रविवार, 24 अप्रैल 2022

दृष्टियाँ





 ये वृक्ष, ये चहचहाते पक्षी, नीला गहराता अनंत आकाश, 

गोद ले जीवन झुलाती, घूमती धरती,

नक्षत्रों की उंगलियाँ थामे यह

 पितृ ब्रह्मांड

दौड़ती भागती ज़िंदगी में 

आसपास आते-जाते 

नज़रों से टकराते परिचित, चिर-परिचित, अपरिचित लोग       

अवचेतन में बे-वजह, बिना पूछे आरामगाह बनाते बेखौफ़ नज़ारे 

चीखते-चिल्लाते शोर के झुरमुट

 घुप्प, गुल और सुन्न सी करतीं अनगिनत चुप्पियों की चौपालें 

मूक-मंथर चलतीं, राग-विराग, ईर्ष्या, अग्नि, तपन, छुअन और समर्पण के लिबास पहने

और अक्सर

आत्मा तक बेंध जातीं, भेद लेने को आतुर

लपलपाते खंजर सी खूनी दृष्टियाँ

और 

इन कैक्टसी राहों के बीच बेधड़क सी चलती साँस

सबकुछ तो है अपरिवर्तित और पूर्ववत युगों से

अग्राह्य को ग्राह्य बनाती 

बदलती है तो सिर्फ आत्मदृष्टि

जो सिद्ध कर देती है

कि जीवन कुछ नहीं है

बदलती दृष्टियों का खेल भर है।







  





बुधवार, 20 अप्रैल 2022

मेरे प्रिय पुरुष





 प्रिय पुरुष

स्वागत है तुम्हारा मेरे इस अद्भुत विश्व में 

मैंने बहुत आग्रह और प्रेम से

ये दुनिया बनाई है तुम्हारे लिये 

जब तुम सो रहे थे देह में मेरी

मैं चुपचाप सँवार रही थी तुम्हारे रास्ते 

बुन रही थी आकाश और चुन रही थी

गलियों के पत्थर, काँटे और हर वो चीज़ जो गुज़र सकती थी तुम्हें नागवार।

मैंने रोप दिए थे रेशमी फूल और मखमली घास, तुम्हारे लिये

इस सबके बीच मेरी साँस भी नहीं थी मेरे पास

उसे भी अटका दिया था झूले की डोर सा 

तुम्हारे सोने और जागने की आहटों से

बहुत धीरे से, कि 

तुम्हारे मुलायम सपनों में कोई खलल न पड़े

नहीं तो मेरे अस्तित्व का अर्थ ही क्या?

स्त्रीत्व और अस्तित्व को दो फाँक कर, 

मैं अब तक यही सब तो करती आई हूँ

मिटाती भुलाती आई हूँ खुद को

यह सोचकर

कि मेरा स्त्रीत्व तुम्हारे पुरुषत्व की नींव है 

खुद को खींचने भर से

भरभराकर ढह जाएगा

 रेत के  महल सा

 तुम्हारा मेरे नाज़ों से सँवारा गया पुरुषत्व 

इसीलिये बहुत पहले ही छोड़ दिया है मैंने

 एक स्त्री की तरह जीना, हँसना, बोलना, रहना, सहना, सबकुछ

मेरी दृष्टि भी अब मेरी नहीं रही 

सब कुछ तो सौप दिया है प्रिय पुरुष मैंने तुम्हें अपना 

पर इस सौपने में तक़लीफ़ इस बात की है

कि तुम अधूरे बहुत अधूरे हो गए हो

संचय के दंभ में छोटे बहुत छोटे हो गए हो

अफसोस कि तुम अब तक निरे शिशु ही रहे

हठधर्मिता छोड़ त्याग, समर्पण और संरक्षण जान ही न पाए 

गर कुछ जान भी गए तो भी मान न रख पाए 

जब भी तुम्हें ऐसा पाती हूँ मैं हार-सी जाती हूँ

पर हारती नहीं क्योंकि, स्त्री हूँ

और स्त्री थकती है, कुछ निराश भी होती है पर हारती नहीं,

उसे तो आता है बस एक ही काम 

रौशनी, हवा और पानी सा 

अनवरत बहते जाना

इसलिये नींव बनकर  भी

 साधनारत एक नदी  हूँ और साधनारत है मेरा स्त्रीत्व भी

तुम्हारे पुरुषत्व-पूर्णता की प्रतीक्षा में .. 






