बुधवार, 25 नवंबर 2009

us din

शायद कुछ समझ पाई थी खुद को उस दिन,
एक क्षण के लिए मैं सामने थी खुद के उस दिन,
उस दिन.......
जब पराये पराये हो गए थे,
मेरे उन अपनों में खो गए थे जो कभी पराये न थे,
आज मेरे वो पराये केवल अपने हो गए थे,
और तब..... मैं सामने थी खुद के उस दिन...........
अकेली सी, सहमी सी, आश्चर्यचकित......
 दूर से देखा थे पानी में झलकता वो अक्स जो शायद मेरा था,
कुछ बुदबुदाता सा कि जैसे कहता हो......
यही जीवन है................

रविवार, 22 नवंबर 2009

Ek aagantuk


दो दिन पहले की   बात है, शाम का वक़्त था. अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे पापा बाहर फोन पर किसी से बात कर रहे हैं. पापा की आवाज़ सुनकर जैसे ही मैं दरवाज़ा खोलने के लिए बढ़ी, मैंने देखा कि पापा दरवाज़े पर मैले कुचैले कपडों  में बैठे एक व्यक्ति से कुछ कह रहे थे. उस व्यक्ति के हाथ में एक पोलीथिन था जिसमें हाल ही की खरीदी गयीं दो मूलियाँ थीं. पापा उस व्यक्ति से दरवाज़ा छोड़ एक ओर हठने की बात कह रहे थे और वह व्यक्ति भरसक पापा को यह समझाने का प्रयत्न कर रहा था कि वह अपने ही घर की देहलीज़ पर बैठा है और अन्दर जाने का इंतज़ार कर रहा है. बड़ी अजीब सी बात थी, जान न पहचान तू मेरा मेहमान!
उसका हुलिया देख और उसकी अनर्गल बातें सुन मुझे लगा कि वह कोई शराबी है, इसलिए  मैंने पापा से कहा कि लगता है इसने शराब पी रखी है, आप छोडिये इसे, अन्दर आ जाइए. मेरी बात पर पापा कुछ कह पाते इससे पहले ही वो बोला, नहीं बेटा मैंने शराब नहीं पी, ये मेरा ही घर है, मैं यहीं ऊपर किराए पर तो रहता हूँ.
यहाँ किराए पर?? भैय्या हमारी छत पर तो कोई कमरा नहीं है, फिर कहाँ रहते हो? पापा ने उसकी बात पर मुस्कुराते हुए कहा.
बाबूजी मैं यहीं रहता हूँ, अन्दर जाने दो मुझे, मैं तो घर से बाहर निकलता ही नहीं, बाज़ार से मूली लाने गया था, और  अब आप घर नहीं जाने दे रहे हो?
  ज़ाहिर सी बात है, उसकी इस बात पर हम दोनों ही हैरान थे. वो हमारी बात का ठन्डे दिमाग से जवाब दे रहा था.वह पूरी कोशिश कर रहा था हमें समझाने की पर वो नहीं समझ पा रहा था कि हम उसकी बात क्यूँ नहीं समझ रहे हैं, उधर हमारे साथ भी कुछ ऐसी ही बात थी.  उसकी आवाज़ लडखडाई  तो लग रही थी पर उसकी भाषा सधी हुयी थी, किसी प्रकार की अभद्रता उसमें नहीं थी...शायद  वह सच कह रहा था कि उसने शराब नहीं पी.
उसकी बात सुन पापा बोले-  ठीक है मान लेता हूँ कि तुम यहीं  रहते हो, अपने किसी पडोसी से मिलवाओ मुझे.
पापा की बात सुनकर उस व्यक्ति ने अपनी आँखें भींचते हुए कहा, बाबू जी, मैं घर मैं ही रहता हूँ, तबियत ठीक नहीं रहती इसलिए  घर से बाहर बहुत कम निकलता हूँ, देखो न इसीलिए तो........
मेरे माँ बाप ने मेरी शादी भी नहीं करवाई. भैय्या को बुलाकर आपकी बात करवाता हूँ, पर आप अन्दर घुसने तो दो.......
पापा उसे धंकेलते हुए अन्दर आ गए, और कहा, कि ठीक ठीक है, तुम जाके पुलिस में रिपोर्ट करा दो कि मैं तुम्हे तुम्हारे घर मैं नहीं घुसने दे रहा...पापा अन्दर आ गए,
