शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

पहली मुलाक़ात



फोटो : गूगल से साभार

नर्सरी क्लास में चार साल के दो बच्चे- एक लड़का और एक लड़की डेस्क पर बैठे थे। सकुचाए, चुपचाप। गालों पर आँसू सूख चुके थे। घर जाने का कोई चांस नहीं। मिस अच्छी थीं इसलिये टॉफ़ी और चिप्स खाने की इजाज़त मिल गई थी। कुछ बच्चे अभी भी रो रहे थे। पर बीच की डेस्क पर बैठे ये दोनों बच्चे अब शान्त थे। लड़का मन ही मन सोच रहा था कि-मम्मी ने कहा था, रोना नहीं, तो मैं तो बस थोड़ा सा रोया, बाकी बच्चे तो अभी तक रो रहे हैं। लड़की भी यही सोच रही थी। उसके आँसू बीच-बीच में टपक जा रहे थे जिन्हें वह जल्दी से पोंछ ले रही थी। अपने ओंठ भींचे, आँखों को बार बार झपकती वह कुछ अधिक सतर्क भी लग रही थी।

इतने में लड़के को याद आया कि मम्मी ने कहा था- मिस को गुड मॉर्निंग कहना और सबसे बात करना। लड़का मन ही मन बुदबुदाया- मिस से गुड मॉर्निंग तो कह दी पर बात किससे करूँ, यहाँ तो सब रो रहे हैं। तभी लड़के को कुछ याद आया और वह अपने बगल में बैठी लड़की की तरफ़ मुड़ा, जो छोटी सी मूर्ति के समान खुद में ही सिकुड़ी बैठी थी। शायद उसके मन में अपनी मम्मी की सीख चल रही थी- मिस से गुड मॉर्निंग करना, रोना नहीं और किसी से ज़्यादा बात मत करना।

लड़के ने लड़की की ओर मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया और कहा- मुझसे दोस्ती करोगी?

अपने में खोई लड़की ने लड़के की ओर आश्चर्य से देखा। कुछ सोचने के अन्दाज़ के साथ पलकें झपकाईं और फिर हाथ को डमरू की तरह हिला, मुँह बनाकर बोली- मन नहीं है...

लड़के को ऐसे जवाब की उम्मीद न थी। अत: लड़की की ओर देखता हुआ वह सोच रहा था कि मम्मी ने ये तो बताया नहीं कि कोई बात करने से मना कर दे तो क्या करना है.....? 

उधर लड़की के चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई थी कि उसने मम्मी की सारी बातें मान ली।

 