  











शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

गुफ्तगू

            






चार सहेलियाँ आपस में गुफ्तगू कर रही थीं। घर परिवार की बातें, कुछ इधर-उधर की बातें और भी न जाने क्या-क्या, कहाँ-कहाँ की बातें। 

इतने में एक सहेली बोली- अच्छा छोड़ो ये सब। ये बताओ कि अगर खुदा से सामना हो जाए तो क्या माँगोगी उनसे?

यह सुनकर दूसरी सहेली बोली- चल न खुदा यूँ ही मिल जाते हैं क्या? खुद को परवरदिगार के माक़ूल पाक साफ बनाना पड़ता है तब जाके  उनका दीदार होता है।

यह सुनना था कि पहली सहेली मुँह बनाकर बोली- आय-हाय! हमारी पाक़ीज़गी पे शको शुभहा! हमसे पाक़ साफ़ तो कोई इस ज़माने में न होगा। सुना नहीं है क्या कि 

 तर दामिनी पे शेख हमारी न जाइयो

दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वुजूँ करें 

सुभान अल्लाह, सुभान अल्लाह क्या खूब कही। बाकी दोनों सहेलियाँ वाह वाह कर उठीं। दूसरी सहेली बेचारी अपना सा मुँह लेकर रह गई।

अब तीसरी सहेली बोली। चल मैं बताती हूँ- गर जो खुदा का दीदार करने के बाद भी होश में रही तो उनसे कहूँगी कि ए खुदा, ए क़ायनातों के शहंशाह मुझे नूरे आफताब बना दे। जो न कैद हो न किसी की गिरफ्त में हो और पूरी क़ायनात जिसका घर हो।

वाह क्या खूब कही। तीनों सहेलियाँ तारीफ़ कर उठीं। अब दूसरी सहेली जो कुछ देर पहले तलक़ मुँह बना के बैठी थी, अपनी सहेली की ख्वाहिश सुन बोली- मैं तो कहूँगी कि या परवरदिगार तू मुझे इतनी मोहब्बत दे कि मेरा क़तरा-क़तरा रोम-रोम तेरी मोहब्बत से लबालब तरबतर हो जाए।

कुछ वाहवाही हो पाती इससे पहले ही पहली सहेली ने चुटकी लेते हुए कहा-  खुदा का दीदार होगा? तुझे? सोच ले, अभी तो बड़ी पाक़ीज़गी की बात कर रही थी। 

इस ताने को बर्दाश्त न कर दूसरी सहेली तिनककर बोली- हाँ तो सही तो कहा था। पर खुद के लिये नहीं तेरे लिये कही थी ये बात। मुझ पे तो है ही खुदा की नवाज़िश। 

पहली सहेली का चिढ़ना लाज़िम था। बोली- शक़ल देखी है आईने में?

हाँ हाँ देखी है, तुझसे तो बेहतर ही है..

अरी जा न बेहतर होगी मेरी जूती... 

क्या कहा......? लड़ाई छिड़ ही जाती अगर बाकी दोनों सहेलियाँ  बीच बचाव न करतीं। इतने में चौथी सहेली बोली - अरी बस करो। सारे फसाद यहीं करोगी क्या? मेरी ख्वाहिश तो सुन लो। जैसे-तैसे दोनों शान्त हुईं और चौथी सहेली ने ख्वाहिश कहनी शुरू की-

मैं तो खुदा से यही कहूँगी कि या खुदा तेरी कायनात की खूबसूरती सिमट कर मेरे मेरे हुस्न में आ जाए। तू मुझे इतना खूबसूरत बना दे कि जन्नत की हूरें भी मुझसे रश्क़ करें। मेरी खूबसूरती के आगे झुक जाए ये क़ायनात!

