रविवार, 26 मार्च 2023

स्वामी भले बिराजे जू भाग-2

 अब भाट नै कई, हम कैसें जानें कै तुम जगन्नाथ जी हो, कच्चे सूत में से झूल जाओ तौ जानें।

अब सच्चे भक्त के लाने तौ भगवान कछू भी कर सकत, सो बे झूल गए कच्चे सूत सें।

भाट खाँ अबै भी भरोसो नईं भओ सो बौ बोलो- करवा की टोंटी से निकल जाओ, तौ जानें। सो जगन्नाथ जी भाट भिखारी कै लाने करवा की टौंटी से झूल गए। अब जब भाट खाँ हो गओ भरोसो सो बौ जगन्नाथ जी के चरणन में गिरो औ चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू। स्वामी जू बोले अब तुम जाओ और भंडार सें ढाई-ढाई चुटकी आटा, दाल, चावल लो और भोग बनाओ, खाओ।

अब भाट जू चले। अब भंडार में उन ने सोची कै ढाई ढाई चुटकी सै का होत। सो खूब बिलात-बिलात भर लओ। अब जैसईं बना कैं हाथ धोन गए, सो फिर कुचिया, रुटिया। अब भाट हीर चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू। 

अब स्वामी जू फिर आए बोले काय रे भाट, अब का हो गओ?

भाट बोलो- एई के मारें तौ हम घर-बार छोड़ कैं तमाए इतै आये। एक गाँव माँगत तो कुचिया रुटिया हो जात औ चार गाँव माँगत तो कुचिया रुटिया हो जात!

भाट की बात सुनकैं स्वामी जू हँसे और बोले- नियत तौ नईं डुगाई ती?

स्वामी जू की बात सुन कैं भाट बोलो- हओ डुगाई तौ हती। हमनैं कई कै ढाई चुटकी सैं का होत सो हमनैं बिलात-बिलात लै लओ सब।

अब स्वामी जू बोले- एई सैं। नियत नईं डुगानैं। अब जाओ और ढाई-ढाई चुटकी लो सब कछू।

अब स्वामी जू की बात सुन कैं, भाट नैं फिर गओ भंडार घर मैं और अब ऊनैं ढाई की जगा एक-एक चुटकी लई औ बनाओ भोग। सो जैसईं भोग लगाओ सो बौ इत्तौ हो गओ कै बड़ाए ना। अब भाट फिर परेसान, चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू ..

स्वामी जू फिर आए, बोले अब का हो गओ?

भाट बोलो- स्वामी जू, तुमनैं जितनौं कई ती हमनैं तौ ऊसैं भी कम लओ, पर अब इत्तौ हो गओ कै, संभर नईं रओ।

भाट की बात सुनकैं स्वामी जू हन्सै और बोले- गरीबन खाँ खबाओ, मछरियन का डारौ औ फिर बचै तौ, उल्टे-सीधे हाथ पटकौ, सो सब बिला जै।

भाट नैं ऐसईं करो। अब तीसरो दिन भओ सो घरैं जाएं की छड़ी लगी। सो भाट नैं जगन्नाथ जी कौ आशीर्वाद लओ। स्वामी जू बोले कै, जाओ सो पाँच बेंत तोड़ लो और एक थाली और लोटा लै लो। भाट गओ बेंत तोड़बे, सो फिर मन मैं लालच आ गओ। ऊनें सोची कै पाँच काए, तनक बिलातअई तोड़ लैं। सो जैसईं ऊनैं पाँच सैं ऊपर तोड़े,, बौ उतईं बाँसन मैं फँस कैं रै गओ। सो फिर चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू।

अब फिर आए स्वामी जू। बोले- काय रे भाट अब का हो गओ?

भाट बोलो स्वामी जू हम निकरई नईं पा रये। 

स्वामी जू बोले- फिर सैं नियत डुगाई ती का?

अब भाट रै गओ। बोलो हओ स्वामी जू, डुगाई तौ हती। 

भगवान बोले- जब-जब नियत डुगाहो, सो फँस हो। ई सैं गाँठ बाँध लो कै नियत नईं डुगानै। अब जाओ, छूट गए तुम।

भाट भगवान कैं पाँव पर कैं, जौँ चलैं का भओ सो आँखन से कछू दिखाए ना। पाँव उतईं कैं उतईं जम गए। सो भाट फिर चिल्लाओ- स्वामी जू, स्वामी जू।

स्वामी जू बोले- अब का हो गओ? काय खाँ चिल्लात? 