बुधवार, 28 सितंबर 2022

अम्बेडकरवाद के परिप्रेक्ष्य में डॉ अम्बेडकर


डॉक्टर भीमराव अंबेडकर पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा है कि उनके विषय में जितना लिखा जाए, जितनी चर्चाएं की जाएँ उतनी कम। पर देखने में यह आता है कि अंबेडकर के विषय में जो भी लिखा और कहा जाता है, वह उन्हें एक साँचे विशेष तक सीमित कर देता है जबकि अंबेडकर का व्यक्तित्व ऐसा नहीं है कि उन्हें एक वर्ग विशेष के सांचे तक ही सीमित रखा जाए। ऐसा करना असल में हिमाकत है। पर बाबा साहेब के व्यक्तित्व  की विडंबना ही बन गई है यह हिमाकत। डॉ अंबेडकर असल में वंचितों के मसीहा थे। जिसके पास ताकत नहीं है, जो शोषित है, दलित और दमित है, डॉ अंबेडकर उनकी आवाज थे। पर दिक्कत यह थी कि सशक्तों  को वंचित और शोषितों की आवाज हो यह पसंद ही नहीं था। सारी लड़ाई यही थी। डॉ अंबेडकर सामाजिक न्याय और उसके माध्यम से सामाजिक विकास के पक्षधर थे। इसलिये वे इस बात को बखूबी समझते थे कि सामाजिक विकास के लिए जरूरी है कि समाज के हर वर्ग का विकास हो और विकास की प्रक्रिया केवल ऊपरी स्तर से आरंभ नहीं होती बल्कि उसके लिए आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत होती है। समाज के अंदर बसे अन्तर्समाजों को जब तक समान रूप से विकसित होने का अवसर नहीं मिलता, तब तक विकास संभव ही नहीं। यही कारण है कि उन्होंने समाज के उन तबकों में प्राण फूंकने से शुरुआत की जिन्हें सामाजिक व्यवस्थापन के नाम पर निचले पायदान से ऊपर उठने ही नहीं दिया गया था। वे स्वयं भी भुक्त-भोगी थे इसलिये दलितों और वंचितों का दर्द उनसे बेहतर भला कोई और कैसे समझ सकता था। गैर-बराबरी का यह व्यवहार असल में शक्ति की उस राजनीति के तहत था जिसके विषय में कहा गया है- समरथ को नहिं दोष गुसाईं। यानी सशक्त के दोष दिखाना खुद को समस्या में डालना है। अंबेडकर ने शक्ति की इस राजनीति को उसके सही समीकरण में समझा और उसे उसी रूप में समाज में सबके सामने रखा। अम्बेडकर ने सामाजिक न्याय और समता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये तीन उपास्यों का सूत्र रखा। इसका सीधा सा अर्थ था कि इन तीन को ही ईश्वर मान आराधना करो तो कुछ भी असम्भव नहीं। ये तीन सूत्र थे- ज्ञान, स्वाभिमान और शील।

अपने प्रथम उपास्य ‘ज्ञान’ के सम्बंध में डॉ अम्बेडकर कहते हैं-

“मेरा प्रथम देवता ज्ञान है। मैं ज्ञान की उपासना करता हूँ। बगैर ज्ञान के मनुष्य को मानवता तथा शान्ति नहीं मिलती।”

इतिहास साक्षी है कि ज्ञान को चुनौती देने की क्षमता अज्ञानी में नहीं है। भले ही वह कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो। ज्ञान के समक्ष उसे झुकना ही होगा। साथ ही ज्ञान में इतनी तेजस्विता है कि जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग जैसे सामाजिक विषय उसके सामने यूं ही हवा हो जाते हैं। समग्र साहित्य, लोक साहित्य, भक्ति साहित्य इस बात को प्रमाणित करता है। अष्टछाप के कवि अपनी जाति नहीं बल्कि अपने अर्जित ज्ञान के कारण गौरव और सम्मान पाते हैं। कबीर भी अपनी जाति के कारण महत्वपूर्ण नहीं है और तुलसी भी जातिगत, वंशगत और कुलगत प्रताड़ना सहते हैं। वे भी सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य होते हैं तो केवल ज्ञान के कारण। और पीछे चलें तो महाभारत के रचयिता मछुआरिन की संतान वेदव्यास अपनी जाति नहीं ज्ञान के कारण महत्व पाते हैं। आदि कवि वाल्मीकि भी अपनी जाति के कारण नहीं बल्कि अपने ज्ञान के कारण समाज के सभी वर्गों के द्वारा पूजित हुए और समाज के पूजितों के द्वारा भी पूजित हुए। अंबेडकर स्वयं शास्त्रज्ञ थे, इसलिये  उन्होंने यह जाना था कि समाज में जाति से अधिक महत्वपूर्ण है ज्ञान। इसलिये समाज में जाति के दंश को मिटाने का महत्वपूर्ण उपकरण भी ज्ञान है। सामाजिक उद्धार भी ज्ञान से ही सम्भव है। इस बात को गहराई से समझते हुए डॉ अंबेडकर ने जो तीन सूत्र या उपास्य कहे, उनमें पहला शब्द था ‘ज्ञान’। जब तक ज्ञान नहीं होगा व्यावहारिक समझ का भी विकास नहीं होगा। इसलिए इतिहास को खंगालते हुए उन्होंने अशक्त वर्गों के लिए ज्ञान प्राप्ति को अवश्यंभावी बताया। क्योंकि वे जानते थे कि ज्ञान के बिना जड़ता से मुक्ति नहीं होगी। यही बात वे शोषितों और वंचितों को समझना चाहते थे। यही कारण है कि ज्ञान को परम उपास्य मान  ज्ञान का सूत्र देना अंबेडकर ने इसलिये भी जरूरी समझा क्योंकि भारतीय धार्मिक साहित्य के दृष्टांत से वे यह बता देना चाहते थे कि ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं है। और जिन शास्त्रों की बात कहकर कुछ लोग निम्न जातियों को अपमानित करते आ रहे हैं, उन निम्न जातियों की भी उन शास्त्रों के लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय संस्कृति के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत गैर-ब्राह्मणों के द्वारा ही लिखे गए हैं। स्वयं इतिहास इस बात का गवाह है। अम्बेडकर यही बताना चाहते थे कि ज्ञान किसी की बपौती कैसे हो सकता है, जबकि स्वयं इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। स्वयं डॉ अम्बेडकर के शब्दों में-