 उसने दरवाज़े की जाली में से झांकते हुए कहा- ठीक है बाबू जी मैं कम्प्लेंट करूंगा पर, ये मूली तो ले लो, परांठे बना लेना सुबह,
पापा उसकी बात को अनसुना कर अन्दर आकर सोफे पर बैठ गए, मगर मेरी नज़र उसी पर थी, वो व्यक्ति अपना सर पकड़ कर बैठा था, बार बार चिंता में अपना सर हिला रहा था. थोड़ी देर में उसने फिर दरवाज़े से भीतर झांकते हुए कहा- बाबूजी, खाना खा आने दो फिर निकाल देना मुझे बाहर, भैय्या भाभी राह देख रहे होंगे,...
अपनी बात कह वह उत्तर की प्रतीक्षा में कुछ देर अपनी नज़रें दरवाज़े से गडाए रहा, जब बहुत देर तक कुछ उत्तर न मिला तो उसने झुंझलाहट में पोलीथिन में रखी मूली को सड़क पर फ़ेंक दिया और अपनी हंथेलियों से अपने चेहरे को  ढँक लिया....
मैं अन्दर आ गयी. थोड़ी देर बाद मैंने फिर दरवाज़े की ओर देखा, वो अब तक वहीँ बैठा हुआ था. पापा ने पूंछा क्या हुआ वो गया क्या? जवाब में मैंने न में सर हिला दिया,
पापा उठकर बाहर आये, और दरवाज़ा खोलकर उससे बोले, अब जाओ यहाँ से, बहुत हो गया.
कहाँ जाऊं अपना घर छोड़ के?? उसने दीनता भरे स्वर में कहा.
अब वाकई हम परेशान हो गए थे, सोसाइटी के भी कुछ लोग आ गए, गेट कीपर भी अपने गलती पर सर खुजलाते हुए हमारे बगल में आ खड़ा हुआ, कुछ लोग गेट कीपर पर भड़क रहे थे कि क्या चौकीदारी करता है, कोई भी ऐरा गैर अन्दर घुस आता है,....बेचारे गेट कीपर की भी जैसे जान पर बन आयी, अपनी गलती से ध्यान हटाने के लिए उसने कहा साब इस बार माफ़ कर दो आगे से ऐसी गलती नहीं होगी. मैं अभी इसका दिमाग ठिकाने लगता हूँ  और उस व्यक्ति का हाथ पकड़ कर उसे लगभग घसीटते हुए वह गेट से बाहर से ले गया,.......
हम लोग अन्दर लौट आये.
अन्दर आते हुए पापा कुछ सोचते हुए बोले वो व्यक्ति बुरा नहीं था केवल उसका समय बुरा था. वह मानसिक रोगी था, ऐसी स्थिति किसी के भी साथ हो सकती है.....
 मैं पापा की बात से पूरी तरह सहमत थी, पर एक अनजान को घर में घुसाना किसी खतरे को बुलावा देने से कम नहीं है, समय ही ऐसा है, यही तर्क मैंने पापा के सामने पटक दिया था उस वक़्त ..... पर जो भी हो उस पर विश्वास करना और न करना दोनों ही हमारे लिए मुश्किल बातें थीं. मनुष्यता की परीक्षा लेते हुए मैंने कई भिखारिओं को दिल्ली की सड़कों पर देखा है, लोगों को लगभग रुला देने वाले उनके मिथ्या उपक्रमों का भंडा फोड़ होते हुए भी देखा है, ऐसे में हम कैसे उस व्यक्ति पर विश्वास कर लेते? हो सकता है कि उसका मानसिक संतुलन वाकई सही न हो, पर भिक्षावृत्ति पर जीवन यापन करने वालों को भावनाओं से हमने इतना खेलते हुए देखा है कि दिमाग ऐसे किसी भी व्यक्ति पर विश्वास करने से मना कर देता है, यही कारण है कि कई बार गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है....
क्या पता वो गेंहू था या घुन...
  थोड़ी देर में  जब गेट कीपर लौटा तो उसने हमें बताया कि वह व्यक्ति कह रहा था- भाई   मैं रास्ता भूल जाता हूँ, कहाँ है मेरा घर मैं भूल गया हूँ. माफ़ करना ज़रा ...
मैं निकलता नहीं घर से, अब मेरा घर..... कैसे घर जाऊंगा......

