शनिवार, 4 जुलाई 2015

कुछ नहीं है





घुंघराले बाल, खुशनुमा प्यारी हीरे सी चमकदार आंखें और आंखों में झलकती एक अल्हड़ मासूमियत। 
दीदी मैं आपके साथ मैट्रो में चलूंगा और फिर हम लोग चिड़ियाघर चलेंगे। कितने सारे जानवर होते हैं न वहां पर!! कितना मज़ा आएगा न। उसकी बात सुनकर मैंने कहा कि हां वो तो ठीक है पर मैंने सुना है कि जबसे चिड़ियाघर वालों को पता चला है कि तुम दिल्ली आए हो, उन्होंने तुम्हारे लिए भी वहां एक पिंजरा बनवा के रख लिया है। इसलिए कहीं ऐसा न हो कि वो तुम्हें पकड़कर पिंजरे में डाल दें। फिर क्या होगा?
मेरी बात सुनकर अंशुल खिलखिलाकर हंस पड़ा और बोला। दीदी आप भी न। मुझे क्यों पकड़ेंगे मैं कोई जानवर लगता हूं क्या?
अंशुल की बात सुनकर मैंने बनावटी गंभीरता से कहा कि मुझे तो तुम कुछ कुछ इंसान जैसे लगते हो पर शायद उन्हें नहीं लगते तभी तो उन्होंने तुम्हारे लिए पिंजरा बनवाया है। 
हां दीदी पर उन्हें भी नहीं लगूंगा। मेरी कोई पूंछ थोडे़ ही है। 
उसकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई। मैंने कहा कि बस यही अंतर है तुममें और चिड़ियाघर के जानवरों में। वैरी गुड।। फिर तो उन्होंने बिल्कुल ठीक किया। मैं सोच रही हूं कि मैं ख़ुद ही तुम्हें चिड़िया घर  छोड़ आऊे़़़़़   बेकार में चिड़ियाघर वाले परेशान होंगे।।
अपना मज़ाक उडते देख अंशुल चिड़चिड़ाते हुए बोला- दीदीईईईईई अच्छा सुनो न। सीरियस होके सुनो। 
मैंने सिर हिलाते हुए कहा चलो अच्छा ठीक है पर तुम्हीं ऐसे बात करते हो तो मैं क्या करूं। 
अच्छा चलो अब मेरी प्लानिंग सुनो कि मुझे दिल्ली में क्या-क्या घूमना है और आप मुझे घुमाने ले जाओगी। अंशुल ने मेरा हाथ खींचते हुए कहा। 
मैंने भी उसी के अंदाज़ में कहा- ओके। चिड़ियाघर भी?????
दीदीईईईई । 
अबके मैंने कुछ सीरियस होकर कहा-ओके अच्छा चलो बताओ। 
अंशुल छोटी-छोटी उंगलियों पर गिनाते हुए मुझे बता रहा था कि हमें मैट्रो में घूमना है, कुतुबमीनार में घूमना है और  हां लालकिले में भी घूमना  है और हां चिड़ियाघर में भी घूमना है आपके साथ... और फिर शरारती आंखें नचाते हुए बोला- चिड़ियाघर में अगर उन्होंने मुझे बंद कर दिया तो.. आप भी तो मेरे साथ होंगीईईई तब आयेगा मज़ा... अपन दोनों शेर के साथ बैठकर डिनर किया करेंगे। 
अंशुल की बात सुनकर मैंने मुंह सिकोड़ते हुए कहा उहं वो तो नाॅन वैजिटेरियन होता है। 
हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं चलो अपन अकेले ही खा लेंगे अंशुल ने मस्ती में सिर हिलाते हुए कहा। 
मैंने भी उसीके अंदाज़ में सिर हिलाते हुए कहा कि हां ये ठीक है। 
चलो और बताओ। और क्या-क्या मज़े करने हैं हमें। 
और? ऊंऊ.... बस इतना ही काफी है। मुझे घर जाकर पढ़ाई भी तो करनी है। दीदी मैं न जब से यहां आया हूं न, मेरी पढ़ाई का बहुत नुकसान हो गया। फिफ्थ क्लास में न मैं फर्स्ट आया था पर यहां आने के चक्कर में मेरे दो पेपर छूट गए... अब कंपार्टमेंट आ जाएगी। दोनों हाथों पर अपने गाल टिकाए अंशुल अचानक से बहुत उदास हो गया था। मैंने उसके घुंघराले बालों में उंगलिया घुमाते हुए कहा अंशुल ----यार तुम तो बड़े समझदार निकले। अभी छटी क्लास में हो और पढ़ाई की इतनी टेंशन करते हो। अगर मैं भी तुम्हारे जैसी समझदार होती तो आज पता नहीं कहां से कहां पहुंच गई होती। 
मेरी बात सुनकर अंशुल ने उत्सुकता से अपना सिर उठाया और मेरी आंखों में झांककर बोला- कैसे? आप तो इतनी इंटेलीजेेंट हो.. फिर?
