी संशयग्रस्त नहीं होते। भय का लेश मात्र भी उनमें नहीं है। रावण के विरुद्ध विजय के प्रति तुलसी के राम के मन में जरा भी संशय नहीं है। वे दुखी होते हैं, रोते भी हैं पर उनके मस्तिष्क में स्पष्टता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे साक्षात परब्रह्म हैं। दृश्य जगत में उनका व्यवहार उनकी लीला मात्र है। तुलसी की रामकथा की बुनावट ही इस संशय को दूर करने के लिए है कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं बल्कि साक्षात परब्रह्म के अवतार हैं। जिन्होंने जन्म ही राक्षसों के विनाश के लिए लिया है। अतः राम का अर्थ अवतारी राम ही है। ‘राम नाम का मरम है आना’ जैसी कोई स्थिति नहीं है। तुलसी इस बात को ठोक बजा कर कहते हैं।   

 इसी प्रकार कृत्तिवास ओझा कृत बांग्ला में लिखी रामायण के राम हैं। तुलसी के राम से लगभग 100 वर्ष पूर्व कृत्तिवास रामायण के राम आते हैं। कृत्तिवास ने रामायण के आधार पर राम के चरित्र की परिकल्पना की हैं। इसी कृत्तिवास रामायण से निराला ने शक्ति पूजा का कथा प्रसंग लिया है। आधारभूमि वही है। कथासूत्र बहुत कुछ वहीं से ग्रहण किया गया है, किन्तु निराला की परिकल्पना इससे बहुत हटकर है। उसमें मौलिकता है। प्रसंग की बुनावट उनकी अपनी है।

निराला के राम ‘पुरुषोत्तम प्रवीण’ हैं। श्रेष्ठ मानव हैं। महा मानव हैं। पर ऐसे मानव हैं, जिसके जीवन में निरंतर ही संघर्ष है। जो उन संघर्षों की अधिकता से निराश भी अनुभव करते हैं। एक सामान्य मानव के समान उनका हृदय भी दुखी होता है। अन्याय के साथ शक्ति को देख उन्हें पराजय का भय भी होता है। तुलसी के राम भय मुक्त हैं। अपनी विजय के प्रति भी उनके मन में किसी प्रकार का कोई संशय नहीं है। पर निराला के राम में ‘रावण जय भय’ है।

अनीति से हारने का भय या शक्ति द्वारा रावण का पक्ष लेने की वेदना अकेले उनके भर की नहीं है। जो भी अपना मार्ग स्वयं चुनना चाहता है, जो भी सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना चाहता है, उसके जीवन में इतनी कठिनाइयाँ आती हैं कि जीवन ही दूभर हो जाता है! ऐसे में सहज ही प्रश्न उठता है कि ईश्वर कहाँ हैं? क्या अनीति और अन्याय के साथ हैं? यदि ऐसा नहीं है तो बुराई, दुष्टता जीतती नजर क्यों आती है? बुराई हमेशा शक्तिशाली नजर क्यों आती है? ये इस प्रकार के प्रश्न हैं जो साधना मार्ग पर चलने वाले हर मनुष्य को व्यथित करते हैं। ऐसे में संकल्प विकल्प की स्थिति उत्पन्न होती है। राम के समान अतीत की विजय स्मृतियाँ उसके हृदय को आंदोलित करती हैं-

फिर विश्व विजय भावना हृदय में आयी भर

वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत

फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत

 मस्तिष्क अतीत और वर्तमान को जैसे एक साथ उपस्थित करके प्रश्न करता है कि अब पराजय का क्या कारण है? ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है कि स्थितियाँ समान होने पर भी परिणाम अलग हैं? पर जब ऐसे में हृदय को यथोचित उत्तर नहीं मिलता तब अवसाद की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसी स्थितियों में आवश्यकता होती है एक ऐसे प्रबोधक की जो दुविधा दूर करे, मार्गदर्शन करे। जामवंत यहाँ ऐसे ही व्यक्ति के रूप में उपस्थित हैं, जो राम को प्रबोधते हैं। उनके संशयग्रस्त मन को मार्ग दिखाते हैं। जो स्थिति राम के लिए वेदना की कारक है, जामवंत को वह वैसी नहीं लगती-

बोले विश्वस्त कंठ से जांबवान

रघुवर विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण

हे पुरुष सिंह तुम भी यह शक्ति करो धारण

आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर

शक्ति स्वयं में निरपेक्ष है। किसी भी पक्ष-विपक्ष को चुनना उसका विषय नहीं है प्रत्युत वह साधना का विषय है। जो भी साधना करेगा, सिद्धि उसकी होगी। यहाँ साधना मार्ग में और अधिक समर्पण की बात है। रावण जो अनीति, अनाचार का प्रतीक है, जब वह शक्ति की साधना कर सकता है और सशक्त हो सकता है, तो फिर तपस्वी, मनस्वी, सत्यव्रत धारी राम के लिए क्या असंभव है? 

देखा जाए तो जीवन संघर्ष में यही प्रबोधन काम आता है। जब आस पास कोई नहीं होता तो अपना मस्तिष्क ही विगत की समस्त सकारात्मक स्मृतियों को शृंखलाबद्ध रूप में सामने रख देता है। क्योंकि पराजय या पराजय का आभास मृत्यु है और जीवन को मृत्यु भला कैसे स्वीकार्य हो सकती है? यही अंधकार में जलती हुई मशाल भी है। मानव मन निराशाजनक स्थितियों में भी प्रकाश बिन्दु खोज ही लेता है। निराला के राम मनुष्य मन की इसी प्रक्रिया को प्रस्तुत करते हैं। 

नाटकीय विधान के साथ कविता दूसरे चरण में प्रवेश करती है। यह दूसरा चरण खिलने से आरंभ होता है-

खिल गई सभा। उत्तम निश्चय यह भल्लनाथ

कह दिया ऋक्ष को मान राम ने झुका माथ 

 एक सुंदर विचार ने जीवन की दिशा ही बदल दी है। भ्रम और अवसाद के बादल जैसे छँट गए हैं। जीवनरण में विजय का मार्ग दिखाई देने लगा है। पर यह प्रसन्नता भी स्थायी हो यह जरूरी नहीं। क्योंकि साधना मार्ग कभी भी सहज नहीं हो सकता। राम शुद्ध भाव से शक्ति की आराधना करते हैं । यम, नियम आसन, प्रत्याहार, प्राणायाम को साधते हुए राम भौतिक स्थितियों से ऊपर उठ गए हैं। युद्ध की ध्वनियाँ अब उन्हें उत्तेजित नहीं कर रही हैं। किसी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया की स्थिति अब नहीं है। वे पूरी तरह से समाधिस्थ हैं और एक ही आसान पर देवी का जाप कर रहे हैं। 107 नील कमल अर्पित किये जा चुके हैं ब्रह्मांड में हलचल है क्योंकि सहस्रार भेदन की स्थिति आ चुकी है और सहस्रार भेदन का अर्थ है महाशक्ति की प्राप्ति। इस स्थिति में आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह जाता। आत्मा उन्मुक्त हो परमात्मा के चैतन्य रूप में मिल जाती है। यह स्थिति ही परीक्षा की स्थिति भी होती है। शक्ति-आराधन बिना परीक्षा के कहाँ संभव है? कथा में शक्ति एक नील कमल लेकर अन्तर्धान हो जाती हैं-

द्विप्रहर,रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर

हँस उठा ले गईं पूजा का प्रिय इंदीवर

राम एक बार फिर परास्त भाव में आ जाते हैं। साधना सम्पूर्ण होते-होते रह गई! सिद्धि से ठीक पहले साधना भंग हो गई! राम का हृदय एक बार फिर वेदना से भर उठता है-

धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध

धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध 

जानकी हाय उद्धार प्रिया का हो न सका!