भाट बोलो- आँखन सैं कछू दिखात नैयाँ। पाँव जाँ कै ताँ रै गए, बढ़तई नैयाँ आगे!

कोऊ के संदेसे तौ नैयाँ? 

भाट बोलो- हैं तो स्वामी जू, गठरियन!

गठरियन? तौ बताओ फिर।

अब भाट नैं पैलो संदेसो कई- गैया ऊ पार, बच्छा ई पार। मिलईँ नईं पाउत।

अब स्वामी जू नैं कई- पिछ्ले जनम मैं अपने बच्चा खाँ तो खूब प्यार करो, दूसरे के खाँ दुत्कार दओ। तुम छू लैयो सो मिल जैन हैं।

दूसरौ संदेसो- आधो सांप बामी मैं आधो बामी के बाहर?

स्वामी जू बोले- पिछ्ले जनम कौ कायस्थ आए। अपनी दूसरे की बिद्या तो लै लई पर अपनी नईं दई। तुम छू लैयो सो ठीक हो जै।

तीसरौ संदेसो- उबीनौ घोड़ा, ऊपै कौऊ नईं बैठत।

स्वामी जू बोले- अपने मालिक खाँ रण में अकेलो छोड़ कैं भग याओ। तुम बैठ कैं पाँच कदम चल लैयो, सो सब बैठन लगैं।

चौथो संदेसो- एक आम को पेड़, जी के फल कोऊ नईं खात।

मामा आएं पिछ्ले जनम के। भनैज कौ लै लओ और लौटाओ नैयाँ। तुम पाँच आम तोड़ लैयो, सो सब जनैं टोरन लगैं।

पाँचवौ संदेसो- एक घर सबेरे बनत साम कैं टूट जात?

जमींदार अपनो तो महल बनवा रओ और ओई के गाँव में गरीब की मौड़ी कौ ब्याओ नईं हो पा रओ। मौड़ी कौ ब्याओ करा दे जमींदार, औ तुम छू दैयो घर ना टूटै फिर।

दो तलैयाँ जिनमें कीरा बिलबिलात?

पिछ्ले जनम की द्योरानी-जिठानी आएं। इन्नैं न उनैं ढाँक कैं बायनों न उन्नै इनैं। तुम ई कौ पानी ऊ मैं और ऊ कौ पानी ई मैं कर दैयों सो सब पियन लगैं।

अगलो संदेसो मूड़ पै मौरिया धरें, उतरतई नैयाँ?

स्वामी जू बोले- अपनों बोझा तो उतरवा लओ, दूसरे को चढ़ो रन दओ। तुम हाथ लगा दैयो सो उतर जै।

मूड़ पै कैलिया औंधाए। निकरतई नैयाँ।

जौन बरतन मैं बनाओ ओई मैं खान लगीं। तुम छू दैयो सो उतर जै।

कमर सैं पीढ़ा चिपको, निकलतई नैयाँ।

स्वामी जू बोले- बड़े आए और मान मैं बैठे रये उठे नईं। तुम छू दैयो सो निकर जै।

अब संदेसे कह कैं भगवान के पाँव पर कैं लौटे भाट जू। 

क्रमश:



क्रमश:

