मंगलवार, 22 नवंबर 2022

एक टुकड़ा दिन




 एक आस भी 

 पूरी जी नहीं पाती

और बीत जाता है!

 लाख बचाती हूँ

पर नहीं बचता

एक पूरी सांस भी नहीं आती

और चवन्नी सा दिन

खर्च हो जाता है!

इस चवन्नी में भी 

 अरमानों के क्रोशिए से

मैं बुन लेती हूँ चाँद 

टाँक देती हूँ सूरज 

सिल देती हूँ ज़िंदगी की कतरनें

पसार देती हूँ सिलवटें 

बो देती हूँ सूखी आँखों में ख्वाब

और बाँध देती हूँ मुट्ठियों में आकाश जैसे-तैसे

मैं भरसक 

रेतीले वक्त को भी समेट लेती हूँ

बचपन की अपनी फ्रॉक के घेर में 

इस उम्मीद में कि

 दिन

चवन्नी से कुछ तो बढ़ेगा

सौदागर कुछ तो पिघलेगा

पर रोज़ ढलते-ढलते

फिर बहुत कुछ

 अनजिया, अनपाया सा रह जाता है

हरी आसें फिर कुम्हला सी जातीं हैं

कुछ बदलता तो नहीं, पर

दिन चवन्नी से भी और छोटा,

और छूटता जाता है

और उसके छूटने के साथ

तिनका-तिनका बिखरती जाती हूँ मैं भी..




गुरुवार, 17 नवंबर 2022

कुतर्क

 आज के समय की सबसे अद्भुत चीज़ है

कुतर्क

जिसके शौर्य के आगे धराशायी और ध्वस्त हैं ब्रह्मांड के सारे तर्क

इसलिये बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है

शास्त्रों को पढ़ना, उन्हें आत्मसात्  करना और ज्ञान की महत्ता स्थापित करके तर्कवान बनना

बल्कि ज़रूरी है अपढ़ रहकर बड़बोला होना, शास्त्रों को थोथा घोषित करना,

 अपने अज्ञान की खूबसूरत इबारत गढ़कर उसे दुनिया का अंतिम सत्य सिद्ध करना 

और क़त्ल कर देना सभी तर्कों को

इशारे में ही।

अगर आपमें है यह खूबी

तो यकीन मानिए

आप हैं इस दौर के सबसे ताक़तवर इंसान...

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

एक सपना ऐसा भी

 




बात उस समय की है जब अध्यापन के क्षेत्र में मैंने अपना पहला कदम रखा था। मैं जानती थी की यह क्षेत्र मेरे लिए जितना रुचिकर है, उतना ही चुनौतियों  से भरा भी है। कारण, यह मेरे अब तक के अर्जित ज्ञान की अध्ययन की, मेरे अनुभव की परीक्षा है। और मुझे इस परीक्षा में सफल होना है। कम से कम सफल होने का प्रयास तो करना ही है। इसी संकल्प के साथ मैंने एक स्कूल टीचर के रूप में अपनी पहली शुरुआत की।

मेरी क्लास में कुल ३५ बच्चे थे। जिनमे से ५ बच्चे क्लास में से अधिकतर अनुपस्थित रहते थे। उन बच्चों का रिकॉर्ड चैक करने पर मैंने पाया कि ये बच्चे इसे क्लास में एक साल फेल भी हो चुके हैं। साथ ही क्लास के बाकी बच्चों से भी उनके संबंध कुछ खासे अच्छे नहीं हैं। क्लास के बच्चे उन ५ बच्चों से दूर ही रहना पसंद करते थे। ये पाँचों बच्चे जब भी क्लास में आते, एक साथ ही आते, साथ-ही-साथ बैठते और एक ही साथ क्लास से अनुपस्थित भी रहते। इनके पास न तो किताबें ही होती और न ही होमवर्क ही पूरा मिलता। कई विषयों की तो इन्होंने कॉपियाँ तक नहीं बनाईं थीं जो कुछेक इनके पास किताबें थीं वो भी फटी सटी और जर्जर हालत में। मैं हैरान थी यह देखकर कि अब तक इन बच्चों पर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया?? इस बारे में मैंने अपनी कुछ अध्यापिका मित्रों से भी बात की। इस दौरान जो तथ्य निकलकर सामने आए वो वाकई चौकानें वाले थे। मुझे बताया गया कि ये बच्चे बहुत बिगड़े हुए हैं। पढ़ाई लिखाई में इनका मन ही कहाँ लगता है। मैंने कहा - इन बच्चों के पेरेंट्स से इस बारे में बात नहीं की? जवाब मिला - अजी पेरेंट्स को कहाँ टाइम है? फीस पहुँचा देते हैं टाइम पर यही क्या कम है?

फीस कौन पहुंचाता है?

कौन पहुंचाता है? यही बच्चे लेकर आते हैं और कौन?

मेरा माथा ठनका! मैंने फ़िर पूंछा - फीस लाने में ये बच्चे कोई आना कानी नहीं करते?

मेरी बात सुनकर मेरी मित्र मुस्कुराई और बोली - कैसी बच्चों जैसी बातें करतीं हैं आप भी... फीस नहीं लायेंगें समय पर तो, स्कूल से बाहर न निकाल दिए जाएंगे?

मेरी मित्र अनजाने में ही स्कूल में चल रहे शिक्षा के व्यवसायीकरण का संकेत दे रही थीं। स्कूल प्रशासन का सम्बन्ध केवल और केवल फीस बटोरने से था। बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं, उनके न पढ़ने के पीछे कारण क्या हैं? और उन कारणों को दूर कैसे किया जाए, इस बारे में सोचने का वक़्त किसे था। मैं समझ गई कि मेरी असली परीक्षा की घड़ी अब आयी है। इस पूरे प्रकरण को सुलझाना और उन बच्चों को सही राह पर लाना जैसे मेरा लक्ष्य बन चुका था। इसलिए एक दिन लंच टाइम में मैंने उन बच्चों में से एक बच्चे को जिसका नाम निशांत था, को अपने पास बुलाया। दरअसल, उन बच्चों की गतिविधियों का निरीक्षण करने पर मैंने पाया था कि निशांत इस पाँच के ग्रुप का केन्द्र था। जैसे- स्कूल आते या जाते वक़्त वह हमेशा बीच में चलता। क्लास में भी वह अपने ग्रुप के बीच में ही बैठता, यानी दो बच्चे उसके दायीं ओर और दो बायीं ओर। मुझे ऐसा भी लगा कि उसकी बात उसके ग्रुप में ज़्यादा सुनी और मानी जाती है। यही सोचकर मैंने निशांत को अपने पास बुलाया था। मैंने निशांत से कहा - " निशांत तुम रोज़ स्कूल क्यों नहीं आते? " निशांत ने लापरवाही से जवाब दिया- आता तो हूँ और कैसे आते हैं? मैंने निशांत के गाल पर हलकी सी थपकी देते हुए कहा- अच्छा सच्ची में... मेरी बात सुनकर निशांत झेंप गया और धीरे से बोला- " मेरे दोस्त बुला रहे हैं" कहकर उसने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे चेहरे पर टिका दी. मैंने उसे सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा  करते हुए  कहा- "बस वही तुम्हारे दोस्त हो सकते हैं। मुझे अपना दोस्त नहीं बना सकते???" मेरी बात सुनकर निशांत सकुचा गया। उसने कुछ कहा नहीं पर उसके चेहरे पर आश्चर्य का भाव साफ झलक रहा था। मैंने फिर कहा - निशांत चेयर ले लो। उसने एक बार फिर मेरी ओर हैरानी से देखा और शर्माते हुए कुर्सी पर बैठ गया। मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा- तो स्कूल में ..... अच्छा नहीं लगता? "नहीं " उसने अपनी पलकें भींचते हुए कहा। "क्यों??" " बस नहीं लगता।" कहकर उसने मेरी ओर देखा और सिर झुका लिया। मैंने देखा कि उसकी आंखों में एक अजीब सा भाव झलक रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे जो कुछ वह कह रहा था, बात शायद उससे कुछ अलग ही है। पर इससे पहले कि मैं उससे कुछ कह पाती, वह उठकर बाहर चला गया। उस दिन के बाद लगातार तीन दिन तक वह स्कूल नहीं आया और न ही उसके चारों दोस्त ही। मुझे लग रहा था कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है। शायद कुछ ऐसा जिसे हम लोग समझ नहीं पा रहे हैं। इसके ठीक तीन दिन बाद एक अजीब घटना घटी। निशांत ग्रुप के चारों बच्चे तो स्कूल आए पर निशांत स्कूल नहीं आया। मेरे लिए यह वाकई हैरान करने वाली बात थी। इसलिए मैंने उन चारों बच्चों में से एक बच्चे शुभम को बुलाया और निशांत के बारे में पूछा। पता चला कि निशांत को तेज़ बुखार है। बुखार !! कब से??? उसी दिन से। उसी दिन से!!!! यानी पिछले ६ दिन से उसे बुखार हैशुभम ने गंभीरता से हामी में सिर हिला दिया। मैंने शुभम से कहा " तुम्हें पता है वो कहाँ रहता है?? मुझे ले चलोगे उसके पास?? शुभम ने एक बार आश्चर्य से मेरी ओर देखा और फिर हामी में सिर हिला दिया। छुट्टी होने पर जब में निशांत के घर पहुँची तो उसके घर का दरवाजा खुला था और सामने एक झीना सा पर्दा पड़ा था, जिसमें से घर की तस्वीर साफ़ झलक रही थी। घर बहुत ही साधारण था। सामान के नाम पर एक निवार का पलंग, एक सन्दूक, छाता, स्कूल बैग और पानी का घड़ा ही मुझे दिखा दिया। सामने निशांत बिस्तर पर बेसुध पड़ा था और उसके सिरहाने बैठी उसकी माँ, उसके तपते माथे पर गीली पट्टियाँ बदल रही थीं।

मैंने धीरे से कुंडी खटखटाई। आवाज़ सुनकर निशांत की माँ ने मेरी ओर देखा। चिंता की रेखाओं से भरा उनका चेहरा उन्हें 35-36 वर्ष की वृद्धा सिद्ध करने के लिए काफी था। मुझे देखते ही वो उठीं। इससे पहले कि वो कुछ कहतीं, मैंने कहा- जी नमस्ते, मैं निशांत की टीचर।

मेरी बात सुनकर एक दबी सी मुस्कुराहट के साथ वो बोलीं- जी मैंने पहचान लिया। आपके बारे में इसने इतना कुछ बताया था कि देखते ही समझ गई थी कि आप ही मैडम जी हैं, कहते हुए उन्होंने सिर झुका लिया। फिर जैसे कुछ याद आया और जैसे भूल सुधार करते हुए बोलीं- आप अंदर आइए न !

