मंगलवार, 11 जून 2013

मैंने खुशबुओं को समेटा था अपने आँचल में 
सितारों को सजा लिया था अपनी उँगलियों में 
इस विश्वास से कि जब भी जिंदगी मुर्झाएगी 
उसे खिला दूँगी अपने आँचल में सिमटी खुश्बुयों से 
और 
हर गहराते अँधेरे को दूर कर दूँगी अपनी उँगलियों में मुस्कुराते सितारों से 
पर नहीं जानती थी कि अँधेरा यूं घिरेगा यूं अचानक से 
कि मैं हैरान रह जाऊं
मगर---- खैर----- 
आज जबकि मैं जान चुकी हूँ कि 
अंधेरों में जिंदगी तड़प रही है
गहराते काले बादलों के बीच रौशनी सिमट रही है
मेरे खुश्बुयों में भीगे मासूम सितारे निकल पड़े हैं मौत और अंधेरों से दो दो हाथ करने …
मुझे अपनी रौशनी का विश्वास देकर
मैं जानती हूँ वो लौटेंगे
मगर उनके लौटने तक अँधेरा सहा नहीं जाता