मैंने भी मज़े लेते हुए कहा- छोड़ो न अंशुल तुमने किसी को बता दिया तो? सब हंसेंगे मेरे ऊपर। 
नहीं बताउंगा दीदी बताओ न प्लीज...
नहीं नहीं कोई और बात करते है। मैंने थोड़ा और भाव खाते हुए कहा। 
दीदी बताओ न? प्लीज़.. अंशुल ने मेरा हाथ खींचते हुए कहा। 
अबके मैंने गंभीर होते हुए कहा- ओके चलो बताती हूं। पर किसी को बताना नहीं, बहुत ही गंभीर किस्म की बात है। 
अंशुल ने मुझे आश्वासन देते हुए कहा पक्का दीदी। अब बताओ भी। 
मैंने बताना शुरू किया-
तो सुनो, जब न मैं आठवीं क्लास में थी तो तब मेरे मिड टर्म एग्ज़ाम थे। मैंने डेटशीट देखी नहीं ध्यान से। इसलिए जिस दिन हिंदी का एग्ज़ाम था मैंने सोचा कि आज तो छुट्टी है और सोती रही दिन भर। अगले दिन जब पेपर देने पहुंची तो पता पड़ा कि हिंदी का पेपर तो कल हो गया और आज तो गणित का पेपर है। 
क्या???????? दीदी आप सच कह रही हो? फिर क्या हुआ जब पापा को पता पड़ा?
कुछ नहीं पापा ने बस थोड़ी पीठ थपथपाई थी मेरी। 
अंशुल खिलखिलाकर हंसते हुए बोला- पीठ नहीं थपथपाई होगी पिटाई की होगी।
मैंने कहा कि जो भी है, पीठ पर ही हुआ था तो मैं तो यही कहूंगी कि पीठ थपथपाई थी। 
ख़ैर मोरल ऑफ़ द स्टोरी ये है कि पेपर छूटने से कुछ नहीं होता। जो इंटेलीजेंट होता है वो पेपर छूटने के बाद भी इंटेलीजेंट ही रहता है। आगे सब कवर हो जाता है। आया समझ में -----मैंने उसके कान खींचते हुए कहा।
हां दीदी मैं सब कवर कर लूंगा। खूब पढ़ाई करूंगा देख लेना। अंशुल ने मस्ती में अपना सिर हिलाते हुए कहा। 
उसका उत्साह उसकी शीशे से चमकीली आंखों में ऐसे झलक रहा था जैसे सुबह के मासूम सूरज की हल्की किरणीली धूप उसकी आंखों में उतर आई हो। 
मैं जैसे एक पल के लिए खो गई थी। अचानक उसने मेरी नाक को पकड़कर कहा- क्या हुआ दीदी? मैंने भी उसका कान खींचते हुए कहा- नाॅटी ब्वाॅय!! और हम दोनों ही हंस पड़े। 
उस दिन के बाद क़रीब एक हफ्ते तक मैं उससे मिलने नहीं जा सकी। अंशुल से मिलने का मन तो बहुत होता था पर कई कारणों के चलते उससे मिलना संभव नहीं हो सका। एक ज़बर्दस्त विरोधाभासी सी स्थिति से गुज़र रही थी मैं उस समय। एक ओर काॅलेज की पढ़ाई तो दूसरी ओर उससे मिलने की आतुरता। उसके साथ कुछ वक्त गुज़ारने का लालच। और इसके साथ ही एक अजीब सा दर्द या शायद दर्द क़िस्म की कोई चीज़ जो बहुत तक़लीफ देती थी। जब एम्स का वो दृश्य मेरी आंखों की पुतलियों से फिसलकर मस्तिष्क तक फैल जाता था। वो दमघोंटू माहौल। अस्पताल के बाहर और भीतर ऐसा लगता था जैसे कराहती हुई पूरी एक दुनिया सिमट आई हो और जिसकी कराहों से आस-पास की दुनिया को कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। बिस्तरों पर पड़े मरीज़। मरीज़ों के रिश्तेदारों के थके और परेशान चेहरे। सफेद कोट और गले में आला लटकाए डाॅक्टरों की आवाजाही और---और इन सबके बीच मौसी-मौसाजी और------अंशुल-----