मैं पलंग के एक किनारे बैठ गई। मैंने निशांत के माथे पर हाथ रखकर देखा, उसका शरीर बिल्कुल तप रहा था। मैंने कहा – इसे अभी भी बहुत तेज़ बुखार है, दवाई दी इसे?

हाँ... कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं।

मैंने उनका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा- क्यों परेशान होतीं हैं, शाम तक उतर जाएगा...कहिए तो हम किसी और डॉक्टर के पास चलते हैं...

जी ... डॉक्टर कह रहा था कि उतर जाएगा शाम तक... अच्छी दवाई दी है...

निशांत की माँ का उतरा चेहरा देख मैंने विषय बदलते हुए कहा- निशांत का दिमाग तेज़ है। आप देखना एक दिन बहुत आगे जाएगा ये। पर स्थिर नहीं है इसका मन। स्कूल से ही कई कई दिन गायब रहता है..

मेरी बात सुनकर निशांत की माँ ने मेरी ओर देखकर कहा-

जितना आता है, शायद उतना ही बहुत है।

मतलब?? मैंने हैरत से कहा।

ब्रेन ट्यूमर! ब्रेन ट्यूमर है इसे ... निशांत को ..कहते हुए उन्होंने हँथेलियों से चेहरा ढँक लिया और फफक पड़ीं।

मैं अवाक थी।

कुछ देर बाद वो बोलीं- पिछले साल इसके पिता एक्सीडेंट में.. अब तो बस...

मैंने कहा- इसका इलाज कैसे कराती हैं?

कपड़े सिलती हूँ, पर उससे क्या होता है...

यह सुनकर अनायास ही मेरे मुँह से निकला- ओह तभी यह स्कूल...

स्कूल? इतने पैसे कहाँ हैं कि पढ़ाई और इलाज का खर्च एक साथ... पर ये माने तब न...

हफ्ते में 4 दिन स्टेशन पे सामान उठाता है..

मैं कहती हूँ, बेटा तू ठीक हो जा पहले.. फिर ... पर ये मानता कहाँ है! कहते हुए उन्होंने पल्लू से अपनी पलकें रगड़ीं और बोलीं- कहता है माँ पढ़ना भी जरूरी और मेरा ठीक होना भी। नहीं तो... नहीं तो तुम्हारी देखभाल कौन करेगा... कहते कहते वे फिर सुबक पड़ीं।

मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा- आप चिंता मत कीजिए, इसका इलाज हो जाएगा..आप बस हिम्मत रखिए।

उन्होंने हामी में सिर हिलाया और बोलीं- आपको यहाँ का पता..?

शुभम। शुभम ने बताया था मुझे।

हाँ मुझे लग रहा था कि ... शुभम, हर्षित, राघव और चेतन ये चारों भी स्टेशन पर उसके साथ सामान... निशांत के लिए। कभी अकेले नहीं जाते स्कूल, आज मैंने ही ज़बर्दस्ती भेजा, उनकी माँ से कहके...

निशांत की माँ के रुँधे गले से निकले अधूरे वाक्य मुझे सब समझा गए थे। तस्वीर बिल्कुल साफ थी। मैं और मेरे साथ बाकी लोग भी जैसा समझ रहे थे, स्थिति उससे इतनी अलग होगी, सोचा न था!

निशांत की माँ से ही बात करके मुझे पता चला कि अगले साल तक यदि निशांत का ऑपरेशन नहीं हुआ, तो यह उसके लिए जानलेवा हो सकता है।

अगले दिन ही स्कूल पहुँचकर मैंने प्रिंसिपल को पूरी बात बताई। प्रिंसिपल ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि उन्हें पहले निशांत की स्थिति का पता चल पाता तो निशांत और उसके साथियों का एक साल बर्बाद न होता। इसके बाद तय हुआ कि निशांत के इलाज का खर्च स्कूल उठाएगा।

फिर क्या था हम सबने मिलकर निशांत के लिए फंड इकट्ठा किया और छह माह के अंदर ही उसका सफल ऑपरेशन हो गया।

इस घटना को कई वर्ष हो चुके हैं। निशांत अब बड़ा हो गया है और डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा है। मुझे वो अपनी डायरी कहता है, जहाँ वो अपना पूरा मन लिख देता है। इस लिखावट का उसका जो सपना मुझे सबसे सुंदर लगता है, वो है - सबको मुफ़्त और अच्छे से अच्छा इलाज उपलब्ध कराना, ताकि किसी निशांत को अपने दोस्तों के साथ स्कूल छोड़ काम पर न जाना पड़े..       

 

शनिवार, 5 नवंबर 2022

बिल्ली का बच्चा

 छत के कोने में बिल्ली के दो बच्चे। उन्हें देखकर  बचपन की एक घटना याद आ गई।  बिल्ली का 




एक बच्चा हमारे साथ खूब खेलता था। वो चतुर भी बहुत था। सुबह 5 बजे जब अम्मा और पिताजी(दादा-दादी) चाय पीते तो पता नहीं कहाँ से प्रकट हो जाता था। वो पलंग पर बैठे पिताजी की गोद में चढ़ता फिर कंधे पर और फिर सिर पर। सिर पर चढ़ते ही पिताजी उसे प्यार से उठाकर नीचे रख देते। पर वो बिलौटा मानता नहीं था। और तब तक यह क्रम जारी रखता जब तक पिताजी अम्मा से कहकर उसे चाय नहीं दिलवा देते। चाय पीते ही वो छू मंतर हो जाता। 

एक बार मैंने पिताजी से पूछा- आपको डर नहीं लगता, आप उसे सिर पर चढ़ा लेते हो? मेरी बात सुनकर पिताजी ज़ोर से हँसे। जवाब अम्मा ने दिया- बच्चे तो सिर पर चढ़ते ही हैं, तुम क्या उससे अलग हो!

बुधवार, 5 अक्तूबर 2022

रावण का प्रत्युत्तर


 हे महामना हे महादेवि 

हे तेज रूप हे स्वयं सृष्टि

सादर प्रणाम हे मातृ शक्ति

हूँ विनत भाव प्रस्तुत समक्ष 

कहने को अन्तर्भाव सहज

भव बन्ध मुक्त निर्बंध स्वत:

दैहिक पाशों से विनिर्मुक्त 

इन्द्रियातीत अब मनस्त्तत्व 

पंच  प्राण सप्त चक्र मुक्त

मैं द्रष्टा ही अब मात्र सही

मात: प्रस्तुत हूँ आज यहीं

सम्भाषित तव आक्षेप सभी

 समुचित ही हैं आरोप सभी

हूँ योग्य यथा स्वीकार सभी

है वाद नहीं प्रतिवाद नहीं 

मेरा कोई संवाद नहीं 

मैं रहा दशानन दशकन्धर

पर यह अंतिम इतिहास नहीं 

गत कर्मों का परिणाम सुफल 

पाया जीवन महर्षि महकुल

महनीय वंश नित पूज्य प्राण

सौभाग्य सुयश नित भाव प्राण 

पाया मैँने यह महा ज्ञान

सन्सृतियोँ की रक्षा करना 

है भूपति निज परमो धर्म:

मात: यह संस्कार वही

स्वर्णिम लंका का प्राण वही

पाया ऋषिकुल से महत ज्ञान

मातुल कुल रण कौशल महान

संश्लेषण तमस और सत का

था सहज प्रस्फ़ुटित अहं प्राण

 रक्षित आत्मज सम मम पुरी 

पर हल हल हल कंपायमान 

काँपा समग्र ब्रह्माण्ड 

था आत्म तत्व अनुपम गति युत 

क्षीरोदधि सम वह हरि धाम प्रयुत 

जिनका नित करते ध्यान ध्यान

 रामेश्वराय 

नतमस्तक हूँ प्रभु रामेश्वराय।।

मम आत्म तत्व सौभाग्य सुफल

ईशानईशस्य वात्सल्य सहज,

पाया नत हो आशीष स्वयं

यह नहीं फलित उपक्रम कोई

प्रत्युत प्रभु आदेश स्वयं

मम जिह्वा निसृत   -

हम काहू के मरहिं न मारे

बानर मनुज जाति दुई बारे

मानो हरि मानस भक्ति सहज

जन्मी ऋषिकुल हो दशकंधर

अनुकूलित प्रेरित जो शिव सह।

वह भक्ति सहज हो मूर्तिमान 

जन्मी रावण बन महाप्राण।

मात: यह भक्ति प्रभाव सहज

प्रेरित करती वैकुंठ धाम

निज कर्म विकर्म, अकर्म सभी 

इंगित करते मम महा प्रयाण

मात: हूँ नत मस्तक

 स्त्री तेज समक्ष

है मान महा सम्मान अपर

वारित उस पर सौभाग्य सकल

फिर हो कन्या, सहोदरी, पत्नी अथवा

तेज: प्रतिमूर्ति पृथ्वी तनया

सब एक रूप सब एक प्राण

इनके हित प्राण्त्याग प्रभो

गौरव गौरव गौरव गौरव

शूर्पणखा अपमान 

निश्चित था इंगित ममावसान 

ज्ञातव्य मुझे प्रभु आवाहन

था तत प्रत्युत्तर जानकी हरण

 मायापति विरचित यह विधान

सृष्टि समक्ष दृष्टांत

स्त्री मर्यादा सर्वोपरि

अपमान यहाँ है सर्वनाश 

था यह निश्चित पूर्वानुमान

अन्तस में व्यापित राम राम

नि:सृत मृत्यु वेला निकट

कहाँ रामु रन हतौं पचारी 

मात:

मैं पात्र मात्र प्रभु माया का

शिव भाषित त्वम ज्यों

उमा दारु जोषित की नाईं

सबहिं नचावत रामु गुसाईं

स्वीकार करें मम नमस्कार

सादर प्रणाम

इति प्रत्युत्तर।।

 



शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

पहली मुलाक़ात



फोटो : गूगल से साभार

नर्सरी क्लास में चार साल के दो बच्चे- एक लड़का और एक लड़की डेस्क पर बैठे थे। सकुचाए, चुपचाप। गालों पर आँसू सूख चुके थे। घर जाने का कोई चांस नहीं। मिस अच्छी थीं इसलिये टॉफ़ी और चिप्स खाने की इजाज़त मिल गई थी। कुछ बच्चे अभी भी रो रहे थे। पर बीच की डेस्क पर बैठे ये दोनों बच्चे अब शान्त थे। लड़का मन ही मन सोच रहा था कि-मम्मी ने कहा था, रोना नहीं, तो मैं तो बस थोड़ा सा रोया, बाकी बच्चे तो अभी तक रो रहे हैं। लड़की भी यही सोच रही थी। उसके आँसू बीच-बीच में टपक जा रहे थे जिन्हें वह जल्दी से पोंछ ले रही थी। अपने ओंठ भींचे, आँखों को बार बार झपकती वह कुछ अधिक सतर्क भी लग रही थी।

इतने में लड़के को याद आया कि मम्मी ने कहा था- मिस को गुड मॉर्निंग कहना और सबसे बात करना। लड़का मन ही मन बुदबुदाया- मिस से गुड मॉर्निंग तो कह दी पर बात किससे करूँ, यहाँ तो सब रो रहे हैं। तभी लड़के को कुछ याद आया और वह अपने बगल में बैठी लड़की की तरफ़ मुड़ा, जो छोटी सी मूर्ति के समान खुद में ही सिकुड़ी बैठी थी। शायद उसके मन में अपनी मम्मी की सीख चल रही थी- मिस से गुड मॉर्निंग करना, रोना नहीं और किसी से ज़्यादा बात मत करना।

लड़के ने लड़की की ओर मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया और कहा- मुझसे दोस्ती करोगी?

