मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

चुम्बक





कोर्ट परिसर में लगातार चहल कदमी करते लोग। जिनमें शामिल थी खिचड़ीनुमाँ जमात। कुछ मज़दूर और निम्न वर्गीय लोग, कुछ आम घर परिवारों के नौकरी पेशा क़िस्म के लोग, कुछ उद्यमी और व्यवसायी लोग। अधेड़, उम्रदराज़ हर उम्र के लोग- कहीं कहीं इनके साथ घिसटते बच्चे भी और... इन सबके बीच सफेदी को स्याह रँग ओढ़ाए इधर से उधर भटकती एक खास सियारी क़िस्म भी। 

इन आम लोगों के चेहरों पर एक विचित्र सी मायूसी थी। कुछ के चेहरों पर यह मायूसी मुर्दनी की हद तक जमी दिख रही थी। पर ये लोग न जाने किस प्रतीक्षा में अब तक मुर्दा नहीं हुए थे और न जाने कितने समय से इस परिसर में खिंचे चले आ रहे थे। यह चले आना ऐसा था कि  लगता था कि यहाँ की दीवारें, फ़र्श, बैंचें, सीढ़ियाँ और घूरती छत भी अब उन चेहरों और दौड़ते-भागते क़दमों को पहचानती होगी। लियो तॉलस्तॉय की कहानी द कोब्लर की तरह जिसमें मोची जो अपनी छोटी सी खिड़की से आने- जाने वालों के जूते देखकर उन्हें पहचान लेता था। ये सब भी शायद वैसे ही हर किसी को जानती होंगी। सबके रूप रेख, सफ़ेद सतखिर्रे होते बाल और झुर्रियों को भी पहचानती होंगी.. पर इस पहचान का कोई अर्थ? 

अधिकांश पहचानें निरर्थक होतीं हैं। शायद ये भी उसी प्रकार की हों! 

मेरी घूमतीं निगाहें एक तेज़ चाल से आती महिला पर टिक गईं। उसकी उम्र शायद 35-40 के आस पास होगी। मध्यम कद-काठी, छरहरा शरीर, चेहरा साफ़। सिलेटी पतलून और काला टॉप। गले में सुरुचिपूर्ण ढंग से लपेटा गया बादामी रंग का शॉल। उसके चेहरे पर भी वही भाव। या यूँ कहें भावहीन चेहरा। वो हताश सी कुछ देर कोर्ट रूम के बाहर टहलती रही। साथ ही उसकी आँखें जैसे भरी बेंचों में एक अदद खाली सीट तलाश रहीं थीं।किस्मत से एक सीट खाली हुई, महिला लपककर उस सीट पर बैठ गई। इत्तेफाक़ से उसकी बगल वाली सीट भी खाली हो गई थी, जिस पर एक अधेड़  उम्र की महिला अपने ग्राम्य अंदाज़ में फैलकर बैठ गई। अधेढ़  महिला का शॉल उस 35-40 वर्ष की महिला को छू न जाए, यह सोचकर ही वह थोड़ा सा और खिसक गई। पर ग्राम्य महिला को उससे जैसे कोई फ़र्क न पड़ा, वह और आराम से बैठ गई और अपने मुँह को पूरे विस्तार के साथ खोलकर जम्हाई लेने लगी।अधेड़ आयु की वह महिला  जितनी बार भी जम्हाई लेती, बगल में बैठी महिला कुछ और असहज हो जाती। मैं देख पा रही थी कि जब जब ग्राम्य वेशभूषा की उस महिला का मुँह खुलता, पतलून वाली महिला अपने मुँह और नाक को अपने शॉल से ढँक लेती। साफ़ था कि वो उसे निहायत ही नापसंद कर रही है। मैं सोच रही थी कि कैसी विवशता है। ये महिला उस फूहड़ महिला को नहीं झेल पा रही है। उसके बार-बार खुलते-बंद होते मुँह से निकलती बदबू से त्रस्त हो रही है, फिर भी वहीं बैठी है! 

ओह! क्या ये वाकई सच है कि कई बार विवशताएँ ऐसी असहज स्थितियाँ उत्पन्न कर देती हैं कि इंसान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। इंसान वाकई कठपुतली ही तो नहीं?

मैं चहल कदमी करते हुए कुछ दूर निकल आई। ऐसी जगह पर कोई कब तक ठहर सकता है भला? शायद तब तक जब तक नियति ही उसे किसी स्थान से न जोड़ दे। घड़ी 11 बजा रही थी। मुझे वापस उसी परिसर में लौटना था। लौटकर जो देखा वो हैरान करने वाला था। पतलून वाली महिला अब उस ग्राम्य महिला के हाथ को अपने हाथ में लिये उसे सांत्वना दे रही थी! ओह ये तो अभी कुछ देर पहले तक...

मैं फिर सोच में डूब गई कि इसे क्या कहेंगे नियति या जीवन?



4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर

आलोक सिन्हा ने कहा…

सुन्दर

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया आलोक सिन्हा जी ।

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया सुशील कुमार जोशी जी।