शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

स्कूल जाता बच्चा





 रंगबिरंगी किताबों,

मन-पसंद चिप्स, चॉकलेट और लंच

से भरा बस्ता पीठ पर और

गले में फेवरिट पानी की बोतल टाँगे

स्कूल जाता नया नवेला बच्चा

लगता है  

आँखों में ढेरों आँसू लिये

ससुराल जाती बेटी सा

जिसके आँसू पोंछती माँ 

पढ़ाती है उसे नई ज़िंदगी का पाठ 

देती है सास ससुर की इज़्ज़त और सेवा करने का ज्ञान 

ठीक वैसे ही दिया जाता है बच्चे को

 'मिस' का फेवरिट बन क्लास मॉनिटर बनने का ज्ञान,

 ठीक से पढ़ने-लिखने और अच्छा बच्चा बनने की सीख

पर कहाँ समझ आती हैं मासूम मन को ये बातें

उसे तो सुहाता है बस अपना घर-आँगन और शरारतें

वो कहता रह जाता है मुझे नहीं जाना

या फिर आज नहीं जाना

पर पिता अनसुना करते सब कुछ

 'देर हो रही है' कहते हुए

उठा लेते हैं वापस पटका हुआ बैग

बिलखता बच्चा नहीं जानता इस निष्ठुर रीत को

इसलिए पिता की मुट्ठी से हाथ छुटा 

फिर दौड़ आता है माँ के आँचल में

और गा उठता है गाना-

नहीं जाना है मुझे स्कूल, अब नहीं होगी कोई शैतानी

पर पिता यूँ ही नहीं पाते कठोर हृदय होने का तमगा 

उन्हें जबरन खींचना पड़ता है बच्चे को

सीने से लगा अपने दोनों हाथों को बेड़ी बनाना पड़ता है बच्चे के लिये

और फिर कर आते हैं विदा उसे 'उसकी ससुराल'

ट्यूबलाइट सी लपलपाती नाक को सुड़कता 

 बच्चा धीरे धीरे आखिर समझ ही जाता है

कि अब नहीं आएंगे दादा-दादी बचाने

न ही बुआ ही समझेंगी उसकी बात

रोना भी अब काम आने वाला नहीं 

इसलिए अब जाना ही होगा स्कूल

क्योंकि 

अब वह हो गया है बड़ा 

और उसे भी नहीं बनना है 

कबाड़ीवाला..

 





रविवार, 17 जुलाई 2022

स्नेह सरोवर

 


आज सुबह से ही दादाजी न जाने किस काम में लगे हैं! न तो मुझे गोद में लिया न ही मुझे प्यार किया ... सोचता हुआ 3 साल का रग्घू अपने दादा जी के सामने जाकर खड़ा हो गया। 

दादाजी लैपटॉप पर काम कर रहे थे। इसलिए अपने पोते को सामने खड़ा देख बोले- बेटा अभी जाओ, अभी मैं काम कर रहा हूँ और फिर काम पर लग गए। बच्चा इस व्यवहार के लिये तैयार नहीं था अत: कभी वह अपने दादाजी की ओर देखता तो कभी लैपटॉप की ओर। अचानक उसे न जाने क्या सूझा कि उसने एक हाथ मारकर लैपटॉप बंद कर दिया। दादाजी ज़ोर से चिल्लाए.... ये क्या किया???

दादाजी को गुस्सा होते देख बच्चा डर के मारे कमरे से बाहर भाग गया। इधर दादाजी गुस्से में तमतमाए हुए थे कि अब क्या करें..पर शुक्र है कुछ खराब हुआ नहीं था.

दादाजी सोच रहे थे कि नाहक ही पोते को डांट दिया, तभी उनका ध्यान कमरे की दीवार के पीछे छिपे अपने पोते की तरफ़ गया जो उन्हें टकटकी लगा कर देख रहा था और तोतली ज़बान में बहुत धीमे-धीमे उन्हीं का सिखाया गाना गा रहा था-

जी तलता है इछ मिट्टी छे तेले जैछा मैं दला बनाऊँ, मीता चनाब ता पानी उतमें बल लाऊँ, तेली प्यात बुजाऊँ.. 