अपने में खोई लड़की ने लड़के की ओर आश्चर्य से देखा। कुछ सोचने के अन्दाज़ के साथ पलकें झपकाईं और फिर हाथ को डमरू की तरह हिला, मुँह बनाकर बोली- मन नहीं है...

लड़के को ऐसे जवाब की उम्मीद न थी। अत: लड़की की ओर देखता हुआ वह सोच रहा था कि मम्मी ने ये तो बताया नहीं कि कोई बात करने से मना कर दे तो क्या करना है.....? 

उधर लड़की के चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई थी कि उसने मम्मी की सारी बातें मान ली।

 


बुधवार, 28 सितंबर 2022

अम्बेडकरवाद के परिप्रेक्ष्य में डॉ अम्बेडकर


डॉक्टर भीमराव अंबेडकर पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा है कि उनके विषय में जितना लिखा जाए, जितनी चर्चाएं की जाएँ उतनी कम। पर देखने में यह आता है कि अंबेडकर के विषय में जो भी लिखा और कहा जाता है, वह उन्हें एक साँचे विशेष तक सीमित कर देता है जबकि अंबेडकर का व्यक्तित्व ऐसा नहीं है कि उन्हें एक वर्ग विशेष के सांचे तक ही सीमित रखा जाए। ऐसा करना असल में हिमाकत है। पर बाबा साहेब के व्यक्तित्व  की विडंबना ही बन गई है यह हिमाकत। डॉ अंबेडकर असल में वंचितों के मसीहा थे। जिसके पास ताकत नहीं है, जो शोषित है, दलित और दमित है, डॉ अंबेडकर उनकी आवाज थे। पर दिक्कत यह थी कि सशक्तों  को वंचित और शोषितों की आवाज हो यह पसंद ही नहीं था। सारी लड़ाई यही थी। डॉ अंबेडकर सामाजिक न्याय और उसके माध्यम से सामाजिक विकास के पक्षधर थे। इसलिये वे इस बात को बखूबी समझते थे कि सामाजिक विकास के लिए जरूरी है कि समाज के हर वर्ग का विकास हो और विकास की प्रक्रिया केवल ऊपरी स्तर से आरंभ नहीं होती बल्कि उसके लिए आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत होती है। समाज के अंदर बसे अन्तर्समाजों को जब तक समान रूप से विकसित होने का अवसर नहीं मिलता, तब तक विकास संभव ही नहीं। यही कारण है कि उन्होंने समाज के उन तबकों में प्राण फूंकने से शुरुआत की जिन्हें सामाजिक व्यवस्थापन के नाम पर निचले पायदान से ऊपर उठने ही नहीं दिया गया था। वे स्वयं भी भुक्त-भोगी थे इसलिये दलितों और वंचितों का दर्द उनसे बेहतर भला कोई और कैसे समझ सकता था। गैर-बराबरी का यह व्यवहार असल में शक्ति की उस राजनीति के तहत था जिसके विषय में कहा गया है- समरथ को नहिं दोष गुसाईं। यानी सशक्त के दोष दिखाना खुद को समस्या में डालना है। अंबेडकर ने शक्ति की इस राजनीति को उसके सही समीकरण में समझा और उसे उसी रूप में समाज में सबके सामने रखा। अम्बेडकर ने सामाजिक न्याय और समता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये तीन उपास्यों का सूत्र रखा। इसका सीधा सा अर्थ था कि इन तीन को ही ईश्वर मान आराधना करो तो कुछ भी असम्भव नहीं। ये तीन सूत्र थे- ज्ञान, स्वाभिमान और शील।

अपने प्रथम उपास्य ‘ज्ञान’ के सम्बंध में डॉ अम्बेडकर कहते हैं-

“मेरा प्रथम देवता ज्ञान है। मैं ज्ञान की उपासना करता हूँ। बगैर ज्ञान के मनुष्य को मानवता तथा शान्ति नहीं मिलती।”

इतिहास साक्षी है कि ज्ञान को चुनौती देने की क्षमता अज्ञानी में नहीं है। भले ही वह कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो। ज्ञान के समक्ष उसे झुकना ही होगा। साथ ही ज्ञान में इतनी तेजस्विता है कि जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग जैसे सामाजिक विषय उसके सामने यूं ही हवा हो जाते हैं। समग्र साहित्य, लोक साहित्य, भक्ति साहित्य इस बात को प्रमाणित करता है। अष्टछाप के कवि अपनी जाति नहीं बल्कि अपने अर्जित ज्ञान के कारण गौरव और सम्मान पाते हैं। कबीर भी अपनी जाति के कारण महत्वपूर्ण नहीं है और तुलसी भी जातिगत, वंशगत और कुलगत प्रताड़ना सहते हैं। वे भी सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य होते हैं तो केवल ज्ञान के कारण। और पीछे चलें तो महाभारत के रचयिता मछुआरिन की संतान वेदव्यास अपनी जाति नहीं ज्ञान के कारण महत्व पाते हैं। आदि कवि वाल्मीकि भी अपनी जाति के कारण नहीं बल्कि अपने ज्ञान के कारण समाज के सभी वर्गों के द्वारा पूजित हुए और समाज के पूजितों के द्वारा भी पूजित हुए। अंबेडकर स्वयं शास्त्रज्ञ थे, इसलिये  उन्होंने यह जाना था कि समाज में जाति से अधिक महत्वपूर्ण है ज्ञान। इसलिये समाज में जाति के दंश को मिटाने का महत्वपूर्ण उपकरण भी ज्ञान है। सामाजिक उद्धार भी ज्ञान से ही सम्भव है। इस बात को गहराई से समझते हुए डॉ अंबेडकर ने जो तीन सूत्र या उपास्य कहे, उनमें पहला शब्द था ‘ज्ञान’। जब तक ज्ञान नहीं होगा व्यावहारिक समझ का भी विकास नहीं होगा। इसलिए इतिहास को खंगालते हुए उन्होंने अशक्त वर्गों के लिए ज्ञान प्राप्ति को अवश्यंभावी बताया। क्योंकि वे जानते थे कि ज्ञान के बिना जड़ता से मुक्ति नहीं होगी। यही बात वे शोषितों और वंचितों को समझना चाहते थे। यही कारण है कि ज्ञान को परम उपास्य मान  ज्ञान का सूत्र देना अंबेडकर ने इसलिये भी जरूरी समझा क्योंकि भारतीय धार्मिक साहित्य के दृष्टांत से वे यह बता देना चाहते थे कि ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं है। और जिन शास्त्रों की बात कहकर कुछ लोग निम्न जातियों को अपमानित करते आ रहे हैं, उन निम्न जातियों की भी उन शास्त्रों के लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय संस्कृति के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत गैर-ब्राह्मणों के द्वारा ही लिखे गए हैं। स्वयं इतिहास इस बात का गवाह है। अम्बेडकर यही बताना चाहते थे कि ज्ञान किसी की बपौती कैसे हो सकता है, जबकि स्वयं इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। स्वयं डॉ अम्बेडकर के शब्दों में-

“मेरे पिताजी धर्म के पूजक थे तथा धर्म चाहने वाले थे। बालपन में रामायण, महाभारत व सभी धर्मग्रन्थों का उन्होंने मुझसे पाठ करा लिया था। रामायण और महाभारत का मुझपर गहरा प्रभाव था।”

 अंबेडकर ने उपास्य के रूप में जो दूसरा शब्द दिया वह था स्वाभिमान। स्वाभिमान खुद पर थोपा गया बेवजह का दंभ नहीं है बल्कि इसका भी गहरा अर्थ है। अपने दूसरे उपास्य के विषय में अम्बेडकर कहते हैं-

“मेरा दूसरा देवता स्वाभिमान है। मैंने किसी से कभी याचना नहीं की। मैं कहता हूँ कि मनुष्य में दीनता भी नहीं रहनी चाहिए। मैं बहुत कुछ हूँ यही सोचना चाहिए।“

