सोमवार, 31 जनवरी 2022

पुस्तक समीक्षा : बलराम एक शिनाख्त


अभी कुछ ही समय पहले एक किताब हाथ लगी, जिसके संपादक हैं जितेंद्र पात्रो। 248 पृष्ठों की यह किताब अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है। जिसमें शामिल है एक पूरा गहराता जीवन। एक ऐसा जीवन जो हजारी प्रसाद द्विवेदी के कुटज के समकक्ष ठहरता है। जिन्होंने यह निबंध पढ़ा है वे यह जानते होंगे की कुटज होना सहज बात नहीं है। अदम्य जीवनी शक्ति की साधना कुटज हो जाना है। जिन स्थितियों में जीवित रहना असंभव है वहाँ जीवन को अनुकरणीय दृष्टांत बना देना कुटज है। ‘पुस्तक बलराम : एक शिनाख्त’ को पढ़ने के बाद ऐसा ही लगा मानो मन में कुटज फूल गया हो क्योंकि बलराम हो जाना भी आसान बात नहीं है। बहुत जीवन और जीवट लगता है  ऐसा लेखक होने में। बलराम एक लेखक हैं। किन्तु इतना भर कह देना या मान लेना स्वयं लेखक और लेखकीय कर्म के साथ अन्याय करना है। यही कारण है कि यह पुस्तक समग्रता में एक ऐसे लेखक को समेटने की कोशिश करती है जिसके व्यक्तित्व की कई परतें हैं जो उसके कृतित्व को उसके वैविध्यमय सौन्दर्य के साथ सबसे अलग स्थापित करती हैं।  

पुस्तक में कुल 46 अध्याय हैं। जिनमें आरंभिक 11 अध्याय लेखक के कृतित्व की कुछ बानगियाँ प्रस्तुत करते हैं। यहाँ संस्मरण भी है। कहानी, लघुकथा, वार्ता, यात्रावृत्त, भेंटवार्ता, संपादकीय लेख और व्यंग्य भी हैं। और इसके साथ शामिल हैं कुछ चिट्ठी पत्रियाँ  भी। कृतित्व का कुछ भी अंश उठा के देख लिया जाए, पाठक को लेखक बनाने के लिए काफी है। मसलन कहानी की ही बात की जाए, तो यह एक अलग किस्म की कहानी है। पहली चीज़ तो शैली का वह आत्मकथात्मक रूप जो पाठक को हृदय से जोड़ लेता है। ऐसा लगता है जैसे इस वृत्तान्त में कोई अपरिचय नहीं है। सुख दुख का यह वितान सबके जीवन में ही तो फैला हुआ है। कोई तो इससे अछूता नहीं है। सहसा प्रसाद की पंक्तियाँ याद हो आती हैं-

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया 

आलिंगन में आते आते मुसक्या कर जो भाग गया 

कुछ ऐसा ही तो है इस कहानी का सत्य। दुर्भाग्यवश! किन्तु साहित्य में कुछ भी अभाग्य , दुर्भाग्य जैसा नहीं होता। वह तो कई मायनों में ज़िंदगी की प्रतिकृति ही है। सो यह कहानी भी जीवन का एक खंड परोसती चलती है। जिसमें जबरदस्त पीड़ा है। त्रासदी है। भरी गोद रिक्त हो जाने का संताप है तो प्रेम का छद्म भी है। सपनों से भरी पूरी ज़िंदगी को मृतप्राय बना दिए जाने की वेदना भी है। और कुछ न कर पाने की स्थिति में किलसता मन भी है। तो वहीं दूसरी ओर एक स्तर पर आशा की क्षीण किरण भी है। संभावनाओं की आस भी है। यही वजह है कि कहानी ‘गोआ में तुम’ में तमाम नकारात्मक स्थितियों के बीच जीवन अपनी संभावनाओं के साथ बना हुआ है, आधी अधूरी ही सही। 