रविवार, 19 मार्च 2023

स्वामी भले बिराजे जू भाग -1






चैत्र का महिना लग गया पिछ्ली 8 तारीख को। इस चैत्र से जीवन के तार जुड़े हैं। इसी चैत्र माह में राम नवमी यानी राम लला के जन्मोत्सव से ही भारतीयों का नववर्ष आरंभ होता है। अखंड मानस पाठ, नवाह पाठ से सब कुछ भक्तिमय हो जाता है। पके गेंहूँ की फसल भी इसी चित्रा नक्षत्र में घर भरती है। इसी के साथ इसी माह में हमारे घर पधारते हैं स्वामी जू और उनके सम्मान में प्रेम और भक्तिमय स्वर गूँज उठते हैं-
स्वामी भले बिराजे जू, 
उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में 
भले बिराजे जू....
प्रतिवर्ष इसके साथ ही मेरा बचपन अपने एक खास दृश्यखंड के साथ मेरी स्मृतियों में जीवंत हो उठता है, कानों में आरती गातीं, 'किसा' कहतीं आवाज़ों के साथ मेरी पड़दादी फिर से मुझे याद आ जातीं हैं। मुझे याद आता है कि किस तरह चैत्र के प्रत्येक सोमवार को, हर बार अलग प्रसाद के साथ अम्मा, मम्मी और बाई (पड़दादी) जगन्नाथ जी की पूजा करती थीं। अम्मा के ही कमरे में  या कभी आँगन में पानी से लीप कर, मम्मी चौक पूरती थीं। फिर पटले पर आसन बिछा भगवान जगन्नाथ जी को बिठातीं। पीतल की एक थाली जिस पर जगन्नाथ जी का चित्र बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी के साथ उकेरा गया होता था, वह स्थापित करतीं। जगन्नाथ जी के दाईं ओर इन्हीं तीनों के चित्र से उत्कीर्ण एक लोटा रखा जाता, जिसमें गुड़ का जल और पाँच बेंत रखे जाते। (ये पाँच बेंत, जगन्नाथ जी की फोटो, चित्र उत्कीर्ण थाली और लोटा, सब पुरी से ही लाए गए होते थे।)
मैं देखती थी कि भले ही पिताजी के प्यार से सींचे गुलाब कितने ही क्यों न फूले हों पर, बाई जगन्नाथ जी को एक गुलाब न चढ़ाने देतीं, पर टेसू के फूलों से उन्हें पूर देतीं। जब मैं पूंछती कि ऐसा क्यों? तो वो बतातीं- भगवान के जगन्नाथ रूप को टेसू के फूल बहुत भाते हैं। बात सच है चैत्र में टेसू खूब फूलते हैं। खिले-खिले टेसू के आगे सभी फूलों की खूबसूरती फीकी लगती है।
भाट जब जगन्नाथ जी के द्वार गया था, तो खूब टेसू खिले हुए थे। वही फूल उसने जगन्नाथ जी को भी अर्पित किये थे। तभी तो जगन्नाथ जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये थे, सब दुख दूर किये थे।
मेरा बालमन जगन्नाथ जी से मिलने की कल्पनाएँ कर उठता। मम्मी, अम्मा जब तक पूजा की तैयारी कर रहीं होतीं, बाई अपनी स्मृतियों को मुझसे खोलते हुए कहतीं- "हम तो बहुत बार गए जगन्नाथ जी कें।" 
पण्डा के इते रुके दो बार। बाकी तो रेलवे के गेस्ट हाऊस में रुकत्ते...बाई बोलते-बोलते चुप हो जातीं, ऐसा लगता कि कोई स्मृति खंड पिघलकर बाई की आँखों में बह आया हो, क्या पता बब्बा याद आ जाते हों, क्या पता! इतने में अम्मा कहतीं- बाई कओ किसा (कहानी) और बाई जय जगन्नाथ जी कहकर किसा कहना आरंभ करतीं। मम्मी बाई, अम्मा और हम बच्चों के हाथ में जौ थमा देतीं।
(कथा बाई ही कह रहीं हैं, तो मैं खड़ी बोली में कैसे लिख सकती हूँ)
एक हतो भाट। बौ एक गाँव माँगे सो कुचिया, रुटिया रह जाये, औ चार गाँव माँगे सो कुचिया रुटिया रह जाबे। बेचारो बड़ो परेसान। अब एक बार ऊकी औरत ने कई कै बिटिया-दमाद को न्योतो करने। आज तनक बिलात माँग ले आइयो। भाट ने कई हओ।
भाट जू चले। एक की जगा चार गाँव माँग ल्याये। लेकिन फिर बेई बात। खाना बनो सो फिर कुचिया-रुटिया रह गई। अब ऊकी औरत नै कई कै अब का करें? बड़ी बेज्जती की बात। मौड़ी की तौ कछू नईं, पर लाला जू का कैं हैं?
भाट बेचारो भोत दुखी भओ। ऊने कई कै अपने भाग खराब हैं तो का करें। कुचिया मौड़ी खों खबा दो औ रुटिया लाला जू खों, औ हम तौ अब जा रये जा मोह-माया छोड़ कैं।  
और भाट चल दओ। चलत-चलत भाट जू एक जंगल में पहुँचे। उतै एक बारी पत्ता तोड़ रओ तो। भाट नै कई भैया का कर रये तुम ई घने जंगल मैं?