 अंबेडकर ने जब स्वाभिमान को उपास्य मानने की बात कही तो इसलिए कि निम्न कहलाने वाली जातियां भी स्वयं को सम्मान दें और समझें कि सामाजिक व्यवस्थापन में उनकी जाति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि उच्च कहलाने वाली जातियां। साथ ही निम्न कहलाने वाली जातियां स्वयं भी यह मानें कि असल में तो उच्च और निम्न का प्रश्न जन्म से तो है ही नहीं। यह सबल और शक्ति पक्षकारों की फैलाई तिकड़म है। इसे केवल तभी समाप्त किया जा सकता है जब अपने होने पर गर्व हो। यह आत्मभिमान जाति स्वाभिमान सामाजिक न्याय की दूसरी महत्वपूर्ण शर्त है। किसी भी जाति वर्ग या समाज के उद्धार की शुरुआत इसी स्वाभिमान से होती है। हालांकि उपास्य के रूप में स्वाभिमान का सूत्र भी सहज बात नहीं थी। सवाल यह था कि वंचित और प्रताड़ित भला किस बात पर गर्व करें? पर यहां समझने की बात यह है कि स्वाभिमान के प्रश्न में सबसे महत्वपूर्ण है मनुष्य होना और सभी मनुष्य बराबर हैं। जो इस बात को नहीं मानता वह अज्ञानी है उससे क्या तर्क किया जाए। पर स्वयं को ऐसा बनाओ कि कोई अपमानित न कर सके। और स्वाभिमान की रक्षा से महत्वपूर्ण कुछ भी न मानो उसकी रक्षा के लिये कुछ भी कर जाओ। डॉ अंबेडकर ने स्वाभिमान की बात इसलिए भी की थी क्योंकि अपमान सहते हुए कुछ जातियों में स्वयं को अपमानित होना नियति-बद्ध मान लिया गया था। इसलिये इस गर्हित विचार से जब तक समाज का निम्न कहा जाने वाला वर्ग मुक्त नहीं होता वह क्या तो अपना उद्धार करता और क्या ज्ञान प्राप्ति करता। यूँ भी समता और न्याय की लड़ाई में तब तक कुछ भी संभव नहीं है जब तक स्वाभिमान और स्वाभिमान के साथ ज्ञान की प्राप्ति न हो। अंबेडकर जानते थे कि बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती। ज्ञान प्राप्त हो गया तो सामाजिक भेदभाव की असलियत सामने आ जाएगी साथ ही स्वाभिमान और जातीय गौरव की भावना से जबरदस्त आक्रोश भी  पैदा होगा और समाज में आक्रोश हो, यह तो ठीक नहीं है। यूं भी अपनों से न्याय के लिए आक्रोश नहीं शील की आवश्यकता होती है। आवेश में काम बिगड़ते हैं। शीलवान  व्यक्ति बिना लड़े सबको जीत लेता है। इसी विचार से उन्होंने अपने साथियों के सामने शील के रूप में तीसरे उपास्य का सूत्र रखा। इस संबंध में वे कहते हैं-

“मेरा तीसरा देवता शील है। मैंने कभी धोखेबाजी नहीं की, विश्वासघात नहीं किया। मुझे किसी तरह की बुरी आदत नहीं है। शील संवर्धन का मुझमें बड़ा गुण है और यह कहते हुए मुझे बहुत गर्व होता है।”

 इसका सीधा सा अर्थ यही था कि स्वाभिमान के साथ ज्ञान प्राप्त करो पर किसी भी स्थिति में शील ना टूटने पाए। मर्यादा का हनन न होने पाए। यूं भी ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में घमंड का भी समावेश हो जाता है और स्वाभिमान और घमंड में तो यूं ही बहुत बारीक सी रेखा का अंतर है। अतः अंबेडकर विनम्रता की बात करते हैं। नम्र और शीलवान बने रहने की बात करते हैं। यह सब इसलिए कि वह समानता का हक लड़कर नहीं बल्कि प्रेम से प्राप्त करना चाहते हैं। कुल मिलाकर यह तीनों सूत्र असल में समानता और न्याय का ऐसा तार्किक मार्ग प्रस्तुत करते हैं जहां पराजय  है ही नहीं। जहां पर आजा है ही नहीं। ये तीनों उपास्य या तीनों सूत्र समाज, इतिहास और साहित्य की पृष्ठभूमि से ही जन्मे हैं। और इस पृष्ठभूमि में उच्चता और निम्नता का कोई प्रश्न ही नहीं है।

यहां एक बात और है और वह है ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद की। आज के तथाकथित अंबेडकरवादियों के समान अंबेडकर ब्राह्मणों से घृणा की राजनीति नहीं करते थे और न ही सभी ब्राह्मण उनसे। यहाँ अज्ञानियों की बात नहीं हो रही है जो धर्म को व्यवसाय बनाते हैं। अम्बेडकर ब्राह्मणों से इतनी ही घृणा करते तो क्या ऐसा होता कि उनका नाम भी उनके ब्राह्मण गुरु के कहने पर ही अंबावडे गांव के नाम पर अंबेडकर रखा जाता? वहां कोई छुआछूत या विरोध नहीं था। विरोध था तो उनके लिए जो स्वयं को धर्म का ठेकेदार घोषित करके मानवता का अपमान करते थे। अंबेडकर ने उसी सामाजिक रीति को ब्राह्मणवाद कहकर गरियाया था। किन्तु इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था कि वे ब्राह्मणों से घृणा करते थे। शास्त्रज्ञ अम्बेडकर ने आजकल के तथाकथित अंबेडकरवादियों की रीति से सोचा भी होगा,  इस बात में सन्देह है। अम्बेडकर का धर्म-परिवर्तन भी असल में हिंदू आस्था के खिलाफ़ अनास्था या विद्रोह नहीं था बल्कि ये विद्रोह था धर्म के उन ठेकेदारों के खिलाफ़ जिन्होंने आस्था को आडंबर बना कर रख दिया था। यह बात भी समझने की ज़रूरत है।

असल में डॉ भीमराव अंबेडकर समाज को एकरूप और सशक्त देखना चाहते थे और इसी दिशा मे प्रयासरत थे। पर वे यह भी जान गए थे कि सामाजिक परिवर्तन इतना सहज नहीं होता जबकि शक्ति केंद्रों की जड़ें सुदूर इतिहास तक फैली हों। किंतु इसके बावजूद भी सामाजिक व्यवस्थापन की दृष्टि से डॉ अंबेडकर ने जो कार्य किया, वह उन्हें महान व्यवस्थापक घोषित करता है और साथ ही इतिहास का सबसे बड़ा जनवादी नेता भी ।


संदर्भ-

डॉ अम्बेडकर : आयाम दर्शन, किशोर मकवाना

थोट्स ऑफ़ डॉ बी आर अम्बेडकर, सेंटरम प्रैस

“की कॉन्सेप्ट इन पॉलिटिक्स”, हेवुड एंड्रयू, न्यूयॉर्क, एन्वाई पाल्ग्रेव ।


गुरुवार, 15 सितंबर 2022

पुस्तक समीक्षा

 

रत्नकुमार सांभरिया ज़मीन से जुड़े रचनाकार हैं। ज़मीनी महक, देसी गमक उनकी कहानियों को एक खास बानगी देती है और कहानियों को अधिक संजीदा अधिक रोचक और कहीं अधिक पठनीय भी बनाती है। डॉ0 लोकेश कुमार गुप्ता द्वारा संपादित ‘पुस्तक रत्न कुमार संभरिया की प्रतिनिधि कहानियां’ कुछ ऐसी ही कहानियों का संग्रह है, जिसमें संपादक  ने बहुत कुशलता से कहानियों का चुनाव किया है। लेखकीय क्षमता से प्रभावित सम्पादक का यह कथन उल्लेखनीय है- 

“अगर मैं एक पंक्ति में कहूं तो रत्न कुमार सांभरिया का लेखन एक महाकाव्यात्मक पीड़ा, संघर्ष, वेदना, वंचना और अभिजन-समाज में व्यक्ति जीवन के नवीन मूल्य और मानदंडों को स्थापित करता है।“ 

यह नवीन मूल्य और मानदंड हमें इन चुनिंदा कहानियों में मिलते हैं। 

इस पुस्तक में संपादक ने कुल 11 कहानियों को संगृहीत  किया है जो अपने मिजाज अपनी कलेवर और अपनी कहन में एकदम अलग किस्म की हैं। मतलब कोई भी कहानी पैटर्न को फॉलो करती नज़र नहीं आती। हर कहानी में एक अनूठापन है, जो पाठक को एक कथालोक से दूसरे कथालोक की सैर कराता है। हां यह ज़रूर है कि कहानियां पैटर्न बनाती ज़रूर हैं। मतलब सरलता से बात कैसे कही जाए और उसे कहानी में कैसे ढाला जाये, ये  कहानियां यह सिखाती हैं। अब ‘मियां जान की मुर्गी’ को ही देख लीजिए। कहानी प्यार से पाली-पोसी गई मुर्गी की है, जो क्योंकि जीना चाहती है, इसलिए मियां जान की बहुत गालियाँ खाती है पर मियाँ जान की लाख कोशिशों के बाद भी वह हाथ नहीं आती। ज़िंदगी जीत जाती है मौत हार जाती है। बेचारे मियां जान अपनी जवानी का द्म याद करते रह जाते हैं। और कहानी कहती क्या है कि इंसानी स्वार्थपरकता सारे मोहजनित संबंधों को ज़िबह कर देती है। ये तो मुर्गी थी पर इस स्वार्थपरकता के आगे इन्सान भी क्या चीज़ है।

आज के राजनीतिक कूटनीतिक और षड्यंत्रकारी जमाने में कहानी विधा किस विधान से अपने मूल चरित्र को बचाए रख सकती है, यह कहानियां उसका भी एक खूबसूरत फॉर्मेट प्रस्तुत करती हैं अपनी बयानगी में एक खास सरलता से। इन कहानियों की एक और खास बात है,  और वह यह कि हर कहानी में एक यथार्थ प्रस्तुत किया गया है और इस यथार्थ की विशेषता है कि यहाँ कोई तल्खी नहीं, कोई आक्रोश नहीं, जातिवादी या जातिसूचक तल्ख-बयानी नहीं। कुछ है तो केवल यथातथ्य चित्रण। साम्भरिया जी भली-भांति जानते हैं कि बयानबाजी से कुछ नहीं होता। सहानुभूति या संवेदनात्मक पक्ष के मार्मिक चित्रण से भी कुछ नहीं होता। कहानी बनाने के लिये कुछ चीज़ें अगर काम करती हैं तो वह हैं बदलते वक्त को उसके बदलावों के साथ कागज पर उतारने की कला। अतीत और वर्तमान को साथ रखकर भविष्य की बुनावट करने की कला। बदलते समीकरणों को बिना किसी लाग-लपेट के सहज रूप में कह जाने की कला। और इन समग्र कलाओं का समुच्चयगत रूप जो कहानी को नदी के पानी सी रवानगी देता है, वह पाठक को वर्तमान से और मजबूती से जोड़ता है। सान्भरिया  जी की कहानियाँ यही करती हैं,  जिससे पाठक वर्तमान से और मज़बूती से जुड पाता है।

