शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

वृद्ध व्यवस्था की आह

कल समलैंगिकता के मुद्दे पर सोचते हुए यूँ ही कुछ लिख दिया। पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी जानने का सुख प्राप्त हुआ, अनुभव कुल मिला कर अच्छा रहा। लोग इस मुद्दे पर सोच रहें हैं और सोचने लायक तरीके से सोच रहे हैं। यह वाकई अच्छी बात है। लेकिन जो बात मुझे सोचने पर विवश कर रही है, वो यह है कि असल मुद्दा समलैंगिकता का है ही नही, मुद्दा है उस व्यवस्था का जो कुछ सामान्य से विषय को भी महत्त्व का विषय बना कर सोचने पर विवश कर देती है। ज़ाहिर सी बात है, कि असली मुद्दा पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के वृद्ध स्वरूप को समझने का है।
वृद्ध इसलिए क्यूंकि मातृसत्तात्मक व्यवस्था के पराभव के बाद से इस व्यवस्था ने एक लंबा सफ़र तय किया है और इस सफ़र के दौरान इसमें कई तरह से बदलाव आए। इस व्यवस्था के अधीन इकाइयों ने इस पर जैसे - जैसे बदलाव के लिए दबाव बनाया, इस व्यवस्था को बदलना पड़ा। हाँ कई स्तरों पर बदलने का ढोंग भी अच्छा खासा करना पड़ा, सो इसने वो भी किया। मूल से अब तक काफ़ी कुछ इसके साथ घटा। यह जन्मजात युवा तो पैदा हुआ ही था, पर आजन्म युवा रहना इसकी नियति नही थी। यही कारण है कि यह भी वृद्ध हुआ और होता जा रहा है। इसकी जड़ें कमज़ोर हुईं, पकड़ ढीली हुई मगर इसके आत्मबल में कोई परिवर्तन नही आया। उसी आत्मबल का प्रमाण है कि यह अब तक जीवित है। वृद्ध ज़रूर हो गया है मगर आवाज़ में अब भी वही तल्खी है जो पहले हुआ करती थी। पहले मतलब तब जब इसने मातृसत्तात्मक व्यवस्था को विस्थापित किया था। खैर.....
समाज शास्त्र की दृष्टि से समाज का अस्तित्व सामाजिक इकाइयों के नियमन द्वारा उचित व्यवस्था की निर्मिति में निहित है। इस व्यवस्था के अनुसार जो इकाई सबसे ताकतवर होती है, नियम बनाने का पूरा दारोमदार उसी के कन्धों पर होता है और उसके द्वारा जो नियम बनाए जाते हैं, वे नियम उसी केंद्रीय इकाई की सुविधा का ध्यान रखते हैं। अन्य इकाईओं का कार्य हर हाल में उन नियमों का अनुपालन होता है। यदि वे ऐसा नहीं करतीं तो तथाकथित व्यवस्था में उनके लिए कोई स्थान नहीं होगा। निश्चय ही उन्हें उस समाज से खदेड़ दिया जाएगा। पितृसत्तात्मक समाज का आरंभिक स्वरुप ऐसा ही था। पुरूष प्रधान इस व्यवस्था ने केवल पुरुष को स्वतंत्रता दी। उसने सभी महत्वपूर्ण पद पुरुष के लिए नियत किए। उसने मातृसत्तात्मक व्यवस्था को विस्थापित कर जिस नई भाषा का निर्माण किया वह भी उसी के वर्चस्व का एक प्रमाण थी। स्त्रियों को उसने अपने बाद दूसरा स्थान दिया। स्त्रियाँ उसके लिए महत्त्वपूर्ण थीं। उनसे उसका वंश चलता था, काम पिपासा पूर्ण होती थी। स्त्री के बिना उसका काम नहीं चल सकता था। इसलिए भाषा का कुछ अंश उनके खाते में भी चला गया। फ़िर भी भाषा में उच्च पद उन्हें कभी नहीं मिला। आधुनिक हिन्दी