रविवार, 30 दिसंबर 2007

राम से तू सेतु से राम नहीं

आज जब मैं सुबह कॉलेज जाने के लिए घर से निकली तो मैंने देखा, सड़क का तो चक्का जाम है। बड़ी भारी भीड़ राम जी के नाम के नारे लगाती हुई, बढ़ती ही चली जा रही है, मैंने ज़रा गर्दन घुमा कर देखा तो मेरी नज़र एक बैनर पर पड़ी, जिस पर लिखा था.... राम सेतु को बचाना है। मुझे समझते देर न लगी, कि यह उपस्थित भीड़ असलियत में भीड़ नहीं बल्कि राम के रक्षक है, जो राम के नाम और राम के सेतु की रक्षा के अपने ज़रूरी से ज़रूरी काम छोड़ कर राम के बचाव मैं आ खड़े हुए हैं। मैंने बैनर की और ध्यान से देखा, राम धनुष बाण संभाले आवेश की मुद्रा में खड़े हैं, उनके आगे पीछे मुझे उनका कोई अंगरक्षक भी नहीं दिखा, ( संभवतः वे उन्हें आकाश में टंगा छोड़ ज़मीद पर उतर आये थे, और जिनके साक्षात् दर्शन मुझे हो रहे थे) मैंने भी भगवान् के सामने यह कहते हुए सिर झुका लिया, वाह रे राम जिस दुनिया को तुमने रचा, जिस इंसान को तुमने बनाया, वह इतना शक्तिशाली कब से हो गया, कि भगवान् का भी नियंता बन बैठा। जिस राम ने उसे रचा वह उसी राम को ठगने लगे। मेरे मन चिल्ला उठा, सवाल उठा कि कहाँ है भगवान् , इन दुष्टों की खबर वह क्योँ नहीं लेता,

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

आज

बहुत दिन से अपने चिट्ठे से दूर थी। दरअसल वक़्त थोड़ा कम लग रह था। फिर सोचा कि दिन के घंटे तो बढ़ने से रहे, क्यों न अपनी रफ्तार में ही इज़ाफा कर लिया जाये! सो थोड़ी कोशिश तो की हमने। थोड़ी-बहुत कामयाबी भी मिली। ख़ैर कोशिश की जाये तो कामयाबी मिल ही जाती है, पर अक्सर कोशिश का समय नहीं मिल पाता। पता नहीं ऐसा क्या करते हैं कि समय कटी पतंग की तरह हाथ से निकल जाता है। और लोग कहते हैं वक़्त थोड़ा सा कम है। पता नहीं कम क्या है? वक़्त कम है या हमारी कोशिश में दम कुछ कम है।
ख़ैर, थोड़ा आगे बढ़ते हैं, आपके लिए एक कविता अर्ज़ करती हूँ-
शायद कुछ समझ पाई थी खुद को उस दिन,
एक क्षण के लिए में सामने थी खुद के उस दिन,
उस दिन,
जब पराये पराये हो गए थे,
मेरे उन अपनों में खो गए थे, जो कभी पराये न थे,
आज मेरे वो पराये केवल अपने हो गए थे,
और तब,
में सामने थे खुद के, उस दिन,
दूर से देखा था पन्नी में झलकता वो अक्स,
जो......
शायद मेरा था,
कुछ बुदबुदाता सा....
कि जैसे कहता हो.....
यही जीवन है




तो मित्रो, यही जीवन है।

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2007

कविता का अगला भाग

कहते-कहते लुप्त हो गई अंतर्मन में वह वाणी,
मैं अबोध सी शांत निशब्द थी, शंकाएँ मेरी हारी
दीर्घ उठा निह्श्वाश हृदय बोला मुझसे
प्रश्न न कोई शेष मिल उत्तर मुझसे

तो जनाब यह छोटी सी कविता तो समाप्त हो गई। और समाप्त तो उसे होना ही था। आख़िर जिस चीज़ की शुरुआत हुई है, वह ख़त्म तो होगी ही। तो ये कविता अपवाद कैसे हो सकती है? पर एक बात और है जिस पर ध्यान दिया जाना ज़रूरी है, वो ये, कि हर समाप्ति एक नए आरंभ का भी संकेत भी होती है। यह कविता भी एक नए आरंभ का संकेत है। कविता में व्याप्त संभावनाओं के विस्तार का संकेत है, एक नए दर्शन का संकेत है, तमाम प्रश्नों का संकेत है, और संकेत है उस बहुत कुछ का भी जिस की हमें शायद जानकारी तक नहीं। तो खुजलायिए अपना सिर और बताये वह शुरुआत क्या है, कौन हैं वो दोनों जो मिल कर भी नहीं मिल पाते, जिसे सुनकर भी नहीं समझ पाते? क्या है वो? कविता में यह नाटकीयता आख़िर है क्या? हुज़ूर सवालों का यहाँ अंत नहीं है, हर सवाल तो एक सिलसिला है ज़वाबों और साथ-साथ सवालों कि एक नवीन श्रृंखला का ........