“मेरे पिताजी धर्म के पूजक थे तथा धर्म चाहने वाले थे। बालपन में रामायण, महाभारत व सभी धर्मग्रन्थों का उन्होंने मुझसे पाठ करा लिया था। रामायण और महाभारत का मुझपर गहरा प्रभाव था।”

 अंबेडकर ने उपास्य के रूप में जो दूसरा शब्द दिया वह था स्वाभिमान। स्वाभिमान खुद पर थोपा गया बेवजह का दंभ नहीं है बल्कि इसका भी गहरा अर्थ है। अपने दूसरे उपास्य के विषय में अम्बेडकर कहते हैं-

“मेरा दूसरा देवता स्वाभिमान है। मैंने किसी से कभी याचना नहीं की। मैं कहता हूँ कि मनुष्य में दीनता भी नहीं रहनी चाहिए। मैं बहुत कुछ हूँ यही सोचना चाहिए।“

 अंबेडकर ने जब स्वाभिमान को उपास्य मानने की बात कही तो इसलिए कि निम्न कहलाने वाली जातियां भी स्वयं को सम्मान दें और समझें कि सामाजिक व्यवस्थापन में उनकी जाति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि उच्च कहलाने वाली जातियां। साथ ही निम्न कहलाने वाली जातियां स्वयं भी यह मानें कि असल में तो उच्च और निम्न का प्रश्न जन्म से तो है ही नहीं। यह सबल और शक्ति पक्षकारों की फैलाई तिकड़म है। इसे केवल तभी समाप्त किया जा सकता है जब अपने होने पर गर्व हो। यह आत्मभिमान जाति स्वाभिमान सामाजिक न्याय की दूसरी महत्वपूर्ण शर्त है। किसी भी जाति वर्ग या समाज के उद्धार की शुरुआत इसी स्वाभिमान से होती है। हालांकि उपास्य के रूप में स्वाभिमान का सूत्र भी सहज बात नहीं थी। सवाल यह था कि वंचित और प्रताड़ित भला किस बात पर गर्व करें? पर यहां समझने की बात यह है कि स्वाभिमान के प्रश्न में सबसे महत्वपूर्ण है मनुष्य होना और सभी मनुष्य बराबर हैं। जो इस बात को नहीं मानता वह अज्ञानी है उससे क्या तर्क किया जाए। पर स्वयं को ऐसा बनाओ कि कोई अपमानित न कर सके। और स्वाभिमान की रक्षा से महत्वपूर्ण कुछ भी न मानो उसकी रक्षा के लिये कुछ भी कर जाओ। डॉ अंबेडकर ने स्वाभिमान की बात इसलिए भी की थी क्योंकि अपमान सहते हुए कुछ जातियों में स्वयं को अपमानित होना नियति-बद्ध मान लिया गया था। इसलिये इस गर्हित विचार से जब तक समाज का निम्न कहा जाने वाला वर्ग मुक्त नहीं होता वह क्या तो अपना उद्धार करता और क्या ज्ञान प्राप्ति करता। यूँ भी समता और न्याय की लड़ाई में तब तक कुछ भी संभव नहीं है जब तक स्वाभिमान और स्वाभिमान के साथ ज्ञान की प्राप्ति न हो। अंबेडकर जानते थे कि बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती। ज्ञान प्राप्त हो गया तो सामाजिक भेदभाव की असलियत सामने आ जाएगी साथ ही स्वाभिमान और जातीय गौरव की भावना से जबरदस्त आक्रोश भी  पैदा होगा और समाज में आक्रोश हो, यह तो ठीक नहीं है। यूं भी अपनों से न्याय के लिए आक्रोश नहीं शील की आवश्यकता होती है। आवेश में काम बिगड़ते हैं। शीलवान  व्यक्ति बिना लड़े सबको जीत लेता है। इसी विचार से उन्होंने अपने साथियों के सामने शील के रूप में तीसरे उपास्य का सूत्र रखा। इस संबंध में वे कहते हैं-

