रविवार, 28 नवंबर 2021

राम की शक्ति पूजा : एक विश्लेषण


 

                                                        

                             

सन् 1936 में छपी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ महाकाव्यात्मक औदात्य, प्रबंधात्मक योजना और नाटकीय विधान से युक्त लंबी कविता है। 8 दिनों के देशकाल से संबंधित यह  कविता एक ही स्थान पर घटित होती है और आठ दिनों की अवधि को अपने में समेटे है। कुल मिलाकर संकलन त्रय (घटना, काल और स्थान) की पूरी योजना इस कविता में घटित होती है।

कविता की कथावस्तु सुपरिचित घटना राम रावण के युद्ध पर आधारित है। जिसमें संघर्ष, द्वन्द्व और पराजय के भाव से विजय की ओर प्रयाण है। साधना से सिद्धि की ओर प्रयाण है। यहाँ प्रतीकों और व्यंजनाओं के साथ जीवन साधना, जीवन संघर्ष और अंततः महानंद से युक्त जीवन सिद्धि की एक नई व्याख्या प्रस्तुत है और यह व्याख्या पौराणिक कथा का वह स्वरूप प्रस्तुत करती है जो आज की स्थितियों में भी प्रासंगिक है और मानव एवं महामानव के बीच एक सूत्र स्थापित करती है।

पूरी कविता दो खंडों में बँटी नजर आती है। कविता का आरंभ होता है, सूर्यास्त होने से। यहाँ अस्त हुआ सूर्य केवल संध्या वेला या एक दिन के युद्ध की समाप्ति का ही संकेतक नहीं है बल्कि सूर्यवंशी राम के हतोत्साहित होने का भी संकेतक है। राम अकेले नहीं हैं, उनके साथ उनके कुल की मर्यादा भी जुड़ी हुई है। अतः उनकी पराजय केवल उनकी पराजय नहीं है बल्कि उनके साथ रघुवंशियों की ख्याति भी दाँव पर लगी है। सूर्यवंशी हारते नहीं हैं, अन्याय हारता है। अब तक यही होता आया था। पर इस बार स्थिति अलग है। जहाँ न्याय के समक्ष अन्याय को परास्त होना था, वहाँ समर अनिर्णीत ही रह गया! न्याय अन्याय के युद्ध का अनिर्णीत रह जाना धर्म और न्याय पर आस्था की भी पराजय है। और आस्था की पराजय किसी भी समाज के लिए सबसे बुरी घटना है। यही कारण है कि हर परिस्थिति में स्थिर चित्त रहने वाले राम विचलित हो गए हैं। उनके मन में अपनी विजय के प्रति आशंका उत्पन्न हो गई है। राम को लग रहा है कि रावण का पक्ष प्रबल हो गया है। उसे हराना संभव नहीं। आज के युद्ध में उन्होंने अपने अमोघ, मंत्रपूत अस्त्रों का प्रयोग किया था। पर वे बाण जो कभी लक्ष्य भ्रष्ट नहीं होते थे वे भी आज विफल हो गए! रावण को उनसे कोई हानि नहीं पहुंची जबकि रावण की ओर से चलाए गए अस्त्रों से राम की पूरी सेना हताहत हो गई! हनुमान के अतिरिक्त सभी दल नायक रावण की सेना का सामना करने में असमर्थ रहे हैं। स्वयं राम भी क्षत-विक्षत हैं। ऐसा होना अप्रत्याशित था। पर ऐसा हुआ क्योंकि स्वयं शक्ति रावण की रक्षा कर रही थीं!-

आया न समझ में यह दैवी विधान

रावण अधर्म रत भी, अपना मैं हुआ अपर-

                                  यह रहा शक्ति का खेल समर, शंकर शंकर!

 वेदना का यही कारण है कि स्वयं शक्ति रावण का रक्षण कर रही हैं!

