सोमवार, 8 अगस्त 2022

 मुझे राग है

उस विश्वास से जो

 बरसता है।

बारिश जैसा

सूखी मरुभूमि को

रस देता है।

हरियाता है

तप्त मनोभूमि को

सुधा रस से।

वो विश्वास

पनपा नहीं है यूँ

उम्र लगी है।

 उसे बोने में

बंजर ज़मीन के

हर पोर में।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

सोन चिरैया

 वो चीं-चीं करती

बहुत शोर मचाती थी

 फुदकती फुदकती

पूरे आँगन का चक्कर लगा आती थी

दूध भात का दाना खाकर

चुपके से मेरे खास उगाए 

 इमली और बेरी के पत्ते भी चबा आती थी

और डाँट के डर से

छुप जाती थी गुलाब के फूलों में 

आम के कोटर में 

या फिर

मेरे पलंग के नीचे

वो नहीं आती थी बाहर 

कोई कितना भी बुलाए 

पर जब उसे बुलाते थे कहकर सोन चिरैया

न जाने किस कोने से

प्रकट हो जाती थी वो चीं-चीं करती

खुले आकाश की ओर गोल गोल आँखें लगाए 

चोंच में तिनका दबाए 

अक्सर पंख फैलाए फुदक पड़ती थी वो 

एक दिन न जाने कहाँ खो गई...

सूने आकाश और आँगन में 

अब नहीं दिखती सोन चिरैया..

















बुधवार, 3 अगस्त 2022

कुछ हाइकू


गुलाबी आस

अब तुम हो पास

कुछ खास है।

कुछ अनाम

नि:शब्द, अबोध सा

एहसास है। 

नत नयन 

मस्तिष्क है मौन

हिय भ्रांत है।

भावमय है

गहराता सा मन

जड़ प्राण हैं।

क्या है यह

प्रेम या प्रेम सा ही

या छलावा है।

चल पड़ी हूँ 

खोज में अज्ञात की

दुर्गम मार्ग है।





मंगलवार, 2 अगस्त 2022

लैंगिक अनुकूलन की प्रक्रिया व्यक्तित्व निर्मिति और समाज

 


जेंडर या लैंगिकता एक समाजशास्त्रीय विषय है जिसका अर्थ है स्त्री और पुरुष की सामाजिक और सांस्कृतिक परिभाषा। दूसरे शब्दों में कहें तो समाज स्त्री और पुरुष को किस तरह देखता है, उन्हें कैसी भूमिकाएँ, संसाधन एवं अधिकार देता है, इसका निर्धारण जेंडर का विषय है। यानी समाज की दो प्रमुख इकाइयों की व्यक्तित्व निर्मिति से इसका गहरा संबंध है और यह संबंध और इसका प्रभाव इतना गहरा है कि न केवल इन दोनों इकाइयों का व्यवहार, उनकी सोच-समझ, उनके दायित्व और कार्यक्षेत्र इस संरचना से प्रभावित होते हैं, बल्कि समाज की अन्य इकाइयों की स्थिति एवं उनके प्रति व्यवहार भी इससे प्रभावित होता है। स्त्री पुरुष और हाशिये की इकाइयों के प्रति नियमबद्ध व्यवहार की यही सुनियोजित प्रक्रिया क्रमशः रूढ़ होते-होते वृहत मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का अंग बनकर समाज विशेष की संस्कृति का हिस्सा बन जाती है। यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म और विरल होती है कि इसके अस्वीकार का प्रायः प्रश्न ही नहीं उठता। स्त्री और पुरुष स्वाभाविक रूप से इनका पालन करते हैं और समाज में रहने वाली अन्य इकाइयाँ स्वतः ही स्वयं को हाशिये पर पड़ा हुआ स्वीकार कर लेती हैं ।

चूँकि यह प्रक्रिया समाज के अनुसार होती है, समाज सापेक्ष होती है, अतः यदि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों को छोड़ दिया जाए तो विभिन्न समाजों और अंतर्समाजों द्वारा गढ़े इन लैंगिक साँचों में कुछ अंतर हो सकता है।

जेंडर के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए सुप्रसिद्ध विचारक पेपनेक का मत है कि-

सामाजिक जेंडर स्त्री और पुरुषों से संबंधित है, जो स्त्री और पुरुष की भूमिकाओं को सांस्कृतिक आधार पर परिभाषित करने का प्रयास करता है एवं जिसका संबंध स्त्री और पुरुष के विशेषाधिकारों से है।