“मेरा तीसरा देवता शील है। मैंने कभी धोखेबाजी नहीं की, विश्वासघात नहीं किया। मुझे किसी तरह की बुरी आदत नहीं है। शील संवर्धन का मुझमें बड़ा गुण है और यह कहते हुए मुझे बहुत गर्व होता है।”

 इसका सीधा सा अर्थ यही था कि स्वाभिमान के साथ ज्ञान प्राप्त करो पर किसी भी स्थिति में शील ना टूटने पाए। मर्यादा का हनन न होने पाए। यूं भी ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में घमंड का भी समावेश हो जाता है और स्वाभिमान और घमंड में तो यूं ही बहुत बारीक सी रेखा का अंतर है। अतः अंबेडकर विनम्रता की बात करते हैं। नम्र और शीलवान बने रहने की बात करते हैं। यह सब इसलिए कि वह समानता का हक लड़कर नहीं बल्कि प्रेम से प्राप्त करना चाहते हैं। कुल मिलाकर यह तीनों सूत्र असल में समानता और न्याय का ऐसा तार्किक मार्ग प्रस्तुत करते हैं जहां पराजय  है ही नहीं। जहां पर आजा है ही नहीं। ये तीनों उपास्य या तीनों सूत्र समाज, इतिहास और साहित्य की पृष्ठभूमि से ही जन्मे हैं। और इस पृष्ठभूमि में उच्चता और निम्नता का कोई प्रश्न ही नहीं है।

यहां एक बात और है और वह है ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद की। आज के तथाकथित अंबेडकरवादियों के समान अंबेडकर ब्राह्मणों से घृणा की राजनीति नहीं करते थे और न ही सभी ब्राह्मण उनसे। यहाँ अज्ञानियों की बात नहीं हो रही है जो धर्म को व्यवसाय बनाते हैं। अम्बेडकर ब्राह्मणों से इतनी ही घृणा करते तो क्या ऐसा होता कि उनका नाम भी उनके ब्राह्मण गुरु के कहने पर ही अंबावडे गांव के नाम पर अंबेडकर रखा जाता? वहां कोई छुआछूत या विरोध नहीं था। विरोध था तो उनके लिए जो स्वयं को धर्म का ठेकेदार घोषित करके मानवता का अपमान करते थे। अंबेडकर ने उसी सामाजिक रीति को ब्राह्मणवाद कहकर गरियाया था। किन्तु इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था कि वे ब्राह्मणों से घृणा करते थे। शास्त्रज्ञ अम्बेडकर ने आजकल के तथाकथित अंबेडकरवादियों की रीति से सोचा भी होगा,  इस बात में सन्देह है। अम्बेडकर का धर्म-परिवर्तन भी असल में हिंदू आस्था के खिलाफ़ अनास्था या विद्रोह नहीं था बल्कि ये विद्रोह था धर्म के उन ठेकेदारों के खिलाफ़ जिन्होंने आस्था को आडंबर बना कर रख दिया था। यह बात भी समझने की ज़रूरत है।