देखा है महाशक्ति रावण को लिए अंक

लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक

ईश्वर भी जब अन्याय के साथ हैं फिर न्याय, सत्य और नीति का क्या अर्थ हुआ? यही कारण है कि स्फटिक शिला पर बैठे राम सुग्रीव से कहते हैं कि-

 मित्रवर विजय होगी न समर

यहीं निराला के राम अलग धरातल पर आ जाते हैं। विजय के प्रति शंकित होना उन्हें सबसे अलग बनाता है और मानवीय धरातल पर ले आता है। साथ ही अब तक की राम कथाओं से एक सर्वथा भिन्न राम को उपस्थित कर देता है। कहीं न कहीं निराला का अपना व्यक्तित्व, उनका अपना आत्मसंघर्ष भी राम के साथ एकाकार हो जाता है। कविता के कई स्थल ऐसे हैं जहां ऐसा लगता है जैसे राम की छवि में निराला भी प्रतिबिंबित होने लगते हैं। फिर चाहे वह राम की रूपाकृति का वर्णन हो-

दृढ़ जाता मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल,

फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर वक्ष पर विपुल

अथवा राम द्वारा प्रथम स्नेह के वर्णन के साथ सीता की स्मृति हो -

                              ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत

जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत

या फिर अपने संघर्ष को याद करते हुए राम का अपने जीवन को धिक्कारना हो-

धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध

धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध

रामाख्यान के माध्यम से निराला अपना और अपने युग का संकेत भी देते चलते हैं।

निराला तुलसीदास से प्रभावित हैं। पर उनके राम तुलसी के राम की प्रतिकृति नहीं हैं। तुलसी के राम कहीं भी संशयग्रस्त नहीं होते। भय का लेश मात्र भी उनमें नहीं है। रावण के विरुद्ध विजय के प्रति तुलसी के राम के मन में जरा भी संशय नहीं है। वे दुखी होते हैं, रोते भी हैं पर उनके मस्तिष्क में स्पष्टता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे साक्षात परब्रह्म हैं। दृश्य जगत में उनका व्यवहार उनकी लीला मात्र है। तुलसी की रामकथा की बुनावट ही इस संशय को दूर करने के लिए है कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं बल्कि साक्षात परब्रह्म के अवतार हैं। जिन्होंने जन्म ही राक्षसों के विनाश के लिए लिया है। अतः राम का अर्थ अवतारी राम ही है। ‘राम नाम का मरम है आना’ जैसी कोई स्थिति नहीं है। तुलसी इस बात को ठोक बजा कर कहते हैं।   

 इसी प्रकार कृत्तिवास ओझा कृत बांग्ला में लिखी रामायण के राम हैं। तुलसी के राम से लगभग 100 वर्ष पूर्व कृत्तिवास रामायण के राम आते हैं। कृत्तिवास ने रामायण के आधार पर राम के चरित्र की परिकल्पना की हैं। इसी कृत्तिवास रामायण से निराला ने शक्ति पूजा का कथा प्रसंग लिया है। आधारभूमि वही है। कथासूत्र बहुत कुछ वहीं से ग्रहण किया गया है, किन्तु निराला की परिकल्पना इससे बहुत हटकर है। उसमें मौलिकता है। प्रसंग की बुनावट उनकी अपनी है।

निराला के राम ‘पुरुषोत्तम प्रवीण’ हैं। श्रेष्ठ मानव हैं। महा मानव हैं। पर ऐसे मानव हैं, जिसके जीवन में निरंतर ही संघर्ष है। जो उन संघर्षों की अधिकता से निराश भी अनुभव करते हैं। एक सामान्य मानव के समान उनका हृदय भी दुखी होता है। अन्याय के साथ शक्ति को देख उन्हें पराजय का भय भी होता है। तुलसी के राम भय मुक्त हैं। अपनी विजय के प्रति भी उनके मन में किसी प्रकार का कोई संशय नहीं है। पर निराला के राम में ‘रावण जय भय’ है।