वल्लाह ! तूने सौगात क्या माँगी, अल्लाह से अल्लाह बनने की दुआ ही माँग ली। तीनों सहेलियाँ एक साथ बोल उठीं लाजवाब!

चलो अब खेल खतम। अब चलते हैं, कहते हुए पहली सहेली ज्यों ही उठने को हुई दूसरी सहेली ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा- अरी कहाँ? अपनी ख्वाहिश बताए बिना ही खेल खतम?

अरे नहीं मेरी कोई ख्वाहिश नहीं। पहली सहेली ने बहाना बनाते हुए कहा।

 ऐसे कैसे नहीं है? बिना तेरी ख्वाहिश जाने तो हम तुझे न जाने देंगी। अबकी तीसरी सहेली बोली। 

अरी अब रहने दो। तुम सबकी ख्वहिशों के सामने मेरी क्या ठहरती है? पहली सहेली जैसे जान छुड़ा कर जाना चाह रही थी। मगर बाकी सहेलियाँ भी कहाँ कम थीं, एक सुर में बोलीं-

ठहरे न ठहरे। तेरी ख्वाहिश जाने बिना जाने तो न देंगी हम तुझे, चल बता..

अच्छा ऐसा क्या? नहीं मानती हो तो ठीक है सुनो, चौथी सहेली ने एक दिलकश मुस्कान के साथ कहना शुरू किया-

मैं बनना चाहती हूँ मलिका। क़ायनात या हुस्न की नहीं, इस दुनिया की मलिका। जिसमें सिर्फ और सिर्फ औरत ज़ात का रुतबा हो। मर्दज़ात का नहीं। मर्द जिनके एक इशारे पर उट्ठक बैठक लगाए। और.....

और क्या? जल्दी बता न सहेलियाँ बैचैन हो रही थीं।

और.... जो भरे दरबार में कमर लचकाकर, हमें लुभाकर गाना गाए.... इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा.....

इस अजब ख्वाहिश को सुन बाकी सहेलियाँ सन्न सी रह गईं फिर एक ज़ोरदार ठहाके के साथ एक आवाज़ में बोल उठीं-

अपनी ख्वाहिशें हम तेरी नज़र  करते हैं। तेरी ख्वाहिश कुबूल हो...  आमीन...


 


गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

प्यार

 

बहुत जरूरी होता है प्यार करना 

जिंदगी अधूरी और खाली किताब है प्यार के बिना 

इस विश्व के कण-कण में समाया है गहरा प्यार,

मीठी मोहब्बत और खुद को मिश्री हवा बना देने का खूबसूरत अंदाज़ 

प्यार हवाओं में हैं,  प्यार मिट्टी की खुशबुओं  में है

प्यार मेरी और तुम्हारी गहरी निगाहों में है

बारिश की बूँदों में बरसता है प्यार

सागर के ज्वार में उठता है प्यार 

इस अनंत विश्व में बरसता है प्यार 

जो भिगोता है आत्माओं को अपनी अमृत छुअन से

यही प्यार घुलता जा रहा है साँसों में मेरी 

गहरे उतर रहा है सीधे अंतरात्मा तक

भीग रही हूँ मैं पोर पोर तक इस अदृश्य जादू में 

डूब रही हूँ मैं अनंत महासागरीय विस्तार में 

आज एक बार फिर प्यार हो गया है मुझे खुद से 


गहरा बहुत गहरा....


शनिवार, 9 अप्रैल 2022

तुम बिन


 सुबह के 8 बज गए और अब तक एक प्याली चाय तक न नसीब हुई, मीठी नींद से जागे रामनाथ अचानक तल्ख हो उठे। सुनो .... सुनती हो क्या? यहीं हो या मायके चली गईं?