पेपनेक यहाँ सामाजिक व्यवस्थापन की दृष्टि से स्त्री और पुरुष के विभक्त कार्यक्षेत्रों की ओर संकेत कर रहे हैं। इसी प्रकार ऐन ऑकली भी जेंडर को जैविक और शारीरिक स्थिति से अलग एक समाजशास्त्रीय संरचना मानते हैं। उनके अनुसार भी-

जेंडर का अर्थ स्त्रीत्व और पुरुषत्व के रूप में सामाजिक रूप से किये गए विभाजन से है।

यहाँ यह स्पष्ट है कि लैंगिकता एक ऐसा सामाजिक समीकरण है जिसे समाज द्वारा निर्मित किया गया है। इस निर्मिति के अंतर्गत पुरुष और स्त्री को क्रमशः प्रमुख और गौण के रूप में स्वीकार किया गया, जिसका आधार था जैविक विश्लेषण। यह माना गया कि स्त्री पुरुष की अपेक्षा कम बलवान होने के साथ साथ भावनात्मक अधिक और तार्किक कम है, अतः शक्ति और तर्क से मुक्त कार्य ही स्त्री के लिए उपयुक्त हैं। इन दोनों क्षेत्रों के लिए पुरुष ही उपयुक्त है। अतः गृहस्थी संभालना स्त्री का दायित्व और गृहस्थी का संरक्षण पुरुष का कार्यक्षेत्र माना गया। इसी विचार का असर था कि स्त्रियों के लिए शिक्षा, अवसरों तथा अन्य सुविधाओं को जरूरी नहीं माना गया। जबकि पुरुष के लिए इनका महत्व बना रहा।

असल में 19 वीं सदी के आखिर में और 20 वीं सदी के आरंभ में समाजशास्त्रियों के एक वर्ग ने यह मान लिया था कि बौद्धिक, भावनात्मक और नैतिक क्षमताओं की दृष्टि से पुरुष और स्त्री में पर्याप्त असमानता है। ब्रिटिश समाजशास्त्री हर्बर्ट स्पेन्सर ने एक उदार नारीवादी के रूप में कार्य करते हुए महिलाओं के अधिकारों की ओर ध्यान दिया किन्तु उन्हीं का यह भी मत था कि-

न्याय और तर्क क्षमता महिलाओं में कम होती है अतः उन्हें अपने परिवार की देखभाल में अपनी क्षमता का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को स्वाभाविक रूप से शक्तिशाली पुरुष की सुरक्षा में रहना पसंद है। इसी प्रकार कॉम्टे के अनुसार भी महिलाएँ अपनी भावनात्मक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता की वजह से परिवार और घरेलू जीवन के लिए ही उपयुक्त हैं।

दुरखीम स्त्रियों की सामाजिक अधीनता को बताने के लिए जैविक कारकों की बात करते हैं। उन्होंने भी यही माना कि स्त्री और पुरुष का उनकी क्षमता के अनुसार कार्यविभाजन होना चाहिए।

बात अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की हो तो आरंभिक मनोविज्ञान की धारणाएं भी इससे अलग नहीं थीं। यहाँ स्त्री पुरुष के जैविक अंतर के आधार पर मनोविज्ञानिक स्थापनाएं की गईं जिनके अनुसार भी स्त्री को पुरुष की तुलना में कम ही आँका गया। इन्हीं सब के प्रभाव से इन धारणाओं को बल मिलता गया कि स्त्री के कार्यक्षेत्र में प्रायः वे कार्य आने चाहिए जिनमें शक्ति और क्षमता की कम आवश्यकता हो। इस प्रकार स्त्री को गृहस्थ जीवन और पारिवारिक दायित्वों के ही अनुकूल माने जाने की धारणा पुख्ता होती गई।

हालांकि ये धारणाएं पितृसत्तात्मक समाजों की शुरुआती अवस्था में ही बननी शुरू हो गईं थीं, जिनका असर आगे तक बना रहा। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि अंतर और कमतर माने जाने की यह स्थिति समाज सापेक्ष थी। उदाहरण के लिए आरंभिक भारतीय समाज व्यवस्था या ऋग्वैदिक युग में ऐसी स्थिति नहीं थीं किन्तु कालांतर में विभिन्न घटनाक्रमों के चलते स्थितियाँ बदलती चली गईं।