अनीति से हारने का भय या शक्ति द्वारा रावण का पक्ष लेने की वेदना अकेले उनके भर की नहीं है। जो भी अपना मार्ग स्वयं चुनना चाहता है, जो भी सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना चाहता है, उसके जीवन में इतनी कठिनाइयाँ आती हैं कि जीवन ही दूभर हो जाता है! ऐसे में सहज ही प्रश्न उठता है कि ईश्वर कहाँ हैं? क्या अनीति और अन्याय के साथ हैं? यदि ऐसा नहीं है तो बुराई, दुष्टता जीतती नजर क्यों आती है? बुराई हमेशा शक्तिशाली नजर क्यों आती है? ये इस प्रकार के प्रश्न हैं जो साधना मार्ग पर चलने वाले हर मनुष्य को व्यथित करते हैं। ऐसे में संकल्प विकल्प की स्थिति उत्पन्न होती है। राम के समान अतीत की विजय स्मृतियाँ उसके हृदय को आंदोलित करती हैं-

फिर विश्व विजय भावना हृदय में आयी भर

वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत

फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत

 मस्तिष्क अतीत और वर्तमान को जैसे एक साथ उपस्थित करके प्रश्न करता है कि अब पराजय का क्या कारण है? ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है कि स्थितियाँ समान होने पर भी परिणाम अलग हैं? पर जब ऐसे में हृदय को यथोचित उत्तर नहीं मिलता तब अवसाद की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसी स्थितियों में आवश्यकता होती है एक ऐसे प्रबोधक की जो दुविधा दूर करे, मार्गदर्शन करे। जामवंत यहाँ ऐसे ही व्यक्ति के रूप में उपस्थित हैं, जो राम को प्रबोधते हैं। उनके संशयग्रस्त मन को मार्ग दिखाते हैं। जो स्थिति राम के लिए वेदना की कारक है, जामवंत को वह वैसी नहीं लगती-

बोले विश्वस्त कंठ से जांबवान

रघुवर विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण

हे पुरुष सिंह तुम भी यह शक्ति करो धारण

आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर

शक्ति स्वयं में निरपेक्ष है। किसी भी पक्ष-विपक्ष को चुनना उसका विषय नहीं है प्रत्युत वह साधना का विषय है। जो भी साधना करेगा, सिद्धि उसकी होगी। यहाँ साधना मार्ग में और अधिक समर्पण की बात है। रावण जो अनीति, अनाचार का प्रतीक है, जब वह शक्ति की साधना कर सकता है और सशक्त हो सकता है, तो फिर तपस्वी, मनस्वी, सत्यव्रत धारी राम के लिए क्या असंभव है? 

देखा जाए तो जीवन संघर्ष में यही प्रबोधन काम आता है। जब आस पास कोई नहीं होता तो अपना मस्तिष्क ही विगत की समस्त सकारात्मक स्मृतियों को शृंखलाबद्ध रूप में सामने रख देता है। क्योंकि पराजय या पराजय का आभास मृत्यु है और जीवन को मृत्यु भला कैसे स्वीकार्य हो सकती है? यही अंधकार में जलती हुई मशाल भी है। मानव मन निराशाजनक स्थितियों में भी प्रकाश बिन्दु खोज ही लेता है। निराला के राम मनुष्य मन की इसी प्रक्रिया को प्रस्तुत करते हैं। 

नाटकीय विधान के साथ कविता दूसरे चरण में प्रवेश करती है। यह दूसरा चरण खिलने से आरंभ होता है-