बारी नै कई राजा कै इतै भोज है सो पत्तल के लाने पत्ता तोड़ रये। भाट नैं कई कै हम टुरुआ दैं? बारी नैं कई टुरुआ लो भैया, तुमाई जै हो जाबै। 
भाट नै कई कै हओ और टुरुआन लगो पत्ता।
अब बारी नैं पत्तल बना कैं पहुँचा दईं। राजा ने पूरे गाँव भर खाँ भोज दओ और पूँछी कै कोऊ ऐसो तौ नैयाँ जो भूखो-प्यासो हो? सो बारी ने बता दओ, के महराज एक भाट है, ऊने पत्ता टुरुआबे मैं हमाई मदद करी ती, सो ऊने नई खाओ कछू। 
राजा नैं कई कैं ऐसो है तो बुलाओ और खबाओ खाना।
अब आये भाट। सो बे ऊँची-नीची जघा ढूँढेँ। राजा के लोगन नैं जो देख कैं कई, काय भैया का बात है?
भाट बोले- भैया का करें, बहुत छुद्द्या (क्षुधा) है। 
सो का भई। तुम दो पत्तलें डार लो। भाट नें ऐसई करो। सो एक पत्तल भोज खाओ औ दूसरी पत्तल घड़ा में धर लई। भोज से आये सो रस्ता मैं उनैं उनई के गाँव की दो औरतें मिलीं, सो भाट ने बौ घड़ा उनै दै कैं कई, कै हमाई भाटिन खाँ दै दैयो, और कह दैयो कै चिंता ना करें, हम जगन्नाथ जू कैं जा रये।
अब उन दोई औरतन नैं सोची, कै ई भाट भिखारी नैं काआ भेजो भाटिन खाँ, तनक देखें तौ। सो जैसई बे देखन लगीं, उनके हाथ घड़ा मैं चिपक गये और आँखन से कछू दिखाए ना और कानन सैं कछू सुनाए ना।
अब बे घबरानी औ बोलीं- ओ राम अब न झाँकें दूसरे के मैं। अपनी तरफ़ से और जो गाँठ में हुइये सो डार दें। पर ठीक कर दो। सो बे ठीक हो गईं और संदेसे के संगे, उन्नें बौ घड़ा भाटिन खाँ दै दओ औ जो उनके संगे भओ सो बौ भी बता दयो।
अब जो भाटिन नैं देखो- सो ऊमैं हीरा-मोती! भाटिन नैं सोची कै भाट नैं ऐसो का करो कै इत्ते हीरा-मोती भेजे! जे तौ राजा के आएं। सो भाटिन बौ घड़ा लै कैं राजा के इतै पहुँची। 
अब राजा नैं जो घड़ा देखो, सो ऊमेँ राजा खाँ खाना दिखो। अब राजा बोलो- भाटिन! हम भूकन आ मरत, जो तुम हमैं खाना दैबे आईं इतै?
फिर भाटिन ने राजा खाँ पूरी बात बताई, कै महराज हमाए इतै तो जे हीरा-मोती बन जात, आपके इतै भोजन बन जात। 
अब राजा बोले कै देखो भाटिन, भगुआन ने जौ तमाए लानैं आ दओ सो खाओ-बिलसो, कन्याअन के ब्याओ कराओ। भाटिन नें कई कै ठीक है महराज। 
 अब इतै भाट तौ चले जा रये ते जगन्नाथ जू की गैल। सो उनैं चलत-चलत दो आम के पेड़ मिले। पेड़न ने पूँछी- किते आ जा रये भाट जू?
भाट ने कई कै हम तौ जा रये जगन्नाथ जू नौ।
सो बे बोले, ए तो हमाओ संदेसो कै दैयो- कै आम फरत कोऊ खातई नैयाँ।
हओ कै दैबी। कह कैं भाट आगे चले। अब रस्ता में दो तलैयाँ मिलीं। बे बोलीं कै हमाओ संदेसो कै दैयो- कै कीरा बिलबिलात रत, कोऊ पीतई नैयाँ पानी।
आगे चले सो एक उबीनो घोड़ा मिलो। ऊ नै कई कै हमाओ संदेसौ कह दैयो- कै कोऊ बैठत नैयाँ।
आगे चले सो- गैया ऊ पार, बच्छा ई पार। उन्ने कई हमाओ संदेसो कह दैयो कै मिलई नईं पाउत।
आगे चले सो आधो साँप बामी मैं आधो बामी से बाहर। उन्ने कई कै हमाओ संदेसो कह दैयो- कै फंसे धरे बीच में। न इताएँ जा पाउत न उताएँ।
आगे चले सो पिड़ी (पीढ़ा) से चिपकी बैठी एक औरत मिली। ऊने कई कै हमाओ संदेसौ कह दैयो कै उठई नईं पाउत।
आगे चले सो मूड़ पै कैलिया (भोजन पकाने का बरतन) औंधाए एक औरत मिली, ऊने कई हमाओ संदेसौ कह दैयो, कै कैलिया मूड़ से उतरत नैयाँ।
आगे चले सो एक घर मिलो। ऊने कई हमाओ संदेसो कह दैयो कै दिन मैं बनत, रात में टूट जात।
आगे चले सो एक जनीं मूड़ पै मौरिया (लकड़ियों का गट्ठर) धरें मिलीं। ऊनैं कई कै हमाओ संदेसो कह दैयो कै मौरिया उतरत नैयाँ।
भाट अब सब संदेसे लैकें पहुँचे पुरी। सो समुद्र के हेड़न से समझ गए, कै आ गए जगन्नाथ जी कै इतै। अब उतैं से चिल्लान लगे भाट स्वामी जू, स्वामी जू।
अब भक्त की आवाज़ सुन कैं आ गए भगवान। बोले- काय रे भटुआ  काय चिल्ला रओ?
अब भाट नें देखो कें जे कोआ आ गए? ऊने नई पहचानों...
शेष कल
 

