सोमवार, 31 जुलाई 2023

जंगल का न्याय






एक समय की बात है। एक जंगल में भेड़ियों का शासन हुआ करता था। यूँ तो सभी भेड़िये माँसाहारी थे और हर तरह का माँस खाते थे। पर सीधी, सरल, शाकाहारी बकरियाँ उन्हें बेहद पसंद थीं। बकरियाँ उन्हें आसानी से मिल भी जाती थीं। इधर-उधर घूमतीं, हरी-हरी घास चरतीं बेफिक्र बकरियों पर जब भेड़ियों की लपलपाती नज़र पड़ती, तो बेचारियों की जान तो दूर की बात, हड्डियांँ तक न बचतीं।

धीरे-धीरे बकरियों की संख्या कम होने लगी। उन्हें समझ आने लगा कि भेड़ियों के रहते उनका रहना संभव नहीं। बड़ी-बूढ़ी बकरियों ने भी यही समझाया कि भलाई यही है कि घर में रहो। घर से बाहर का काम बकरे कर लेंगे। बकरों को भी समझाया कि बकरियों की आन, बान और मान की रक्षा बकरों को करनी होगी और बकरियों को भी समझना होगा कि अगर इतने के बाद भी उन्होंने बात नहीं मानी और लक्ष्मण रेखा पार की तो भेड़ियों से तो कोई कुछ नहीं कहेगा, 'वो तो होते ही भेड़िये हैं', पर तुम बकरियों की खैर नहीं! अधिकतर बकरियों ने सहमति जताई। कुछ बकरियों ने अपनी आज़ादी का प्रश्न उठाया पर मौत के भय से वो भी कसमसाकर, और अगले जनम मोहे बकरी न कीजो गुनकर चुप  हो गईं। पर अल्हड़ और मासूम बकरियों को कौन समझाए! हज़ार समझाने पर भी वे चोरी-छिपे कुलाँचें भरती हुई निकल तो जातीं पर फिर घर न लौट पातीं। थक-हारकर सब बकरे-बकरियों ने जंगल छोड़ने का फैसला किया। 

एक बुज़ुर्ग बकरी ने यह भी सुझाया कि भेड़ियों से लड़ना है तो छोड़ो ये बकरियों का रूप रँग। भेड़ियों जैसी बनो। कुछ बकरियों को ये सुझाव पसंद आया, पर कुछ उम्रदराज़ बकरियों को लगा, भेड़िये बूढ़ी हड्डियों को चबाकर क्या करेंगे, हम तो ऐसे ही भले। नई बकरियों के आगे पूरी ज़िंदगी पड़ी है, उनके लिये ये सुझाव ठीक है। पर जब बूढ़ी हड्डियांँ और बकरों को भी भेड़ियों ने नहीं छोड़ा तो सबके होश फ़ाख्ता हो गए और विचार बदलते देर न लगी।

अब आक्रोश बढ़ा और समझ आया कि जंगल छोड़ना विकल्प नहीं। भेड़िये तो हर जंगल में होंगे, बकरियांँ कहाँ-कहाँ भागेगीं? इसलिये तय हुआ कि बकरियों को ट्रेनिंग दी जाए, सशक्त बनाया जाए, जिससे वो भी निर्भीक होकर भेड़ियों की बराबरी कर सकें।

इधर भेड़ियों के कई खबरी थे, अत: उन्हें भी कुछ भनक लगी और सूचना भेड़ियों तक पहुँची।

बकरियांँ न रहेंगी तो कैसे काम चलेगा! भेड़िये सकते में आ गए। 

कुछ गुर्राए- @#$% हम से बचके कहाँ जाएंगी...!

सबको चुप कराते हुए, अबकी बुज़ुर्ग भेड़ियों ने समझाया- देखो बेटा, हम भी कभी तुम्हारी उमर के थे। पर हम तुम्हारी तरह नहीं थे। हम तुम्हारी तरह अक़्ल से पैदल नहीं थे। समझ आई बात? एक तरीका होता है, बकरियांँ पकड़ने का। हमारे जमाने में तो कभी ऐसा नहीं हुआ, कि बकरियाँ भेड़ियों की तरह रहने की बात करें, जंगल छोड़ के कहीं और बस जाएँ! ये तुम्हारी कमी है। तुम्हें बकरियों को संभालना नहीं आया!