 अब फुलवा कहानी को ही देख लीजिए यहां जाति है। ऊंच-नीच का प्रपंच भी है। पर अतीत में। स्मृतियों में जो कभी आंख के कोर में ढुलकते पानी में, तो कभी जमीदारी दिमाग में उमड़ते ज्वार के रूप में तो दिख जाता है।  पर जैसे ही स्थान बदलता है, स्थितियां बदलती हैं, जाति भी बदल जाती है। अब यह जाति जिस नए रूप में है, उसे कहते हैं अमीर और गरीब की जाति। यह नई किस्म की जाति अब तक चली आती जातिवादी सामंती व्यवस्था से नितांत भिन्न है। इसलिए यह स्थिर भी नहीं है। यह असल में साँचे वाली जाति है, जिसमें किसी भी परंपरागत जाति का व्यक्ति फिट हो सकता है। इसलिए जाति आधारित परंपरागत व्यवहार यहां मैच नहीं करता। इसीलिये  पुरातन जाति संस्कार भरे रामेश्वर को फुलवा कहानी की पंडिताइन डपटती हुई कहती हैं -

“तू तो कुएं का मेंढक ही रहा रामेसरिया। अब तो पद और पैसा का जमाना है, जात पांत का नहीं।” 

पर दुनिया का क्या करें,  जो इस बदलाव को स्वीकार न कर पाये उसका क्या करें। ऐसे अतीतजीवी लोगों के लिए कोई क्या करे और क्या उन्हें समझाएं? मांडी कहानी भी कुछ ऐसी ही विवशता प्रस्तुत करती है जहाँ बेचारे बाम्भन दानीदास गौमाता को मान्डी खिलाने के लिये तरस जाते हैं क्योंकि नीच जात के घर बंधी गाय को मान्डी खिलाने में धर्म जो आड़े आता है और जब जैसे-तैसे वो खुद्को तैयार कर लेते हैं तो गाय की मालकिन का स्वाभिमान आड़े आ जाता है। और त्योहार हो जाता है निल बटे सन्नाटा।

वक़्त आगे गुज़र गया पर पुराने पंडित जी वहीं के वहीं। इस तरह की अतीत और वर्तमान के टकराव की ये कहानियाँ, आज के समय को प्रस्तुत करती कहानियाँ हैं, जिनमें एकदम सहजता है और बदलती स्थितियों को कहने की समझ है।

ज़िंदगी ‘इत्तेफाक’ है। कब क्या हो जाए, आज कुछ है, कल कुछ है, परसों कुछ और हो जाए,  किसे पता? जिंदगी ऐसे ही चालें चलती है और बहुत कुछ उलटती-पलटती, कुछ का कुछ करती चलती है। स्तब्ध पात्र केवल इस उलट-पलट के प्रभावों के साक्षी बनते हैं। यहाँ 40 साल का वियोग एक ऐसा सुखद संयोग बन जाता है कि ज़िंदगी की ढलान पर बैठी बुढ़िया फिर से दुल्हन बन जाती है। ऐसी कहानी को पढ़कर लगता है मानों वक्त कोई जीवंत शक्ति है जिसे ज़िंदगी से मसखरी करने में बड़ा मज़ा आता है। यह मसखरी कभी तो बहुत खूबसूरत होती है और कभी ऐसी कि ज़िंदगी का सिक्का बदलते देर नहीं लगती। इन्सान को मालकिन से ‘चपड़ासन’ बनने में देर नहीं लगती। स्थिति बदलने पर इन्सान की बदलती फितरत का भी खुलासा हो जाता है और तब पता चलता है कि 

“आदमी गिरगिट से भी बदतर रंग-बदलू होता है।“ और तब इस बात का एहसास होता होता है कि “औरत की चुप का आदमी अपना नियत अर्थ निकाल लेता है”... लोग बदल जाते हैं और उनके साथ वक्त भी बदल जाता है और तब समझ आता है कि “वक्त बहरूपिया है।“

स्थितियां बदलती हैं, समाज बदलता है और उसके साथ बदल जाता है बहरूपिया वक्त भी। अपने इस बदलने की प्रक्रिया में वह किसी पर भी रहम नहीं खाता फिर चाहे वह कोई नेत्रहीन जोड़ा ही क्यों न हो। कहानी सवाखें समाज की इसी सच्चाई को उजागर करती है कि जातीय शुद्धिकरण और जातिवाद नेत्रहीनों को भी नहीं बख्शता। परिणामत: जमन और वीमा की ज़िंदगी समाज के ठेकेदारों की भेंट चढ़ जाती है। पर हाँ एक आशा है और आशा कभी नहीं मरती।

मातृत्व महत्वपूर्ण है। फिर चाहे वह ‘हिरणी’ ही क्यों न हो। हर माँ की आत्मा अपने बच्चे में बसती है। हिरणी भी एक माँ है जो अपने शावक को शिकारी के पंजों से भी बचा लेती और तब ज़िंदगी एक और जादू करती है। भक्षक को रक्षक बना देती है। लछिनाथ भी द्रवित हो जाता है भाव की उस भाषा से जिसमे मानो हिरणी के रूप में एक माँ कह रही थी-

‘यह बच्चा मेरी वंशबेल है। इसे मत मारो। मैं ढलती उम्र हूँ। मेरा गला रेत ले।‘

समाज के एक अन्तर्समाज सपेरा समाज की कहानी है टोकरे में गांठ। जिसमें प्रेम,  वासना और षड्यंत्र को पूरी तल्खी के साथ उभारा गया है।

इसी तरह भारतीय दलित समाज की भी विडम्बना है। वह एक ओर जाति मुक्त भी होना चाहता है और ऊंची जात का भी कहलाना चाहता है। चमरवा इसी सामाजिक विरोधाभास को व्यक्त करती कहानी है जहाँ चमरवा बाम्भन न तो पूरे चमार रहे और बाम्भन तो उन्हें बाम्भन मानें ही क्यों?। यहाँ प्रश्न भी है कि समाज का दलित वर्ग असल में चाहता क्या है? जातिमुक्त समाज, ऊंची जाति का समाज या फिर खुद को ऊँची जाति में देखना। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह ऊपर से कुछ भी कहे पर अंदर उसके भी ब्राह्मण समाज का हिस्सा बन जाने की अदम्य इच्छा है?

 संग्रह में कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं जिनमें ऊँची जातियां एक अलग किस्म से चुनौतियां पाती नज़र आ रही हैं।  सत्ता और पद अस्पृश्य को भी सम्मानित बना देते हैं। और कहानी की बानगी देखिये कि चमार सीधा चौधरी बन जाता है। पंडित जी जाति का दंभ भूल जाते हैं और जिससे छूत मानते थे, उसके घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। और तब एक बार फिर यह स्थापित होता है कि ज्ञान के आगे सत्ता है और सत्ता के आगे जाति नहीं टिकती। ज्ञान ही एकमात्र ऐसा तत्व है जो सारे समीकरण उलट-पलट कर देता है। ज्ञान ऐसी संपदा है जो किसी को भी राजा बना दे। निम्नता को सहज ही उच्चता में बदल दे। ऐसे में यानी ज्ञान और सत्ता के प्रभाव में जाति एक ऐसा क्षुद्र संबोधन मात्र बन कर रह जाती है जिसका होना ना होना एक गैर जरूरी चीज लगता है।

ज्ञान से ही सत्ता प्राप्ति का रास्ता खुलता है और सत्ता से जाति का दंश मिटता है यही वजह है कि डॉ0 भीमराव अंबेडकर ने अपनी त्रिदेव की अवधारणा में प्रथम देव ज्ञान को मानते हुए कहा है-

“मेरा प्रथम देवता ज्ञान है मैं ज्ञान की उपासना करता हूं बगैर ज्ञान के मनुष्य को मानवता तथा शांति नहीं मिलती।“

11 कहानियों में से यह तो सिर्फ गिनी-चुनी कहानियां है। शेष कहानियां  भी इसी रवानगी पर हैं। जिनका लब्बोलुआब यह है कि कहानियाँ जीवन परोसती हैं और जीवन परोसने की प्रक्रिया में जीव विशेष का अंतर भी मिट जाता है। बकरी के बच्चे, हिरणी, मुर्गी सबके सब दास्ताँने ज़िंदगी कहते हैं और यह दास्ताँ इंसानी दास्ताँ से बिल्कुल अलग नहीं। जीवन जीवन है फिर फिर चाहे यह इन्सान का हो या किसी का भी। किसी हिरणी, मुर्गी बकरी या फिर सांप का भी। अब इस पर दुखी होना चाहिए या विचार करना चाहिए, ये लेखक ने पाठक पर छोड दिया है।

इस संग्रह को केवल ‘दलित-कहानियों’ के चश्में से नहीं देखा जा सकता। कथ्य की विविधता पाठक के समक्ष ऐसे अंतर-समाजों का उद्घाटन करती है कि जिसके बारे में उसने शायद ही पहले कभी सुना या पढ़ा हो। एक या दो नहीं संग्रह की अधिकांश कहानियों की ये विशेषता है।

 यह तो रही कहानियों के विचार तत्व की बात। पर विचार तब तक किसी मतलब का नहीं होता जब तक शिल्प से उसे सँवारा न गया हो। भाषा में उसे प्यार से सहेजा न गया हो। इस लिहाज से भी साम्भरिया जी बहुत सजग रहे हैं। सजगता के साथ सहजता भी ऐसी है कि कहीं कुछ भी अटकता भटकता नहीं है। देसी राजस्थानी संस्कृति अपनी सौंधी सुगंध वाले भावमय शब्दों के जरिए दिल तक उतर जाती है और व्यक्ति को सहज ही पाठक बना देती है। इस संबंध में संपादक महोदय का कथन उल्लेखनीय है-

“लेखक की विशेषता है कि वह अपने कथानक के अनुसार आरंभ से ही कथ्य की भाषा का सगुम्फन करता है। वेदना और वर्चस्व के विरोध में प्रतिरोध, प्रतिशोध, अधिकार, विद्रोह और चेतना की भाषा है। राजस्थान और हरियाणा के सीमा क्षेत्र की  भाषा है।”

भाषा में देसीपन बहुत लुभाता है। किवाड़, सान्कल, गूदड़-गाबा, मटका, बेंत, सिल, चूल्हा, चिमटा, फ़ूंकनी जैसे शब्द शहर की चारदीवारी से निकालकर पाठक को गांव की खाट पर बैठा देते हैं। ये शब्द गांव-देहात को मन में रमा देते हैं।

कुल मिलाकर कहें तो ये कहानियाँ एक अलग किस्म का दस्तावेज़ हैं जो पाठक को अपने समय की समझ देती हैं, समाजों में बसे अन्तर्समाजों से जोडती हैं और समय की नब्ज़ टटोलती हुईं दलित शब्द की परिभाषा को भी बदलती नज़र आती हैं।


सोमवार, 8 अगस्त 2022

 मुझे राग है

उस विश्वास से जो

 बरसता है।

बारिश जैसा

सूखी मरुभूमि को

रस देता है।

हरियाता है

तप्त मनोभूमि को

सुधा रस से।

वो विश्वास

पनपा नहीं है यूँ

उम्र लगी है।

 उसे बोने में

बंजर ज़मीन के

हर पोर में।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

सोन चिरैया

 वो चीं-चीं करती

बहुत शोर मचाती थी

 फुदकती फुदकती

पूरे आँगन का चक्कर लगा आती थी

दूध भात का दाना खाकर

चुपके से मेरे खास उगाए 

 इमली और बेरी के पत्ते भी चबा आती थी

और डाँट के डर से

छुप जाती थी गुलाब के फूलों में 

आम के कोटर में 

या फिर

मेरे पलंग के नीचे

वो नहीं आती थी बाहर 

कोई कितना भी बुलाए 

पर जब उसे बुलाते थे कहकर सोन चिरैया

न जाने किस कोने से

प्रकट हो जाती थी वो चीं-चीं करती

खुले आकाश की ओर गोल गोल आँखें लगाए 

चोंच में तिनका दबाए 

अक्सर पंख फैलाए फुदक पड़ती थी वो 

एक दिन न जाने कहाँ खो गई...