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

purush sanskriti ka avshesh

आज भैया दूज है. भारतीय समाज में इस दिन की बहुत अहमियत है, कारण इस दिन बहन अपने भाई की लम्बी उम्र के लिए, पूजा करती है. कई जगहों पर तो इस दिन व्रत भी रखा जाता है. अच्छा लगता है इस दिन. मैं खुद इस दिन को बहुत प्यार से मनाती हूँ, अपने भाई को गिफ्ट देती हूँ, वो भी मुझे देता है, मम्मी कहती हैं कि बहन को क्या ज़रुरत है गिफ्ट देने की, यह काम तो भाई का है, बहन तो इस दिन भाई की लम्बी उम्र की कामना करती है, पूजा करती है. मम्मी अपनी जगह ग़लत नहीं है, एक परंपरा से उन्होंने ऐसा ही देखा है, उन्होंने भी ऐसा ही किया है, तो उनकी बेटी क्यूँ न करे,  ठीक है, मैं भी करती हूँ, अपने भाई से प्यार करती हूँ, इसलिए करती हूँ, इस दिन ख़ास तौर से वो मुझसे झगड़ता भी नहीं है, इसलिए भी यह दिन मेरे लिए काफी अहम् है, पर एक सवाल मेरे जेहन में रह रह कर उठता है, और वो यह कि कोई ऐसा त्यौहार क्यूँ नहीं है जिसमे भाई बहन के लिए व्रत रखे, पूजा करे? ऐसा कोई पर्व  क्यूँ नहीं होता, जब भाई अपनी बहन की  लम्बी उम्र के लिए उपासना करे? दरअसल बात केवल बहन की ही नहीं है, पूरी स्त्री जाति पुरुषों के ही लिए ही पूजा पाठ करती है, चाहे फिर तीज का व्रत हो, संतान सप्तमी हो, भैया दूज हो, राखी का त्यौहार हो.......फेहरिस्त बहुत लम्बी है जिसका सार यही है कि  पुरुष हमेशा पूज्य की भूमिका में आता है, और स्त्री भक्त की भूमिका में.
वस्तुतः हमारी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी है, लड़के को अधिक महत्त्व दिया जाता है, लड़का पैदा होने पर थाली बजाना, उल्लास के साथ भोज कराना  और लड़कियों को पैदा होते ही या तो मार डालना और अगर नहीं मारा तो  उनसे पुरुषों का पूजन कराया जाना हमारे समाज की पारंपरिक बीमारी है. जो समाज को विकसित करने की बजाय उसे तोड़ती है. जब तक इस तरह कि बे वजह की परम्पराए रहेंगी तब तक स्त्री को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल सकता.इस तरह के व्रत और त्यौहार और कुछ नहीं पुरुष संस्कृति का अवशेष है, जो अब उत्तराधुनिक युग में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देते है,

