गुरुवार, 31 मार्च 2022

माँ तुम सा होना...


  

माँ तुम सा होना कोई बच्चों की बात नहीं

मैं अगर कहूँ कि मैं जीती हूँ तुमको तो शायद अधूरा होगा

या फिर मैं कहूँ कि तुम बसी हो मुझमें 

तो भी शायद अधूरा होगा

या फिर मैं कहूँ कि तुम ही मेरी दुनिया हो

तो भी शायद अधूरा होगा

या फिर मैं कहूँ मेरी आँखों की चमक,

मेरे इंद्रधनुषी सपने और सपनों में दम भर के भरी हुई जान तुम ही तो हो

तो भी शायद अधूरा होगा

संपूर्णता से भरी इस दुनिया में 

माँ तुमको जितना जानती जाती हूँ

और अधूरी सी होती जाती हूँ मैं 

क्योंकि तुम सा होना चट्टान होना है और

पानी होना भी 

 सबको साधती धरती होना है और

 होना है आकाश भी

और क़तरा सी मैं कुछ भी तो नहीं तुम्हारे आगे

न जाने कैसे इतना कुछ रचा-बसा पाती हो माँ

आधुनिकता और तर्क को पकड़े मैं चाहे जहाँ भी पहुँच जाऊँ

तुमसे एक क़दम पीछे ही नज़र आती हूँ माँ

सोचती हूँ कि तुम सा होना असल में साधना है संपूर्णता की,

 खुद को हवा की स्रोतस्विनी बनाकर श्वास बन जाना है सहज ही

जिस दिन मैं भी थोड़ा सा आकाश, थोड़ी सी  धरती बन पाई

इतराता पानी और पहाड़ बन पाई,

शायद मैं भी श्वास बन जाऊँगी माँ

तुम तो नहीं पर शायद कुछ कुछ तुम सी हो जाऊँगी माँ....

 




शुक्रवार, 4 मार्च 2022

कबीर साहित्य में स्त्री चिंतन



हिंदी साहित्य में कबीर के विषय में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा गया है। अलग-अलग दृष्टियों से कबीर साहित्य की समीक्षा की गई है। इतने सब के बाद भी कबीर को समझना सहज नहीं हुआ है। बल्कि कहना चाहिये कि जटिलता जस की तस है। दूसरी बात यह कि ऐसा भी लगता है जैसे कबीर के पाठ के साथ कुछ अन्याय भी हुआ है जैसे तुलसीदास को कुछेक पंक्तियों के आधार पर स्त्री विरोधी कहा गया उसी प्रकार कबीर पर भी इसी प्रकार के आरोप लगे हैं। पर विज्ञ जनों के समक्ष यह स्पष्ट हो चुका है कि इस तरह की बातें सिर्फ आरोप ही हैं और ऐसा केवल वही लोग कहते हैं जिन्होंने कबीर साहित्य को पढ़ते हुए संभवतः कुछ पक्षों को छोड़ दिया है या उनसे छूट गए हैं। 