असल में डॉ भीमराव अंबेडकर समाज को एकरूप और सशक्त देखना चाहते थे और इसी दिशा मे प्रयासरत थे। पर वे यह भी जान गए थे कि सामाजिक परिवर्तन इतना सहज नहीं होता जबकि शक्ति केंद्रों की जड़ें सुदूर इतिहास तक फैली हों। किंतु इसके बावजूद भी सामाजिक व्यवस्थापन की दृष्टि से डॉ अंबेडकर ने जो कार्य किया, वह उन्हें महान व्यवस्थापक घोषित करता है और साथ ही इतिहास का सबसे बड़ा जनवादी नेता भी ।


संदर्भ-

डॉ अम्बेडकर : आयाम दर्शन, किशोर मकवाना

थोट्स ऑफ़ डॉ बी आर अम्बेडकर, सेंटरम प्रैस

“की कॉन्सेप्ट इन पॉलिटिक्स”, हेवुड एंड्रयू, न्यूयॉर्क, एन्वाई पाल्ग्रेव ।


गुरुवार, 15 सितंबर 2022

पुस्तक समीक्षा

 

रत्नकुमार सांभरिया ज़मीन से जुड़े रचनाकार हैं। ज़मीनी महक, देसी गमक उनकी कहानियों को एक खास बानगी देती है और कहानियों को अधिक संजीदा अधिक रोचक और कहीं अधिक पठनीय भी बनाती है। डॉ0 लोकेश कुमार गुप्ता द्वारा संपादित ‘पुस्तक रत्न कुमार संभरिया की प्रतिनिधि कहानियां’ कुछ ऐसी ही कहानियों का संग्रह है, जिसमें संपादक  ने बहुत कुशलता से कहानियों का चुनाव किया है। लेखकीय क्षमता से प्रभावित सम्पादक का यह कथन उल्लेखनीय है- 

“अगर मैं एक पंक्ति में कहूं तो रत्न कुमार सांभरिया का लेखन एक महाकाव्यात्मक पीड़ा, संघर्ष, वेदना, वंचना और अभिजन-समाज में व्यक्ति जीवन के नवीन मूल्य और मानदंडों को स्थापित करता है।“ 

यह नवीन मूल्य और मानदंड हमें इन चुनिंदा कहानियों में मिलते हैं। 

इस पुस्तक में संपादक ने कुल 11 कहानियों को संगृहीत  किया है जो अपने मिजाज अपनी कलेवर और अपनी कहन में एकदम अलग किस्म की हैं। मतलब कोई भी कहानी पैटर्न को फॉलो करती नज़र नहीं आती। हर कहानी में एक अनूठापन है, जो पाठक को एक कथालोक से दूसरे कथालोक की सैर कराता है। हां यह ज़रूर है कि कहानियां पैटर्न बनाती ज़रूर हैं। मतलब सरलता से बात कैसे कही जाए और उसे कहानी में कैसे ढाला जाये, ये  कहानियां यह सिखाती हैं। अब ‘मियां जान की मुर्गी’ को ही देख लीजिए। कहानी प्यार से पाली-पोसी गई मुर्गी की है, जो क्योंकि जीना चाहती है, इसलिए मियां जान की बहुत गालियाँ खाती है पर मियाँ जान की लाख कोशिशों के बाद भी वह हाथ नहीं आती। ज़िंदगी जीत जाती है मौत हार जाती है। बेचारे मियां जान अपनी जवानी का द्म याद करते रह जाते हैं। और कहानी कहती क्या है कि इंसानी स्वार्थपरकता सारे मोहजनित संबंधों को ज़िबह कर देती है। ये तो मुर्गी थी पर इस स्वार्थपरकता के आगे इन्सान भी क्या चीज़ है।