इस कहानी की जो दूसरी खास बात है वह है, दो कहानियों का समानांतर चलना। कहानी में पत्नी और बहन दोनों  की ज़िंदगियाँ चलती हैं कहानी बनकर। एक कहानी में संभावना खत्म हो गई है इसलिए अतीत की सुखद स्मृतियों को  भी माथे पर छलक आई पसीने की बूंदों के समान पोंछ दिया गया है। त्याग दिया गया है। किन्तु इस त्याग में एक पूरा का पूरा व्यक्तित्व टूट फूट गया है। छिन्न भिन्न हो गया है। जीवन का आनंद जैसे हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। 

तकलीफ दूसरी कहानी में भी है। टूटना, बिखरना यहाँ भी है। पर इन सबके साथ यह क्षीण ही सही, पर एक संभावना भी है। जो पहली कहानी में नदारद है। पाँच पृष्ठों की यह कहानी पाठक के मन से उतरती नहीं है। बल्कि जीवन की एक व्याख्या प्रस्तुत कर देती है। 

इसी प्रकार लघुकथा ‘बेटी की समझ’ भी बेजोड़ है। आधे पन्ने से भी कम के फैलाव में जैसे जीवन का फलसफा ही प्रस्तुत कर दिया है कि – बदलाव ही जीवन है। अतः इसे स्वीकारो। इसकी बुनावट को समझो। अब यदि असहज महसूस हो तो ये आपकी समस्या। विवाह से पूर्व बेटी की ज़िंदगी में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति उसके पिता हैं। उसे अपनी राशि या गृह नक्षत्रों की चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी ज़िंदगी तो उसके पिता के ही इर्द गिर्द घूमती है पर विवाह होते ही समीकरण बदल गए। नए नक्षत्र और नई राशि महत्वपूर्ण हो गई है। यही कारण है कि पिता से अधिक महत्वपूर्ण पति हो गया है। इसलिए जहाँ पहले बेटी को अपने पिता की राशि और गृह नक्षत्रों की चिंता सताती थी वहीं अब पिता के स्थान पर पति के लिए वार्षिक भविष्यफल लाया जाता है। 

इसी प्रकार व्यंग्य लेखन में भी लेखक बलराम का कोई सानी नहीं है। डिग्रियाँ ज्ञान का प्रमाण बन रही हैं पर डिग्रियों का प्रमाण क्या है? क्या वे ज्ञान की कसौटी हैं? या बस ज्ञान की पैरवी का ठप्पा बन कर रह गई हैं। यह सोचने वाली बात है। कबीर को केंद्र में रखकर लिखा गया यह व्यंग्य जहाँ एक ओर पाठक को गुदगुदाता है तो वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था और भ्रष्टाचार की भी पोल खोल कर रख देता है। 

कृतित्व के इसी अंश में ‘कारा’ शीर्षक से एक उपन्यास का भी अंश है जो ग्राम्य परिवेश के सटीक चित्रण के साथ परिवार में जमीन जायदाद पर कलह, संबंधों में तनाव और रिश्तों की टूटन को उजागर करता है। 

पुस्तक के इस खंड में और भी बहुत कुछ है। लेकिन जो बात खास तौर से ध्यान आकर्षित करती है वह है शैली के विशेष गुणों के साथ भाषा का सौन्दर्य। प्रत्येक रचना में भाषा अलग है। भाषा की यह विभिन्नता अलग अलग भाव स्थितियों में लिखी रचनाओं की विशेषताओं को रेखांकित करने में सक्षम है। 

अब ज़रा पुस्तक के दूसरे खंड पर निगाह डालें तो यहाँ दूसरे ही बलराम नज़र आते हैं। यहाँ व्यक्ति बलराम हैं। एक ऐसे व्यक्ति जिनको अपने समकालीन लेखकों की नज़र से परखा गया है।  इन पारखी लेखकों में शामिल हैं- से. रा. यात्री, प्रेम जनमेजय, ज्योतिष जोशी, विवेक मिश्र, श्रीराम तिवारी, विनय दास, राकेश शर्मा जैसे कई मित्र। शेष के 34 अध्यायों में पाठक समकालीन साहित्यकारों की कलम से लेखक बलराम को पढ़ता है। 