खिल गई सभा। उत्तम निश्चय यह भल्लनाथ

कह दिया ऋक्ष को मान राम ने झुका माथ 

 एक सुंदर विचार ने जीवन की दिशा ही बदल दी है। भ्रम और अवसाद के बादल जैसे छँट गए हैं। जीवनरण में विजय का मार्ग दिखाई देने लगा है। पर यह प्रसन्नता भी स्थायी हो यह जरूरी नहीं। क्योंकि साधना मार्ग कभी भी सहज नहीं हो सकता। राम शुद्ध भाव से शक्ति की आराधना करते हैं । यम, नियम आसन, प्रत्याहार, प्राणायाम को साधते हुए राम भौतिक स्थितियों से ऊपर उठ गए हैं। युद्ध की ध्वनियाँ अब उन्हें उत्तेजित नहीं कर रही हैं। किसी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया की स्थिति अब नहीं है। वे पूरी तरह से समाधिस्थ हैं और एक ही आसान पर देवी का जाप कर रहे हैं। 107 नील कमल अर्पित किये जा चुके हैं ब्रह्मांड में हलचल है क्योंकि सहस्रार भेदन की स्थिति आ चुकी है और सहस्रार भेदन का अर्थ है महाशक्ति की प्राप्ति। इस स्थिति में आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह जाता। आत्मा उन्मुक्त हो परमात्मा के चैतन्य रूप में मिल जाती है। यह स्थिति ही परीक्षा की स्थिति भी होती है। शक्ति-आराधन बिना परीक्षा के कहाँ संभव है? कथा में शक्ति एक नील कमल लेकर अन्तर्धान हो जाती हैं-

द्विप्रहर,रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर

हँस उठा ले गईं पूजा का प्रिय इंदीवर

राम एक बार फिर परास्त भाव में आ जाते हैं। साधना सम्पूर्ण होते-होते रह गई! सिद्धि से ठीक पहले साधना भंग हो गई! राम का हृदय एक बार फिर वेदना से भर उठता है-

धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध

धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध 

जानकी हाय उद्धार प्रिया का हो न सका!

 पर राम जैसे साधक की साधना कभी निष्फल जा सकती है क्या? राम का भौतिक मन तो परास्त हो चुका है पर उनका लोकोत्तर मन परास्त नहीं होता। हो ही नहीं सकता। वाल्मीकि ने राम की दो प्रतिज्ञाएँ गिनाईं हैं- न दैन्यम न पलायनम। निराला भी राम के हारे मन पर उस लोकोत्तर मन की स्थापना करते हैं। और अंततः मनस्वी राम की स्मृति उन्हें फिर प्रबोधती है-

कहती थीं माता मुझे सदा राजीव नयन

                                   दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण

पूरा करता हूँ देकर मात: एक नयन

कमल जैसे नेत्रों वाले राम उद्यत हो उठते हैं अपना नेत्र समर्पित करने को पर इससे पूर्व ही देवी आशीर्वचन कहते हुए उनका हाथ थाम लेती हैं-

होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन

कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन 

साधना मार्ग की विशेषता यही है कि यहाँ सब कुछ हविष्य है। जीवन भी हविष्य है। यदि इसके लिए पूरी तैयारी है तो किसी भी प्रकार की सिद्धि को प्राप्त करना असंभव नहीं। राम ऐसे ही हैं। वो यूँ ही ‘पुरुषोत्तम नवीन’ की संज्ञा नहीं पाते। वो निराश होते हैं। स्वयं को धिक्कारते हैं। पर उनका ‘कभी न हार मानने वाला मन’ उन्हें निराश नहीं होने देता और राम शक्ति का वरदान पाने में सफल होते हैं।

संकल्प-विकल्प से भरी यह कविता मानवीय चेतना की कविता है। गिरकर उठने की कविता है। जीवन संघर्ष में स्वयं को परखने की कविता है, विजय के योग्य बना देने की कविता है और अंततः विजय के महालिंगन की कविता है।

