शनिवार, 25 दिसंबर 2021

जिजीविषा


 ट्रैफिक में मुर्गों से भरा एक ठेला जा रहा था। ठेले वाला अपने भरसक दम से ठेला चला रहा था। लोहे के सींखचेदार डिब्बों में करीब दर्ज़न भर से कुछ अधिक ही मुर्गे बंद थे। सामान की तरह एक के ऊपर एक ठुँसे मुर्गे। इतने में एक जोर का झटका लगने से मरे से प्रतीत हो रहे मुर्गे कुनमुना कर जाग गए-

कराहती सी आवाज में एक मुर्गा चिल्लाया-  मरा जानबूझ के ऐसे चलाता है कि हम सब ऐसे ही मर जाएँ!

दूसरा मुर्गा हँसते हुए बोला- अरे काका अभी भी जीने की इच्छा है क्या?

इससे पहले कि पहला मुर्गा कुछ बोल पाए कोने में दुबका एक मुर्गा बोला- अबे क्या पगलेट सी बातें करता है, जब तक मौत नहीं आती, तब तक हर कोई जीने की इच्छा रखता है। काका कोई अनोखे हो गए क्या? तेरी कमर नहीं टूटी क्या झटके से, जो जादा बातें बना रहा है?

दूसरे  मुर्गे को शायद ऐसे जवाब की अपेक्षा न थी इसलिए अपनी आँखें फैलाकर गर्दन गोल घुमा कर उसने जवाब देने वाले मुर्गे की ओर देखा। एक मरियल सा, टूटे पंख वाला मुर्गा उसे इतना लेक्चर दे गया, वो भी मुश्किल से आधे घंटे की बची ज़िंदगी के लिए! वाह भाई वाह! मुर्गा क्वाक क्वाक करके हँस पड़ा। 

कोने में दुबका मुर्गा इस अपमानजनक व्यवहार पर कुछ नहीं बोला और गर्दन घुमा कर बाहर की ओर देखने लगा। इतने में दूसरा मुर्गा फिर बोला- भाई बात तो सही कही तुमने। पर जिस ज़िंदगी की तुम बात कर रहे हो वो कुछ ही क्षणों की मेहमान है क्योंकि आज तक तो डिब्बों में भरकर जाते मुर्गों को जिंदा लौटते मैंने तो देखा नहीं। 

यह बात सुनकर सभी मुर्गों के माथे पर चिंता की रेखाएं खिंच गईं। सच बात थी कि जो भी मुर्गा इस तरह से गया उसे फिर कहाँ देखा? सभी मुर्गे मन ही मन अपने बचपन के साथियों को याद करने लगे। साथी तो साथी उनके माता-पिता, चाचा-ताऊ तक तो उनके सामने ऐसे ही डिब्बों में भरकर गए, पर फिर उन्हें कभी नहीं देखा! सभी मुर्गे मार खाई सी नजर से एक दूसरे को देख रहे थे कि क्या करें?

डिब्बे में व्याप्त इस मातम को तोड़ते हुए काका मुर्गा बोले- मौत का डर कैसा? वो तो आनी ही है। आज नहीं तो कल आएगी। हमारे बाप दादों को आई थी तो हम बच जाएंगे क्या? 

अब तक डिब्बे से बाहर झाँक रहा मुर्गा बोला - काका यह बात नहीं जमी तुम्हारी। ऐसा ही था तो काहे को कराहे थे? लुढ़क लेते मजे में। 

मौके की नजाकत को समझते हुए दूसरा मुर्गा बोला- देखो भाई मैं यही तो कह रहा हूँ कि हम सब चाहे जितनी भी बड़ी बड़ी बातें कर लें पर सच्चाई ये है कि हम सभी जीना चाहते हैं। देखो एक तरफ से डिब्बा टूटा हुआ है, हम चाहें तो उसमें से निकल कर अपनी जान बचा सकते हैं... क्यों क्या कहते हो सब?

कुछ मुर्गों ने पंख फड़फड़ाए, क्वाक क्वाक की आवाज़ें फिर उठीं कि काका गुर्राए-

अबे चल शोहदों का चाचा, गुंडा मवाली। उलटी रीत सिखाता है, शर्म नहीं आती तुझे? तू बचाएगा इन्हें? इत्ती गाड़ियाँ  जो खुद इंसान तक पर रहम नहीं करतीं हम सबको बख्श देंगी? जब मरेंगे तब मरेंगे तू तो हमे अभी मरवा देगा!

 ज्यादातर मुर्गों ने अपनी गर्दन हिलाकर और हिकारत भरी नज़रों से ज्यादा समझदार बनते मुर्गे को घूरकर काका मुर्गा के साथ अपनी सहमति व्यक्त की। आखिर उम्र और अनुभव भी तो कोई चीज है, इस बात को बाकी मुर्गे समझ रहे थे। 

इतने में मरियल मुर्गा बोला- काका कुछ भी कहें, मैं तो मोटे की बात से सहमत हूँ। हमें जान बचाने की कोशिश करनी चाहिए। 

इतने में एक और मुर्गा मरियल मुर्गे से बोला- देख बेटा ज्यादा बचपना ठीक बात नहीं। तेरी हालत तो वैसे ही ठीक नहीं। किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो क्या होगा?

और जो बच गया तो? वहाँ पहुँच कर तो मरना तय ही है। अबकी मोटे मुर्गे ने मरियल का पक्ष लिया। 

डिब्बे में एक बार फिर नीरवता छा गई। 

मरियल और मोटा दोनों मुर्गे अब दोस्त बन चुके थे अतः मौका पाकर दोनों ने बचने की कोशिश करना ज्यादा मुनासिब समझा। मोटा मुर्गा चूंकि हट्टा कट्टा था अतः बड़ी आसानी से उसने नजदीक के एक पेड़ पर पनाह ले ली पर मरियल मुर्गे की ऐसी किस्मत कहाँ थी, वह अधिक ऊँचा न उड़ पाया और घिसट कर बगल में उगी झाड़ियों में उसे पनाह लेनी पड़ी। बच वह भी गया था। 

उधर डिब्बे में बंद बाकी मुर्गे इन दोनों मुर्गों की चिंता में दुबले हुए जा रहे थे कि एक दुकान के आगे ठेला रुक गया।ठेले वाले के साथ मिलकर दुकानदार ने मुर्गों का डिब्बा नीचे पटक दिया।  इत्तफाक से मुर्गे कटने का ऑर्डर भी आ गया था,  सभी मुर्गों की आँखों के सामने लपलपाती मौत और दिमाग में ज़िंदगी की उड़ान भरते दोनों मुर्गे थे...