अस्पताल के एक बिस्तर पर अंशुल। ब्लड कैंसर की लाइलाज हो चुकी बीमारी से मुस्कुराकर लड़ता अंशुल। 
ठीक एक हफ्ते बाद मैं उससे मिली। हफ्ते भर में ही वो थोड़ा सा और कमज़ोर हो गया था। आंखों के नीचे काले घेरे मुझे अवाक  कर रहे थे। पर सब नाॅर्मल है। यही तो दिखाना है मुझे। इतना तो मैं कर ही सकती हूं और अगर इतना भी नहीं कर सकती तो शायद कभी भी कुछ भी नहीं कर सकती। मैंने यही सोचा था उस वक्त ख़ैर---
मुझे देखते ही उसकी मुरझाए चेहरे पर चमक आ गई। आंखें हीरों सी चमक उठीं। वो चहककर बोला। दीदीईईईई--- आप आ गईं। मैं कब से आपका इंतज़ार कर रहा था। आप आईं क्यों नहीं मुझसे मिलने..अंशुल एकदम मुझसे लिपट गया। 
मैंने उसके हाथ में चाॅकलेट थमाते हुए कहा कि अंशुल मैं तुम्हें अब क्या बताऊं। बड़ी गड़बड़ हो गई। मेरे काॅलेज के सर को ये पता चल गया कि स्कूल में मैं पेपर देना भूल गई थी। इसलिए अब वो बहुत स्ट्रिक्ट हो गए हैं। कहते हैं कि स्कूल का पेपर छोड़ दिया सो छोड़ दिया पर काॅलेज का पेपर छोड़ा तो तुम्हारी ख़ैर नहीं। मैंने रुआंसा मुंह बनाते हुए कहा। 
सच्ची दीदी? अंशुल ने अपनी गोल-गोल आंखों को पूरा खोलते हुए कहा।
और नहीं तो क्या? मैंने संजीदगी से कहा। 
ओ दीदी यह तो समस्या हो गई तुम्हारे लिए!!
पर दीदी सर को कैसे पता चला?
पता नहीं अंशुल मैं भी यही सोच रही हूं..
कहीं आपके स्कूल वाले सर ने तो नहीं बताया?
क्या पता? ख़ैर छोड़ो न.. आज तो आ गई हूं न, क्या ये फालतू पढ़ाई-वढ़ाई की बात करनी। आज तो हम खूब मस्ती करेंगे। ठीक है न? 
हां ठीक है पर आप पूरा दिन यहीं रुकोगी न?
हां भाई पक्का। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। 
दीदी मैं न यहां बहुत बोर हो जाता हूं... मुझे अच्छा नहीं लगता यहां। घर कब जाऊँगा दीदी? अचानक से अंशुल ने बेहद थकी सी आवाज़ में कहा। 
पता नहीं क्यों मुझे उम्मीद नहीं थी कि वो ऐसा कुछ कहेगा। मुझे समझ ही नहीं आया कि उसकी इस बात का क्या जवाब दूं। कलेजा मुंह को आना क्या होता है, यह उस वक्त समझ आया था मुझे और तब अपने आवेग को बड़ी मुश्किल से रोकते हुए मैंने पूरी गंभीरता से उससे कहा कि बहुत जल्दी अंशुल। और अंशुल ये मैं नहीं कह रही हूं खु़द डाॅक्टर ने कहा मुझसे। 
नहीं दीदी आप झूठ बोल रही हो मुझसे। मुझे ये डाॅक्टर बिल्कुल अच्छे नहीं लगते। बहुत गंदे हैं। पता है दीदी जब वो मेरी कमर में छेद करते हैं न तो बहुत दर्द होता है। तीन बार कर चुके हैं वो मेरी कमर में छेद और जब मैं रोता हूं तो कहते हैं कि अभी तो और भी करेंगे। जब तक तुम्हारा बोनमैरो नहीं निकलता तब तक करेंगे..
