गुरुवार, 27 जनवरी 2011

आन्ना ------2

मेरी बात सुनकर आन्ना मुस्कुराई और बोली, छोड़ो न भाभी आखिर फ़र्क पड़ता है कि वो क्या सोचती हैं, मैं तो बस ये जानती हूँ कि मुझे क्या करना है. और वैसे भी वो जो कुछ कहती हैं, वो उनकी भाषा कहाँ है? ये तो उनके विचार हैं जिनकी वो दासियाँ हैं.
आन्ना की बात सुनकर मैंने आँखें तरेरकर कहा- अच्छा तो तेरा मतलब कि हम औरतों में कुछ दिमाग ही नहीं होता, हम सब एक नंबर की मूर्खा हैं न.
मेरी बात सुनकर आन्ना कुछ गंभीर होकर बोली- मैंने ऐसा कहाँ कहा है, आप जानती हो कि मेरा वो मतलब नहीं था, मगर आप ही देखिये कि हमारे समाज में लड़कियों को अपनी बात कहने की उतनी आज़ादी नहीं है जितनी होनी चाहिए, उनका धर्म तो बस अपने पति-परमेश्वर के चरण चिह्नों पर चलना नियत कर दिया जाता है. चाहे-अनचाहे वो क्या से क्या बन जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चल पाता. उनके सामने तो बस एक परंपरा होती है, जिस पर आँख कान बंद करके वो चलती जाती हैं,...फिर मुस्कुराते हुए मेरे गले में हाथ डालकर बोली- मगर मैं जानती हूँ कि मेरी प्यारी भाभी ऐसी नहीं हैं,
उसकी बात सुनकर मैंने भी उसी के अंदाज़ में कहा- हाँ ये बात तू ठीक कह रही है.
हम दोनों ही हँस पड़े और बात वहीं ख़त्म हो गई.
कोई कुछ भी कहता रहे पर मैं चाहकर भी उससे  दूरी नहीं बना सकती थी, इसका कारण यह नहीं था कि मुझे उसकी आदत पड़ चुकी थी, या फिर वह मेरी एकांत की साथी थी बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी स्पष्टवादिता, उसकी शांत मनस्कता मुझे प्रभावित करती थी, मुझे उसमें भीड़ से अलग एक नेत्री के दर्शन होते थे. मैं उसमें कहीं न कहीं अपने अहम्  को खोजती थी. उसकी आवाज़ में मुझे अपना वह स्वर सुनाई पड़ता था जिससे अब तक मैं खुद ही अपरिचित थी. जिसे शायद खुद मैंने ही ५००० वर्ष पुरानी मान्यताओं के गर्त में सुरक्षित मान लिया था. वही स्वर जैसे आन्ना की आँखों में चमकता था, उसकी हंसी खिलखिलाहट में गूंजता था और वही स्वर मेरे कानों में घुलकर शरीर मैं एक झुरझुरी सी पैदा कर देता था. उसका सान्निध्य जैसे मेरा आत्मसाक्षात्कार था. ख़ैर.
एक दिन आन्ना की बड़ी बहन शीला मेरे पास आई. शीला के विवाह को पांच वर्ष हो चुके थे, लेकिन इन पांच वर्षों में जितनी बार भी मैंने उसे देखा, थोड़ा और गंभीर और चुप सा पाया. उस दिन जब शीला मुझसे मिली तो हमेशा की तरह उसके चहरे पर एक अजीब सी उदासी थी, मुझे देखते ही बोली- नमस्ते भाभी, आन्ना अक्सर मुझे आपके बारे में बताती है. आपको बहुत मानती है वो.....  इसलिए मैं ......मैं उसकी बारे में आपसे कुछ बात करना चाहती थी.
मैंने उसे बैठने के लिए इशारा किया और कहा- हाँ आन्ना बहुत अच्छी लड़की है, रोज़ हमारी बातें होती हैं, बहुत तेज़ दिमाग है उस लड़की का, आपतो बस उसे  ऐसे ही पढने दो, फ़क्र होगा आपको भी उसपर.
मेरी बात सुनकर शीला थोड़ी परेशान होकर बोली- आप ये क्या कह रहीं हैं, आपको पता है की सब उसके बारे में क्या क्या बाते करते हैं, और आप कह रही हैं कि....
उसकी बात सुनकर मैंने  आश्चर्य  से कहा कि- वो आपकी बहन है, मुझसे ज़्यादा आप क़रीब हैं उसके. आपको क्या लगता है कि लोग उसके बारे में जो कुछ कहते हैं वो सही कहते हैं?
मेरी बात सुनकर शीला बोली- भाभी बात सही और ग़लत की नहीं है. बात जिंदगी की है, जिसे वो अबतक अपना मानकर यूं बर्बाद कर रही है.
बर्बाद!! मतलब वो पढ़ रही है तो जिंदगी बर्बाद कर रही है?
और नहीं तो क्या!! शीला लगभग चीख कर बोली. फिर यकायक हाथ जोड़कर बोली- आपकी बात वो सुनती है इसलिए कृपा  करके  उसे समझाइये.......
क्या समझाऊँ मैं उसे?