इतना सुनना था कि दादाजी की आँखों में आँसू छलछला आए। उन्होंने झपटकर बच्चे को गोद में उठा सीने से लगा लिया और सुबक पड़े।

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

सफ़र

 बहन जी आप बैठिए सामान मैं रख देता हूँ। कहते हुए ड्राइवर ने किताबों का भारी बस्ता उठाकर गाड़ी में रख दिया। श्यामा ने एक नज़र उस आदमी पर डाली जिसे कल ही ड्राइवर रखा था। करीब 5 फुट 2 इन्च का वह आदमी कुछ अधिक ही फुर्ती से काम कर रहा था। उसके चेहरे पर अतिरिक्त सजगता थी, जिसका प्रयोग वह बाज़ू के पास से फटी शर्ट और थकान छुपाने के लिये कर रहा था। यही वह व्यक्ति था जिसे 18 हज़ार के वेतन पर रखा गया था। 

18 हज़ार! आपको नहीं लगता कि जिस हिसाब का काम है, पैसे ज़्यादा है? पिता से यही तो कहा था उसने। पर पिता का सोचना कुछ और ही था- तुम्हें इस सब से क्या मतलब? कितना देना है, कितना नहीं यह मेरी सिरदर्दी है, तुम्हारी नहीं। ऐसा मेहनती, ज़िम्मेदार और भरोसेमंद आदमी मेरी नज़र में तो दूसरा नहीं।

श्यामा चुप हो गई थी। उसे याद हो आया था कि सिर्फ पापा के कहने भर पे ये आदमी अपने दस काम छोड़कर खड़ा हो जाता है। बीवी-बच्चों का खर्च कुछ रुपयों में चला लेता है, पर आज तक किसी से एक रुपया तक नहीं माँगा। एक बार डेढ़ हज़ार रुपये माँगे थे पापा से, वो भी किस लिये? घर के राशन के लिये... वो भी अगले महिने ही वापिस कर दिये थे। चाहता तो न भी देता पापा कौन से माँग रहे थे उससे। पर दे गया था और ज़बर्दस्ती करके दे गया था।

सुना है आजकल जहाँ ड्राईवर है, मालिक बड़ा सख्त है किसी भी समय बुला लेता है। ऐसे में भी समय निकाल 4 घन्टे की ड्यूटी के लिये उपस्थित! कोई दिक्कत नहीं सर जी। कटेगा तो सोने का समय ही। फिर सो लेंगे? यही तो कहा था उसने जब पापा ने कहा था कि भाई इतने व्यस्त हो तो रहने दो।

ये आदमी है या मशीन! आखिर कौन सी वो चीज़ है जो इंसान को मशीन बना देती है? लगभग 35-36 वर्ष की उम्र और खुद के लिये कुछ नहीं एक अदद साबुत शर्ट तक नहीं!

बहन जी अभी आपने देखा न कि मैंने गाड़ी कैसे स्टार्ट की? क्लच दबा के गाड़ी स्टार्ट करनी है और फिर फ़र्स्ट गियर और.... श्यामा का ध्यान टूटा उसने हाँ में सिर हिला दिया। ड्राईवर इस बात से बेखबर कि बाजू के पास से फटी शर्ट साफ़ दिख रही है बोले जा रहा था-

बहन जी देखो तेज नहीं चलाना। धीरे ही प्रैक्टिस कीजिए आप 15 दिन में सीख जाओगी। फिर आपको किसी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। फर्राटे से गाड़ी चलाओगी..

उधर स्टीयरिंग हाथ में थामे श्यामा सोच रही थी- पापा से कहूँगी अपनी कुछ शर्ट इसे दे दो और आप कुछ नया खरीद लो 18 हज़ार वाकई कम हैं....


बुधवार, 6 जुलाई 2022

प्रसंग

 




मैं कब से चिल्ला रहा हूँ तूने सुनी नहीं मेरी आवाज़?

पापा मैंने अगर सुनी होती तो जवाब न देती क्या?

पूरे मोहल्ले ने सुनी पर तूने नहीं सुनी! तमतमाए चेहरे के साथ पिता चीखे जा रहे थे।

मैं छत पर थी, आप मम्मी से पूछ लो नहीं आई आपकी आवाज़ यहाँ तक...

हाँ-हाँ, नहीं आई..मैं ही झूठ बोल रहा हूँ या दिमाग खराब हो गया है मेरा....

मम्मी देखो पापा बिना बात के चिल्लाए जा रहे हैं, आप बोलो न कुछ। बेटी ने रुआंसी होकर कहा।

माँ कुछ बोल पाती इससे पहले ही पिता चिल्लाए- कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं है। सब पता है मुझे....

यह सुनना था कि बेटी ने भी लगभग चींखते हुए कहा- हाँ जानकर अनसुना किया मैंने। ओके? अब कभी मुझसे बात मत करना कहते हुए बेटी पाँव पटककर नीचे चली गई।

इस व्यवहार से पिता और भी आगबबूला हो गए और पत्नी से बोले- देखा? कितनी बदतमीज़ है! सब तुम्हारी गलती है। अबकी पत्नी बोली- तुम भी हद कर देते हो। मुझे तक तो सुनाई नहीं दी कोई आवाज़... और मेरे बस का नहीं है तुम बाप- बेटी के बीच पड़ना...कुछ तुम्हें भी सोचना चाहिये ...आखिर....कहते हुए पत्नी भी नीचे आ गई। 

