सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

purush sanskriti ka avshesh

आज भैया दूज है. भारतीय समाज में इस दिन की बहुत अहमियत है, कारण इस दिन बहन अपने भाई की लम्बी उम्र के लिए, पूजा करती है. कई जगहों पर तो इस दिन व्रत भी रखा जाता है. अच्छा लगता है इस दिन. मैं खुद इस दिन को बहुत प्यार से मनाती हूँ, अपने भाई को गिफ्ट देती हूँ, वो भी मुझे देता है, मम्मी कहती हैं कि बहन को क्या ज़रुरत है गिफ्ट देने की, यह काम तो भाई का है, बहन तो इस दिन भाई की लम्बी उम्र की कामना करती है, पूजा करती है. मम्मी अपनी जगह ग़लत नहीं है, एक परंपरा से उन्होंने ऐसा ही देखा है, उन्होंने भी ऐसा ही किया है, तो उनकी बेटी क्यूँ न करे,  ठीक है, मैं भी करती हूँ, अपने भाई से प्यार करती हूँ, इसलिए करती हूँ, इस दिन ख़ास तौर से वो मुझसे झगड़ता भी नहीं है, इसलिए भी यह दिन मेरे लिए काफी अहम् है, पर एक सवाल मेरे जेहन में रह रह कर उठता है, और वो यह कि कोई ऐसा त्यौहार क्यूँ नहीं है जिसमे भाई बहन के लिए व्रत रखे, पूजा करे? ऐसा कोई पर्व  क्यूँ नहीं होता, जब भाई अपनी बहन की  लम्बी उम्र के लिए उपासना करे? दरअसल बात केवल बहन की ही नहीं है, पूरी स्त्री जाति पुरुषों के ही लिए ही पूजा पाठ करती है, चाहे फिर तीज का व्रत हो, संतान सप्तमी हो, भैया दूज हो, राखी का त्यौहार हो.......फेहरिस्त बहुत लम्बी है जिसका सार यही है कि  पुरुष हमेशा पूज्य की भूमिका में आता है, और स्त्री भक्त की भूमिका में.
वस्तुतः हमारी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी है, लड़के को अधिक महत्त्व दिया जाता है, लड़का पैदा होने पर थाली बजाना, उल्लास के साथ भोज कराना  और लड़कियों को पैदा होते ही या तो मार डालना और अगर नहीं मारा तो  उनसे पुरुषों का पूजन कराया जाना हमारे समाज की पारंपरिक बीमारी है. जो समाज को विकसित करने की बजाय उसे तोड़ती है. जब तक इस तरह कि बे वजह की परम्पराए रहेंगी तब तक स्त्री को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल सकता.इस तरह के व्रत और त्यौहार और कुछ नहीं पुरुष संस्कृति का अवशेष है, जो अब उत्तराधुनिक युग में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देते है,