सारे भेड़िये बेचारे मुँह लटकाकर रह गए। बात सही भी थी। इसलिए क्या कहते। हिम्मत साधकर एक भेड़िया बोला- तो बताओ न चचा अब क्या करें???

बूढ़ा भेड़िया अब गुस्से में चिल्लाया- अबे चुप कर! ये करेंगे! करना होता तो बकरियाँ आज जाने की बात न कर रही होतीं। अब जो भी करना होगा हम करेंगे।

भेड़िया अपना सा मुँह लेकर रह गया।

बुज़ुर्ग भेड़ियों को अपनी बुद्धि पर बड़ा भरोसा था अत: उन सबने तय किया कि बातचीत से सब ठीक होता है तो क्यों न बकरियों से बात की जाए, और वो तो होती ही हैं कम अक़्ल! सब अपने पक्ष में होगा, सही होगा।

आनन-फानन में संदेश बकरियों के पास भिजवाया गया। घिसे नाखून और उखड़े दाँतों वाले चार भेड़ियों को बकरियों के खेमे में भेजा गया। उनके साथ भविष्य के शान्ति दूत के प्रतीक रूप में एक हट्टा-कट्टा भेड़िया भी सरल और चुपचाप मुद्रा में भेजा गया।

बकरियांँ पहले तो ठिठकीं पर भेड़ियों की उम्र को देख मन में स्वाभाविक दया उपज आई। आवभगत के बाद बातचीत शुरू हुई।

भेड़ियों ने कहना शुरू किया-

देखो जंगल की शान आप बकरियों से ही है। जंगल की रौनक आप बकरियों से ही है, नहीं तो हम भेड़ियों को कौन पूछ्ता है! आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि बकरियांँ जंगल छोड़कर जाने की बात करें!

बूढ़ा भेड़िया अपनी बात पूरी कर पाता कि एक बकरी बोली- पहले हम बकरियों पर ऐसे अत्याचार भी नहीं हुए!!

बूढ़ी बकरी उसे बरजने ही वाली थी कि बुज़ुर्ग भेड़िया बोला-

सही कह रही हो बेटी। लेकिन अपनी दादी नानी से पूछो, अपनी माँ से पूछो, उनका जीवन भी कभी आसान नहीं था। 

कुछ बकरियों ने हामी में सिर हिलाया।

बूढ़े भेड़िये ने अपनी बात कहना जारी रखा-

फिर भी कभी अपना देश, अपना संस्कार नहीं छोड़ा। अब दूसरा भेड़िया बोला- भेड़ियों की वेशभूषा बना लेने से भेड़िया तो नहीं बन जाओगी, अपनी संस्कृति और संस्कार को छोड़ने से कुछ नहीं होगा। 

भेड़िये की बात सुनकर बूढ़ी बकरी बोली- दादा बस बकरियों को ही उपदेश देने आए हो! देखते नहीं कि बकरियों का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया है? आपकी उमर का लिहाज़ करके हम बात करने को राज़ी हुए थे, पर लगता है गलती कर दी।

भेड़ियों ने दाँत निपोरे। एक भेड़िया बोला- जंगल अकेले बकरियों या भेड़ियों से नहीं चलता। इस बात को मानो कि हमारे डर से बहुत से खूंखार जानवर यहाँ नहीं आ पाते, नहीं तो सोचो क्या होता?

क्या होता? जो भी होता इतना बुरा न होता। आप अपने बनकर हम बकरियों को धोखा देते आए हो, पर अब नहीं सहेंगे। एक अधेड़ उमर की बकरी ने कहा। भेड़िये मन ही मन गुर्राए।

अब एक भेड़िया बोला-

जो हुआ सो हुआ। अब हम अपनी बहन-बकरियों के सम्मान की रक्षा का प्रण लेते हैं। 

पीछे से आवाज़ आई- ऐसा ही है तो कटवा लो न अपने नाखून और तुड़वा लो नुकीले दाँत!