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

वृद्ध व्यवस्था की आह

कल समलैंगिकता के मुद्दे पर सोचते हुए यूँ ही कुछ लिख दिया। पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी जानने का सुख प्राप्त हुआ, अनुभव कुल मिला कर अच्छा रहा। लोग इस मुद्दे पर सोच रहें हैं और सोचने लायक तरीके से सोच रहे हैं। यह वाकई अच्छी बात है। लेकिन जो बात मुझे सोचने पर विवश कर रही है, वो यह है कि असल मुद्दा समलैंगिकता का है ही नही, मुद्दा है उस व्यवस्था का जो कुछ सामान्य से विषय को भी महत्त्व का विषय बना कर सोचने पर विवश कर देती है। ज़ाहिर सी बात है, कि असली मुद्दा पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के वृद्ध स्वरूप को समझने का है।
वृद्ध इसलिए क्यूंकि मातृसत्तात्मक व्यवस्था के पराभव के बाद से इस व्यवस्था ने एक लंबा सफ़र तय किया है और इस सफ़र के दौरान इसमें कई तरह से बदलाव आए। इस व्यवस्था के अधीन इकाइयों ने इस पर जैसे - जैसे बदलाव के लिए दबाव बनाया, इस व्यवस्था को बदलना पड़ा। हाँ कई स्तरों पर बदलने का ढोंग भी अच्छा खासा करना पड़ा, सो इसने वो भी किया। मूल से अब तक काफ़ी कुछ इसके साथ घटा। यह जन्मजात युवा तो पैदा हुआ ही था, पर आजन्म युवा रहना इसकी नियति नही थी। यही कारण है कि यह भी वृद्ध हुआ और होता जा रहा है। इसकी जड़ें कमज़ोर हुईं, पकड़ ढीली हुई मगर इसके आत्मबल में कोई परिवर्तन नही आया। उसी आत्मबल का प्रमाण है कि यह अब तक जीवित है। वृद्ध ज़रूर हो गया है मगर आवाज़ में अब भी वही तल्खी है जो पहले हुआ करती थी। पहले मतलब तब जब इसने मातृसत्तात्मक व्यवस्था को विस्थापित किया था। खैर.....
समाज शास्त्र की दृष्टि से समाज का अस्तित्व सामाजिक इकाइयों के नियमन द्वारा उचित व्यवस्था की निर्मिति में निहित है। इस व्यवस्था के अनुसार जो इकाई सबसे ताकतवर होती है, नियम बनाने का पूरा दारोमदार उसी के कन्धों पर होता है और उसके द्वारा जो नियम बनाए जाते हैं, वे नियम उसी केंद्रीय इकाई की सुविधा का ध्यान रखते हैं। अन्य इकाईओं का कार्य हर हाल में उन नियमों का अनुपालन होता है। यदि वे ऐसा नहीं करतीं तो तथाकथित व्यवस्था में उनके लिए कोई स्थान नहीं होगा। निश्चय ही उन्हें उस समाज से खदेड़ दिया जाएगा। पितृसत्तात्मक समाज का आरंभिक स्वरुप ऐसा ही था। पुरूष प्रधान इस व्यवस्था ने केवल पुरुष को स्वतंत्रता दी। उसने सभी महत्वपूर्ण पद पुरुष के लिए नियत किए। उसने मातृसत्तात्मक व्यवस्था को विस्थापित कर जिस नई भाषा का निर्माण किया वह भी उसी के वर्चस्व का एक प्रमाण थी। स्त्रियों को उसने अपने बाद दूसरा स्थान दिया। स्त्रियाँ उसके लिए महत्त्वपूर्ण थीं। उनसे उसका वंश चलता था, काम पिपासा पूर्ण होती थी। स्त्री के बिना उसका काम नहीं चल सकता था। इसलिए भाषा का कुछ अंश उनके खाते में भी चला गया। फ़िर भी भाषा में उच्च पद उन्हें कभी नहीं मिला। आधुनिक हिन्दी भी