रविवार, 5 मार्च 2023

अपराध-बोध

 



मम्मी स्कूल के लिये देर हो रही है, दीपा अब तक आई क्यों नहीं?? साँझला ने परेशान होते हुए कहा। 

हो सकता है उसे स्कूल न जाना हो..चलो मैं छोड़ आती हूँ। माँ ने साँझला की चोटी गूँथते हुए कहा। 

नहीं मम्मी, मैं चली जाऊँगी रास्ता मुझे याद हो गया है।

याद हो गया है, अच्छी बात है, पर अकेले नहीं जाना। माँ ने खीझते हुए कहा।

मम्मी प्लीज़, आज मुझे अकेले जाने दो न, पता है मुझे रास्ता।

"साँझला ज़िद मत किया करो, चलो दूध फिनिश करो, मैं तुम्हारे पापा को बता कर आती हूँ।" 

इधर माँ का अंदर जाना हुआ कि साँझला ने बस्ता उठाया और स्कूल की ओर दौड़ लगा दी।

साँझला बड़े मज़े में चली जा रही थी कि सामने दो रास्तों को देख ठिठक गई... इधर जाना है या उधर?

उसे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। लग रहा था कि अगर मम्मी की बात मान ली होती तो कितना अच्छा होता! बेचारी की आँखें भर आईं। 

तभी सामने से उसे एक आदमी आता दिखा। साँझला ने झट से अपने आँसू पोंछे और उस आदमी को अपने स्कूल का नाम बताकर बोली - अंकल क्या आप मेरे स्कूल का रास्ता बता सकते हैं?

"हाँ बेटा क्यों नहीं।" कहते हुए वो व्यक्ति रास्ता बताते हुए साँझला के साथ चलने लगा। कुछ ही देर में साँझला अपने स्कूल गेट पर थी। उस व्यक्ति ने साँझला से कहा- बाय बेटा, आ गया तुम्हारा स्कूल। साँझला मुस्कुराकर बाय बोलने ही वाली थी, कि पीछे से आवाज़ आई- "साँझला.."

  साँझला ने मुड़कर देखा, उसकी एक सहेली थी।

 हाय रिया..

हाय..अरे साँझला! ये तुम्हारे पापा हैं क्या?

अरे नहीं ये तो.. साँझला कुछ कह पाती, इससे पहले ही दूसरी सहेली बोली- ये तो कितने गंदे हैं! देखो इनके कपड़े! और देखो इनके जूते भी फटे हुए हैं...

साँझला ने अब एक नज़र उस व्यक्ति पर डाली जो सहेलियों की बातों से बेखबर शायद साँझला के बाय कहने का इतज़ार कर रहा था। 

सच ये तो एकदम भिखारी है! साँझला मन ही मन धिक्कार उठी। उसे अचानक से माँ की डाँट याद हो आई। वह बुदबुदा उठी-

"मम्मी सच ही कहतीं हैं कि अब तक अक्ल नहीं आई मुझे, छठी क्लास में आने से क्या होता है!" 

कैसे मैंने बिना कुछ सोचे-समझे इस भिखारी से मदद माँग ली। एक बार देखा भी नहीं इसे! उफ्फ!!! एक ज़बर्दस्त नकारात्मकता, घृणा और अपराध-बोध की मिली-जुली भावना से साँझला का चेहरा तमतमा गया। उसने एक चुभती सी नज़र से उस व्यक्ति को देखा और बिना किसी बात का उत्तर दिये, स्कूल गेट से अंदर चली गई। 

उधर अजनबी की आँखें जड़वत स्कूल गेट पर थम गईं थीं।