कबीर साहित्य में स्त्री तत्व की व्याख्या या विश्लेषण के लिए भारत की सांस्कृतिक प्रक्रिया, उसमें स्त्री के विविध रूपों, भूमिकाओं और समाज में उन रूपों और भूमिकाओं के व्यवस्थापन पर ध्यान देना भी जरूरी है। भारतीय संस्कृति में वैदिक काल के बाद स्त्री की स्थिति में बहुत परिवर्तन देखने को मिलता है। पहले जहाँ उसके कार्यक्षेत्र में विविधता है, विद्या-अध्ययन उसके लिए आवश्यक है। वैद्यक, संगीत, नृत्य, गणित और शिल्प ही नहीं, क्षात्र-ज्ञान की भी वह अधिकारिणी है और ऐसा इस कारण कि वह अपने अर्जित और संचित संस्कारों से न केवल अपने घर परिवार बल्कि आने वाली संततियों को भी श्रेष्ठ संस्कार प्रदान कर सके। यहाँ उसकी सभी भूमिकाएँ समाज की उन्नति के दायित्व से युक्त हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो उसकी भूमिका पुरुष से कहीं अधिक व्यापक और दायित्व से युक्त है। इसमें कहीं भी कोई ऐसा कर्म नहीं है जो समाज में उसकी नकारात्मक छवि को प्रस्तुत करे। हालांकि कुछ ऐसे भी प्रसंग हैं जहाँ अकेली स्त्री के लिए यौनकर्म की ओर प्रवृत्ति को दिखाया गया है। हालांकि ऐसा कुछ विशेष परिस्थितियों में ही है। कालांतर में विभिन्न साँस्कृतिक टकरावों और हलचलों के कारण सामाजिक संरचना में भी अंतर आया और इसका सीधा असर स्त्री की स्थिति पर पड़ा। परिणाम यह हुआ कि ऋग्वैदिक समाज से गुजरती स्त्री मध्यकाल तक आते-आते न जाने कितनी बेड़ियों में बँध गई। यहीं से उसकी परतंत्रता की जो कहानी लिखी गई वह फिर न मिट सकी। मातृसत्तात्मक व्यवस्था से पितृसत्तात्मक व्यवस्था तक इतिहास साक्षी है जो स्त्री के साथ हुआ। जो प्रकरण प्रसंगवश थे वे जीविकावृत्ति के अलग मार्ग के रूप में समाज की आवश्यकता बन गए। समाज उन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार तर्कसंगत साबित करता रहा और स्त्री अपने अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा खोकर मोहरा बनकर गई। 

मध्यकाल तक आते-आते हालांकि चीजें बहुत कुछ बदल गई थीं पर फिर भी पितृसत्तात्मक समाज का आदर्श विवाह संस्था, उसकी गरिमा अपने आदर्शात्मक रूप में बनी रही। स्त्री गरिमा का दायरा विवाह संस्था तक ही सीमित होकर रह गया। हालांकि विवाह संस्था के बहुत से नियम युगीन परिस्थियों के अनुसार पुनरपरिभाषित भी हुए। जिसके कारण जहाँ एक ओर पुरुष का स्त्री की सुरक्षा के प्रति दायित्व बढ़ा तो वहीं स्त्री का कार्यक्षेत्र सिमट कर पति, परिवार और बच्चों का लालन-पालन भर रह गया। उसमें भी पुरुष की इच्छा सर्वोपरि! निश्चित रूप से इसके पीछे कोई धार्मिक कारण नहीं था बल्कि वे सामाजिक स्थितियाँ थीं, जिनके कारण स्त्रियों के लिए घर से बाहर निकलना असुरक्षित हो गया था। इन्हीं स्थितियों में बहुत सी कुरीतियाँ भी स्त्रियों का दायरा पक्का करती गईं। घर की दहलीज से बाहर कदम रखना मानो नर्क हो गया। इसी के साथ यौन-शुचिता का प्रश्न भी प्रासंगिक होता चला गया और चाहे अनचाहे ही पुरुष की इच्छा का पालन करना स्त्री का धर्म बन गया। पितृसत्तात्मक व्यवस्था का सुदीर्घ इतिहास इसका गवाह है। । विवाह एक ऐसा सुरक्षात्मक दायरा था जिसमें स्त्री सुरक्षित थी अतः पुरुष और स्त्री दोनों पर ही इसकी गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। पर विडंबना यह रही कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने पुरुष के दायित्व को अहं से जोड़कर स्त्री प्रतारणा का जरिया बना दिया। फलतः विवाह संस्था दूषित होती चली गई। और इसके साथ ही विवाह संस्था को बचाए रखने के प्रयास भी आरंभ हो गए। 

