सोमवार, 22 जनवरी 2024

रविवार, 14 जनवरी 2024

 आज जीवन के उस पड़ाव पर हूँ, जब विगत को विश्लेषक बुद्धि के साथ देख रही हूँ। क्या खोया, क्या पाया सब समझ पा रही हूँ। अपनी मूर्खताओं को भी समझ और देख पा रही हूँ। दुनिया को अब थोड़ा बेहतर समझ पा रही हूँ। और अब जब समझी हूँ, तो कष्ट होता है कि पहले क्यों नहीं समझी? समझ का विकास इतना धीमी गति से क्यों होता है? पर साधारणत: यही होता है।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि नीच और पापी बुद्धियों का विनाश हो। शुभ कर्म फलें-फूलें। सरलता का मार्ग प्रशस्त हो।