 पर राम जैसे साधक की साधना कभी निष्फल जा सकती है क्या? राम का भौतिक मन तो परास्त हो चुका है पर उनका लोकोत्तर मन परास्त नहीं होता। हो ही नहीं सकता। वाल्मीकि ने राम की दो प्रतिज्ञाएँ गिनाईं हैं- न दैन्यम न पलायनम। निराला भी राम के हारे मन पर उस लोकोत्तर मन की स्थापना करते हैं। और अंततः मनस्वी राम की स्मृति उन्हें फिर प्रबोधती है-

कहती थीं माता मुझे सदा राजीव नयन

                                   दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण

पूरा करता हूँ देकर मात: एक नयन

कमल जैसे नेत्रों वाले राम उद्यत हो उठते हैं अपना नेत्र समर्पित करने को पर इससे पूर्व ही देवी आशीर्वचन कहते हुए उनका हाथ थाम लेती हैं-

होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन

कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन 

साधना मार्ग की विशेषता यही है कि यहाँ सब कुछ हविष्य है। जीवन भी हविष्य है। यदि इसके लिए पूरी तैयारी है तो किसी भी प्रकार की सिद्धि को प्राप्त करना असंभव नहीं। राम ऐसे ही हैं। वो यूँ ही ‘पुरुषोत्तम नवीन’ की संज्ञा नहीं पाते। वो निराश होते हैं। स्वयं को धिक्कारते हैं। पर उनका ‘कभी न हार मानने वाला मन’ उन्हें निराश नहीं होने देता और राम शक्ति का वरदान पाने में सफल होते हैं।

संकल्प-विकल्प से भरी यह कविता मानवीय चेतना की कविता है। गिरकर उठने की कविता है। जीवन संघर्ष में स्वयं को परखने की कविता है, विजय के योग्य बना देने की कविता है और अंततः विजय के महालिंगन की कविता है।

शिल्प की दृष्टि से देखें तो अपनी इस कविता में निराला ने भाषा के साथ भी अभिनव प्रयोग किये हैं। सामासिक पदावली के प्रयोग से भाषा सुगठित हुई है और उसमें अर्थगाम्भीर्य आ गया है। निराला का यह प्रयोग मंत्र शैली का सा भाव उत्पन्न करता है। आरंभिक 16 पंक्तियों में एक दिन के युद्ध का पूरा विवरण इसी शैली में प्रस्तुत किया गया है। पूरी कविता में तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार की भाषा जहां एक ओर कथानक की गरिमा के अनुकूल है वहीं दूसरी ओर कविता को औदात्य और नाटकीय गरिमा भी प्रदान करती है।

कथानक बेहद ही व्यवस्थित और कलात्मक रूप से विकसित होता है। राम का मानव रूप, ईश्वरीय रूप का संकेत, फिर साधक रूप तथा पुरुषोत्तम रूप कविता में नाटकीयता उत्पन्न करता है। पूरी सृष्टि उनमें ईश्वरीय रूप का दर्शन करती है। कवि ने स्वयं कई स्थलों पर उन्हें अतुल बल शेषशयन, सच्चिदानंद रूप, विश्राम धाम, युग अस्ति नास्ति के एक गुण गण अनिंद्य, अच्युत, राघवेंद्र आदि से संबोधित किया है। हनुमान जब अपने आराध्य के अश्रु देखकर विचलित हो उठते हैं तब भी राम की अलौकिकता का आख्यान स्वयं शिव और शक्ति के  माध्यम से होता है। इस प्रकार निराला इतिहास सिद्ध पौराणिक राम को एक नए विधान के साथ वर्णित करते हैं।

निराला ने शक्ति की आराधना में वैष्णव भक्ति की नवधा भक्ति का भी संकेत किया है साथ ही उस साधना में यौगिक साधना को भी प्रमुखता से स्थापित किया है। सप्त चक्र भेदन के साथ आठ दिन की साधना इसी यौगिक साधना का प्रतीक है। जिसमें कुंडली जागरण, आज्ञा और सहस्रार भेद का उल्लेख है। निराला जैसे स्थापित करना चाहते हैं कि यही भारतीय दर्शन है जहाँ पुरुषार्थ के साथ भक्ति और योग के समन्वय से सिद्धि होती है और मनुष्य को वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे वह मनुज होकर भी अवतारी हो जाता है। ब्रह्म और जीव का अंतर मिट जाता है। मानव महामानव बन जाता है। विश्व की किसी भी प्रकार की सिद्धि उसके लिए असंभाव्य नहीं रहती।

प्रबंधात्मकता की दृष्टि से घटनाओं का आरोह-अवरोह वस्तु विन्यास को कलात्मकता प्रदान करता है। उसी प्रकार से संवाद भी व्यवस्थित हैं और कथा को सुंदर प्रवाह देते हैं। राम जब अपनी ओर से भावोच्छवास प्रकट करते हैं तो जो संवाद हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। जामवंत द्वारा प्रबोधन भी महत्वपूर्ण है। केवल हनुमान के उड्डयन का प्रसंग ऐसा है जो कविता की प्रबंधात्मकता की दृष्टि से बहुत आवश्यक नहीं लगता। इस प्रसंग का महत्व राम के ईश्वरीय रूप की प्रतिष्ठा में ही सहायक है अन्यथा कथाक्रम की दृष्टि से इसका विशेष महत्व नहीं।   कुल मिलकर कह सकते हैं कि हरि अनंत हरि कथा अनंता के कथन को पुनर्स्थापित करती यह कविता निराले राम का सुंदर आख्यान है। जहां निराले राम को पढ़ना मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की ओर प्रयाण को पढ़ना भी है, युग संघर्ष को पढ़ना है और इसके साथ छायावादी कविता के उत्कर्ष को भी पढ़ना है।

संदर्भ  :

Nirala : kriti se sakhshatkaar, nandkishor naval, rajkamal prakashan

Aparajey Nirala, Dr. Ashish pandey, bhartiya sahitya inc.

http://kavitakosh.org

http://www.drishtiias.com

http://kolhanuniversity.ac.in

http://m.youtube.com

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

जिज्जी


जिज्जी


आजादी से पहले की बात है सन 1939 का समय। उत्तर प्रदेश में बरसाती नदी सुखनई के किनारे बसा एक गाँव। गाँव में अन्य जाति के लोगों की अपेक्षा कोरी जाति के लोगों की संख्या अधिक थी, अतः उस गाँव को कोरियों का गाँव कहा जाता था। वैसे गाँव का असली नाम लुहर गाँव यानी छोटा गाँव था, जिसे बोलचाल की भाषा में सब लोग लौरगुआं कहते थे। 

गाँव अपने नाम के अनुरूप सच में ही छोटा था। कुल 45 घर। जिनमें 36 घर कोरियों के 8 अन्य जातियों के और एक घर एक ब्राह्मणी का था। ब्राह्मणी बाल विधवा थी। जब वो 5 बरस की थीं, तभी उनका ब्याह दस बरस के एक ब्राह्मण पुत्र से हो गया था। गौने से पहले ही पति की मृत्यु की खबर आ गई। अब आठ बरस की उम्र में भला क्या बोध होता है! ईश्वर की कृपा यह रही कि कष्ट और और परिताप उस समय घटा जब उसकी वेदना समझ से परे थी। इसलिए जब सुहाग जाना ही नहीं तो वैधव्य भी कष्टकर नहीं था।