कोई उत्तर न पाकर रामनाथ और तिलमिला गए। रसोई की तरफ बढ़ते हुए वे लगातार  बड़बड़ाए जा रहे थे-

मेरी कोई अहमियत नहीं इस घर में .. .

“अरे! यहाँ भी नहीं! पता नहीं कहाँ चली गईं देवी जी। पति भगवान यहाँ चाय को तरस रहे हैं और इनकी भक्ति चल रही है।“

 बड़बड़ाते हुए रामनाथ पूजा वाले कमरे की और बढ़े ही थे कि गैस पर रखे कागज़ पर नज़र पड़ गई। रामनाथ ठिठक गए। नींद भरी आँखों में बिजलियाँ सी चमक गईं। मुड़े  हुए कागज़ पर सबसे ऊपर लिखा था

मैं जा रही हूँ ....

रामनाथ पर्चा उठाए कमरे की तरफ भागे। चश्मा वहीं रखा था बिस्तर के बगल में। पर ये क्या चश्मा तो यहीं रखा था रात को.   अब कहाँ गया ...रामनाथ यह सोचते हुए ज्यों ही बिस्तर पर बैठने को हुए कि पाँव के अँगूठे में इतनी ज़ोर का टेबिल का पाया लगा कि चीख निकल गई .....अरे राम....

रामनाथ कराहते हुए अँगूठा पकड़ बिस्तर पर बैठ गए। चिट्ठी  हाथ  से छिटक कर न जाने कहाँ उड़ गई। इधर  नाखून के अंदर फांस घुस गई थी पर बिना चश्मे के कुछ दिखाई पड़े तब तो कुछ करें। अजीब आफत है। रामनाथ सोच रहे  थे कि 35 सालों में आज तक तो चिट्ठी लिखी नहीं देवी जी ने। जब प्यार-मोहब्बत के दिन थे, तब भी याद नहीं पड़ता कि हटो जी, जाओ जी के अलावा एक शब्द भी कहा हो। मायके जाती थी तो भी तो लिखी नहीं ... रामनाथ के चेहरे पर अचानक मुस्कुराहट खिल गई। मायके में हमने छोड़ा ही कहाँ?  रोज़ ही तो मिलने पहुँच जाते थे,  कुएं के पीछ वाले खेत में..... आह क्या दिन थे.....कुछ देर के लिए रामनाथ फिर से जवान हो गए थे। दर्द-वर्द सब भूल गए तभी बालकनी में कुछ गिरने की आवाज़ आई रामनाथ चौंके और लंगड़ाते हुए बालकनी की तरफ भागे। थाली में दाल रखी थी बिल्ली ने पूरी गिरा दी थी। सत्यानाश! कैसा दिन है आज प्रभु! अब ये भी मैं ही करूँ? ये देवी जी चली कहाँ गईं?

रोज़ ही तो किसी न किसी बात पर मैं कुछ न कुछ न कहता रहता हूँ कहीं नाराज़ होकर मायके तो नहीं चली गईं। थाली में दाल के दानों को बीनकर रखते रामनाथ के हाथ यह सोचकर एकदम काँप गए। 

नहीं ऐसे कैसे चली जायेंगी। आखिर किस पति-पत्नी में झगड़ा नहीं होता? और फिर ये झगड़ा कहाँ है, छोटी-मोटी नोंक-झोंक है। वो भी न हो तो अकेले घर में दो जनों का रहना दूभर हो जाए। सोचते-सोचते थोड़ी  बहुत  दाल बिन गई। रामनाथ ने थाली उठाई और वापस रसोई में चले आये। थाली को एक तरफ रख सोचा चाय ही बना लें। लाईट का बटन फ्रिज के पीछे की दीवार पर था। जैसे ही बटन खोलने को रामनाथ ने हाथ बढ़ाया खड़ाक़ से कुछ गिरने की आवाज़ आई। लाइट जल गई थी इसलिये देख पा रहे थे कि गिलास भर दही पूरा का पूरा गिर गया था।।