पितृसत्तात्मक व्यवस्था मातृसत्तात्मक व्यवस्था से अधिक वैज्ञानिक और व्यवस्थित तो थी पर इसमें जो दोष आते गए  उनके कारण स्त्री का बहुत अहित हुआ। हालांकि इसका खामियाजा पुरुष को भी उठाना पड़ा और पुरुष ही क्या समाज की अन्य इकाइयाँ भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हुईं। ऐसे समाज का विकास भला किस प्रकार संभव है! असल में यहीं पर भक्ति मार्ग प्रासंगिक हो उठता है।  

अब यह जो विवाह संस्था से बाहर प्रवृत्ति की बात है, यही एक ऐसा विषय है, जो सामाजिक व्यवस्थापन और विवाह में आस्था रखने वालों को नागवार गुजरती है। यहीं से चिंतन-मनन की प्रक्रिया की भी शुरुआत हो जाती है। यह विचार का विषय बना कि जो स्त्री अपनी संततियों की प्रथम पाठशाला है, उनकी प्रथम गुरु है, जो समय समय पर पुरुष को उसके कर्त्तव्यों का बोध कराती है, उसी का एक रूप यदि पुरुष को दैहिकता के दलदल में खींच ले जाए या उसकी कामुक प्रवृत्ति को और बढ़ावा दे तो इससे बुरी बात भला और क्या हो सकती है? यहाँ समस्या का कारण पर-पुरुष और पर-स्त्री का संबंध है। क्योंकि इस प्रकार के संबंध विवाह संस्था के लिए चुनौती हैं। जबकि मातृसत्तात्मक व्यवस्था के विस्थापन के बाद पितृसत्तात्मक व्यवस्था के 16 संस्कारों में सबसे जरूरी संस्कार विवाह संस्कार ही था। इस संस्कार की विशेषता थी इसमें पुरुष और स्त्री के प्रति समान भाव से दायित्वों का बँटवारा था। पितृसत्तात्मक समाज की यह सबसे खूबसूरत व्यवस्था थी। जिसमें कालांतर में कई दोष आते रहे। धर्म, अर्थ और काम की पूर्ति करने में यह संस्था सक्षम थी। अब यदि कुछ शेष बचता था तो त्याग की साधना, मोक्ष के लिए साधना। विवाह संस्था की टूटन और अतृप्त कामनाएँ इस मोक्ष साधना में व्यवधान बनती ही हैं। अतः बहुत जरूरी है कि इस संस्था के प्रति सम्मान भाव हो। ऐसा तभी संभव है जब पति-पत्नी के बीच प्रेम और बराबर सम्मान का भाव हो। दोनों के बीच प्रेम, समर्पण और तृप्ति का आनंद हो। और केवल उनके बीच ही नहीं समाज में भी सद्गरिहस्तों के प्रति सम्मान भाव हो। इस संबंध में मनुस्मृति में कथन है-

यथा नदीनदा: सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। 

तथैव श्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्।

 यथा वायुम् समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तव:। 

तथा गृहस्थ माश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमा:। 

मनुस्मृति के इन्हीं श्लोकों का का अर्थ करते हुए महर्षि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में कहते हैं- 

जैसे नदी और बड़े-बड़े नद तब तक भ्रमते ही रहते हैं, जब तक समुद्र को प्राप्त नहीं होते, वैसे ही गृहस्थ ही के आश्रय से सब आश्रम स्थिर रहते हैं। संत साधकों का भी मत इससे भिन्न नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा नहीं होगा तो साधक भक्ति को भी नहीं समझ पाएगा उसकी स्थिति कमोबेश तुलसी के ‘विंध्य के वासियों’ के समान हो जाएगी। जो कि असल में त्रिशंकु से भी बुरी स्थिति है। 

यही कारण है कि भक्ति और ज्ञान मार्ग के साधकों को विवाह संस्था का टूटना या दूसरे शब्दों में कहें तो उससे बाहर का दैहिक संबंध स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि विवाह संस्था की टूटन समाज की टूटन है। यही कारण है कि जो भी सामाजिक व्यवस्थापन में विश्वास रखते है, वे विवाह संस्था में भी उतना ही यकीन रखते हैं। 

