शनिवार, 1 जून 2024

सियार

 कुछ आदमी होते हैं सियार

भटकती आत्मा से

वे घूमते हैं हर तरफ़

ताज़े गोश्त की तलाश में

उन्हें नहीं होता अपनी हड्डियांँ टूटने 

या इज़्ज़त का घड़ा फूटने

का डर 

बल्कि वो तो

बुढ़ाती देह में भी

कमर कस, चेहरे पे रोगन पोत

जवानी की आस लिये

 लपलपाते हैं जीभ

निपोरे रहते हैं दाँत

इन्हें नहीं होता जूते खाने का भय

बल्कि वो तो समझते हैं इसे

अपनी वीरता का प्रसाद ही

इन सियारों को खूब आता है

 उपदेश देना चरित्र के

और स्त्रियों की विशेषताएँ गिनाना

अच्छी और बुरी स्त्री  का

अंतर समझाना 

पर अफसोस

होता नहीं खुद इनके पास चरित्र का 'च' भी

माँ, बहन, बेटी जैसे रिश्ते

होते हैं इनके लिये हथियार या चिड़िया का दाना भर

जिसे फेंक ये पकड़ सकते हैं

किसी भी स्त्री का हाथ 

या फेर सकते हैं 

किसी भी स्त्री की पीठ पर हाथ 

वासना के ये पापी

पनपते जा रहे हैं खरपतवार से

हर जगह हर ओर

काश कि एक धारदार

तलवार हाथ में आए 

और ये सियार धूल में मिल जाएँ 

 खत्म हो जाएँ कुनबे सहित

 मैं सोचती हूँ कि तब

ये दुनिया

 कितनी सुंदर हो जाएगी! 




11 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" रविवार 02 जून 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" रविवार 02 जून 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया यशोदा अग्रवाल जी

Abhilasha ने कहा…

यथार्थ सार्थक वर्तमान की विसंगतियों पर कुठाराघात करती रचना

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया अभिलाषा जी,

Rupa Singh ने कहा…

चिंतन करने योग्य...सार्थक रचना।

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया रूपा जी

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया आलोक सिन्हा जी

सुनीता अग्रवाल "नेह" ने कहा…

आज के समाज की भयानक विडंबना है यह।हमने विकास किया है पर आज तक स्त्री के लिए एक सुरक्षित समाज का निर्माण नहीं कर पाएं है हम ।

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

जी सुनीता जी। सही कहा आपने।