गाँव के लोग ब्राह्मणी को जिज्जी कहते थे। जिज्जी यानी जीजी। ससुराल तो जाना ही न था तो जिज्जी माँ-बाप के साथ मायके में ही रहती थीं। बहुत अरसा हुआ माँ-बाप भी न रहे। एक छोटी बहन थी, जो पास के ही गाँव में ब्याही थी। समय-बखत उसके बाल बच्चे और कभी वो खुद भी जिज्जी के पास आती रहती थी। भगवान की कृपा से वह अपनी गृहस्थी में सुखी थीं  और यहाँ जिज्जी अपनी पुश्तैनी विरासत को संभालतीं थीं। 

पुश्तैनी विरासत में लंबी चौड़ी हवेली भर नहीं थी। पूरा गाँव और गाँव का एक मात्र दिवाला (देवालय) जिसे कोरियों का दिवाला कहा जाता था, भी शामिल था। जिज्जी उस दिवाले की पुजारिन थीं। कहते हैं कि एक बार जिज्जी हमेशा की तरह नदी में नहाने जा रही थीं। तभी उनका पाँव फिसला और जब वो गिरीं तो एक शिला के सहारे संभल पायीं। उस शिला को जब उन्होंने ध्यान से देखा तो वो ढाई हाथ ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा निकली। जिज्जी के कहने से उस प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करा दिया गया। कहते हैं जब से हनुमान जी की प्रतिमा की स्थापना हुई तबसे गाँव में फसल बहुत अच्छी होने लगी और कोई बुरी घटना भी नहीं घटी। इसलिए गाँव भर में हनुमान जी की बड़ी मानता थी और हनुमान बाबा आए थे जिज्जी के कारण इसलिए जिज्जी की मानता भी हनुमान जी से कम न थी। 

जिज्जी के पास 12 गाय और 5 भैंस मिलाकर कुल 17 जानवर भी थे। रोज सुबह जिज्जी दूध दुहकर जानवर ढील देतीं जिन्हें बरेदी कक्का आकर ले जाते थे। गाँव भर के जानवरों के साथ जिज्जी की लायची (भैंस) और पट्टिन (गाय)समेत जब सभी जानवर संझा वेला को लौटकर अपनी निर्दिष्ट जगह पर खड़े हो जाते तो जिज्जी बड़े लाड़ से उनके सिर पर हाथ फेरतीं, दूध दुहतीं और फिर दूध लेने वालों की लाइन लग जाती। हर तीन चार दिन में मठा भी भुमता था। जिज्जी यथासंभव दूध और छाछ में जल मिलाकर बेचतीं। गाँव वाले घिघियाई आवाज में दूध और छाछ में कम पानी मिलाने का आग्रह करते पर न तो जिज्जी टस से मस होतीं और न ही गाँव वाले उनसे दूध लेना छोड़ते। आखिर जिज्जी के सामने कौन कुछ कहता।

गाँव का कोई भी काम जिज्जी के बिना सम्पन्न नहीं होता था। भले ही कितनी देर रुकना पड़ जाए पर जिज्जी के बिना कोई भी काम सधता नहीं था। तीज त्योहार हो या कोई उत्सव या किसी के परिवार में कोई आयोजन जिज्जी हर जगह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहतीं। जिज्जी गाँव के एकमात्र मंदिर की पुजारिन थीं, अतः हर अमावस और पूर्णिमा के दिन उन्हें गाँव के कोरियों से सीधा मिलता। जिसके लिए वो स्वयं कोरियों के हर घर जातीं, उनकी राजी खुशी पूंछतीं और उनके द्वारा दिया गया आटा दाल चावल अपनी पोटली में रख के ले आतीं। महीने में दो बार इतना कुछ मिलने से जिज्जी के पास इतना कुछ हो जाता कि आस पास के गाँव के लोग भी उनसे आटा दाल खरीद कर ले जाते। तो जिज्जी अकेली रहतीं जरूर थीं पर पूरा गाँव ही उनकी गृहस्थी था।

कुछ दिन पहले की ही बात है। गाँव में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी न हुआ था। जिज्जी जब दिवाले से लौट रही थीं तो उन्हें एक कुत्ते ने काट लिया। जिस गाँव में एक पत्ता भी जिज्जी की मर्ज़ी के बिना न हिलता हो, वहाँ ऐसी घटना घट जाए? जिज्जी ने चूहे मारने की दवा मिलाकर बनाई रोटी से उस कुत्ते का तो काम तमाम कर दिया पर वो समझ गईं कि गाँव के दिन अच्छे नहीं रहे। कोई विपदा आफ़त आने की पूरी संभावना है। इस घटना के ठीक 4 दिन बाद ही जिज्जी ने आकाश में जो देखा सो देखतीं ही रह गईं! तीन बड़ी चील गाड़ी आगे पीछे सन्नाटा चीरते हुए निकल गईं थीं। जिज्जी का तो मानो कलेजा बैठ गया। समझ गईं कि संकेत ठीक था। आज से ठीक 18 साल पहले जब ऐसे ही आकाश में चील गाड़ियां निकली थीं, तब कितने लोग मरे थे, कैसा अकाल पड़ा था। भगवान फिर न वो दिन दिखाए।

बिना देर किये जिज्जी ने पंचायत बुलाई और अपना फरमान सुना दिया। फरमान कुछ इस प्रकार था- कि गाँव के बाहर की खाली जमीन के नीचे एक कोठरी बनवाई जाए, जिसमें हर घर का पूरा अनाज रखा जाएगा। कोठरी इतनी बड़ी होनी चाहिए कि बखत जरूरत गाँव के सब लोग उसमें ठहर भी सकें और बाहरी किसी को भनक तक न लगे कि यहाँ क्या है? यह काम जितना जल्दी हो उतना ठीक। 

पंचों की मुखिया तो जिज्जी ही थीं अतः हुकुम की तामील होते देर न लगी। रात दिन एक करके काम शुरू हो गया और हफ्ते भर के अंदर बंकरनुमा कोठरी तैयार हो गई। जिज्जी की सख्त ताकीद थी कि गाँव से कोई आदमी बाहर कदम नहीं रखेगा, फिर चाहे कितनी ही बड़ी बात क्यों न हो। सबने जिज्जी की बात मान ली। पर कोरियों ने हिम्मत करके पूछ ही लिया कि बाकी सब तो ठीक पर हाट बाजार में बुना हुआ कपड़ा नहीं बेचेंगे तो खाएंगे क्या? पहली बार जिज्जी से किसी ने कोई सवाल किया था। इसलिए जिज्जी का बिफरना लाज़मी था। बोलीं- पेट की चिंता मत करो, मैं पाल लूँगी। लेकिन जो कह दिया सो कह दिया। जाहिर सी बात है इतना सुनने के बाद कौन क्या बोलता।

यह पहली बार नहीं था जब जिज्जी का अंदाज सही निकला था। देखते ही देखते चील गाड़ियों का गुजरना और बढ़ गया। गाँव वाले छाती पकड़ के रह गए। सभी को जिज्जी के फरमान का अर्थ समझ आने लगा था। चील गाड़ियां क्या आयीं जैसे काल ही बरस रहा था। ठीक 6 महीने के भीतर ही आस पास के सभी बाजार ठप्प हो गए थे। फसल के लिए बीजों की किल्लत हो गई। आस पास के गाँवों में भुखमरी जैसी हालत थी। गोरे गाँव गाँव से आदमियों को पकड़ पकड़कर ले जा रहे थे। फौज और मिलों में भर्ती के नाम पर उनका खून चूसा जा रहा था। जो जा रहा था, वापिस नहीं आ रहा था। बीज खतम हो जाने से खेती भी बदहाल थी। बेचारे लोग कारखानों में काम करने को विवश थे। अंग्रेजी शासन का सबसे बुरा रूप सामने आ रहा था। हर जगह डर और बेचैनी का माहौल था। देश का माल असबाब तक लूटा जा रहा था। देश में खाने को अन्न नहीं और गाँव गाँव से अनाज इकट्ठा कर सेना के लिए भेजा जा रहा था। सुनने में तो यह भी आ रहा था कि अनाज का आयात सरकार ने पूरी तरह से बंद कर दिया था। लोग भूखों मर रहे थे। आलम यह हो गया था कि सड़े और खराब अन्न के लिए भी लोग मरने मारने पर उतारू हो गए थे। भूख ने जैसे जानवर और इंसान का अंतर मिटा दिया था।

