बुधवार, 5 अक्तूबर 2022

रावण का प्रत्युत्तर


 हे महामना हे महादेवि 

हे तेज रूप हे स्वयं सृष्टि

सादर प्रणाम हे मातृ शक्ति

हूँ विनत भाव प्रस्तुत समक्ष 

कहने को अन्तर्भाव सहज

भव बन्ध मुक्त निर्बंध स्वत:

दैहिक पाशों से विनिर्मुक्त 

इन्द्रियातीत अब मनस्त्तत्व 

पंच  प्राण सप्त चक्र मुक्त

मैं द्रष्टा ही अब मात्र सही

मात: प्रस्तुत हूँ आज यहीं

सम्भाषित तव आक्षेप सभी

 समुचित ही हैं आरोप सभी

हूँ योग्य यथा स्वीकार सभी

है वाद नहीं प्रतिवाद नहीं 

मेरा कोई संवाद नहीं 

मैं रहा दशानन दशकन्धर

पर यह अंतिम इतिहास नहीं 

गत कर्मों का परिणाम सुफल 

पाया जीवन महर्षि महकुल

महनीय वंश नित पूज्य प्राण

सौभाग्य सुयश नित भाव प्राण 

पाया मैँने यह महा ज्ञान

सन्सृतियोँ की रक्षा करना 

है भूपति निज परमो धर्म:

मात: यह संस्कार वही

स्वर्णिम लंका का प्राण वही

पाया ऋषिकुल से महत ज्ञान

मातुल कुल रण कौशल महान

संश्लेषण तमस और सत का

था सहज प्रस्फ़ुटित अहं प्राण

 रक्षित आत्मज सम मम पुरी 

पर हल हल हल कंपायमान 

काँपा समग्र ब्रह्माण्ड 

था आत्म तत्व अनुपम गति युत 

क्षीरोदधि सम वह हरि धाम प्रयुत 

जिनका नित करते ध्यान ध्यान

 रामेश्वराय 

नतमस्तक हूँ प्रभु रामेश्वराय।।

मम आत्म तत्व सौभाग्य सुफल

ईशानईशस्य वात्सल्य सहज,

पाया नत हो आशीष स्वयं

यह नहीं फलित उपक्रम कोई

प्रत्युत प्रभु आदेश स्वयं

मम जिह्वा निसृत   -

हम काहू के मरहिं न मारे

बानर मनुज जाति दुई बारे

मानो हरि मानस भक्ति सहज

जन्मी ऋषिकुल हो दशकंधर

अनुकूलित प्रेरित जो शिव सह।

वह भक्ति सहज हो मूर्तिमान 

जन्मी रावण बन महाप्राण।

मात: यह भक्ति प्रभाव सहज

प्रेरित करती वैकुंठ धाम

निज कर्म विकर्म, अकर्म सभी 

इंगित करते मम महा प्रयाण

मात: हूँ नत मस्तक

 स्त्री तेज समक्ष

है मान महा सम्मान अपर

वारित उस पर सौभाग्य सकल

फिर हो कन्या, सहोदरी, पत्नी अथवा

तेज: प्रतिमूर्ति पृथ्वी तनया

सब एक रूप सब एक प्राण

इनके हित प्राण्त्याग प्रभो

गौरव गौरव गौरव गौरव

शूर्पणखा अपमान 

निश्चित था इंगित ममावसान 

ज्ञातव्य मुझे प्रभु आवाहन

था तत प्रत्युत्तर जानकी हरण

 मायापति विरचित यह विधान

सृष्टि समक्ष दृष्टांत

स्त्री मर्यादा सर्वोपरि

अपमान यहाँ है सर्वनाश 

था यह निश्चित पूर्वानुमान

अन्तस में व्यापित राम राम

नि:सृत मृत्यु वेला निकट

कहाँ रामु रन हतौं पचारी 

मात:

मैं पात्र मात्र प्रभु माया का

शिव भाषित त्वम ज्यों

उमा दारु जोषित की नाईं

सबहिं नचावत रामु गुसाईं

स्वीकार करें मम नमस्कार

सादर प्रणाम

इति प्रत्युत्तर।।