आज के राजनीतिक कूटनीतिक और षड्यंत्रकारी जमाने में कहानी विधा किस विधान से अपने मूल चरित्र को बचाए रख सकती है, यह कहानियां उसका भी एक खूबसूरत फॉर्मेट प्रस्तुत करती हैं अपनी बयानगी में एक खास सरलता से। इन कहानियों की एक और खास बात है,  और वह यह कि हर कहानी में एक यथार्थ प्रस्तुत किया गया है और इस यथार्थ की विशेषता है कि यहाँ कोई तल्खी नहीं, कोई आक्रोश नहीं, जातिवादी या जातिसूचक तल्ख-बयानी नहीं। कुछ है तो केवल यथातथ्य चित्रण। साम्भरिया जी भली-भांति जानते हैं कि बयानबाजी से कुछ नहीं होता। सहानुभूति या संवेदनात्मक पक्ष के मार्मिक चित्रण से भी कुछ नहीं होता। कहानी बनाने के लिये कुछ चीज़ें अगर काम करती हैं तो वह हैं बदलते वक्त को उसके बदलावों के साथ कागज पर उतारने की कला। अतीत और वर्तमान को साथ रखकर भविष्य की बुनावट करने की कला। बदलते समीकरणों को बिना किसी लाग-लपेट के सहज रूप में कह जाने की कला। और इन समग्र कलाओं का समुच्चयगत रूप जो कहानी को नदी के पानी सी रवानगी देता है, वह पाठक को वर्तमान से और मजबूती से जोड़ता है। सान्भरिया  जी की कहानियाँ यही करती हैं,  जिससे पाठक वर्तमान से और मज़बूती से जुड पाता है।

 अब फुलवा कहानी को ही देख लीजिए यहां जाति है। ऊंच-नीच का प्रपंच भी है। पर अतीत में। स्मृतियों में जो कभी आंख के कोर में ढुलकते पानी में, तो कभी जमीदारी दिमाग में उमड़ते ज्वार के रूप में तो दिख जाता है।  पर जैसे ही स्थान बदलता है, स्थितियां बदलती हैं, जाति भी बदल जाती है। अब यह जाति जिस नए रूप में है, उसे कहते हैं अमीर और गरीब की जाति। यह नई किस्म की जाति अब तक चली आती जातिवादी सामंती व्यवस्था से नितांत भिन्न है। इसलिए यह स्थिर भी नहीं है। यह असल में साँचे वाली जाति है, जिसमें किसी भी परंपरागत जाति का व्यक्ति फिट हो सकता है। इसलिए जाति आधारित परंपरागत व्यवहार यहां मैच नहीं करता। इसीलिये  पुरातन जाति संस्कार भरे रामेश्वर को फुलवा कहानी की पंडिताइन डपटती हुई कहती हैं -

“तू तो कुएं का मेंढक ही रहा रामेसरिया। अब तो पद और पैसा का जमाना है, जात पांत का नहीं।” 

पर दुनिया का क्या करें,  जो इस बदलाव को स्वीकार न कर पाये उसका क्या करें। ऐसे अतीतजीवी लोगों के लिए कोई क्या करे और क्या उन्हें समझाएं? मांडी कहानी भी कुछ ऐसी ही विवशता प्रस्तुत करती है जहाँ बेचारे बाम्भन दानीदास गौमाता को मान्डी खिलाने के लिये तरस जाते हैं क्योंकि नीच जात के घर बंधी गाय को मान्डी खिलाने में धर्म जो आड़े आता है और जब जैसे-तैसे वो खुद्को तैयार कर लेते हैं तो गाय की मालकिन का स्वाभिमान आड़े आ जाता है। और त्योहार हो जाता है निल बटे सन्नाटा।

वक़्त आगे गुज़र गया पर पुराने पंडित जी वहीं के वहीं। इस तरह की अतीत और वर्तमान के टकराव की ये कहानियाँ, आज के समय को प्रस्तुत करती कहानियाँ हैं, जिनमें एकदम सहजता है और बदलती स्थितियों को कहने की समझ है।