 कबीर भी यही बात कहते हैं। इसी कारण विवाह संस्था के प्रति पूरा सम्मान भाव रखते हुए वे मनुष्य को साधना मार्ग पर बढ़ने और उसके बाद ही साधकों को मोक्ष साधना की बात कहते हैं। समाज से विरक्ति की बात न तो कोई अन्य भक्त कवि कहता है और न ही कबीर कहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पहली बात तो ज्ञान और भक्ति में कोई अंतर नहीं है। दूसरे, इन दोनों की ही साधना समाज के बिना संभव नहीं। एकांतचित्त व्यक्ति भ्रमित तो हो सकता है पर बिना विषद परंपरा से जुड़े न तो भक्त हो सकता है और न ही ज्ञानी। गुरु का महत्व यूँ ही नहीं है पूरे भक्ति साहित्य में। भक्ति और ज्ञान का मर्म ही यही है कि बिना किसी भेदभाव के अधिकाधिक जनों तक इस आह्लाद का अनुभव कराया जाए। इस भक्ति के लिए कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है। विवाह से विमुख होने की तो बिल्कुल ही नहीं। कबीर की कई साखियाँ इसकी प्रमाण हैं-

मो को कहाँ ढूँढे रे बंदे 

मैं तो तेरे पास में 

या फिर 

कस्तूरी कुंडली बसे मृग ढूँढे बन माँहिं 

ऐसे घट घट राम हैं दुनिया जानत नाहिं 

कबीर का उद्देश्य यहाँ यह समझाना है कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अपने दायित्वों से विमुख होना नहीं है, बल्कि सत्यनिष्ठा के साथ कर्त्तव्य पालन ही ईश्वर साक्षात्कार की साधना है। 

अन्य भक्त कवियों के समान कबीर चिंतन में जो एक और बात है, वह है प्रेम। निश्चित रूप से वे प्रेमाभास की बात नहीं कर रहे हैं, प्रेम की बात कर रहे हैं। बिना गार्हस्थिक प्रेम के कबीर की भक्ति को नहीं समझा जा सकता। इसमें भी पत्नी का जो प्रेम है वह अप्रतिम है। कबीर उससे इतने अभिभूत हैं कि आत्मा-परमात्मा के प्रेम को दर्शाने के लिए उन्हें स्त्री के प्रेम से अधिक उपयुक्त संज्ञा नहीं मिलती। वे कह उठते हैं-

हरि मेरा पीव मैं हरि की बहुरिया 

या फिर 

दुलहिनी गावहुँ मंगलाचार हम घर आए राजा राम भरतार 

स्त्री के पातिव्रत्य से सुंदर प्रेम की नज़ीर कबीर को मिलती ही नहीं। कारण उसमें जो एक निष्ठता होती है, ईश्वर को प्राप्त करने के लिए भी वैसा ही समर्पण, वैसी ही एकनिष्ठता चाहिए होती है। यही वजह है कि कबीर पतिव्रता स्त्रियों को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका महिमा मंडन करते हैं।

पतिबरता मैली भली, काली कुचिल कुरूप 

पतिबरता के रूप पर बारों कोटि सरूप  

 वे ये सब स्त्रियों को सीख देने के लिए नहीं करते बल्कि वो अपने तरीके से पुरुषों को ज्ञान देते चलते हैं, कि जिस प्रकार एक स्त्री पति को अपना धर्म मान उसे अपना जीवन समर्पित कर देती है, पति का भी दायित्व है कि वह भी समान समर्पण भाव से अपनी पत्नी से प्रेम करे, सम्मान करे। कुल मिलाकर वह भी एक पत्नीव्रती ही रहे। कबीर कहते हैं- 