सोमवार, 29 अक्तूबर 2007

कविता का अगला भाग

मैं तो रूठी थी पहले से, ना बोली ना मुस्काई
बैठी रही अनमनी ऐसी जैसे पास ना वो आई,
करते देख मुझे ऐसा वो हल्के से यूं मुस्काई
वेणु बजी ज्यौं दसों दिशा में, पवन नृत्य करने आयी
तभी अचानक हाथ पकड़ कर वो बोली,
क्यों रानी ये स्वांग रचाया, मेरे आँचल में सोई तू, फिर भी मुझको जान ना पाय?
हाय! मुझे देखने को ही तूने क्यों अपना ये जी तरसाया
मैं विस्मित सी मंत्रमुग्ध सी, सुनती रही घात पर घातें,
तभी तर्जनी इंगित करके, बोली वो शुभ संवादे,
देख गगन की पृष्ठभूमि पर नृत्य कर रही कौन प्रभा,
कौन सूर्य का जीवन बन कर, देती जग को प्राण सुधा,
फिर मुझसे बोली वो आली, शतदल, शत्पत्री के जन की मैं ही तो जीवन दाई
अब भी तू क्या जान ना पाई?
देख जगत में तू रहती है और जगत रहता मुझमें है,
मैं रहती हूँ जनजीवन में, और जीवन रहता तुझमें है
तू है जीवन की अधिकारी मैं जीवन की पालन हारी,
अब भी क्या तू जान ना पाई?
फिर मुझसे बोली --
मैं जीवन हूँ और तू जन है, मुझमें तुझमें भेद कहाँ?
पर क्यों तूने स्वांग रचा कर जीवन जन में भेद रचा?
जीवन खिले स्वयं जीवन सा,
जीवन का अन्यार्थ कहाँ , रहे प्रतिष्ठा जीवन जन में अन्य कामना शेष कहाँ
जियो जगत में जीवन बन कर, जन जीवन का प्राण बनो,
हंसो पवन सी , खिलो दिशा सी शेष अन्य वरदान

कविता का अगला भाग

रविवार, 28 अक्तूबर 2007

कविता का अगला भाग

मन में उठती थीं शंकाएँ ये कौन स्नेह जतलाती है,
नहीं दिखाई देती मुझको, पर अनुभव दे जाती है,
सोच-समझ कर ठाना मैंने देखूँगी इस अनामिके को,
तभी अन्न-जल ग्रहण करूंगी, जब मिल लूंगी इस चपले को,
सो यूं ही इक दिन झूठ-मूठ मैं रूठ गई उस चपला से,
गुमसुम बैठ गई कोने में, डूबी रही व्यग्रताओं में,
मन में उठती थीं कब आयेगी-कब आयेगी,
क्या वो मेरी शंकाओं का समाधान भी कर पाएगी
तभी वायु के इक झोंके ने स्पर्श किया मुझको सहसा,
सुरभित हो गई दसों दिशाएँ, समझ गई आयी चपला

शनिवार, 27 अक्तूबर 2007

कविता का अगला भाग

ऐसे मुझे बना देती है रानी वो संसार की,
मुझे रुलाती नहीं कभी वो, पर जब मैं रो पड़ती हूँ,
चुपके से आकर वो मेरे आँसू ही ले जाती है,
कहती है कानों में, आकर
तू है मेरी गुड़िया रानी,
मेरी इस अनंत जीवन की तू ही,
एक मात्र उत्तराधिकारिणी,
तुझको हँसता देख स्वयं मैं जीवन को पा जाती हूँ
इसीलिए तेरे जीवन को रंगों से नहलाती हूँ,
फिर बोली तू भर देना इन रंगों को हर कोने में,
जहाँ रमी तुझको मैं देखूं , जीवन के कोने-कोने में...

मन की बात

आज मैं एक छोटी सी कविता अर्ज़ करना चाहती हूँ। उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी। न भी आए तो भी कोई बात नहीं क्योंकि कविता तो मैं अर्ज़ करूंगी ही। आपको बताना है इसके रचनाकार का नाम, अगर आप कविता पढें तो----
चुपके-चुपके स्वप्न सुध सी,
आती है पलकों के पीछे,
मुझे छुपाने आँचल मैं वो आती है धीरे, धीरे
सोऊँ-जागूँ आस-पास वो मेरे वृत्त बनाती है,
कभी हंसी के, कभी ख़ुशी के, ढेरों फूल खिलाती है
इतने रंग दिखाती है कि मैं गिनती रह जाती हूँ,
पर जब खोजूँ उस चपला को क्यों वो नाच नचाती है?
सूरज लौटा, संध्या आयी, आँचल में तारे भर लाई,
पर ये हाथ पकड़ कर हाय! मुझको यहाँ कहाँ ले आयी?
देखा सूरज पास खड़ा है, तारों की बरात सजी है,
चन्दा के भी ओंठों पर मीठी सी मुस्कान खिली है
इन्द्र-धनुष में रंगे हैं बादल, और फूलों का मेला है,
इनके बीच खड़ी हूँ ऐसे, जैसे ये मेरा है,