यही कि लड़की को जन्म से ही सयानेपन का बोझ झेलना पड़ता है. वो कोई लड़का नहीं है जो पढने के नाम पर दिन भर घर से बाहर रहे....ये सब उसे शोभा नहीं देते,  और फिर भैया और पिताजी को भी उसका घर से बाहर रहना पसंद नहीं है. आप....आप समझाइये उसे कि लड़की की जिंदगी...उसका दायरा घर के आँगन तक ही खटने के लिए है. कहकर उसने अपनी आँखों को एक बार अपनी साड़ी के फटे पल्लू से रगड़ा और कहा- कई बार जीने के लिए समझौते करने ही पड़ते हैं. हो सके तो उसे समझा दीजियेगा...चलती हूँ.
मैं कुछ कह पाती इस से पहले ही शीला जा चुकी थी. पर उसके अधूरे वाक्य मेरे कानों में चुभ रहे थे.मैंने सोचा कि आन्ना से अब इस मुद्दे पर गंभीर होकर बात करना अब ज़रूरी हो गया है.
उस दिन मैं बेसब्री से आन्ना का इंतज़ार करती रही. पर आन्ना जो मेरी एकांत की साथी थी. जो अपनी प्यारी बातों का पुलिंदा लेकर मेरे पास आती थी, वो नहीं आई, वो नहीं ही आई. दो दिन हो गए, तीन दिन और आज पूरे चार दिन हो गए थे......
मैं समझ गई कि आन्ना जिस व्यक्ति से प्रेम करती है, शायद उसी के साथ वो चली गई है.
उसदिन मुझे एहसास हुआ कि मेरी पड़ोसिने जो कहती थी वो सही ही कहती थीं. उस दिन पहली बार आन्ना के प्रति मैंने मन में गुस्से और नफरत का अनुभव किया. रह रह कर मुझे यह बात कचोटे जा रही थी कि आन्ना इतनी स्वार्थी  कैसे हो गई कि उसने इतना बड़ा क़दम उठा लिया. वो तो मुझे अपनी सब बात बताती थी, पर अपनी जिंदगी का इतना बड़ा फैसला लेने से पहले  उसने मुझसे मिलना ज़रूरी भी नहीं समझा, एक बात तक नहीं की उसने मुझसे...................
उस रात मैं बहुत रोई, पता नहीं क्यों. गुड्डू और गुड्डू के पापा तो आराम से सो रहे थे पर मैं? मेरी आँखों में नींद कहाँ थी? ऐसा लग रहा था जैसे मेरे अंदर से कुछ कट कट कर पिघल पिघल कर बहा जा था, अपनी इस स्थिति पर मैं खुद चकित थी.
जैसे तैसे सुबह हुई, कमला चाची दरवाज़े पर पर कड़ी आवाज़ लगा रही थीं.
मैंने जाकर पूंछा- क्या हुआ चाची क्यों सुबह सुबह चिल्ला रही हो?
चाची ने अपनी थोड़ी पर हाथ रखकर और भोंहे सिकोड़कर कहा- हैं! तुम्हें नहीं पता क्या हुआ? आन्ना का नहीं पता तुम्हें?
मैंने कहा- हाँ पता है. चली गई न वो. ठीक है, तुम क्यों परेशान होती हो? उसकी जिंदगी बनाए या बिगाड़े.
कमला चाची आश्चर्य से मेरी और टाक रहीं थी, बोली- लो और सुन लो, अरे जब जिंदगी ही ना रही तौ का बने बिगड़े?
चाची का यह वाक्य मेरे कानो में तीर सा चुभा, मैं अवाक थी, उधर चाची थीं कि लगातार बोलती ही जा रही थीं, बिगड़ी तो थी ही मुई, सादी नई करेगी, लड़कों संग घूमे फिरेगे, ये ई हसर तो होना था,
फिर मेरे नज़दीक आकर कान में फुसफुसाई - बाप और भाई ने मारा है मिल के, सुना की साम को पकोड़े में जहर मिला के खबाया बिचारी को, ओ जब मुए पिरान न निकले तो तकिया से सांस दबा दी. बड़ी कस्ट से मरी बिचारी, रात को ही किरिया करम भी कर आये, कि पुलिस को, पडोसिओं को खबर न लगे,
फिर अपना पल्लू सरका कर बोली- इन्होने सब देखा अपनी आंखन से, कह रहे थे कि बड़ी तड़प रही थी बिचारी....
अनायास ही मेरे मुंह से निकला- चाचा उसे मरते देखते रहे, कुछ नहीं किया......
मेरी बात सुनकर चाची मुझे डपटकर बोली- हट कैसी बात करती हो, उनके घर की बात...और मोहल्ले में रहना है तो बहुत कुछ देखना सुनना पड़ता है. ....हाँ पर जे तो है कि लड़की अच्छी थी....
चाची का यह वाक्य जैसे मुझे अंदर तक बेंध गया. मैंने तिरस्कार भरी नज़रों से उनकी ओर देखा. चाची से एक क्षण के लिए मेरी नज़रें मिली रहीं फिर उन्होंने अपनी नज़रें झुका लीं और बोलीं- अच्छा तो नहीं हुआ पर का किया जा सकता है, ....चलो हो आयें, घर में रोना धोना मचा है, माँ और बहन का तो सुना रो रो कर बुरा हाल है, चलो चलकर देख लेना.
चाची लगातार बोले जा रहीं थी, और उधर मैं.... मेरी ज़बान जम चुकी थी, आँखें सूख चुकी थीं. मेरे कानों मैं आन्ना के ये शब्द गूँज रहे थे कि, जहां विचारों की ही स्वतंत्रता न हो वहां कैसी सुरक्षा?
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आन्ना मेरी आँखों के सामने खड़ी मुझपर जोर जोर से हँस रही है और उसकी आँखों से अनवरत आंसू बह रहे हैं......