कहने का तात्पर्य यह कि शक्ति को बाह्य आक्रमणों से क्रमशः समाज, देश और राष्ट्र संरक्षण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण घटक माना गया। जिसका परिणाम था उन्हीं स्थितियों के अनुरूप स्त्री और पुरुष का अनुकूलन।

हालांकि शुरुआती समाजों में यह जरूरी रहा होगा जबकि समाज का अस्तित्व शारीरिक बल पर ही आधारित था। किन्तु लोकतान्त्रिक समाजों के उदय के साथ इन मान्यताओं में परिवर्तन भी देखने को मिला। किन्तु सुदूर अतीत से लिखित इतिहास तक रूढ़ि बन चुके सिद्धांतों को बदल पाना कोई कोई सहज बात नहीं है। तब जबकि संस्कृति के प्रत्येक पाठ में सोच विचार, व्यवहार, नैतिकता के मानदंडों, पहनने ओढ़ने, उठने बैठने से लेकर मौखिक अमौखिक भाषिक अभिव्यक्तियों में भी लैंगिक अनुकूलन के आधार पर भेदभाव पाँव पसार चुका हो।

लैंगिक अनुकूलन

अनुकूलन की यह प्रक्रिया सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप पुरुष और स्त्री को साँचाबद्ध करने की प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुष द्वारा पुरुषत्व और स्त्री द्वारा स्त्रीत्व की सामाजिक, सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर सहज स्वीकार्यता अनुकूलन है। नारीवादी मानव विज्ञानी सिमोन द बॉउवार ने अपने पुस्तक सेकंड सेक्स में कहा है कि- स्त्री जन्म नहीं लेती बल्कि गढ़ी जाती है। सिमोन का यह कहना पूर्णतः यह स्पष्ट कर देता है कि यह शिशु पालन की ऐसी प्रथा है जिसमें एक स्त्री को निरंतर यह याद दिलाया जाता है कि उसे पहनना, ओढ़ना, खाना, गाना, हँसना, बोलना और सारे कार्य उसी प्रकार से करना चाहिए जैसा कि समाज उससे चाहता है। ठीक यही प्रक्रिया पुरुष के साथ भी है। भावनाओं पर नियंत्रण, निर्भीकता, निडरता, शक्तिशाली होना पुरुषत्व के लक्षण के रूप में स्थापित किये जाते हैं। जिनकी प्राप्ति बालक के श्रेय के रूप में प्रस्तुत की जाती है। इस प्रकार के भिन्न व्यवहारों की शिक्षा बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। जिसका परिणाम यह होता है कि लगभग पाँच वर्ष की आयु तक पहुंचते पहुँचते बच्चा अपने सामाजिक साँचे के प्रति एक समझ और सजगता हासिल कर लेता है। उसे पता होता है कि वह एक पुरुष के रूप में बड़ा हो रहा है या वह एक कन्या है।

बच्चे को गढ़ने की इस प्रक्रिया में इतनी सहजता होती है कि किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। माँ का व्यवहार उनका व्यक्तित्व, पिता का व्यवहार और उनका व्यक्तित्व बच्चे के लिए प्रथम सीख होता है। जो धीरे धीरे आस पास के वातावरण और व्यवहार से और पुष्ट होता रहता है। इसमें योगदान धर्म शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं का भी होता है। जिनमें लैंगिक अनुकूलन से निर्मित साँचों के अनुरूप ही वृत्तान्त होते हैं। जिनका निषेध या जिन पर प्रश्नचिह्न कोई साधारण बात नहीं होती। बल्कि प्रायः उनका प्रयोग या उनकी व्याख्या लैंगिक अनुकूलन को पुष्ट करने और सामाजिक साँचों को मज़बूत करने के लिए की जाती है। जैसे तत्कालीन स्थितियों के अनुरूप मनुस्मृति में स्त्री के विषय में कहा गया है –

स्त्रियों का विवाह संस्कार ही वैदिक संस्कार, यज्ञोपवीत, पति सेवा ही गुरुकुल निवास, वेदयाध्ययन और गृहकार्य ही अग्निहोत्र कर्म हैं।

तो कुरान मजीद में तो स्त्रियों को पुरुषों की जागीर ही घोषित कर दिया गया है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-

