मंगलवार, 2 जुलाई 2013

गढ़ी गईं औरतें

सिन्दूर से रंगी पुती औरतें 
रंगे लाल होंठो से मुस्कुराती औरतें 
माथे पर चाँद सितारों में जगमगाती औरतें 
पायल की छम छम में गुनगनाती औरतें 
कितने विश्वास से बना देती हैं खुद को किसी और की जागीर 
और बदल देती हैं अपनी दुनिया ख़ुशी ख़ुशी 
इस एहसास से कि समर्पण ही एक औरत की जिंदगी का सार है 
और क्योंकि अब तक देखा भी है उन्होंने अपने सी औरतों को किसी के प्रेम में समर्पित होकर निस्सार हो जाना 
और ख़ुशी ख़ुशी 
मुर्दा घोषित कर देना खुद को पुरुष के आगे बेवजह यूं ही 
खैर
यूं भी नहीं आखिर 
पुरुष को अधिकार जो है उसके समर्पण का, उसके निस्सार हो जाने का  
तो गलत भी क्या है अगर औरत चलती है उसके नक़्शे कदम पर 
क्योंकि अब तक वो निभाती आई है परंपरा 
और आगे भी निभाती रहेगी यूं ही 
और फिर परंपरा और पुरुष में अंतर ही कहाँ है 
कि वह उसे चुनौती देने की कूवत रखे अपने समर्पण से परे जाकर… 
अव्वल तो वो निकल ही नहीं पाई है अपने खोल से,
कि देख सके जिंदगी की असली सच्चाई 
कि वो बेतरह गढ़ दी गई है जिसमे 
उसकी आत्मा तड़प के रह गई उसकी गढ़ी गई देह के बोझ के नीचे ......