samjhauta

आज खूब खरीददारी की दीदी की शादी के लिए। ऐसा लग रहा था मानो आज तो पूरी दुनिया ही खरीद लें। पर एक सवाल मन में यह भी उठ रहा था कि क्या यह सब अपने आप में एक दिखावा नहीं है? मैं जो हमेशा यह सोचती हूँ कि पापा के ऊपर कर्ज न बढ़े, आज मेरी वह सोच कहाँ हवा हो गई? और पापा! पापा भी मुझे वो सब दिला रहे हैं जिस पर मेरी नज़र जा रही है! कमबख्त नज़र क्यों अपनों को ही लूट लेती है ये पापा भी जानते हैं और उनकी यह बेटी भी की इस शादी में शायद क़र्ज़ भी लेना पड़े। और शायद क्या, बिना क़र्ज़ के काम चलेगा ही नहीं। फिर भी, वो दिल खोल के खर्चा कर रहे हैं। हाँ कभी कभी उनके माथे पर कुछ शिकन भी नज़र आ जाती है, पर पापा के माथे की उस शिकन से शायद कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं मेरे लिए वो सब कुछ खरीदना जो मुझे ख़ास दुल्हन की ख़ास बहन साबित करे, खूबसूरत और सबसे अलग। इसलिए ५००० की साड़ी मंहगी नहीं है। और फिर मैंने यानी उनकी छोटी बेटी ने आज तक उनसे कुछ फरमाइश भी तो नहीं की। आज पहली बार ही तो दिल मचल रहा है॥
मेरा सिर चढा दिमाग जाने कब से मेरे इस दब्बू दिल को समझा रहा था। आख़िर dइमाग को दुनिया की समझ है। दिल कहाँ दुनियादारी समझ सकता है, उसे दिमाग का सहारा लेना ही पड़ेगा। वैसे भी भावुकता से काम नहीं चलता।दिमाग ने विभा को समझाया की तुम कमा ही रही हो कर्जा उतर जायेगा। पर विभा का दिल दब्बू ज़रूर हो सकता है पर आख़िर काम तो करता ही है, धड़कता तो है ही, सो उसने भी एक सवाल फिर दोहरा दिया की ये विभा नाम की बला तो दिखावे में विश्वास ही नही करती, फिर आज क्यों वह दिखावे के पीछे अपनों को ही लूटने पर उतारू है? दिमाग ने अबकी ऐसी पटकनी दी इस दिल को की एक बार फिर साबित हो गया की यह दुनिया दिमागदारों की है, दिल में आज इतनी ताकत ही नही की दिमाग को जवाब दे सके। तो ज़रा सुनिए की दिमाग ने क्या कहा-----
अरे मेरे भोले दिल भइया- ज़रा सोचो -अच्छा लगेगा की अपनी विभा रानी सबसे फीकी नज़र आए। लोग क्या सोचेंगे की क्या बात है छोटी बहन खुश नहीं है अपनी बड़ी बहन की खुशी पर? और किसी ने कुछ कह दिया उल्टा सीधा तो पापा को कितना बुरा लगेगा। और देखो पैसे से zयदा ज़रूरी है चहेरे की खुशी, जो पापा को केवल तभी मिल सकती है जब उनके बच्चे खुश रहें। और बच्चे tab खुश रहेंगे जब वो संतुष्ट रहें। इसलिए अब लेलोजो लेना है और संतुष्ट हो जाओ, पापा की खुशी भी इसी में है
और फिर हमेशा की तरह एक करिश्मा हुआ----
मेरा 'आदर्शवादी' मन सिर चढ़े दिमाग की बात मान गया....

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2007

अपनी बातें

तो दोस्तो, स्वागत है आपका इस मंच पर, जहाँ हम और आप एक दूसरे से अपनी तमाम बातें खुले दिल से कर सकते हैं। कुछ लिख सकते हैं, कुछ पढ सकते हैं और कुछ नया सोच सकते हैं। अपनी कल्पनाओं को मूर्त कर सकते हैं। विचारों को वाणी दे सकते हैं। आँखों में सपने दे सकते हैं। मुट्ठियों में आसमान दे सकते हैं। दिल में हसरतें चेहरों पर मुस्कान दे सकते हैं। अधिकार दे सकते हैं। सम्मान दे सकते हैं। शब्दों की ताकत से निर्जीव को भी प्राण दे सकते हैं। इसलिए दोस्तों स्वागत है आपका इस मंच पर क्योंकि यहाँ हम और आप कुछ आपसी बात कर सकते हैं।