इस खंड का प्रथम लेख ‘सम्पूर्ण और प्रामाणिक कथ्य’ से. रा. यात्री द्वारा की गई पुस्तक समीक्षा है। इस समीक्षा का विषय है- ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’। बलराम के इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ जीवन अपनी समग्रता के साथ मौजूद है। अपनी सारी कड़वी सच्चाइयों के साथ मौजूद है। यही वजह है कि से. रा. यात्री आरंभ में ही कहते हैं-

“ये कहानियाँ अपने कथ्य और कथन में बहुरूपी हैं और कथाकारों पर लगे उस आरोप का खंडन करती हैं, जिसे कथाकारों पर इस रूप में लगाया जाता रहा है कि उनकी कहानियाँ इकहरी सच्चाइयों की कहानियाँ हैं।” इस समीक्षा में दसों कहानियों का तीखा विश्लेषण है। 

इसी प्रकार अगला लेख विवेक मिश्र का है। यहाँ कहानीकार बलराम व्यक्ति नहीं कुछ और ही हैं। कुछ सपनों के सौदागर टाइप। एक ऐसे व्यक्ति जो अकेले गाँव से शहर नहीं आए हैं बल्कि उनके साथ आए हैं ढेरों सपने। इस वृत्तान्त को पढ़ते हुए जगन्नाथ भगवान की एक कथा याद आ जाती है कि एक भाट भौतिक कष्टों से दुखी होकर जगन्नाथ भगवान की शरण में जाने की सोचता है। अब पहले के जमाने में जगन्नाथ पुरी जाना इतना सहज तो नहीं ही रहा होगा अतः जिसे भी पता चलता कि भाट जगन्नाथ पुरी जा रहे हैं वो भी अपना वृत्तान्त भाट को यह कहकर सौंप देते कि भगवान से ‘हमारी किसा भी कह देना’। इस संस्मरणात्मक लेख में लेखक बलराम के इसी ‘भाट’ व्यक्तित्व से परिचय होता है। विवेक मिश्र कहते हैं- 

“बलराम कानपुर से दिल्ली आए तो अपनी ही नहीं, शिवमूर्ति, केशव और दामोदर खड़से जैसे देश के दसियों कथाकारों की शुरुआती कहानियों को साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने छपवाने के सपने को भी साथ लाए।” 

बलराम असल में पहले कहानीकार हैं इसके बाद में कुछ और। कहानी से उन्हें विशेष प्रेम है। यही कारण है कि जहाँ भी अच्छी कहानी उन्हें मिलती है उसे साहित्यिक मंच देने का मोह वे संवरण नहीं कर पाते। साहित्य जगत को और चाहिए भी क्या? अच्छे रचनाकार और अच्छी रचनाएँ। बलराम इसी वजह से ज़बर्दस्त साहित्यिक व्यक्ति हैं। 

श्रीराम तिवारी भी कहानीकार बलराम के खासे मुरीद हैं। अपने लेख ‘ग्रामकथा का नया पाठ’ में वे पाठकों का परिचय लघुकथाकार बलराम से कराते हैं और कहते हैं-  “बलराम की लघुकथाओं में यथार्थ स्थितियों का विलक्षण फैलाव है। उनकी लघुकथाएँ दृष्टांत भर नहीं हैं, स्थितियों के अनुभव के प्रामाणिक बयान हैं।“

लेखक बलराम का जीवन उनके प्रथम कथा संग्रह ‘कलम हुए हाथ’ में अपने कुटज जिजीविषा सा उभर आया है। यही कारण है कि साहित्य जगत में बहुत सत्कार के साथ इस संग्रह का स्वागत हुआ।  ज्योतिष जोशी द्वारा की गई समीक्षा ‘मृगजल’ का कड़वा सच भी उल्लेखनीय है। जिसमें लेखक ने लघुकथा संग्रह मृगजल की समीक्षा की है और यह भी स्पष्ट किया है कि बलराम को क्यों पढ़ा जाना चाहिए। 

