सोमवार, 30 अक्तूबर 2023

ध्वनि



मैं रोज़ जीती हूँ एक कविता

और रोज़ पी जाती हूँ उसे 

वायु में घोलकर।

मैं रोज़ जीती हूँ एक जीवन

और दिन ढलने के साथ ही

मरोड़कर रख लेती हूँ उसे

अपने तकिये के नीचे।

मैं रोज़ उम्र के धागों से 

बुनती हूँ ख्वाब

और उधेड़ देती हूँ उन्हें अगली सुबह तक।

प्रत्येक क्षण मैं 

समेटती हूँ अनंत सृष्टि

और एक नि:श्वास के साथ ही 

मैं हो जाती हूँ आकाश।

मेरी आँखें बनातीं हैं एक पुल 

बाहर और अंदर 

हृदय की रेतीली ज़मीन दरक जाती है गहरे और गहरे।

नक्षत्रों के आगे, स्वप्नों से भी तीव्र

ब्रह्मांडीय अस्तित्व से सुदूर

कोई व्यतिक्रम खेलता

 बैठकर चुपचाप।

फिर भी 

मैं उकेरती हूँ विश्व 

समेटती जाती हूँ 

आकाश-पृथ्वी की परतें

और देखती हूँ खुद को घुलते जाना

 आकाश और

पृथ्वी होते जाना

यूँ ही मैं रोज़ 

जीती हूँ अस्तित्व

और बिखरा देती हूँ उसे

कविता के अस्फुट शब्दों में..