मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

एक नदी की साधना




एक था पहाड़। ऊबड़-खाबड़, रूखा-सूखा एकदम नीरस. अपने इष्ट की तपस्या में लीन दुनिया से एकदम वीतरागी सा. और एक थी नदी. अल्हड सी, छल-छल करती, चांदी सी मुस्कुराती, बहुत ही चंचल. दोनों का कोई मेल नहीं। मौन, आत्मलीन, खोया-खोया सा पहाड़ और जीवन की धुन पे गुनगुनाती नदी. पर ईश्वर की माया! न जाने क्या हुआ उस  नदी को कि उस रूखे पहाड़ से प्रेम कर बैठी और सब कुछ भूल कर बन गई पहाड़ी नदी. नदी जानती है कि उसके पहाड़ ने उसे खींच लिया है अपनी ओर. लेकिन ये बात और किसी को नहीं पता. 
तभी तो किसी से भी पूछो तो सब यही कहते हैं कि  नदी तो अपने पहाड़ के साथ तब से है जबसे उसका पथरीला पहाड़।  उसी के संग जन्मी उसी में घुली मिली सी. तभी तो  उसी की खुशबु से महकती है वो नदी. पर देखो तो यह पहाड़। सच में बिलकुल अबोध ही तो है जो  उसे नदी के प्रेम का आभास तक नहीं। कहते हैं वो तो जबसे जन्मा है खुद में ही डूबा है और देखो तो नदी के आने के बाद भी यूं ही  डूबा हुआ है. पर लगता है नदी भी थोड़ी सी पगली है तभी तो इस पगले से प्रेम कर बैठी।  शायद नदी उसकी इसी अबोधता पर रीझ गई हो.…  भगवान जाने! 
 गुज़रती हवाएँ बताती हैं कि जब पहाड़ समाधिस्थ  होता तो नदी कैसे उसके रूखे पथरीले अंगों को अपने निर्मल जल से स्निग्धता प्रदान करती. पहाड़ चुपचाप ध्यानमग्न और नदी उसकी रुखाई को अपनी तरलता प्रदान करती। उसकी आग सी तपती देह को शीतल करती। पहाड़ निर्लिप्त नदी चंचल. पहाड़ मौन और नदी उसके मौन मन्त्रों को आत्मसात कर  अपना कल कल स्वर देती जैसी अपने आत्मस्थ शिव के लिए स्तोत्र गाती पार्वती और तब ऐसा लगता जैसे पूरा विश्व प्रेम के अदृश्य तंतुओं से बंध गया हो ।
इस विचित्र प्रेम को देख किसी ने कहा यही ओंकार है तो किसी ने कहा प्रकृति के प्रेम की अभिव्यक्ति।
ऐसे ही न जाने कितने युग बीत गए।  नदी यूं ही तपस्या करती रही साधना मेंलीन अपने निर्मोही वीतरागी तपस्वी की. और उसका तपस्वी  वैसे ही आत्मस्थ आत्मलीन वीतरागी और अबोध सा।
युगों बाद जब एक दिन अचानक उस रूखे आत्मस्थ पहाड़ की समाधि खुली तो अचंभित सा वह  क्या देखता हैकि उसकी रूखी तपती पथरीली देह यूं हिमालय कैसे हो गई? आअह  किसने अपने प्रेम रस से सींच दिया है  उसकी रूखी ऊबड़ खाबड़ आग सी तपती देह को।  पहाड़  हैरान।  और ये क्या इतना सौंदर्य ! जीवन के इतने रूप! कल- कल की अनुकृति में कलरव करते कितने मधुरगान।  उसी की सुगंध और दृढ़ता को धारण किये झूमते लचकते ये अनगिनत वृक्ष और वनस्पतियां ! कहाँ से आये सब ।   जीवन का ऐसा अनुभव !! पहाड़  गर्व से  झूम उठा कि ओह मेरे देव का वरदान है यह।  मेरी साधना का सुफल।
अपने इष्ट के भोलेपन पर नदी खिलखिलाकर हंस  पड़ी कहते हैं तभी से अल्हड नदी अपनी कलकल ध्वनि में अपने आत्मस्थ हिमालय के कान में कुछ कहती है पर वो अबोध पहाड़ फिर से समाधिस्थ हो गया है अपने देव से  एक और वरदान पाने  को। ....