इधर जिज्जी के गाँव की स्थिति सबसे अलग थी। वीरानगी तो यहाँ पर भी थी पर एक अलग किस्म की। आस पास के गाँवों से इस गाँव का संपर्क एकदम बंद था। पिछले छः महीनों से गाँव से किसी ने बाहर कदम न रखा था। पूरा अनाज गाँव में बने बंकर में सुरक्षित था। समय को देखते हुए जिज्जी की सख्त ताकीद थी कि किसी घर में चूल्हा नहीं जलेगा। भोजन का सब इंतजाम बंकर में ही होगा। यह सिलसिला आगे एक साल तक चलता रहा। जिज्जी को छोड़ गाँव भर का खाना बंकर में ही बनता। जिज्जी का तो ऐसा था कि अंग्रेज भी उनका क्या बिगाड़ सकते थे और फिर गाँव की मुखिया तो वही थीं, तो उनका सामने रहना जरूरी था। न रहतीं तो किसी को भी शक होता।

इस बीच तीन बार तहसीलदार के साथ गोरों का भी गाँव में आना हुआ। पूरे गाँव का मुआयना किया गया। घरों, गोदामों को खंगाला गया। पर मजाल कि किसी को अन्न का एक दाना भी मिलता। सब हैरान कि क्या खाकर ऐसे हट्टे कट्टे हो? जवाब मिला शकरकंदी खाकर। कंदमूल खाकर। आखिर जब हाट बाजार तक में बीज नहीं तो कौन सी खेती कौन सा अनाज? बात भी सही थी। अनाज तो सचमुच नहीं था पर उनकी चौड़ी देह देखकर बात सच लगती नहीं थी।

गोरे सिर खुजलाते रह गए। उनके लिए हैरानी की बात यह भी थी कि गाँव में कोई भी युवा नहीं था! सब बुजुर्ग, बूढ़ी औरतें और बच्चे ही थे। बच्चे भी पाँच साल से कम आयु के। अब ये कौन जान सकता था कि जिज्जी ने सबको बंकर में तैनात कर दिया था। जिससे मिल या सेना में भरने के लिए उन्हें कोई युवा मिले ही ना। लगभग तीन वर्षों तक ऐसा माहौल था कि कुछ कहते नहीं बनता। भय का माहौल तो सब जगह था पर जिज्जी के गाँव में भय से अधिक कर्फ्यू जैसा माहौल था। जिज्जी ने बड़ी चतुराई से हर ओर व्याप रहे भय को गाँव का सुरक्षा कवच बना दिया था। यह सब ऐसे हो गया कि आस पास के गाँवों को खबर तक न हुई।

इतना सब हो गया था। जिज्जी के रौब और उनकी दिनचर्या में भला कोई अंतर आना था? रौब जरूर बढ़ गया थाजिज्जी कुछ और महत्वपूर्ण हो गई थीं। पर उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया। नदी जाना, नहाकर वही गीली धोती पहनकर आना। आकर डोर पर टँगी अनछुई धोती पहनकर पहनी हुई, राह चली धोती को फिर से धोना और धोकर डोर पर अगले दिन के लिए बांध देना। फिर दिवाले जाकर पूजा अर्चना करना, हनुमान बाबा को भोग लगाना। घर आकर खाना पका खा कर गाँव में निकल जाना। सब कुछ वैसा का वैसा ही तो रहा। कुछ नहीं बदला। 

हाँ माहौल अब धीरे धीरे शांत हो रहा था। आकाश में अब चील गाड़ियों का निकलना बंद हो गया था। पर आस पास जो मनहूसियत सी पसरी थी, वह कम न हो पाई थी। आलम यह था कि इतने दिन बाद जब कोरियों का कपड़ा बाजार लगा तो कोई खरीददार तक न था। कंगाली की बदतर स्थिति! इतने पर भी गाँव वालों का पक्का विश्वास हो गया था कि यह उनके पुण्य कर्म ही थे जो जिज्जी उनकी मुखिया थीं। नहीं तो इस विपत्ति में क्या वे सब बच पाते? आस पास के गाँवों की बात करें तो अकेला उनका ही गाँव था, जिसमें एक जन भी कम न हुआ था। नहीं तो हर ओर ऐसी स्थिति थी कि कुछ कहते नहीं बनता। लंबे अरसे बाद गाँव का फिर से अन्य गाँवों से मेल जोल बढ़ रहा था। आस पास के गाँवों के लिए यह हैरानी की बात थी कि कोई अनहोनी इस गाँव में कैसे न घटी थी? न तो किसी ने बताया न जिज्जी से किसी के पूछने की हिम्मत पर अंदाज सबको था कि हो न हो ये नद्दी वाले हनुमान बाबा की कृपा है जिनके आशीर्वाद से विकट परिस्थिति में भी गाँव सुरक्षित बच गया था। 


गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

शून्य


 


मां कहते कहते थक जाती कि बेटा कुछ घर का काम भी सीख ले, शादी के बाद काम आएगा। तेरा दूल्हा जो कहेगा कि एक कप चाय बना दे तो तेरा ये गणित का फार्मूला काम नहीं आएगा। पर रूज़ा को कुछ समझ आए तब न। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी जो ठहरी। सबके सब उसके नाज़-नखरे उठाने वाले। मजाल कि किसी ने एक कप भी उसे उठाकर रखने को कहा हो। उल्टे मां जब कुछ कहती तो भैया तक उठ खड़ा होता कि मां तू मुझे बता दे क्या करना है, उसे अपना काम करने दे। मां बेचारी अपना सा मुंह लेकर रह जाती और फिर खीझते हुए कहती-तुम्हीं ने इसे सिर चढ़ा रखा है। कल को ससुराल में सास जब ताना मारेगी तो क्या कर लेगा तू। भाई हंसते हुए कहता-अरी मां तू चिंता क्यों करती है? तेरा बेटा अपनी बहन के लिए ऐसा घर ढूंढेगा जहां सास उसे चाय बना के पिलाएगी।

चल हट। बेशरम। ये संस्कार दे ेभेजेगा तू अपनी बहन को? दुनिया क्या कहेगी मुझे कि कैसी बेटी जनी है जो सास से सेवा कराती है? यही चाहता है तू कि दुनिया मुझे नाम रखे? और तुझे भी कोई बख्श नहीं देगी।बहन तो तेरी ही है वो।

अच्छा ऐसा है तो बहुत अमीर घर में शादी करूंगा उसकी। जहां इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे काम करने की कोई ज़रूरत ही नहीं होगी।

ना इतने अमीर घर में नहीं करनी जहां इतनी माया हो कि इंसान की क़ीमत ही न समझे कोई। रुपये-पैसों और गहने-जेवरों से न तो पेट भरता है और न संस्कार ठहरते हैं। इसलिए ऐसे रईसी घर में तो नहीं करनी।

मां तो ऐसे बात कर रही थी जैसे अभी ही रिश्ता तय हो रहा हो और भैया आकाश भी ऐसी ही तन्मयता से बात कर रहा था जैसे अभी ही रिश्ता तय करने जा रहा हो। पर मां को तो उसकी कोई बात जैसे पसंद ही नहीं आ रही थी। इसलिए चिंतित होकर बोला कि मां अब तू ही बता कि तुझे अपनी बेटी के लिए कैसा दूल्हा चाहिए?