ज़िंदगी ‘इत्तेफाक’ है। कब क्या हो जाए, आज कुछ है, कल कुछ है, परसों कुछ और हो जाए,  किसे पता? जिंदगी ऐसे ही चालें चलती है और बहुत कुछ उलटती-पलटती, कुछ का कुछ करती चलती है। स्तब्ध पात्र केवल इस उलट-पलट के प्रभावों के साक्षी बनते हैं। यहाँ 40 साल का वियोग एक ऐसा सुखद संयोग बन जाता है कि ज़िंदगी की ढलान पर बैठी बुढ़िया फिर से दुल्हन बन जाती है। ऐसी कहानी को पढ़कर लगता है मानों वक्त कोई जीवंत शक्ति है जिसे ज़िंदगी से मसखरी करने में बड़ा मज़ा आता है। यह मसखरी कभी तो बहुत खूबसूरत होती है और कभी ऐसी कि ज़िंदगी का सिक्का बदलते देर नहीं लगती। इन्सान को मालकिन से ‘चपड़ासन’ बनने में देर नहीं लगती। स्थिति बदलने पर इन्सान की बदलती फितरत का भी खुलासा हो जाता है और तब पता चलता है कि 

“आदमी गिरगिट से भी बदतर रंग-बदलू होता है।“ और तब इस बात का एहसास होता होता है कि “औरत की चुप का आदमी अपना नियत अर्थ निकाल लेता है”... लोग बदल जाते हैं और उनके साथ वक्त भी बदल जाता है और तब समझ आता है कि “वक्त बहरूपिया है।“

स्थितियां बदलती हैं, समाज बदलता है और उसके साथ बदल जाता है बहरूपिया वक्त भी। अपने इस बदलने की प्रक्रिया में वह किसी पर भी रहम नहीं खाता फिर चाहे वह कोई नेत्रहीन जोड़ा ही क्यों न हो। कहानी सवाखें समाज की इसी सच्चाई को उजागर करती है कि जातीय शुद्धिकरण और जातिवाद नेत्रहीनों को भी नहीं बख्शता। परिणामत: जमन और वीमा की ज़िंदगी समाज के ठेकेदारों की भेंट चढ़ जाती है। पर हाँ एक आशा है और आशा कभी नहीं मरती।

मातृत्व महत्वपूर्ण है। फिर चाहे वह ‘हिरणी’ ही क्यों न हो। हर माँ की आत्मा अपने बच्चे में बसती है। हिरणी भी एक माँ है जो अपने शावक को शिकारी के पंजों से भी बचा लेती और तब ज़िंदगी एक और जादू करती है। भक्षक को रक्षक बना देती है। लछिनाथ भी द्रवित हो जाता है भाव की उस भाषा से जिसमे मानो हिरणी के रूप में एक माँ कह रही थी-

‘यह बच्चा मेरी वंशबेल है। इसे मत मारो। मैं ढलती उम्र हूँ। मेरा गला रेत ले।‘

समाज के एक अन्तर्समाज सपेरा समाज की कहानी है टोकरे में गांठ। जिसमें प्रेम,  वासना और षड्यंत्र को पूरी तल्खी के साथ उभारा गया है।

इसी तरह भारतीय दलित समाज की भी विडम्बना है। वह एक ओर जाति मुक्त भी होना चाहता है और ऊंची जात का भी कहलाना चाहता है। चमरवा इसी सामाजिक विरोधाभास को व्यक्त करती कहानी है जहाँ चमरवा बाम्भन न तो पूरे चमार रहे और बाम्भन तो उन्हें बाम्भन मानें ही क्यों?। यहाँ प्रश्न भी है कि समाज का दलित वर्ग असल में चाहता क्या है? जातिमुक्त समाज, ऊंची जाति का समाज या फिर खुद को ऊँची जाति में देखना। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह ऊपर से कुछ भी कहे पर अंदर उसके भी ब्राह्मण समाज का हिस्सा बन जाने की अदम्य इच्छा है?

 संग्रह में कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं जिनमें ऊँची जातियां एक अलग किस्म से चुनौतियां पाती नज़र आ रही हैं।  सत्ता और पद अस्पृश्य को भी सम्मानित बना देते हैं। और कहानी की बानगी देखिये कि चमार सीधा चौधरी बन जाता है। पंडित जी जाति का दंभ भूल जाते हैं और जिससे छूत मानते थे, उसके घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। और तब एक बार फिर यह स्थापित होता है कि ज्ञान के आगे सत्ता है और सत्ता के आगे जाति नहीं टिकती। ज्ञान ही एकमात्र ऐसा तत्व है जो सारे समीकरण उलट-पलट कर देता है। ज्ञान ऐसी संपदा है जो किसी को भी राजा बना दे। निम्नता को सहज ही उच्चता में बदल दे। ऐसे में यानी ज्ञान और सत्ता के प्रभाव में जाति एक ऐसा क्षुद्र संबोधन मात्र बन कर रह जाती है जिसका होना ना होना एक गैर जरूरी चीज लगता है।