रामनाथ तिलमिलाए अब ये भी कोई दही  रखने की जगह है...फ्रिज एक ओर से दही से नहा गया था और रामनाथ का पजामा भी दही से गीला हो गया। कुछ समझ ना आने पर रामनाथ ने पजामा उतारकर उसी से फ्रिज और फर्श साफ कर दिया। पजामा भी वहीं सिंक में डाल दिया। चाय पीने का पूरा मूड़ खराब हो गया था। रामनाथ मुँह लटकाकर आए और सोफे पर बैठ गए। 

रामनाथ मन ही मन सोच रहे थे कि पत्नी के बिना जीवन कितना दूभर है। ज़रा सी बात पर कितना कुछ सुना दिया करता हूँ। आदत ही पड़ गई है मुझे लड़ने की। अब कुछ नहीं कहूँगा। रामनाथ की पलकें भीग गईं और ओंठ बुदबुदा उठे। इतने में डोर बैल बजी। रामनाथ ने दरवाजा खोला। सामने विस्फारित आँखों से उन्हें निहारती पत्नी थी। रामनाथ को मानो खोई पूँजी मिल गई। कुछ कह पाते इससे पहले ही पत्नी बोली- ये क्या बनकर घूम रहे हो ? बनियान पर दही कहाँ से आया और पजामा कहाँ है तुम्हारा? और ये ऐसे क्यों खड़े हो पैर में क्या हो गया? चाय पी ली थी? वहीं थरमस में रख दी थी। कागज़ लिख कर रख गई थी। रात को लड़कर सोए थे कि जगाना मत इसलिये नहीं जगाया। सुबह सुबह श्याम का फोन आया था कि रत्ना उसकी बीवी की नाभि खिसक गई थी तो जाना पड़ा।  

पत्नी को ऐसी चुप्पी की आदत न थी।  व्याख्यान समाप्त होने पर  भी प्रत्युत्तर  न पा वह बड़े गौर से पति को देख रही थी। उधर पतिदेव चोरी पकड़े जाने के भय से सहमे बच्चे के समान मन ही मन भगवान का शुक्र मना रहे थे कि पत्नी ने अभी घर का मुआयना नहीं किया है...


मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

गैर ज़रूरी कुछ...


 तमाम गैर ज़रूरी चीज़ों के बीच

सबसे गैर ज़रूरी चीज़ है इंसानियत

आज के वक़्त में सबसे ज़्यादा आउटडेटेड और खतरनाक़

 इसलिए 

चुन चुनकर निकालना चाह रहे हैं लोग इसे अपनी आत्मा से

इसका एक भी अंश

तबाह कर सकता है उनकी हसरतों को

ढहा सकता है उनके इमारती जज़्बों और केंचुई दास्तानों को

और फेर सकता है पानी उनके दानवी इरादों पर

इसलिए लोग ताक़ में रहते हैं इंसानियत की

 घात लगाकर, छद्म रूप बनाकर

शर्म और लिहाज़ को अपनी ही ज़बान से निगलकर

अपनी ही आत्मा में सेंध लगाते हैं लोग

पर इंसानियत आत्मा से कर चुकी है कूच 

इसलिये बहुत सिर धुनते और पछ्ताते हैं लोग

आपस में चीखते-चिल्लाते और बिलबिलाते हैं लोग

शुक्र है आज के दौर में एक अच्छी बात सीखी है लोगों ने

"हार न मानना"

इसलिए मरी आत्मा को तलवों से रौंद कर

अक्सर सियार, श्वान, केंचुआ और भी न जाने क्या क्या बन,

फिर इंसानियत की खोज में निकल जाते हैं लोग

बदहवास, बैचैन इन आत्महीनों को अब कौन बताए

कि इंसानियत अब नहीं रही 

वह तो कर चुकी है कूच बहुत पहले ही

 इस समूचे ब्रह्मांड से 

इसलिए अब असंभव है उनके लिये

टोह भी पाना उसकी परछाई को ... .