दूल्हा? रूज़ा के लिए? मां के चेहरे पर मुस्कान खिल गई।सांवला चेहरा दमक उठा। माथे की बिंदी जैसे थोड़ी और लाल हो गई और काजल रेखी आंखे ंचंचल हो उठीं। उसने आकाश का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा-बताउं मुझे कैसा दूल्हा चाहिए अपनी रूजा के लिये?

हा न मां बता  न।आकाश ने भीउत्सुक्ता से कहा।

तो सुन। ज़्यादा कुछ नहीं। खूब पढ़ा-लिखा हो। देखने का अच्छा हो। एकदम राजकुमार जैसा। आखि़र हमारी रूजा भी तो सबसे सुंदर है।पर अच्छा संस्कारी भी हो। कुछ खाता-पीता भी न हो। कोई ऐब न हो और सबसे ज़रूरी बात कि तेरे पापा की तरह सरकारी नौकरी करता हो। ये प्राइवेट फ्राइवेट या बिज़नेस वाला नहीं चाहिए।

ठीकहै मां जैसा तू चाहती है, वैसा ही सही। पर एक बात अपनी तरफ से भी जोड़ दूं। मेरी बहन को जो बहुत प्यार करे। इतना कि उसे कोई काम न करने दे।

अबके मां हंस पड़ी। बोली जैसी तेरी मर्ज़ी बेटा। ये तो मुझे पता है कि  जितनी मुझे उसकी चिंता है उससे कहीं ज़्यादा तू उसकी फ़िकर करता है।

मां की बात सुनकर आकाश भावुक हो आया। बोला- मां जब तू जानती है तो क्यों परेशान होती है? जना तूने उसे है पर मेरे लिए भी वो बेटी से कम नहीं है। तू देखना उसके लिए ऐसा दूल्हा ढंूढंूगा कि तेरी आत्मा तृप्त हो जाएगी। उसे जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं आने दूंगा।

मां बेटा दोनों कुछ पल के लिए ऐसे भावुक हो गए जैसे उनकी लाडली रूजा अभी ही विदा हो रही हो।

त्रिपाठी परिवार के चारभाई-बहनो ंमे ंसबसे छोटी थी रूजा। तीन बहनें और एक भाई। भाई तीसरे नंबर का और रूजा चैथे नंबर की। रूजा और आकाश में कोई बहुत लंबा-चौड़ा अंतर नहीं था। बस चार साल। पर दोनों भाई बहन में ऐसा प्यार कि कोई माने ही न कि दोनों तर उपरी के हैं। प्यार तो चारों भाई बहनों में ही ख़ैर खूब था पर सब भाई बहनों का प्यार भी सबसे ज़्यादा रूजा पर ही बरसता था। सबसे छोटी जो थी। उस पर भी सिर चढ़ी अलगसे। मुंह से बात निकली नहीं कि मन चाही चीज़ हाज़िर। शादी लायक हा ेर्गइ थी फिर भी बच्ची ही थी अभी। उसे बड़ा भी किसने होने दिया था। पर रूज़ा भी निरी बुद्धू नहीं थी। स्त्री सुलभ इच्छा-आकांक्षाएं उसके मन में भी पनपने लगी थीं। मां की बात वो सबके सामने तो अनसुना कर देती पर अकेले में अपने मोबाइल पर नए-नए व्यंजन बनाने की खूब विधियां देखती और कई बार तो खाली रसोई मेें घुसकर कुछ-कुछ बनाकर भी ले आती। और तब सब देखते रह जाते कि रूई के फाहे सी नाज़ुक हमारी रूज़ा के अंदर ये सयानी लड़की कहां से आ गई?

इधर रूजा मन ही मन अपनी गृहस्थी संजो रही थी उधर भाई आकाश की नौकरी भी लग गई थी। पर नौकरी लगी भी तो कहां गुजरात। यूपी के एक छोटेगांव से सीधे गुजरात! पिताजी ने तो सख़्त मना कर दिया कि इतनी दूर नौकरी के लिए नहीं जाना। बड़ी डाक्टरी करनी है इन्हें। यहीं क्लिीनिक खोलो और चलाओ मेहनत से। पैसा हम लगाते हैं। पर इससे पहले कि आकाश कुछ कहे मां पिताजी से बोलीं-तुम्हें लगता है कि यहां रहकर अच्छी तरक्की कर सकता है तुम्हारा बेटा? ठीक है सारी सुविधाएं हैं यहां। लेकिन वहां से जो सीखकर आएगा न पूरे गांव का नाम रौशन कर देगा। पत्नी की बात पर पिता चकित होकर बोले-और जो बिना बताए ब्याह लाया तो? ऐसा कर सकता है तुम्हारा बेटा? तुम खुद सोचो। और जो कर भी लिया तो मैं उसके लिए भी तैयार हूं। पर इत्ता पढ़ा-लिखाने के बाद यहां गांव में न पड़ा रहने दूंगी।

पिता ने हिक़ारत भरी नज़रों से पत्नी की ओर देखा और बोले-तू एक बेटे को नहीं पाल सकती। दुनिया चार-चार को रख लेती है। पिता का वात्सल्य जैसे हिलोरें ले रहा था। खुद बैंक मैनेजर, अच्छे-खासे पढ़े-लिखे पर बेटे को इतनी दूर भेजने को मन न मानता था। ऐसा नहीं था कि बेटे के लिए ही ऐसे विह्वल हो रहे थे, बेटियों के लिए भी उनका कलेजा ऐसा ही लरजता था। दोनों बेटियों की जब विदा हुई तो ऐसे फूट-फूटकर रोए कि मां और अम्मा को समझाना पड़ा। मर्द होकर भी बड़े कच्चे कलेजे के हैं पिताजी। तो ऐसे में कुछ कठोर होना मां की ज़िम्मेदारी भी थी और मजबूरी भी। अगर वो कठोर न बनतीं तो न तो उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई-लिखाई कर पाते और न ही उनका लाडला डाक्टर बन पाता। ये सब हुआ तो मां की ही बदौलत। पिताजी भी यह बात समझते थे इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बोले। बस इतना ज़रूर कहा- चाहे जितने बिज़ी क्यों न हो दिन में तीन बार बात ज़रूर करोगे।

जी कहते हुए आकाश ने मुस्कुराकर मां की ओर देखा और पिताजी के पांव छू लिये।

आकाश को गुजरात गए सात महिने हो गए थे। इस बीच वह दो बार गांव भी आया था। एक बार दस दिन की छुट्टी पर और एक बार आठ दिन के लिए। वहां भी जब भी उसे समय मिलता फोन तो कर ही लेता। ऐसे ही एक दिन रात को दस बजे आकाश का फोन आया। उसने मोबाइल पर एक फेाटो भेजी थी। मां और पिताजी दोनों फोन से चिपक कर बैठ गए थे और उनकी आंखें जैसे फोन की स्क्रीन पर चिपक गई थीं। और भला क्यों न चिपकतीं? बात ही कुछ ऐसी थी। आकाश ने अपनी प्यारी बहन रूजा के लिए एक लड़के की तस्वीर जा े भेजी थी। लड़का बड़ा संुदर। हाईट भी बहुत अच्छी छह फुट दो इंच। रूजा के हिसाब से एकदम सही। वो भी तो पांच फुट आठ इंच की है। किसी माॅडल से कम नहीं लगती। और नौकरी? माता पिता की सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा। पर आकाश ने जैसे हीरा ही खोज लिया था बहन के लिए। बोला-लड़का रेलवे में इंजीनियर है। कोई किसी तरह का ऐब नहीं है। परिवार भी अच्छा है। इसका बड़ा भाई यहीं मेरे साथ डाॅक्टर है। चार जनों का छोटा परिवार है। दो भाई और मम्मी.पापा। अभी जनवरी में भाई की शादी हो गई है अब इसकी करनी है।