शिल्प की दृष्टि से देखें तो अपनी इस कविता में निराला ने भाषा के साथ भी अभिनव प्रयोग किये हैं। सामासिक पदावली के प्रयोग से भाषा सुगठित हुई है और उसमें अर्थगाम्भीर्य आ गया है। निराला का यह प्रयोग मंत्र शैली का सा भाव उत्पन्न करता है। आरंभिक 16 पंक्तियों में एक दिन के युद्ध का पूरा विवरण इसी शैली में प्रस्तुत किया गया है। पूरी कविता में तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार की भाषा जहां एक ओर कथानक की गरिमा के अनुकूल है वहीं दूसरी ओर कविता को औदात्य और नाटकीय गरिमा भी प्रदान करती है।

कथानक बेहद ही व्यवस्थित और कलात्मक रूप से विकसित होता है। राम का मानव रूप, ईश्वरीय रूप का संकेत, फिर साधक रूप तथा पुरुषोत्तम रूप कविता में नाटकीयता उत्पन्न करता है। पूरी सृष्टि उनमें ईश्वरीय रूप का दर्शन करती है। कवि ने स्वयं कई स्थलों पर उन्हें अतुल बल शेषशयन, सच्चिदानंद रूप, विश्राम धाम, युग अस्ति नास्ति के एक गुण गण अनिंद्य, अच्युत, राघवेंद्र आदि से संबोधित किया है। हनुमान जब अपने आराध्य के अश्रु देखकर विचलित हो उठते हैं तब भी राम की अलौकिकता का आख्यान स्वयं शिव और शक्ति के  माध्यम से होता है। इस प्रकार निराला इतिहास सिद्ध पौराणिक राम को एक नए विधान के साथ वर्णित करते हैं।

निराला ने शक्ति की आराधना में वैष्णव भक्ति की नवधा भक्ति का भी संकेत किया है साथ ही उस साधना में यौगिक साधना को भी प्रमुखता से स्थापित किया है। सप्त चक्र भेदन के साथ आठ दिन की साधना इसी यौगिक साधना का प्रतीक है। जिसमें कुंडली जागरण, आज्ञा और सहस्रार भेद का उल्लेख है। निराला जैसे स्थापित करना चाहते हैं कि यही भारतीय दर्शन है जहाँ पुरुषार्थ के साथ भक्ति और योग के समन्वय से सिद्धि होती है और मनुष्य को वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे वह मनुज होकर भी अवतारी हो जाता है। ब्रह्म और जीव का अंतर मिट जाता है। मानव महामानव बन जाता है। विश्व की किसी भी प्रकार की सिद्धि उसके लिए असंभाव्य नहीं रहती।

प्रबंधात्मकता की दृष्टि से घटनाओं का आरोह-अवरोह वस्तु विन्यास को कलात्मकता प्रदान करता है। उसी प्रकार से संवाद भी व्यवस्थित हैं और कथा को सुंदर प्रवाह देते हैं। राम जब अपनी ओर से भावोच्छवास प्रकट करते हैं तो जो संवाद हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। जामवंत द्वारा प्रबोधन भी महत्वपूर्ण है। केवल हनुमान के उड्डयन का प्रसंग ऐसा है जो कविता की प्रबंधात्मकता की दृष्टि से बहुत आवश्यक नहीं लगता। इस प्रसंग का महत्व राम के ईश्वरीय रूप की प्रतिष्ठा में ही सहायक है अन्यथा कथाक्रम की दृष्टि से इसका विशेष महत्व नहीं।   कुल मिलकर कह सकते हैं कि हरि अनंत हरि कथा अनंता के कथन को पुनर्स्थापित करती यह कविता निराले राम का सुंदर आख्यान है। जहां निराले राम को पढ़ना मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की ओर प्रयाण को पढ़ना भी है, युग संघर्ष को पढ़ना है और इसके साथ छायावादी कविता के उत्कर्ष को भी पढ़ना है।

संदर्भ  :

Nirala : kriti se sakhshatkaar, nandkishor naval, rajkamal prakashan

Aparajey Nirala, Dr. Ashish pandey, bhartiya sahitya inc.

http://kavitakosh.org

http://www.drishtiias.com

http://kolhanuniversity.ac.in

http://m.youtube.com