मुसलमानो, तुम्हारी औरतों में जो बदकारी कर बैठें, उन पर अपने लोगों में चार आदमियों की गवाही लो। अगर वे उनकी बदकारी की गवाही दें, तो इन औरतों को घरों में बंद रखो, यहाँ तक कि मौत उनका काम तमाम कर दे। या खुदा उनके लिए कोई और रास्ता पैदा करे। 

  कुल मिलाकर कहें तो समाज, संस्कृति, धर्म और परिवेश मिलकर बच्चे के उस संस्कार का निर्माण करते हैं जिसमें उसकी सहज स्वीकृति होती है। यहीं शक्ति और सत्ता के सभी व्यवहार, विकसित होती भाषिक समझ के साथ बच्चे के संस्कार का हिस्सा बन जाते हैं। परिणामतः प्रायः वह उसी रूप में विकसित होता है जैसा कि समाज उसे विकसित होते देखना चाहता है।

कैथरीन ए मैकिनोन अनुकूलन की इस सुनियोजित प्रक्रिया के विषय में कहतीं हैं कि – यह अनुकूलन जिस प्रक्रिया द्वारा होता है, वह सामाजीकरण वास्तव में शक्ति की ही अभिव्यक्ति है।

अनुकूलन की इस प्रक्रिया में पुरुष और स्त्री स्वतः ही शासक और शासित के रूप में सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर अपने व्यक्तित्व का तर्क भी तय कर लेते हैं। यही कारण है कि पुरुष और स्त्री के साँचों को प्रायः कोई चुनौती नहीं मिलती और ये न केवल उसी रूप में बने रहते हैं बल्कि उनके साथ कई सामयिक तर्क भी शामिल होते रहते हैं। इस संबंध में जॉन स्टुअर्ट मिल ने पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में स्त्री की स्थिति पर विश्लेषण करते हुए अपनी पुस्तक द सबजेक्शन और वूमेन में कहा है-

स्त्रियों पर पुरुषों का शासन अन्य सत्ताओं से इसलिए अलग है क्योंकि यह बल का नियम नहीं बल्कि इसे स्वेच्छा से स्वीकार किया जाता है।

कुल मिलाकर कहें तो इसी अनुकूलन के आधार पर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। सामाजिक साँचा जितना मजबूत होगा सामाजिक संरचना में टूट फूट उतनी ही कम होगी। किन्तु यह टूट फूट न होना या समाज का जस का तस बने रहना कोई सकारात्मक स्थिति नहीं है। फिर सांस्कृतिक आदान प्रदान, इतिहास का पुनर्स्मरण और पुनर्जागरण, समतावादी स्थितियाँ न केवल समाज का रूप परिवर्तन करती हैं बल्कि सामाजिक इकाइयों को भी नए परिप्रेक्ष्य में पुनरव्यक्त होने के लिए एक माहौल प्रस्तुत करती हैं।

वर्तमान स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि समाज की रूढ़ियाँ टूटी हैं। शक्ति के जो समीकरण पहले थे वो अब नहीं हैं। चाहे व्यवसाय की बात हो या स्त्री पुरुषों के अलग अलग दायित्वों की हर ओर परिवर्तन आया है। तर्क और शक्तितंत्र पर आधारित अवधारणाएं अब वैसी नहीं हैं जैसी पहले थीं। इनका स्वरूप अब पुरुष के साथ साथ स्त्रियों के लिए भी अनुकूल हुआ है। जिसका प्रमाण है स्त्री और पुरुष की बराबर भागीदारी। अब कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलातीं, निरंतर आगे बढ़ती स्त्रियाँ न हों। स्त्रियों और पुरुषों के लिए शिक्षा और व्यवसाय के समान अवसरों ने पुरानी चली आती उन सभी मान्यताओं को ध्वस्त किया है, जिनके अनुसार यह माना जाता था कि स्त्रियाँ केवल घर संभालने के ही योग्य हैं।

इसके साथ ही कानून और अधिकारों की समझ ने स्त्रियों को भी अपने आत्मसम्मान के लिए सजग होना सिखाया है। राजनीति, प्रशासन, अर्थशास्त्र, शिक्षा और सेना में महिलाओं की भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया है कि योग्यता और ज्ञान किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं है। अवसरों की सुलभता किसी को भी सफल बना सकती है। हालांकि अभी भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां काम किया जाना जरूरी है। क्योंकि समाज जितना अपनी इकाइयों के प्रति अनुकूल होगा, उसका विकास भी उसी तीव्रता से होगा।