अब दूसरा प्रश्न पिता की ओर से-मांग क्या है? 20 लाख से कम तो क्या ही होगी? नहीं पापा ऐसा कुछ नहीं है। मैंने सब पता कर लिया है। उन्हें लड़की पढ़ी-लिखी चाहिए और कुछ नहीं। चाय न भी बनानी आती हो तो कोई बात नहीं पर पढ़ी-लिखी होनी चाहिए। बिल्कुल हमारी रूज़ा जैसी। पिता ने कहा- रूजा की फोटो भेज दे उन्हें फिर। पापा उन्होंने रूजा की फोटो देख ली है और उसे पसंद भी कर लिया है। बस अब देखने आना चाहते हैं। आप चाहो तो लड़के से मिल लो वो अभी अपने बगल के गांव में ही है। वहां उसकी बुआ रहती हैं।

हैं? कहां पर? पिता ने आश्चर्य से पूछा। निवाड़ी में। पिताजी हतप्रभ से रह गए। पत्नी की ओर देखकर बोले-तुम्हारे बेटे ने तो बहन का दूल्हा भी बगल में ही खोज लिया। आकाश फोन पर मुस्कुरा उठा। अबकी मां बोलीं-बेटा दो-चार दिन की छुट्टी लेकर घर आ जाओ फिर तुम दोनों लड़का देख आओ। इनके अकेले के बस की बात नहीं है।

ठीक है मां मैं जल्दी ही आता हूं। लड़के का नाम नीरज है वह भी 5 दिन है वहां पर उससे बात करके समय तय कर लेता हूं और फिर आपको बताता हूं।

जैसा फोटो में देखा था लड़का उससे कहीं जादा सुंदर और स्मार्ट। बस फिर क्या था शादी की तारीख भी तय होगई। और देखते ही देखते रूजा दुल्हन बन गई। धूमधाम से शादी हुई। मांग नहीं थी पर भाई और घर भर की लाडली जो ठहरी। इतना दान दहेज दिया कि ससुरालवालों का तो कहना ही क्या रिश्तेदारों और अगल बगल वालों की भी आंखें फटी की फटी रह गईं। रूजा मना करती। क्या करते हो भैया पूरा घर ही खाली कर दोगे क्या? मेरी भाभी का स्वागत क्या सूने घर से करोगे? उसकी तू चिंता मत कर। सब अपनी किस्मत लेकर आते हैं और मैं हूं न सब कर लूंगा। तू बस अपनी नई जिंदगी पर ध्यान दे। और हां मैंने नीरज को कह दिया है कि मेरी बहन का वैसे ही ध्यान रखना जैसे पलकें आंखों का।

रूजा अपने दूल्हे के साथ विदा हो गई। जाते समय अपने भैया से बोली भैया आप मेरी चिंता मत करना। आपके आशीर्वाद से मुझे कभी कोई कष्ट नहीं होगा। आप अपना और मम्मी पापा का खूब ध्यान रखना। बहन की बात सुनकर उसका भाई तो देखता ही रह गया। कैसे उसकी छुटकी अचानक से इतनी बड़ी हो गई! समझ और अक्कल के घोड़े जिसकी बगल से भी कभी न गुज़रे थे वो अचानक से इतनी सयानी कैसे हो गई? आकाश समझने की कोशिश कर रहा था कि रूजा में इस परिवर्तन से वही हैरान है या मां पापा भी। पर नहीं उसके जैसा हैरान कोई भी नहीं था।

मां इसलिए हैरान नहीं थी क्योंकि वह समझती थी कि एक लड़की चाहे जितनी भी पढ़ लिख क्यों न जाए, अपनी गृहस्थी बसाकर ही पूर्ण अनुभव करती है और फिर रूजा ने भी तो गृहस्थियां बनती देखी हैं। अपनी दोनों बहनों की। और रिश्तेदारियों में भी। तो भला कब तक उसके अंदर नारीत्व नहीं जागता। यूं भी आकाश के जाने के बाद वो मां के साथ रसोई में हाथ बटाया करती। घर के काम-काजकरती। जैसे अपने आपको स्त्रीत्व की टे्रनिंग दे रही हो। रही बात पापा की तो उनके लिए तो रूजा का जाना चहकते घर का चुप हो जाना था। दोनों बेटियों की शादी हो गई तो आकाश और रूजा घर में थे। घर इतना खाली नहीं लगा। फिर आकाश के भी गुजरात जाने के बाद रूजा से घर में चहल-पहल थी। पर अब उसके भी चले जाने से इतने बड़े घर में दो अकेले जीव कैसे रहेंगे? यह सोच के ही उनका जी दुखता था। उनका बस चले तो अपने कलेजे के टुकडे को कभी दूर न करें। पर बेटी को आखिर कब तक घर में बिठाया जा सकता है? एक न एक दिन तो उसे विदा करना ही होता है। सो जा रही है और अच्छे घर जा रही है सोचकर अपने मन को उन्होंने समझा लिया था। पर न समझा पाते अगर आकाश जैसे बेटे के मज़बूत कंधों का सहारा उन्हें न मिला होता। आखिर शादी में सबकुछ आकाश ने ही तो किया था। उसने अपनी तरफ से कोइ कसर नहीं छोड़ी थी। पिता पर कोई बोझ न पड़े इसलिए सब अपने कंधों पर संभाल कर किया। मन में एक सुकून भी था कि बहन के लिए जैसा वर चाहिए थाए सो मिल गया।लड़का था भी बहुत अच्छा। सब कुछ बहुत बढ़िया। सब प्रसन्न सब बहुत खुश।

सबने चैन की सांस ली कि चलो बेटी अच्छे घर पहुंच गई। इधर अभी सालभर ही हुआ था कि रूजा के मां बनने की खबर आ गई। सब बहुत खुश। इधर भाई आकाश की भी शादी पक्की हो गई और फिर क्या था इधर चांद सी भाभी का रूजा ने स्वागत किया पर शायद खुद रूजा के नसीब में अभी खुशी नहीं लिखी थी। आठवें महिने में ही गर्भपात हो गया। रूजा के प्राण जाते जाते बचे। सबने बड़ी मुश्किलों और मिन्नतों से रूजा को संभाला ही था कि नीरज की तबियत खराब। गाॅल ब्लेडर की पथरी और पथरी का दर्द कोई बताने की चीज़ है? जिसे होता है सो जानता है। पर ठीक कैसे हो जबतक पथरी निकले न। पर रूजा की सास को कौन समझाए। कहतीं इत्ते बड़े शरीर में दो एक कंकड पत्थरों से शरीर नहीं गलता। नहीं कराना आपरेसन। बेचारा मातृभक्त नीरज मां की बात सुनकर रह जाता। हालत तब खराब हो गई जब आयुर्वेद की दवाओं और दर्द निवारक दवाओं ने भी काम करना बंद कर दिया। अकेली रूजा क्या करती फौरन भाई से कहकर इलाज का इंतजाम किया। पर ये क्या होगया? कैंसर! नहीं।

देखते ही देखते रूजा की दुनिया उजड़ गई। शादी की तीसरी सालगिरह से पांच दिन पहले ही नीरज चल बसा और नियति तो देखिए यह सब हुआ उसी अस्पताल में जहां उसका अपना भाई डाॅक्टर था।

रूजा जैसे पत्थर की घिसी हुई मूरत। पति को बचाते बचाते खुद को भूल गई। पर जिसे बचना ही नहीं था वो कैसे बचता। न चाहते हुए भी बच गई तो अकेली रूजा। भाई आकाश को नहीं समझ आ रहा था कि क्या करे। कैसे रूजाको समझाए? या खुदको समझाए। ये वही तो था जिसने मां से कहा था कि अपनी रूजा को कभी कष्ट नहीं होने देगा। पर अब क्या करे? सब उसी ने तो किया था। लड़का भी तो उसी ने ही ढूँढा था। अब किसे क्या समझाए? मां बाप तो विक्षिप्त के समान हो गए थे। आंखों में ढेरों समुंदर भरे रूजा उनकी आंखों के सामने थी पर किंकत्र्तवयविमूढ और नियति के सामने बेबस आकाश आज पहली बार अपनी रूजा को उसकी सबसे प्यारी चीज़ नहीं लौटा पाया।

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

गुड़िया मिल गई


 


 

पापा मैं भी आपकी तरह खूब पढ़ाई करूंगी।

अच्छा?