दीदी ये बोनमैरो क्या होता है? 
मैं अवाक सी उसकी बातें सुन रही थी। अपने प्रश्न का जवाब जानने की उसे उत्सुकता नहीं थी, वो तो अपना दर्द बताए जा रहा था.. 
दीदी अब वो ड्रिल वाला आॅप्रेशन फिर से होगा। अचानक उसकी आंखों में चमक आ गई और वह बोला। दीदी पर एक बात बताऊं? अब न मुझे दर्द नहीं होता। पता है कैसे? जब न वो ड्रिल घुमाते हैं तो मैं खूब तेज चिल्लाता हूं तो दर्द न कम हो जाता है। है न अच्छा आइडिया? 
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूं? शब्दों की ऐसी कमी और भावों को छिपाने का ऐसा प्रयोग मेरी ज़िंदगी में अब तक नहीं हुआ था। असल में तो मुझे भी यूं लग रहा था कि बाहर जाकर मैं भी ज़ोर से चिल्लाऊं। ऐसी सुनसान जगह पर चली जाऊं जहां कोई न हो। मुझे लग रहा था कि मैं दुनिया की सबसे नकारा लड़की हूं। जिं़दगी की चाह लिए एक छोटा सा बच्चा मेरी आंखों के सामने दर्द और तकलीफ़ से मर रहा है, और मैं उसके सामने गप्पे हांक रही हूं। क्या वो यह सब समझता नहीं होगा? उफ्फ---
अंशुल तो अपनी बात कहे जा रहा था- दीदी मुझे अच्छा नहीं लगता। पता है पापा डाॅक्टरों के पैरों में पड़े रो रहे थे और कह रहे थे कि डौक्टर साब बचा लो मेरे इकलौते अंशुल को। और डाॅक्टर कह रहे थे ये नहीं बचेगा। 
दीदी मैं नहीं बचूंगा क्या? वैसे दीदी मुझे हुआ क्या है? जो भी हो दीदी मैं यहां नहीं रहना चाहता। यहां के डाॅक्टर बहुत बुरे हैं। ये डाॅक्टर मुझे कुछ नहीं करने देंगे। मुझ्रे अभी पेपर देने हैं। बड़े पापा से मिलने जाना है और दीदी मैट्रो, कुतुबमीनार और चिड़िया घर भी तो देखना है। दीदी सुन रही हो न?
वो बोलता जा रहा था-- कहे जा रहा था अपनी बात और मैं पूरे ध्यान से उसकी बात सुनने का नाटक कर रही थी। ध्यान तो बस इसी ओर था कि आंख की पुतलियांे के पीछे छिपा आंसुओं का सैलाब कहीं पलकों से नीचे न उतर आए। फिर भी मैंने पूरे विश्वास के साथ अंशुल से कहा कि तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे अंशुल और जिस डाॅक्टर ने तुमसे और मौसाजी से ऐसी बदतमीज़ी की थी न उसे बड़े डाॅक्टर ने बहुत बुरी तरह से डांटा। अब वो कभी ऐसे बात नहीं करेगा। तुम देखना। तुम बस जल्दी से ठीक हो जाओ फिर हम पिकनिक पर चलेंगे। खूब सारे गोल-गप्पे खांएगे। 
अंशुल भी जैसे पुरानी बात भूल गया और बोला हां दीदी और चाउमीन भी खांएगे खूब सारी। 
पक्का। पर फिलहाल हम चिप्स तो खा सकते हैं न?
चिप्स?? कहां है?