सूने आकाश और आँगन में 

अब नहीं दिखती सोन चिरैया..

















बुधवार, 3 अगस्त 2022

कुछ हाइकू


गुलाबी आस

अब तुम हो पास

कुछ खास है।

कुछ अनाम

नि:शब्द, अबोध सा

एहसास है। 

नत नयन 

मस्तिष्क है मौन

हिय भ्रांत है।

भावमय है

गहराता सा मन

जड़ प्राण हैं।

क्या है यह

प्रेम या प्रेम सा ही

या छलावा है।

चल पड़ी हूँ 

खोज में अज्ञात की

दुर्गम मार्ग है।





मंगलवार, 2 अगस्त 2022

लैंगिक अनुकूलन की प्रक्रिया व्यक्तित्व निर्मिति और समाज

 


जेंडर या लैंगिकता एक समाजशास्त्रीय विषय है जिसका अर्थ है स्त्री और पुरुष की सामाजिक और सांस्कृतिक परिभाषा। दूसरे शब्दों में कहें तो समाज स्त्री और पुरुष को किस तरह देखता है, उन्हें कैसी भूमिकाएँ, संसाधन एवं अधिकार देता है, इसका निर्धारण जेंडर का विषय है। यानी समाज की दो प्रमुख इकाइयों की व्यक्तित्व निर्मिति से इसका गहरा संबंध है और यह संबंध और इसका प्रभाव इतना गहरा है कि न केवल इन दोनों इकाइयों का व्यवहार, उनकी सोच-समझ, उनके दायित्व और कार्यक्षेत्र इस संरचना से प्रभावित होते हैं, बल्कि समाज की अन्य इकाइयों की स्थिति एवं उनके प्रति व्यवहार भी इससे प्रभावित होता है। स्त्री पुरुष और हाशिये की इकाइयों के प्रति नियमबद्ध व्यवहार की यही सुनियोजित प्रक्रिया क्रमशः रूढ़ होते-होते वृहत मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का अंग बनकर समाज विशेष की संस्कृति का हिस्सा बन जाती है। यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म और विरल होती है कि इसके अस्वीकार का प्रायः प्रश्न ही नहीं उठता। स्त्री और पुरुष स्वाभाविक रूप से इनका पालन करते हैं और समाज में रहने वाली अन्य इकाइयाँ स्वतः ही स्वयं को हाशिये पर पड़ा हुआ स्वीकार कर लेती हैं ।

चूँकि यह प्रक्रिया समाज के अनुसार होती है, समाज सापेक्ष होती है, अतः यदि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों को छोड़ दिया जाए तो विभिन्न समाजों और अंतर्समाजों द्वारा गढ़े इन लैंगिक साँचों में कुछ अंतर हो सकता है।

जेंडर के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए सुप्रसिद्ध विचारक पेपनेक का मत है कि-

सामाजिक जेंडर स्त्री और पुरुषों से संबंधित है, जो स्त्री और पुरुष की भूमिकाओं को सांस्कृतिक आधार पर परिभाषित करने का प्रयास करता है एवं जिसका संबंध स्त्री और पुरुष के विशेषाधिकारों से है।

पेपनेक यहाँ सामाजिक व्यवस्थापन की दृष्टि से स्त्री और पुरुष के विभक्त कार्यक्षेत्रों की ओर संकेत कर रहे हैं। इसी प्रकार ऐन ऑकली भी जेंडर को जैविक और शारीरिक स्थिति से अलग एक समाजशास्त्रीय संरचना मानते हैं। उनके अनुसार भी-

जेंडर का अर्थ स्त्रीत्व और पुरुषत्व के रूप में सामाजिक रूप से किये गए विभाजन से है।

यहाँ यह स्पष्ट है कि लैंगिकता एक ऐसा सामाजिक समीकरण है जिसे समाज द्वारा निर्मित किया गया है। इस निर्मिति के अंतर्गत पुरुष और स्त्री को क्रमशः प्रमुख और गौण के रूप में स्वीकार किया गया, जिसका आधार था जैविक विश्लेषण। यह माना गया कि स्त्री पुरुष की अपेक्षा कम बलवान होने के साथ साथ भावनात्मक अधिक और तार्किक कम है, अतः शक्ति और तर्क से मुक्त कार्य ही स्त्री के लिए उपयुक्त हैं। इन दोनों क्षेत्रों के लिए पुरुष ही उपयुक्त है। अतः गृहस्थी संभालना स्त्री का दायित्व और गृहस्थी का संरक्षण पुरुष का कार्यक्षेत्र माना गया। इसी विचार का असर था कि स्त्रियों के लिए शिक्षा, अवसरों तथा अन्य सुविधाओं को जरूरी नहीं माना गया। जबकि पुरुष के लिए इनका महत्व बना रहा।

असल में 19 वीं सदी के आखिर में और 20 वीं सदी के आरंभ में समाजशास्त्रियों के एक वर्ग ने यह मान लिया था कि बौद्धिक, भावनात्मक और नैतिक क्षमताओं की दृष्टि से पुरुष और स्त्री में पर्याप्त असमानता है। ब्रिटिश समाजशास्त्री हर्बर्ट स्पेन्सर ने एक उदार नारीवादी के रूप में कार्य करते हुए महिलाओं के अधिकारों की ओर ध्यान दिया किन्तु उन्हीं का यह भी मत था कि-

न्याय और तर्क क्षमता महिलाओं में कम होती है अतः उन्हें अपने परिवार की देखभाल में अपनी क्षमता का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को स्वाभाविक रूप से शक्तिशाली पुरुष की सुरक्षा में रहना पसंद है। इसी प्रकार कॉम्टे के अनुसार भी महिलाएँ अपनी भावनात्मक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता की वजह से परिवार और घरेलू जीवन के लिए ही उपयुक्त हैं।

दुरखीम स्त्रियों की सामाजिक अधीनता को बताने के लिए जैविक कारकों की बात करते हैं। उन्होंने भी यही माना कि स्त्री और पुरुष का उनकी क्षमता के अनुसार कार्यविभाजन होना चाहिए।

बात अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की हो तो आरंभिक मनोविज्ञान की धारणाएं भी इससे अलग नहीं थीं। यहाँ स्त्री पुरुष के जैविक अंतर के आधार पर मनोविज्ञानिक स्थापनाएं की गईं जिनके अनुसार भी स्त्री को पुरुष की तुलना में कम ही आँका गया। इन्हीं सब के प्रभाव से इन धारणाओं को बल मिलता गया कि स्त्री के कार्यक्षेत्र में प्रायः वे कार्य आने चाहिए जिनमें शक्ति और क्षमता की कम आवश्यकता हो। इस प्रकार स्त्री को गृहस्थ जीवन और पारिवारिक दायित्वों के ही अनुकूल माने जाने की धारणा पुख्ता होती गई।

हालांकि ये धारणाएं पितृसत्तात्मक समाजों की शुरुआती अवस्था में ही बननी शुरू हो गईं थीं, जिनका असर आगे तक बना रहा। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि अंतर और कमतर माने जाने की यह स्थिति समाज सापेक्ष थी। उदाहरण के लिए आरंभिक भारतीय समाज व्यवस्था या ऋग्वैदिक युग में ऐसी स्थिति नहीं थीं किन्तु कालांतर में विभिन्न घटनाक्रमों के चलते स्थितियाँ बदलती चली गईं।

कहने का तात्पर्य यह कि शक्ति को बाह्य आक्रमणों से क्रमशः समाज, देश और राष्ट्र संरक्षण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण घटक माना गया। जिसका परिणाम था उन्हीं स्थितियों के अनुरूप स्त्री और पुरुष का अनुकूलन।

हालांकि शुरुआती समाजों में यह जरूरी रहा होगा जबकि समाज का अस्तित्व शारीरिक बल पर ही आधारित था। किन्तु लोकतान्त्रिक समाजों के उदय के साथ इन मान्यताओं में परिवर्तन भी देखने को मिला। किन्तु सुदूर अतीत से लिखित इतिहास तक रूढ़ि बन चुके सिद्धांतों को बदल पाना कोई कोई सहज बात नहीं है। तब जबकि संस्कृति के प्रत्येक पाठ में सोच विचार, व्यवहार, नैतिकता के मानदंडों, पहनने ओढ़ने, उठने बैठने से लेकर मौखिक अमौखिक भाषिक अभिव्यक्तियों में भी लैंगिक अनुकूलन के आधार पर भेदभाव पाँव पसार चुका हो।