क्या बनोगी पढ़-लिखकर?

बहुत बड़ी अफसर बनूँगी।

बहुत बड़ी? कितनी बड़ी?

इतनी बड़ी... छोटी लड़की ने अपने दोनों हाथ फैलाते हुए कहा- इतनी बड़ी।

इतनी बड़ी हो जाओगी तो मैं तुम्हें गोद में कैसे उठाऊँगा?

नहीं पापा मैं इतनी बड़ी हो जाऊँगी कि आपको गोद में उठा लूँगी।

अच्छा??? कहते हुए पिता ठहाका लगा कर हंस पड़े और उन्होंने बेटी को अपने कंधों पर बिठा लिया।

इतना लाड़ करोगे, तो जब अफ़सरी की पढ़ाई करने तुमसे दूर जाएगी तो कैसे रह पाओगे इसके बिना, पत्नी ने टोकते हुए कहा।

जब जाएगी तब जाएगी। अभी तो खेल लेने दो मुझे, पिता ने झूमते हुए कहा।

पत्नी ने दुलार से कहा -मैं कब मना कर रही हूँ, फिर जैसे कुछ याद करते हुए बोली- अच्छा सुनो- बाबूजी की चिट्ठी आई है। कृष्णा के बेटे का नामकरण है।

ठीक है चले चलेंगे। कार्यक्रम कब का है?

आज से चौथे दिन।

ठीक है। चलो इस बहाने हमारी गुड़िया से भी मिल लेंगे सब लोग।

मैं नहीं ले जाना चाहती गुड़िया को। पाँच साल हो गए कोई देखने तक नहीं आया। किसी को यह तक नहीं लगा कि ठीक है बेटी है तो क्या हुआ, है तो उन्हीं का खून।

अब ये सब बातें मत करो। मुझे लगता है हम तीनों को ही चलना चाहिए।

दादा दादी हैं, देखना, अपनी गोद से उतारेंगे ही नहीं गुड़िया को।

आपके माता पिता हैं, इसलिए मैं भी उनका बहुत सम्मान करती हूँ। पर अपनी बेटी के लिए उनकी ये बेरुखी मेरा बहुत दिल दुखाती है, पत्नी ने उदास होते हुए कहा।

ऐसा नहीं है। बहुत सी बातें होतीं हैं, तुम तो बस एक बात पकड़ के बैठ जाती हो। वैसे भी तुम्हारे घर से कितनी बार पूछ लिया गुड़िया के बारे में? तुम्हारी माँ तो मुंह पर बोल गई थी कि चलो सब अच्छा है पर बेटा होता तो और ज्यादा खुशी होती...

उनकी बात छोड़ो। सबकी सोच इतनी जल्दी नहीं बदलती, पर वो गुड़िया को बहुत चाहती हैं और ये आप भी जानते हो।

वही मैं कह रहा हूँ कि हर बात पर दिमाग खराब करने की जरूरत नहीं होती। मेरे लिए मेरी बेटी सबकुछ है, वो मेरी जिम्मेदारी है और मेरा सबकुछ है। कोई क्या सोचता है, क्या कहता है, मुझे उससे कोई मतलब नहीं।

पत्नी के पास कोई उत्तर नहीं था।

तीसरे दिन वे तीनों गाँव में थे। अनीता की देवरानी के चेहरे का गर्व देखते ही बनता था। आखिर बेटे को जो जन्म दिया था। सासु माँ भी पोते को देख वारी जा रही थीं। गुड़िया भी अपनी भाई के पास ही बैठी थी। वह बार बार उसे छूने की कोशिश करती पर चाची उसका हाथ छिटक देती। एक बार तो दादी ने भी बरजते हुए कहा- अरे क्या कर रही है, जब थोड़ा बड़ा हो जाएगा न, तब खेल लियो उसके साथ, अभी रहने दे।

गुड़िया बेचारी मुंह बना कर रह गई। कोई उसे प्यार ही नहीं कर रहा था। ठीक से बात तक नहीं कर रहा था। पर उपेक्षा-अपमान से बेपरवाह बाल मन को शांत होना कहाँ आता है अतः कुछ क्षण चुप रहने के बाद वो फिर बोली- अच्छा मैं भाई के खिलौने देख लूँ?

अरे नहीं, टूट जायेगे। तेरे खेलने के नहीं हैं, छोटे बच्चों के हैं। तू जा, जाके अपनी माँ का हाथ बँटा।

गुड़िया ने इधर-उधर देखने के बाद कहा- माँ कहाँ हैं?

अब की दादी ने झिड़कते हुए कहा- कितना बोलती है... सुरेश तू क्या खिलाता है अपनी बेटी को कितना बोलती है, चुप ही नहीं होती।

सुरेश हँसते हुए बोला- माँ लगता है तूने ही इसे अपना जूठा खिला दिया है, तभी तो तेरी ही तरह बात कर रही है..

चल हट, बाप बेटी दोनों एक जैसे... दादी ने खीझते हुए कहा।

इतने में गुड़िया अपनी माँ को ढूँढने निकल चुकी थी।

नामकरण संस्कार विधि विधान से पूरा हो गया था। बाहरी लोगों का खाना पीना हो रहा था तभी अनीता ने इशारे से पति को बुलाकर कहा कि गुड़िया को खाना खिला दो।

ठीक है। पर है कहाँ गुड़िया?

है कहाँ मतलब?  वहीं तो थी, तुम्हारे साथ।

मेरे साथ? पर माँ ने तो उसे तुम्हारे पास भेजा था?

कब भेजा? यहाँ तो आई नहीं, फिर कहाँ गई?  अनीता और सुरेश का चेहरा सफेद पड़ गया। पूरे घर में भगदड़ मच गई। हर जगह गुड़िया गुड़िया की पुकार, गुड़िया की तलाश। पर गुड़िया कहीं नहीं थी।

अनीता का रो रोकर बुरा हाल था, बार बार पति से कह रही थी कि सब तुम्हारी वजह से हुआ। क्यों लाए यहाँ जब ध्यान नहीं रख सकते थे, मैं रसोई में काम कर रही थी, पता होता कि तुम ध्यान नहीं रख पाओगे तो कभी न छोड़ती तुम्हारे पास।

सुरेश के पास सिवाय आंसुओं के कोई जवाब न था।

पुलिस में रिपोर्ट करा दी गई। तीन दिन बीत गए। घर में मातम जैसा माहौल। इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई- पुलिस के एक आदमी ने इशारे से सुरेश को बुलाकर कुछ कहा और सुरेश बदहवास सा उसके साथ चल पड़ा।

घर के पीछे एक पाँच साल की लड़की की खून से लथपथ लाश मिली थी। लाश को देखकर साफ था कि उसके साथ बीभत्स घटना को अंजाम दिया गया था और बाद में उसकी हत्या कर दी गई थी, अफसोस ...... गुड़िया मिल गई थी...