नारी निंदा नारी रतन की खान 

नारी से नर होत है ध्रुव प्रह्लाद समान 

स्त्री तत्व के प्रति कबीर का इतना अटूट विश्वास है कि वे तो इस समग्र विश्व चेतना को स्त्री तत्व से विच्छिन्न करके देख ही नहीं पाते। वह उनके लिए सर्व समर्थ है। अबला जैसा कोई भी भाव कबीर की स्त्री में नहीं है। यही कारण है कि माया के रूप में भी स्त्री तत्व की महिमा भजनों में बिखरी नजर आती है-

रमैया की दुल्हनि ने लूटा संसार है,

माया महा ठगिनी हम जानी, तिरगुन फांस लिए कर डोले,

बोले मधुरी बानी ..। 

स्त्री तत्व से युक्त यह माया कई प्रकार की कलाओं से युक्त है। उसमें छल, छद्म और इंद्रजाल भी है। स्त्री तत्व का यही रूप सबसे बड़ा छलावा है जिससे बचने की बात कबीर कहते हैं। यह बात केवल भक्ति के संदर्भ में नहीं लोक के संदर्भ में भी है। विवाह संस्था से इतर स्त्रियाँ, जिन्हें कबीर ने कुलटा आदि सम्बोधन दिए हैं, कबीर को बड़ी खटकती हैं, वह इसलिए क्योंकि बनी बनाई गृहस्थी को ध्वस्त करने की क्षमता उनमें है। ऐसी स्त्रियों को कबीर खूब खरी-खोटी सुनाते हैं, इसी प्रकार पर नारी रत पुरुष भी उन्हें नहीं सुहाता। उसके दुष्चरित्र के परिणाम को वे सपाट बयानी के साथ प्रस्तुत करते हैं-

पर नारी राता फिरे चोरी बिढ़ता खाई 

दिवस चारी सारस रहे अंति समूला जाई

कबीर सांस्कृतिक कथाओं से भी उदाहरण उठाकर पुरुष को प्रबोधते हैं कि संभवतः उसके ज्ञान चक्षु जाग्रत हों। अतः देवताओं को भी अपने अधीन करने के सामर्थ्य से युक्त महाज्ञानी रावण का उदाहरण रखते हुए कहते हैं -

पर नारी पैनी छुरी, मति कोई लावो अंग,

रावण के दस सिर गए, पर नारी के संग  

तिस पर भी अगर पुरुष को समझ न आए तो क्या करें अतः स्त्री को ही दूषित बता उससे दूर रहने की बात कहते हैं- 

नारी की झाईं परै अंधा होत भुजंग 

कबिरा तिन की का गति जो नित नारी के संग

कबीर स्त्री विरोधी या पुरुष के समर्थक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक व्यवस्थापन के लिए जहाँ जिसे जरूरी है कहते-सुनाते चलते हैं। कबीर गृहस्थ धर्म छोड़कर संन्यास आश्रम अपनाने की बात नहीं करते हैं। वे जब स्वयं गृहस्थ थे तो संन्यास की बात कैसे कह सकते हैं। वे कहते हैं तो बस उच्शृंखल कामनाओं को नियंत्रण में रखने की क्योंकि भक्ति की राह पर चलने के लिए चित्त की शुद्धता चाहिए जिसका प्रभाव जीवन के हर पक्ष पर झलकता है। 

वस्तुतः कबीर की स्त्रीवादी विचारधारा का संबंध सामाजिक रीतियों के सुविन्यस्त व्यवस्थापन से है। जिसमें न तो किसी की पक्षधरता है और न ही किसी का विरोध। हाँ समर्थन है तो उस आदर्श समाज का जिसमें सभी वर्ग और सभी इकाइयाँ परस्पर सम्मान, सौहार्द्र और समरसता की जीवन व्यतीत करते हुए, धर्म, अर्थ, काम को भोगते हुए मोक्ष की ओर प्रयाण कर सकें। 


संदर्भ 

अकथ कहानी प्रेम की : पुरुषोत्तम अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन 2021 

कबीर चिंतन :  नीरज आनंद,  डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशन 2017 

कबीर : संपादक – विजयेन्द्र स्नातक, राधाकृष्ण प्रकाशन 2009