रविवार, 23 जून 2024

पहाड़

 एक था पहाड़

मज़बूत फौलादी

व्यापक भूखंड पर

देह पसारे

उसकी एक-एक चढ़ान पर

जीवन रस पा रही थीं

न जाने कितनी वनस्पतियाँ

फूट रहे थे झरने

 जगह-जगह

हिम आच्छादित उसके शिखर

उसकी भव्यता का थे प्रमाण

गरजते बादल, उमड़ती हवाएँ

बेदम हो जाती थीं

उसके आगे 

और

सिहरा देती थी

आकाश से बातें करती

उसकी विराटता 

 पर देखती हूँ कि 

 उस भूधर की बगलों से

अब झड़ने लगी है रेत!

और

दरक उठी ज़मीन भी धीरे धीरे!

पहाड़ टूट रहा है

पत्थर पत्थर

मैं देख रही हूँ  

सामर्थ्य और सौन्दर्य को

पर 

ऊँचाई??

 उसमें ज़रूर खोट है



6 टिप्‍पणियां:

Deepak dubey ने कहा…

Bahut sunder

amitkhare ने कहा…

बहुत सुन्दर

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया अमित खरे जी🙏

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया जीज🙏

MANOJ KAYAL ने कहा…

बड़ी ही उम्दा रचना

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

Shukriya Manoj ji