बुधवार, 29 सितंबर 2021

आकाश और आँखें

 


झरोखे में सिमटा आकाश जैसे आँखों में उतर आया था सिया की। नीरव, गहरा और निस्तब्ध! उस ज़िंदगी की तरह जो अचानक से सिमट गई थी झरोखे के इर्द गिर्द ही। आकाश की ओर टकटकी लगाए उसकी आंखें जैसे जबरन कैद कर दी गई ज़िंदगी को आज़ाद करना चाह रहीं थीं,  बिल्कुल खुले आकाश की तरह पर कैसे? कोई उत्तर न पाकर जैसे वो और उदास हो गईं थीं और कब आकाश से फिसल कर हथेली पर सिमट आईँ थीं, पता ही नहीं चला। निस्तब्धता जैसे और गहरा गई थी.......

पर ये क्या? झरोखे से आई एक छोटी सी किरण ने सिया की झुकी आँखों को अपनी नरमीली चमक से जैसे गुदगुदा दिया। निस्तब्धता उसी क्षण जैसे हवा हो गई और किर्णीली चमकीली आँखें मुस्कुराहट के साथ फिर से खुले आकाश से मिल  गईं। उन्हें उत्तर जो मिल गया था...

सोमवार, 27 सितंबर 2021

बाल मन


 


बच्चा लगातार अपनी माँ से साथ खेलने की ज़िद कर रहा था। माँ थी फोन में व्यस्त। बार बार बच्चे को झिड़क देती। बच्चा फिर भी नहीं मान रहा था। अबकी माँ ने चिल्लाते हुए कहा- भाग यहाँ से, नहीं खेलना मुझे।

बच्चे को ऐसी प्रतिक्रिया की आशा न थी। कुछ क्षण वो यह सोचते हुए माँ को देखता रहा, कि क्या सचमुच मुझे डांट पड़  गई है! जब माँ ने उसकी ओर सिर उठाकर नहीं देखा, तो वो समझ गया कि हां डांट पड़ गई है। बच्चे ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना मुँह ढँक लिया और सोफे पर औंधा लेट गया। अभी दो सैकेण्ड ही हुए होंगे कि वह माँ की ओर देखकर बोला- मुझसे मत बोलो!!

माँ ने फोन में नज़र गड़ाए हुए ही कहा- कौन बोल रहा है?

बच्चे ने फिर सर झुका लिया और कुछ सैकेण्ड बाद फिर बोला- मुझसे मत बोलो...माँ ने अपनी हंसी दबाते हुए अबकी उसकी ओर देखकर कहा-  कौन बोल रहा है?

बच्चा अब रुआंसा मुँह बनाकर बगल में पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। गुस्से वाली आंखें और होंठों को बत्तखनुमा बनाकर वो फिर माँ से बोला- मुझसे मत बोलो।

अब हंसी रोक पाना असंभव था- माँ ने अपना फोन एक ओर रखते हुए बच्चे से कहा- अक्कड़ बक्कड़ खेलें......?

बच्चे के मुख पर चांदनी खिल गई और वो किलककर बोला हाँ चलो। झूठमूठ का गुस्सा काफूर हो गया था।

शनिवार, 25 सितंबर 2021

सत्यमेव जयते! गिद्ध


 


 

भाई साहब आप चिंता न करें बिल्कुल भी। हम हैं न। हम आखिर बैठे किस लिए हैं? आप और आप जैसों की मदद के लिए ही तो भगवान ने हमे भेजा है, ये मानिए आप। और हाँ आपकी बेटी मेरी बेटी। अब ये लड़ाई अकेले आप भर की नहीं है, मेरी भी है। मेरा तो ... क्या कहूँ आप मानेंगे नहीं पर सच है कि मैंने तो इन ..... को सीधा करने के लिए ही वकालत के पेशे में कदम रखा है, वरना क्या बुरी थी सरकारी नौकरी!

चुँधियाईं आँखों और चौथाई से भी कम लागत से अधबना आदमी सा वह वकील शर्मा साहब को यकीन दिलाने की भरसक कोशिश कर रहा था कि उससे बेहतर वकील उन्हें कोई और नहीं मिल सकता। शर्मा साहब भी कातर आखों से उसे कृतज्ञता ज्ञापित करते जा रहे थे। और करते भी तो क्यों न? आखिर उनकी बेटी की ज़िंदगी का जो सवाल था। हँसती खेलती बेटी को शादी के नाम पर सौदा करने वालों ने आखिर मसल कर जो रख दिया था। पिछले 5 वर्षों में कितनी चुप, निराश और हताश हो गई थी उनकी बेटी। वो करते भी तो क्या? कुछ भी तो नहीं कर पाए थे। पाँच साल बीत गए 8 लाख से ऊपर खर्च हो गए, और मुकद्दमा वहीं का वहीं। तो अब वकीलों के आगे कातर मन हो ही आता, भगवान जो खोज रहे थे वकीलों में। आखिर फिर एक बार तीन लाख पर बात करके शर्मा जी लौट आए और सोफ़े पर निढाल हो गए।

पत्नी पानी लेकर पास बैठ गई। क्या हुआ कुछ बात बनी?

क्या बात बननी है? तीन लाख देने हैं इस नए वकील को।

तीन लाख! पत्नी लगभग चीखी। 8 लाख से ऊपर खर्च हो चुके हैं, और अब फिर तीन लाख?

ये दूसरा वकील है। पिछले वाले ने आने से मना कर दिया।

मना कर दिया! तो उससे कहो कि पैसे वापिस करे।

तुम बकवास बंद करो। कौन वकील पैसे वापिस करता है? इनका ये रोज का काम है। किस्मत तो अपनी खराब है। बेटी की ज़िंदगी खराब कर दी और जमा पूंजी सब बही जा रही है। केस का भी कुछ आता पता नहीं। शर्मा जी का हृदय जैसे चीत्कार कर उठा।

मतलब? यह बेटी का स्वर था।

कुछ मतलब नहीं। तुम जाकर अपना काम करो, तुम्हारे मतलब की बात नहीं है।

पापा क्या क्या कह रहे हो आप? मैंने सब सुन लिया है। नहीं देने दूँगी किसी को इतना पैसा। पहले ही सब कुछ लुट गया है, अब और नहीं।

तो कैसे होगा निबटारा। देना पड़ता है वकीलों को।

वकील? ये वकील हैं ! ये तो गिद्ध हैं! आपके और मेरे आँसू देखकर लार टपकने लग जाती है इनकी। एक ने भी ठीक से काम किया है?

नहीं किया तो क्या करें? अबकी पिता झल्ला उठे।

बेटी की आँखों में आँसू आ गए। नहीं पापा आप परेशान मत हो। कोई रास्ता निकल आएगा। हम सरकारी वकील की अर्जी लगाएंगे।

पिता कुछ नहीं बोले।

अगले ही दिन सरकारी वकील की व्यवस्था हो गई। किस्मत से वकील एक महिला थी। शर्मा जी के चेहरे पर पहली बार सुकून झलका। बेटी ने भी चैन की सांस ली कि अब सब ठीक होगा, आखिर एक महिला महिला के दर्द को न समझे ऐसा होता है क्या?

शर्मा जी ने पूरे विश्वास के साथ महिला वकील को फ़ाइल पकड़ाते हुए कहा  – हो सके तो जल्दी निबटवा दीजिए, हमें कुछ नहीं चाहिए।

शर्मा जी की बात सुनकर महिला वकील जोर से हँसते हुए बोली- मोटी पार्टी हो। तभी कुछ नहीं चाहिए। सुनो प्राइवेट वकीलों को खूब खिला पिला चुके अब जरा मेरी भी सेवा कर दो। ज़्यादा नहीं ढाई लाख अकाउंट में जमा कर दो, नहीं तो फिर केस ऐसा लटकाऊँगी कि पानी मांगते भी नहीं बनेगा। शर्मा जी और उनकी बेटी निस्तब्ध एक दूसरे का चेहरा देखते रह गए...