सवाल लाजिमी से सा है कि आखिर ऐसा क्या लेखक बलराम में कि उन्हें पढ़ा जाना चाहिए? तो इसका जवाब यह है कि बलराम एक complicated व्यक्ति हैं और यही वजह है कि साहित्यिक दृष्टि से बहुत जरूरी व्यक्ति भी हैं। वे ज़बर्दस्त प्रेमी हैं। पर उनकी प्रेमिका एक नहीं बल्कि तीन हैं। बड़ी खूबसूरती से प्रेम जनमेजय अपने सहज स्वाभाविक चुटीले अंदाज़ में आदरणीय लेखक बलराम की तीनों प्रेमिकाओं से परिचय कराते हैं और पाठक को बलराम को थोड़ा और नजदीक से पढ़ने, समझने और सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। 

‘बलराम की तीसरी प्रेमिका’ इस पुस्तक का अंतिम लेख है। पर यह अंतिम होकर भी अनंतिम है क्योंकि अंत तक पहुँचने के बाद एक बार फिर पुस्तक को पढ़ने का मन हो आता है क्योंकि यहाँ गाँव की माटी को मुट्ठियों में भरे आकाश की ओर नज़र टिकाए जिस व्यक्ति से मुलाकात होती है, वह साहित्य में एक नई बानगी प्रस्तुत करता है। 

इस पुस्तक में केवल इतना ही नहीं है। बहुत कुछ है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। 


गुरुवार, 13 जनवरी 2022

केंचुए


 

बहुत मेहनत लगती है कुछ लोगों को बड़ा होने में
 यूँ ही नहीं बन जाते हैं वे बड़े 
खोना पड़ता है उन्हें अपनों का साथ 
होना पड़ता है उन्हें कुछ संगदिल
 सीखना पड़ता है उन्हें तलवे चाटना
 और जी हुजूरी करना भगवानों की
 अपने सिद्धांतों को फ्रेम में कैद कर
 फेन्क देना होता है किसी बंद कमरे में
 और अपनी आवाज़ की रीढ़ निकाल कर
 केंचुआ बना देना होता है अपने स्वर को
 इतना भी आसान नहीं होता बड़ा होना
 इसलिए अक्सर बड़े हो चुके लोगों को 
 नहीं सुहाती खुद्दारी भरी ज़बान, 
आत्मविश्वास से उठा हुआ सिर
 अपनी ही धुन में कुछ नया करने की चाह
 इसलिए सीखना पड़ता है उन्हें एक और हुनर 
 चीटियाँ मसलने का
 जिससे उनके जैसे केंचुए
 बेफ़िक्री से चल सकें
 आखिर उन केंचुओं ने ही तो उन्हें भी भगवान बनाया है 
और शायद भगवान से भी बेहतर होने का एहसास दिलाया है. ..

सोमवार, 3 जनवरी 2022

टुकड़ा आकाश


 अलग-अलग रंग के कई पंछियों का झुंड आकाश के एक छोटे  टुकड़े के चक्कर लगा रहा था। गोल-गोल चक्कर लगाते, एक ही गति में उड़ते कबूतर देखने वालों के ध्यान का केंद्र बन रहे थे। आखिर रोज़ रोज़ ऐसा नज़ारा कहाँ मिलता था? अत: छत पर खड़ी जैनब ने झट से अपने तीन साल के भतीजे को आवाज़ दी-

अरे ओ कलूंटे जल्दी से छत पर आ।

थोड़ी ही देर में ट्यूबलाइट सी लपलपाती नाक को पूरे दम से साधता और कमरछोड़ पैंट को एक हाथ से थामे, अपनी बुआ के नवाज़े नाम से एकदम अलग धूप से उजले रंग वाला एक 3-4 साल का बच्चा प्रकट हो गया- क्या हुआ बुआ?