भेड़ियों की आँखों में खून उतर आया। वे फिर गुर्राए... पर बूढ़े भेड़िये ने फिर चुप होने का इशारा किया और उठते हुए कहा- जो हमारी बहने-बकरियांँ कहेंगी, वही होगा।

बकरियांँ चकित थीं। भेड़िये जा चुके थे। 

घर आकर भेड़िये चिल्लाए- दादा खुद के तो हैं नहीं अब हमारे भी तुड़वाओगे! वाह!

टूटे हैं तो क्या खाते नहीं हैं? समझो, अब नाखून और दाँतों को सब्र दो। मैं कब कहता हूँ कि तुड़वाओ? हैं?? हम भेड़ियों की यही तो पहचान है।

पर अब पैंतरा बदलो, छुपा लो अपने दाँत और नाखून, सीखो कुछ। अब यह दिखाओ कि तुमसे बड़ा हितैषी कोई नहीं है बकरियों का। करो कुछ ऐसा कि बकरियांँ खुद चली आएं...समझे? कहते हुए भेड़िये ठठाकर हँस पड़े। बकरी फँसाने की नई योजना सब भेड़ियों को समझ आ गई थी।

इधर बकरियों की ट्रेनिंग जारी थी। उन्होंने अपने सींग पैने और सीधे कर लिये थे, खुरों को और मज़बूत कर लिया था और अपने दाँतों को भी उन्होंने तीखा और नुकीला बना लिया था। यहाँ तक कि उनकी मिमियाहट भी ऐसी हो गई थी, कि एक क्या दस भेड़ियों को हार्ट-अटैक आ जाए!

परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में जंगल की तबियत बदल गई। डरना तो कब का हवा हुआ, अब बकरियाँ घास के साथ भेड़ियों के माँस का भी लुत्फ़ उठाने लगीं! भेड़िये चिल्ला उठे- घोर कलयुग! ये जंगल अब रसातल की ओर जा रहा है....

पर अफसोस बकरियों के आगे उनकी एक न चली

मरते क्या न करते, वे अब इस  खयाल में थे कि किसी दूसरे जंगल की बकरियों पर दाँव आज़माया जाए, पर असलियत में बकरियों के सामने उनकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी।












सोमवार, 17 जुलाई 2023

श्रावण

 




श्रावण तुम्हारा स्वागत है

सब पलकें बिछाकर राह देखते हैं तुम्हारी

मानो पूरी सृष्टि ही जैसे प्रतीक्षा करती हो तुम्हारी,

तुम्हारे आते ही बदल जाती है, मौसम की रंगत

श्यामल सज जाता है आकाश और करता है शंखनाद।

 बूँदें छम छम करती हैं नृत्य,

कूकती है कोयल और थिरकते हैं मोर

तपस्विनी धरती भी धो लीप लेती है अपना आँगन

और हरियाती आत्मा से कर उठती है मंद्रित स्वर मन्त्रोच्चार।

नदी और सागर भी नहीं ठहर पाते अपनी ही जगह 

और उमग आते हैं,

जैसे हो जाना चाहते हों वो भी कृतार्थ

कर पाद-प्रक्षालन उस अनंत का।

सोचती हूँ 

 ये परिवर्तन नहीं संयोग भर,

यहाँ तो याचना है, प्रार्थना है परित्राण की,

उस आदियोगी से जिसने सहज ही पी लिया था विष हलाहल,

सृष्टि के उद्धार को

और हो गए थे ध्यानस्थ।

श्रावण मैं देखती हूँ 

 तुम्हारा आना नहीं साधारण

वह तो अवसर है, सृष्टि के ओंकाररूप हो खुद को पा लेने का,

निर्दोष

इसलिए

 हर बार जब तुम आते हो,

प्रकृति पूर लेती है चौक और 

हो जाती है नतमस्तक

करती आत्मस्थ मन्त्रोच्चार- 

शिवोअहं शिवोअहं शिवोअहं...