लैंगिक अनुकूलन

अनुकूलन की यह प्रक्रिया सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप पुरुष और स्त्री को साँचाबद्ध करने की प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुष द्वारा पुरुषत्व और स्त्री द्वारा स्त्रीत्व की सामाजिक, सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर सहज स्वीकार्यता अनुकूलन है। नारीवादी मानव विज्ञानी सिमोन द बॉउवार ने अपने पुस्तक सेकंड सेक्स में कहा है कि- स्त्री जन्म नहीं लेती बल्कि गढ़ी जाती है। सिमोन का यह कहना पूर्णतः यह स्पष्ट कर देता है कि यह शिशु पालन की ऐसी प्रथा है जिसमें एक स्त्री को निरंतर यह याद दिलाया जाता है कि उसे पहनना, ओढ़ना, खाना, गाना, हँसना, बोलना और सारे कार्य उसी प्रकार से करना चाहिए जैसा कि समाज उससे चाहता है। ठीक यही प्रक्रिया पुरुष के साथ भी है। भावनाओं पर नियंत्रण, निर्भीकता, निडरता, शक्तिशाली होना पुरुषत्व के लक्षण के रूप में स्थापित किये जाते हैं। जिनकी प्राप्ति बालक के श्रेय के रूप में प्रस्तुत की जाती है। इस प्रकार के भिन्न व्यवहारों की शिक्षा बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। जिसका परिणाम यह होता है कि लगभग पाँच वर्ष की आयु तक पहुंचते पहुँचते बच्चा अपने सामाजिक साँचे के प्रति एक समझ और सजगता हासिल कर लेता है। उसे पता होता है कि वह एक पुरुष के रूप में बड़ा हो रहा है या वह एक कन्या है।

बच्चे को गढ़ने की इस प्रक्रिया में इतनी सहजता होती है कि किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। माँ का व्यवहार उनका व्यक्तित्व, पिता का व्यवहार और उनका व्यक्तित्व बच्चे के लिए प्रथम सीख होता है। जो धीरे धीरे आस पास के वातावरण और व्यवहार से और पुष्ट होता रहता है। इसमें योगदान धर्म शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं का भी होता है। जिनमें लैंगिक अनुकूलन से निर्मित साँचों के अनुरूप ही वृत्तान्त होते हैं। जिनका निषेध या जिन पर प्रश्नचिह्न कोई साधारण बात नहीं होती। बल्कि प्रायः उनका प्रयोग या उनकी व्याख्या लैंगिक अनुकूलन को पुष्ट करने और सामाजिक साँचों को मज़बूत करने के लिए की जाती है। जैसे तत्कालीन स्थितियों के अनुरूप मनुस्मृति में स्त्री के विषय में कहा गया है –

स्त्रियों का विवाह संस्कार ही वैदिक संस्कार, यज्ञोपवीत, पति सेवा ही गुरुकुल निवास, वेदयाध्ययन और गृहकार्य ही अग्निहोत्र कर्म हैं।

तो कुरान मजीद में तो स्त्रियों को पुरुषों की जागीर ही घोषित कर दिया गया है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-

मुसलमानो, तुम्हारी औरतों में जो बदकारी कर बैठें, उन पर अपने लोगों में चार आदमियों की गवाही लो। अगर वे उनकी बदकारी की गवाही दें, तो इन औरतों को घरों में बंद रखो, यहाँ तक कि मौत उनका काम तमाम कर दे। या खुदा उनके लिए कोई और रास्ता पैदा करे। 

  कुल मिलाकर कहें तो समाज, संस्कृति, धर्म और परिवेश मिलकर बच्चे के उस संस्कार का निर्माण करते हैं जिसमें उसकी सहज स्वीकृति होती है। यहीं शक्ति और सत्ता के सभी व्यवहार, विकसित होती भाषिक समझ के साथ बच्चे के संस्कार का हिस्सा बन जाते हैं। परिणामतः प्रायः वह उसी रूप में विकसित होता है जैसा कि समाज उसे विकसित होते देखना चाहता है।

कैथरीन ए मैकिनोन अनुकूलन की इस सुनियोजित प्रक्रिया के विषय में कहतीं हैं कि – यह अनुकूलन जिस प्रक्रिया द्वारा होता है, वह सामाजीकरण वास्तव में शक्ति की ही अभिव्यक्ति है।

अनुकूलन की इस प्रक्रिया में पुरुष और स्त्री स्वतः ही शासक और शासित के रूप में सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर अपने व्यक्तित्व का तर्क भी तय कर लेते हैं। यही कारण है कि पुरुष और स्त्री के साँचों को प्रायः कोई चुनौती नहीं मिलती और ये न केवल उसी रूप में बने रहते हैं बल्कि उनके साथ कई सामयिक तर्क भी शामिल होते रहते हैं। इस संबंध में जॉन स्टुअर्ट मिल ने पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में स्त्री की स्थिति पर विश्लेषण करते हुए अपनी पुस्तक द सबजेक्शन और वूमेन में कहा है-

स्त्रियों पर पुरुषों का शासन अन्य सत्ताओं से इसलिए अलग है क्योंकि यह बल का नियम नहीं बल्कि इसे स्वेच्छा से स्वीकार किया जाता है।

कुल मिलाकर कहें तो इसी अनुकूलन के आधार पर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। सामाजिक साँचा जितना मजबूत होगा सामाजिक संरचना में टूट फूट उतनी ही कम होगी। किन्तु यह टूट फूट न होना या समाज का जस का तस बने रहना कोई सकारात्मक स्थिति नहीं है। फिर सांस्कृतिक आदान प्रदान, इतिहास का पुनर्स्मरण और पुनर्जागरण, समतावादी स्थितियाँ न केवल समाज का रूप परिवर्तन करती हैं बल्कि सामाजिक इकाइयों को भी नए परिप्रेक्ष्य में पुनरव्यक्त होने के लिए एक माहौल प्रस्तुत करती हैं।

वर्तमान स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि समाज की रूढ़ियाँ टूटी हैं। शक्ति के जो समीकरण पहले थे वो अब नहीं हैं। चाहे व्यवसाय की बात हो या स्त्री पुरुषों के अलग अलग दायित्वों की हर ओर परिवर्तन आया है। तर्क और शक्तितंत्र पर आधारित अवधारणाएं अब वैसी नहीं हैं जैसी पहले थीं। इनका स्वरूप अब पुरुष के साथ साथ स्त्रियों के लिए भी अनुकूल हुआ है। जिसका प्रमाण है स्त्री और पुरुष की बराबर भागीदारी। अब कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलातीं, निरंतर आगे बढ़ती स्त्रियाँ न हों। स्त्रियों और पुरुषों के लिए शिक्षा और व्यवसाय के समान अवसरों ने पुरानी चली आती उन सभी मान्यताओं को ध्वस्त किया है, जिनके अनुसार यह माना जाता था कि स्त्रियाँ केवल घर संभालने के ही योग्य हैं।

इसके साथ ही कानून और अधिकारों की समझ ने स्त्रियों को भी अपने आत्मसम्मान के लिए सजग होना सिखाया है। राजनीति, प्रशासन, अर्थशास्त्र, शिक्षा और सेना में महिलाओं की भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया है कि योग्यता और ज्ञान किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं है। अवसरों की सुलभता किसी को भी सफल बना सकती है। हालांकि अभी भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां काम किया जाना जरूरी है। क्योंकि समाज जितना अपनी इकाइयों के प्रति अनुकूल होगा, उसका विकास भी उसी तीव्रता से होगा।

 

 

 

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

स्कूल जाता बच्चा





 रंगबिरंगी किताबों,

मन-पसंद चिप्स, चॉकलेट और लंच

से भरा बस्ता पीठ पर और

गले में फेवरिट पानी की बोतल टाँगे

स्कूल जाता नया नवेला बच्चा

लगता है  

आँखों में ढेरों आँसू लिये

ससुराल जाती बेटी सा

जिसके आँसू पोंछती माँ 

पढ़ाती है उसे नई ज़िंदगी का पाठ 

देती है सास ससुर की इज़्ज़त और सेवा करने का ज्ञान 

ठीक वैसे ही दिया जाता है बच्चे को

 'मिस' का फेवरिट बन क्लास मॉनिटर बनने का ज्ञान,

 ठीक से पढ़ने-लिखने और अच्छा बच्चा बनने की सीख

पर कहाँ समझ आती हैं मासूम मन को ये बातें

उसे तो सुहाता है बस अपना घर-आँगन और शरारतें

वो कहता रह जाता है मुझे नहीं जाना

या फिर आज नहीं जाना

पर पिता अनसुना करते सब कुछ

 'देर हो रही है' कहते हुए

उठा लेते हैं वापस पटका हुआ बैग

बिलखता बच्चा नहीं जानता इस निष्ठुर रीत को

इसलिए पिता की मुट्ठी से हाथ छुटा 

फिर दौड़ आता है माँ के आँचल में

और गा उठता है गाना-

नहीं जाना है मुझे स्कूल, अब नहीं होगी कोई शैतानी

पर पिता यूँ ही नहीं पाते कठोर हृदय होने का तमगा 

उन्हें जबरन खींचना पड़ता है बच्चे को

सीने से लगा अपने दोनों हाथों को बेड़ी बनाना पड़ता है बच्चे के लिये

और फिर कर आते हैं विदा उसे 'उसकी ससुराल'

ट्यूबलाइट सी लपलपाती नाक को सुड़कता 

 बच्चा धीरे धीरे आखिर समझ ही जाता है

कि अब नहीं आएंगे दादा-दादी बचाने

न ही बुआ ही समझेंगी उसकी बात

रोना भी अब काम आने वाला नहीं 

इसलिए अब जाना ही होगा स्कूल

क्योंकि 

अब वह हो गया है बड़ा 

और उसे भी नहीं बनना है 

कबाड़ीवाला..

 





रविवार, 17 जुलाई 2022

स्नेह सरोवर

 


आज सुबह से ही दादाजी न जाने किस काम में लगे हैं! न तो मुझे गोद में लिया न ही मुझे प्यार किया ... सोचता हुआ 3 साल का रग्घू अपने दादा जी के सामने जाकर खड़ा हो गया। 

दादाजी लैपटॉप पर काम कर रहे थे। इसलिए अपने पोते को सामने खड़ा देख बोले- बेटा अभी जाओ, अभी मैं काम कर रहा हूँ और फिर काम पर लग गए। बच्चा इस व्यवहार के लिये तैयार नहीं था अत: कभी वह अपने दादाजी की ओर देखता तो कभी लैपटॉप की ओर। अचानक उसे न जाने क्या सूझा कि उसने एक हाथ मारकर लैपटॉप बंद कर दिया। दादाजी ज़ोर से चिल्लाए.... ये क्या किया???

दादाजी को गुस्सा होते देख बच्चा डर के मारे कमरे से बाहर भाग गया। इधर दादाजी गुस्से में तमतमाए हुए थे कि अब क्या करें..पर शुक्र है कुछ खराब हुआ नहीं था.

दादाजी सोच रहे थे कि नाहक ही पोते को डांट दिया, तभी उनका ध्यान कमरे की दीवार के पीछे छिपे अपने पोते की तरफ़ गया जो उन्हें टकटकी लगा कर देख रहा था और तोतली ज़बान में बहुत धीमे-धीमे उन्हीं का सिखाया गाना गा रहा था-

जी तलता है इछ मिट्टी छे तेले जैछा मैं दला बनाऊँ, मीता चनाब ता पानी उतमें बल लाऊँ, तेली प्यात बुजाऊँ.. 