ये देख आकाश में कितने रंग-बिरंगे पंछी हैं....कहते हुए जैनब ने आसमान की तरफ इशारा किया।

छुटका विस्फारित आँखों से पंछियों को देखने लगा। सचमुच इतने रंग-बिरंगे पंछी उसने पहली बार देखे थे। वह चकित था इतना कि अपनी सरकती पैंट को छोड़ बुआ को पकड़कर खड़ा हो गया और ज़िद करने लगा- बुआ मुझे नहीं दिख रहे ठीक से, तुम गोदी लेकर दिखाओ न......

गोदी में लेने से हम उन पंछियों के पास पहुँच जाएंगे क्या? बुद्धू कहीं का कहते हुए जैनब ने उसे गोद में उठा लिया। 

अब दोनों बुआ-भतीजे मज़े में उन रंग-बिरंगे पंछियों को देख रहे थे। अभी आधा मिनट ही हुआ होगा कि छुटका फिर बोला- बुआ ये बस थोड़े से आकाश में क्यों घूम रहे हैं?  बाकी पंछी तो ऐसा क्यों नहीं करते?

अरे बुद्धू इसलिए क्योंकि ये किसी के पालतू पंछी हैं. .. बिना अपने मालिक की पर्मिशन के ये कहीं नहीं जाते। मालिक ने कहा होगा कि बस आस-पास और साथ-साथ घूमना, कहीं इधर-उधर मत जाना, इसीलिये तो ऐसे उड़ रहे हैं।

अचानक छुटके को अपनी खिसकी पैंट की ध्यान आई, जो बुआ की  गोद में चढ़ते वक़्त थोड़ी सी और उतर गई थी अत: उसने धीमी सी आवाज़ में कहा- बुआ ....मेरी पैंट..  .

हट बुद्धू.....पहनता ही क्यों है जब संभलती नहीं है, कहते हुए बुआ ने गोद में ही उसकी पैंट ठीक करते हुए कहा- कलूँटे तूने कोई आवाज़ सुनी?

कैसी आवाज़ बुआ- कुछ अजीब सी, सीटी जैसी आवाज़.. सुनो फिर आई.....

हाँ बुआ सुनी। ये क्या है?

बुआ हँसकर बोली- अच्छा आँखें बंद करके 20 तक गिनती सुनाओ, फिर बताती हूँ।

छुटका अपनी बुआ की बात कैसे टाल सकता था- दोनों हाथ आँखों पर रखे 1,2,3 शुरू हुई और झट से खतम भी कि बुआ चिल्लाई- कलूँटे देख- बच्चे ने झट से आँखें खोलकर देखा , आकाश में से वो सारे रंगीन पंछी गायब हो चुके थे। 

अरे! कहाँ गए सब? आपने जादू से सबको छिपा दिया क्या? छुटका आश्चर्य से बोला।

अरे बुद्धू  मैंने कोई जादू नहीं किया। तूने वो सीटी की आवाज़ सुनी थी न? वो असल में उन्हें बुलाने के लिए थी, जिसे सुनते ही सारे पंछी  वापस अपने डिब्बे में चले गए। 

क्यों चले गए मुझे तो उन्हें अभी और भी देखना था, बच्चे ने रुआंसा मुँह बनाते हुए कहा, फिर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये बोला-

अगर वो नहीं जाते तो? उनके तो पंख हैं। खूब दूर उड़ जाते तो फिर मालिक उन्हें कैसे पकड़ता? आकाश तो इत्ताआआआआ .......बड़ा है, छुटके ने दोनों हाथ फैलाते हुए कहा।

कलूँटे की बात सुनकर बुआ मुस्कुराई और कुछ पल मौन रहकर  बोली- अरे मेरे बुद्धू.... कुछ आवाज़ें इतनी भयानक होती हैं कि पंछी भूल जाते हैं कि उनके पंख भी हैं और उड़ने के लिए आकाश भी....

अबकी छुटका चुप था, शायद वह अपनी बुआ की बात को समझने की कोशिश कर रहा था...