आंखें बंद करो शायद मिल जाए। 
छोटे बच्चों की तरह अंशुल ने आंखें बंद कर लीं और मैंने अपने बैग से धीरे से चिप्स के पैकिट निकालकर उसकी गोद में रख दिए। अंशुल एक बार फिर खुशी से उछल पड़ा। उस दिन हमने ख़ूब मस्ती की। मैं अंशुल को लेकर वहां के गार्डन एरिया में गई मौसी-मौसाजी भी साथ थे। हम सबने साथ मिलकर वहीं खाना खाया। खाने में मम्मी ने ख़ास तौर से अंशुल की पसंद का ध्यान रखा था। खट्टे-मीठे अनुभवों को लिए वो दिन भी बीत गया। दिन अकेला नहीं बीता। उसके साथ बीती बहुत कुछ मैं और बहुत कुछ अंशुल भी। 
फिर एक लंबा अंतराल------
मैं मां से कहती रही कि मुझे अंशुल से मिलने जाना है, वो अकेला बोर होता है वहां, आप लोगों के जाने से कुछ नहीं होता वो मुझसे बहुत बातें करता है, इसलिए मिस करता होगा मुझे। पर मां का हर बार यही जवाब होता कि मिल लेना उससे, ठीक है वो। डाॅक्टरों ने अभी मिलने से मना किया है। मैं और तुम्हारे पापा जा रहे हैं न! मुझे लगता कि मां इतनी रुखाई से क्यों बोल रही हैं। पर यह सुनकर अच्छा लगता था कि अंशुल अब ठीक है। मैंने सोचा कि चलो ठीक है कि उसकी स्थिति में सुधार है, वर्ना मैं तो कुछ और ही देख-सुन आई थी। एक बार थोड़ा स्वस्थ हो जाए फिर जहां उसका मन करेगा उसे घुमाने ले जाउंगी। 
पर दो-दिन बाद न जाने क्या हुआ मुझे। मैं क्लास में थी। सर के सामने की बैंच पर। अचानक से मुझे रोना आ गया। इतना रोना इतना कि क्या कहूं। मैं रोए जा रही थी। सब पूछ रहे थे कि क्या बात हो गई अचानक? तबीयत ठीक है वगैरह.. पर मैं क्या बताती। मुझे खु़द ही नहीं पता था। ये अचानक से मुझे क्या हो गया मैं खु़द भी हैरान थी। ख़ैर घर आकर मैंने मां को भी रोते हुए और अपने आंसू छिपाते हुए देखा। वो रो रहीं थीं पर क्यों रो रहीं थीं ये मुझे नहीं बताना चाहती थीं। पर सच वही था जो मैं जान चुकी थी। 
अंशुल जा चुका था। उसी ड्रिल के दर्द से हारकर जिसे वो चिल्लाकर कम कर दिया करता था। पर उस दिन दर्द जीत गया और वो हार गया। ठीक दो दिन पहले ही। ठीक उसी वक्त जब क्लास में मैं रो पड़ी थी। विधि का कैसा विधान! जिन आंसुओं को मैं बेवजह समझ रही थी, वो बेवजह नहीं थे। इस दुनिया में शायद कुछ भी बेवजह नहीं होता। अंशुल अपने हिस्से के आंसू लेकर मुझसे विदा हो गया था। शायद मेरी आंखों में उमड़े आंसुओं के साथ वो यह कहने आया हो कि दीदी तुम नहीं आईं न मुझसे मिलने?
मस्तिष्क में शून्यता चिल्ला रही थी कि क्यों ज़िंदगी से भरपूर ज़िंदगी मौत के आगे हार जाती है? क्यों इस मौत को मासूम ज़िंदगियों पर तरस नहीं आता? क्यों जिं़दगी में कुछ ट्रांसफरेबल नहीं होता। अगर होता तो मैं अपनी ज़िंदगी उसे ट्रांसफर कर देती। पर नहीं यह सब फिज़ूल की बातें हैं। ऐसा कुछ नहीं होता। और अकसर जैसा हम चाहते हैं वैसा तो कभी भी कुछ नहीं होता। मुझे लग रहा था कि मैं भी कुछ-कुछ ख़त्म सी हो गई हूं। लग रहा था कि कहीं भी कुछ भी नहीं। कुछ समझ में आ रहा था तो बस नियति का घूमता चक्र जिसके आगे कोई कुछ नहीं है-----