ज्ञान से ही सत्ता प्राप्ति का रास्ता खुलता है और सत्ता से जाति का दंश मिटता है यही वजह है कि डॉ0 भीमराव अंबेडकर ने अपनी त्रिदेव की अवधारणा में प्रथम देव ज्ञान को मानते हुए कहा है-

“मेरा प्रथम देवता ज्ञान है मैं ज्ञान की उपासना करता हूं बगैर ज्ञान के मनुष्य को मानवता तथा शांति नहीं मिलती।“

11 कहानियों में से यह तो सिर्फ गिनी-चुनी कहानियां है। शेष कहानियां  भी इसी रवानगी पर हैं। जिनका लब्बोलुआब यह है कि कहानियाँ जीवन परोसती हैं और जीवन परोसने की प्रक्रिया में जीव विशेष का अंतर भी मिट जाता है। बकरी के बच्चे, हिरणी, मुर्गी सबके सब दास्ताँने ज़िंदगी कहते हैं और यह दास्ताँ इंसानी दास्ताँ से बिल्कुल अलग नहीं। जीवन जीवन है फिर फिर चाहे यह इन्सान का हो या किसी का भी। किसी हिरणी, मुर्गी बकरी या फिर सांप का भी। अब इस पर दुखी होना चाहिए या विचार करना चाहिए, ये लेखक ने पाठक पर छोड दिया है।

इस संग्रह को केवल ‘दलित-कहानियों’ के चश्में से नहीं देखा जा सकता। कथ्य की विविधता पाठक के समक्ष ऐसे अंतर-समाजों का उद्घाटन करती है कि जिसके बारे में उसने शायद ही पहले कभी सुना या पढ़ा हो। एक या दो नहीं संग्रह की अधिकांश कहानियों की ये विशेषता है।

 यह तो रही कहानियों के विचार तत्व की बात। पर विचार तब तक किसी मतलब का नहीं होता जब तक शिल्प से उसे सँवारा न गया हो। भाषा में उसे प्यार से सहेजा न गया हो। इस लिहाज से भी साम्भरिया जी बहुत सजग रहे हैं। सजगता के साथ सहजता भी ऐसी है कि कहीं कुछ भी अटकता भटकता नहीं है। देसी राजस्थानी संस्कृति अपनी सौंधी सुगंध वाले भावमय शब्दों के जरिए दिल तक उतर जाती है और व्यक्ति को सहज ही पाठक बना देती है। इस संबंध में संपादक महोदय का कथन उल्लेखनीय है-

“लेखक की विशेषता है कि वह अपने कथानक के अनुसार आरंभ से ही कथ्य की भाषा का सगुम्फन करता है। वेदना और वर्चस्व के विरोध में प्रतिरोध, प्रतिशोध, अधिकार, विद्रोह और चेतना की भाषा है। राजस्थान और हरियाणा के सीमा क्षेत्र की  भाषा है।”

भाषा में देसीपन बहुत लुभाता है। किवाड़, सान्कल, गूदड़-गाबा, मटका, बेंत, सिल, चूल्हा, चिमटा, फ़ूंकनी जैसे शब्द शहर की चारदीवारी से निकालकर पाठक को गांव की खाट पर बैठा देते हैं। ये शब्द गांव-देहात को मन में रमा देते हैं।

कुल मिलाकर कहें तो ये कहानियाँ एक अलग किस्म का दस्तावेज़ हैं जो पाठक को अपने समय की समझ देती हैं, समाजों में बसे अन्तर्समाजों से जोडती हैं और समय की नब्ज़ टटोलती हुईं दलित शब्द की परिभाषा को भी बदलती नज़र आती हैं।