भी उसी पुरानी परम्परा को ढो रही है। राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, सब के सब पुल्लिंग शब्द है, स्त्रियों के लिए यहाँ किसी समानता की बात ही नही है। भाषा के ज़रिये स्त्री वर्ग को दोयम दर्ज़े का साबित किया जाता रहा। उनका निरंतर अपमान किया जाता रहा है, किन्तु स्त्री तो फ़िर भी ठीक रही एक और सामाजिक इकाई को तो इस व्यवस्था ने भाषा का भी अधिकार नहीं दिया गया। इस तीसरी इकाई को नपुंसक लिंग के नाम पर जो मुठ्ठी भर शब्द सौपें गए, क्या वो उस इकाई का अपमान नहीं था? स्थिति आज भी वैसी ही है, वह सामाजिक इकाई भाषा के नाम पर या तो पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग करती है या फ़िर स्त्रीलिंग शब्दों। जबकि सत्य यह है कि यह वर्ग न तो स्त्री की श्रेणी में आता है न ही पुरूष की। भाषिक अपंगता के ही कारण यह वर्ग या तो पुरुष के रूप में ख़ुद को खपाने की कोशिश करता है या स्त्री के रूप में। किसी भी इकाई को जब भाषा में स्थान नही तो समाज में उसे सम्माननीय स्थान मिलने की कैसे उम्मीद की जा सकती है ? जो भी हो आज वह इकाई भी समर्थ हो रही उसने भी अपने अधिकारों की मांग की, कुछ अधिकार उसे मिले भी और धीरे धीरे मिलेंगे भी। इसी प्रकार समलैंगिक इकाइयां भी है। ऐसा नही है कि यह ग्लोबलाइज़ेशन से उत्पन्न बीमारी है। इनका भी लंबा इतिहास है। दक्षिण भारत में देवी येल्ल्म्मा को नन्हीं बच्चियां समर्पित करने की लम्बी परम्परा इसका बहुत छोटा सा प्रमाण है। ग्रीस में देवी आइसिस को बच्चियां और महिलायें समर्पित की जाती थी। इंडोनेशिया, रशिया और भारत के अलावा कई संस्कृतियों में लेस्बियन कल्चर के प्रमाण मौजूद हैं। इसीप्रकार गे कल्चर के भी प्रमाण भारतीय ही नहीं अन्य संस्कृतियों में भी मिल जाते हैं। इन इकाईओं के स्वतंत्र अस्तित्व को यदि हम नकारते हैं तो निश्चित रूप से हम तर्कहीनता की ओर ही कदम बढाते हैं। तथ्यों से आँखें मूंदते है। कहने का तात्पर्य इस तरह के सामाजिक परिवर्तन कोई नई बात नही है। इतनी हाय तौबा जो मचाई जा रही है, वह इस वृद्ध पित्रिसत्तामात्क व्यवस्था की कसमसाहट भर है जो पूरी तरह स्वाभाविक भी है। जिन सामाजिक इकाइयों को अब तक दबा कर रखा गया था, वे जैसे जैसे विकसित होंगी, परिवर्तन तो होंगे। वृद्ध पितृसत्तात्मक समाज की बूढी पसलियाँ चर्मरायेंगी हीं। यह तो अवश्यम्भावी है, होना ही होना है। यह तो वैज्ञानिक सत्य है, कि जिसे जितने दबाया जाता है वह उतने ही दम के साथ उठ खड़ा होता है। शक्ति आख़िर जायेगी कहाँ। वह तो क्रमशः संचरित होती है, यही नियम है।
यह आधुनिकता के बाद का युग है, हाशिये पर पड़े समूहों का मुख्य धारा में आने का युग है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, के बाद अब समलैंगिक विमर्श का युग है। साथ ही यह पितृसत्तात्मक समाज के वृद्ध स्वरूप को नए सिरे से विमर्श के दायरे में लाने का भी युग है...........