इतना सुनना था कि दादाजी की आँखों में आँसू छलछला आए। उन्होंने झपटकर बच्चे को गोद में उठा सीने से लगा लिया और सुबक पड़े।

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

सफ़र

 बहन जी आप बैठिए सामान मैं रख देता हूँ। कहते हुए ड्राइवर ने किताबों का भारी बस्ता उठाकर गाड़ी में रख दिया। श्यामा ने एक नज़र उस आदमी पर डाली जिसे कल ही ड्राइवर रखा था। करीब 5 फुट 2 इन्च का वह आदमी कुछ अधिक ही फुर्ती से काम कर रहा था। उसके चेहरे पर अतिरिक्त सजगता थी, जिसका प्रयोग वह बाज़ू के पास से फटी शर्ट और थकान छुपाने के लिये कर रहा था। यही वह व्यक्ति था जिसे 18 हज़ार के वेतन पर रखा गया था। 

18 हज़ार! आपको नहीं लगता कि जिस हिसाब का काम है, पैसे ज़्यादा है? पिता से यही तो कहा था उसने। पर पिता का सोचना कुछ और ही था- तुम्हें इस सब से क्या मतलब? कितना देना है, कितना नहीं यह मेरी सिरदर्दी है, तुम्हारी नहीं। ऐसा मेहनती, ज़िम्मेदार और भरोसेमंद आदमी मेरी नज़र में तो दूसरा नहीं।

श्यामा चुप हो गई थी। उसे याद हो आया था कि सिर्फ पापा के कहने भर पे ये आदमी अपने दस काम छोड़कर खड़ा हो जाता है। बीवी-बच्चों का खर्च कुछ रुपयों में चला लेता है, पर आज तक किसी से एक रुपया तक नहीं माँगा। एक बार डेढ़ हज़ार रुपये माँगे थे पापा से, वो भी किस लिये? घर के राशन के लिये... वो भी अगले महिने ही वापिस कर दिये थे। चाहता तो न भी देता पापा कौन से माँग रहे थे उससे। पर दे गया था और ज़बर्दस्ती करके दे गया था।

सुना है आजकल जहाँ ड्राईवर है, मालिक बड़ा सख्त है किसी भी समय बुला लेता है। ऐसे में भी समय निकाल 4 घन्टे की ड्यूटी के लिये उपस्थित! कोई दिक्कत नहीं सर जी। कटेगा तो सोने का समय ही। फिर सो लेंगे? यही तो कहा था उसने जब पापा ने कहा था कि भाई इतने व्यस्त हो तो रहने दो।

ये आदमी है या मशीन! आखिर कौन सी वो चीज़ है जो इंसान को मशीन बना देती है? लगभग 35-36 वर्ष की उम्र और खुद के लिये कुछ नहीं एक अदद साबुत शर्ट तक नहीं!

बहन जी अभी आपने देखा न कि मैंने गाड़ी कैसे स्टार्ट की? क्लच दबा के गाड़ी स्टार्ट करनी है और फिर फ़र्स्ट गियर और.... श्यामा का ध्यान टूटा उसने हाँ में सिर हिला दिया। ड्राईवर इस बात से बेखबर कि बाजू के पास से फटी शर्ट साफ़ दिख रही है बोले जा रहा था-

बहन जी देखो तेज नहीं चलाना। धीरे ही प्रैक्टिस कीजिए आप 15 दिन में सीख जाओगी। फिर आपको किसी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। फर्राटे से गाड़ी चलाओगी..

उधर स्टीयरिंग हाथ में थामे श्यामा सोच रही थी- पापा से कहूँगी अपनी कुछ शर्ट इसे दे दो और आप कुछ नया खरीद लो 18 हज़ार वाकई कम हैं....


बुधवार, 6 जुलाई 2022

प्रसंग

 




मैं कब से चिल्ला रहा हूँ तूने सुनी नहीं मेरी आवाज़?

पापा मैंने अगर सुनी होती तो जवाब न देती क्या?

पूरे मोहल्ले ने सुनी पर तूने नहीं सुनी! तमतमाए चेहरे के साथ पिता चीखे जा रहे थे।

मैं छत पर थी, आप मम्मी से पूछ लो नहीं आई आपकी आवाज़ यहाँ तक...

हाँ-हाँ, नहीं आई..मैं ही झूठ बोल रहा हूँ या दिमाग खराब हो गया है मेरा....

मम्मी देखो पापा बिना बात के चिल्लाए जा रहे हैं, आप बोलो न कुछ। बेटी ने रुआंसी होकर कहा।

माँ कुछ बोल पाती इससे पहले ही पिता चिल्लाए- कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं है। सब पता है मुझे....

यह सुनना था कि बेटी ने भी लगभग चींखते हुए कहा- हाँ जानकर अनसुना किया मैंने। ओके? अब कभी मुझसे बात मत करना कहते हुए बेटी पाँव पटककर नीचे चली गई।

इस व्यवहार से पिता और भी आगबबूला हो गए और पत्नी से बोले- देखा? कितनी बदतमीज़ है! सब तुम्हारी गलती है। अबकी पत्नी बोली- तुम भी हद कर देते हो। मुझे तक तो सुनाई नहीं दी कोई आवाज़... और मेरे बस का नहीं है तुम बाप- बेटी के बीच पड़ना...कुछ तुम्हें भी सोचना चाहिये ...आखिर....कहते हुए पत्नी भी नीचे आ गई। 

रामनाथ बहुत देर तक अकेले चिंतन-मनन करते रहे। पिता और पति के क़िरदारों में झूलते रहे फिर चुपचाप कमरे में जाकर लेट गए। न टीवी देखा गया न कोई बात हुई। सभी चुप थे। अचानक आए तूफ़ान के बाद शान्ति सभी को खल रही थी जिसका असर सुबह तक बना ही रहा।

शाम को रामनाथ ऑफ़िस से लौटे तो सोफे पर निढाल हो गए। कल की घटना से मूड खराब था कि नाहक ही बेटी पर चिल्ला पड़े। तभी नज़र टेबिल पर रखी किताब पर पड़ी। ये कौन लाया? किताब को हाथ में उठाते हुए रामनाथ चौंककर बोले। 

कहीं से कोई जवाब न पा बेटी की ओर देखकर बोले- तू लाई है क्या?

बेटी के चेहरे पर उदासी और गुस्सा साफ़ झलक रहा था। अत: हाँ में सिर हिलाकर उसने दूसरी तरफ़ मुँह फेर लिया। 

रामनाथ का ध्यान पूरी तरह से किताब पर था उनका चेहरा खिल गया था। स्मृतियाँ कुरेदते वे बोले जा रहे थे-

ये किताब मुझे बहुत प्रिय है। तुलसीदास का जीवन कैसा कष्टमय रहा और अमृतलाल नागर ने क्या लिखा है, वाह! तुलसी के राम को समझने के लिये इस पुस्तक को भी पढ़ना ज़रूरी है। बेटी की ओर से कोई प्रतिक्रिया न पा पत्नी को आवाज़ लगा रामनाथ बोले- अरे कहाँ हो?

आ रही हूँ, कहकर पत्नी बगल में आकर बैठ गई। बेटी निर्लिप्त भाव से फोन में मगन। 

देखो- ये प्रसंग, जब अपनी पत्नी के अंतिम समय तुलसीदास जी अचानक आ पहुँचते हैं.... रामनाथ मगन भाव से प्रसंग पढ़े जा रहे थे कि अचानक भावावेग से होंठ फड़क उठे, गला रुंध गया और रामनाथ सुबक-सुबककर रोने लगे.....

पत्नी हैरान! कुछ कह पाती इससे पहले ही एक और घटना घटी- अब तक मुँह फुला के बैठी बेटी अपने पिता को सुबकते देख छोटे बच्चे की भाँति रो पड़ी थी.. उसका गुस्सा न जाने कहाँ काफ़ूर हो गया था। अपनी आंखों में ढेरों आँसू भरे वह कह रही थी- पापा क्या हो गया आप रो क्यों रहे हो...उधर रामनाथ से कुछ कहते न बना। न जाने कौन सी भावनाओं का ज्वार था जो अचानक फूट पड़ा था।

विस्मय विमुग्ध माँ आँखों में आँसू और होंठों पर मुस्कुराहट लिये सोच रही थी कि अद्भुत है पिता-पुत्री का संबंध भी...



 

रविवार, 3 जुलाई 2022

समय


समय कागज़ पर लिखा शब्द नहीं है

गर ऐसा होता

तो उसे मिटाकर

अपने मन माफिक अंदाज में लिख दिया जाता

सँवारकर, सजाकर

और रख लिया जाता उसे तिजोरी में संभालकर

पर समय तो

टुकड़ा है ज़िंदगी का

वो ज़िंदगी जिसमें

मन की न जाने कितनी स्याहियों से लिखी गई हैं

सतरंगी, बदरंगी, अधूरी, पूरी, चुप्प, बोलतीं, शोर मचातीं

अनगिनत कहानियाँ, कविताएँ और उपन्यास

एक अदृश्य चाबुक भी तो है समय

जिसके निशान साँस दर साँस गहराते जाते हैं

देह और आत्मा पर

जो नहीं मिट सकते किसी भी मरहम या दवा से

समय तो है लहराता विशाल, अथाह समुंदर भी

जिसमें

डूबती उतरातीं हैं प्रश्नाकुल ब्रह्मांडीय स्मृतियाँ

और बेचैन शोर मचाती हैं दृष्टिहीन साँसों की लहरें

छूटते जाते क्षणों को रेत सी बिखरती तसल्ली से थामें

 इस नाटकीयता के साथ समय है चश्मदीद भी

जो हाज़िर नाज़िर है

असंख्य दुनियाओं के मिलने टूटने बिखरने और फिर बनने का

समय है एक अदृश्य नदी भी

जिसके प्रवाह में

बहते जा रहे हैं जन्म

चाहे अनचाहे छिनता और मिलता जा रहा है बहुत कुछ

तो कहाँ संभव है समय के एक भी अंश को विस्मृति के अथाह में उंडेलना

या नज़रअंदाज़ करके खुद को मूर्ख बनाना

जबकि यह तय है कि वह लौटकर तो नहीं आने वाला

पर उसकी छाप ताउम्र रहने वाली है