रामनाथ बहुत देर तक अकेले चिंतन-मनन करते रहे। पिता और पति के क़िरदारों में झूलते रहे फिर चुपचाप कमरे में जाकर लेट गए। न टीवी देखा गया न कोई बात हुई। सभी चुप थे। अचानक आए तूफ़ान के बाद शान्ति सभी को खल रही थी जिसका असर सुबह तक बना ही रहा।

शाम को रामनाथ ऑफ़िस से लौटे तो सोफे पर निढाल हो गए। कल की घटना से मूड खराब था कि नाहक ही बेटी पर चिल्ला पड़े। तभी नज़र टेबिल पर रखी किताब पर पड़ी। ये कौन लाया? किताब को हाथ में उठाते हुए रामनाथ चौंककर बोले। 

कहीं से कोई जवाब न पा बेटी की ओर देखकर बोले- तू लाई है क्या?

बेटी के चेहरे पर उदासी और गुस्सा साफ़ झलक रहा था। अत: हाँ में सिर हिलाकर उसने दूसरी तरफ़ मुँह फेर लिया। 

रामनाथ का ध्यान पूरी तरह से किताब पर था उनका चेहरा खिल गया था। स्मृतियाँ कुरेदते वे बोले जा रहे थे-

ये किताब मुझे बहुत प्रिय है। तुलसीदास का जीवन कैसा कष्टमय रहा और अमृतलाल नागर ने क्या लिखा है, वाह! तुलसी के राम को समझने के लिये इस पुस्तक को भी पढ़ना ज़रूरी है। बेटी की ओर से कोई प्रतिक्रिया न पा पत्नी को आवाज़ लगा रामनाथ बोले- अरे कहाँ हो?

आ रही हूँ, कहकर पत्नी बगल में आकर बैठ गई। बेटी निर्लिप्त भाव से फोन में मगन। 

देखो- ये प्रसंग, जब अपनी पत्नी के अंतिम समय तुलसीदास जी अचानक आ पहुँचते हैं.... रामनाथ मगन भाव से प्रसंग पढ़े जा रहे थे कि अचानक भावावेग से होंठ फड़क उठे, गला रुंध गया और रामनाथ सुबक-सुबककर रोने लगे.....

पत्नी हैरान! कुछ कह पाती इससे पहले ही एक और घटना घटी- अब तक मुँह फुला के बैठी बेटी अपने पिता को सुबकते देख छोटे बच्चे की भाँति रो पड़ी थी.. उसका गुस्सा न जाने कहाँ काफ़ूर हो गया था। अपनी आंखों में ढेरों आँसू भरे वह कह रही थी- पापा क्या हो गया आप रो क्यों रहे हो...उधर रामनाथ से कुछ कहते न बना। न जाने कौन सी भावनाओं का ज्वार था जो अचानक फूट पड़ा था।

विस्मय विमुग्ध माँ आँखों में आँसू और होंठों पर मुस्कुराहट लिये सोच रही थी कि अद्भुत है पिता-पुत्री का संबंध भी...



 

रविवार, 3 जुलाई 2022

समय


समय कागज़ पर लिखा शब्द नहीं है

गर ऐसा होता

तो उसे मिटाकर

अपने मन माफिक अंदाज में लिख दिया जाता

सँवारकर, सजाकर

और रख लिया जाता उसे तिजोरी में संभालकर

पर समय तो

टुकड़ा है ज़िंदगी का

वो ज़िंदगी जिसमें

मन की न जाने कितनी स्याहियों से लिखी गई हैं

सतरंगी, बदरंगी, अधूरी, पूरी, चुप्प, बोलतीं, शोर मचातीं

अनगिनत कहानियाँ, कविताएँ और उपन्यास

एक अदृश्य चाबुक भी तो है समय

जिसके निशान साँस दर साँस गहराते जाते हैं

देह और आत्मा पर

जो नहीं मिट सकते किसी भी मरहम या दवा से

समय तो है लहराता विशाल, अथाह समुंदर भी

जिसमें

डूबती उतरातीं हैं प्रश्नाकुल ब्रह्मांडीय स्मृतियाँ

और बेचैन शोर मचाती हैं दृष्टिहीन साँसों की लहरें

छूटते जाते क्षणों को रेत सी बिखरती तसल्ली से थामें

 इस नाटकीयता के साथ समय है चश्मदीद भी

जो हाज़िर नाज़िर है

असंख्य दुनियाओं के मिलने टूटने बिखरने और फिर बनने का

समय है एक अदृश्य नदी भी

जिसके प्रवाह में

बहते जा रहे हैं जन्म

चाहे अनचाहे छिनता और मिलता जा रहा है बहुत कुछ

तो कहाँ संभव है समय के एक भी अंश को विस्मृति के अथाह में उंडेलना

या नज़रअंदाज़ करके खुद को मूर्ख बनाना

जबकि यह तय है कि वह लौटकर तो नहीं आने वाला

पर उसकी छाप ताउम्र रहने वाली है