उसी पुरानी परम्परा को ढो रही है। राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, सब के सब पुल्लिंग शब्द है, स्त्रियों के लिए यहाँ किसी समानता की बात ही नही है। भाषा के ज़रिये स्त्री वर्ग को दोयम दर्ज़े का साबित किया जाता रहा। उनका निरंतर अपमान किया जाता रहा है, किन्तु स्त्री तो फ़िर भी ठीक रही एक और सामाजिक इकाई को तो इस व्यवस्था ने भाषा का भी अधिकार नहीं दिया गया। इस तीसरी इकाई को नपुंसक लिंग के नाम पर जो मुठ्ठी भर शब्द सौपें गए, क्या वो उस इकाई का अपमान नहीं था? स्थिति आज भी वैसी ही है, वह सामाजिक इकाई भाषा के नाम पर या तो पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग करती है या फ़िर स्त्रीलिंग शब्दों। जबकि सत्य यह है कि यह वर्ग न तो स्त्री की श्रेणी में आता है न ही पुरूष की। भाषिक अपंगता के ही कारण यह वर्ग या तो पुरुष के रूप में ख़ुद को खपाने की कोशिश करता है या स्त्री के रूप में। किसी भी इकाई को जब भाषा में स्थान नही तो समाज में उसे सम्माननीय स्थान मिलने की कैसे उम्मीद की जा सकती है ? जो भी हो आज वह इकाई भी समर्थ हो रही उसने भी अपने अधिकारों की मांग की, कुछ अधिकार उसे मिले भी और धीरे धीरे मिलेंगे भी। इसी प्रकार समलैंगिक इकाइयां भी है। ऐसा नही है कि यह ग्लोबलाइज़ेशन से उत्पन्न बीमारी है। इनका भी लंबा इतिहास है। दक्षिण भारत में देवी येल्ल्म्मा को नन्हीं बच्चियां समर्पित करने की लम्बी परम्परा इसका बहुत छोटा सा प्रमाण है। ग्रीस में देवी आइसिस को बच्चियां और महिलायें समर्पित की जाती थी। इंडोनेशिया, रशिया और भारत के अलावा कई संस्कृतियों में लेस्बियन कल्चर के प्रमाण मौजूद हैं। इसीप्रकार गे कल्चर के भी प्रमाण भारतीय ही नहीं अन्य संस्कृतियों में भी मिल जाते हैं। इन इकाईओं के स्वतंत्र अस्तित्व को यदि हम नकारते हैं तो निश्चित रूप से हम तर्कहीनता की ओर ही कदम बढाते हैं। तथ्यों से आँखें मूंदते है। कहने का तात्पर्य इस तरह के सामाजिक परिवर्तन कोई नई बात नही है। इतनी हाय तौबा जो मचाई जा रही है, वह इस वृद्ध पित्रिसत्तामात्क व्यवस्था की कसमसाहट भर है जो पूरी तरह स्वाभाविक भी है। जिन सामाजिक इकाइयों को अब तक दबा कर रखा गया था, वे जैसे जैसे विकसित होंगी, परिवर्तन तो होंगे। वृद्ध पितृसत्तात्मक समाज की बूढी पसलियाँ चर्मरायेंगी हीं। यह तो अवश्यम्भावी है, होना ही होना है। यह तो वैज्ञानिक सत्य है, कि जिसे जितने दबाया जाता है वह उतने ही दम के साथ उठ खड़ा होता है। शक्ति आख़िर जायेगी कहाँ। वह तो क्रमशः संचरित होती है, यही नियम है।
यह आधुनिकता के बाद का युग है, हाशिये पर पड़े समूहों का मुख्य धारा में आने का युग है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, के बाद अब समलैंगिक विमर्श का युग है। साथ ही यह पितृसत्तात्मक समाज के वृद्ध स्वरूप को नए सिरे से विमर्श के दायरे में लाने का भी युग है...........