शनिवार, 28 मई 2022

एक सच


 

जब-जब तुम सच बोलोगे

मैं तुम्हारे शब्द मूक कर दूँगा

तुम्हारी ज़बान तो होगी पर आवाज़ छीन लूँगा 

अनजाना खौफ बनकर तुम पर मंडराऊँगा

मैं वायवीय दुनिया बुनकर सच को गुल कर जाऊँगा

मैं दोहराऊँगा अभिमन्यु वध का इतिहास अनेकश:!

और कर जाऊँगा सच को

चारों खाने चित्त!

बहुत घमंड है न सच के अमर होने का तुम्हें?

तुम देखना मैं उसे कुछ ऐसा कर जाऊँगा

कि वो ज़िंदा तो रहेगा पर कर कुछ नहीं पाएगा

पंगु कर जाऊँगा मैं उसे ऐसा

कि अपने अस्तित्व को वो समझ ही नहीं पाएगा 

बचा सको तो बचाओ उसे

पर बता दूँ, मैं उसे मारूँगा नहीं 

हाँ उसकी खाल ओढ़कर खुद सत्य बन जाऊँगा

मोहिनी सा ऐसा इन्द्रजाल रचूँगा कि 

'कुंद धी' तुम खुद ही नहीं कर पाओगे सत्य और असत्य में भेद!

फिर इस दुनिया की तो बिसात ही क्या?

मैं तुम्हारे हर अपने की रूह में घर कर जाऊँगा 

तुम देखते रह जाओगे

 और मैं तुम्हारे संबंधों को भी लील जाऊँगा 

तुम तुलना भी मत करना कर्ण कटु सच से मेरी

खुदा की नैमत है शक्कर से भी मीठी बोली मेरी

तुम्हारा कड़वा सच ठहर भी नहीं पायेगा मेरे आगे

मैं खेलूँगा तुम्हारी भावनाओं से जी भर

और सत्यवादी तुम, असहाय हो जाओगे मेरे आगे

हाँ मैं झूठ, असत्य, छद्म हूँ

इन्द्रजाल हूँ, माया हूँ तुम बुलाओ कितने ही नामों से

परवाह नहीं है मुझे

तुम्हारी इस सत्य दुनिया पर असीम सत्ता है मेरी

और 

अस्तित्व से निरस्तित्व होते तुम नित्य क्रीड़ा हो मेरी ..



बुधवार, 25 मई 2022

एक मुश्किल







उससे रोज़ मिलना तो नहीं होता था, पर जब भी होता, दो मिनिट रुककर बात ज़रूर हो जाती थी। यूँ भी कॉलेज में किसी के पास 2 मिनिट से ज़्यादा का समय कहाँ होता है, किसी से भी बोलने-बतियाने का। सब अपनी दुनिया में मशगूल। फिर स्टाफ रूम से क्लास, क्लास से घर। और भी न जाने कितने पचड़े और दुनिया भर के काम। अब ऐसी उलझनों में बेचारा दिमाग क्या-क्या सम्भाले! कितना कुछ याद रखे? यही सब सोच मैं खुद को सांत्वना दे रही थी। पर सांत्वनाएँ अगर काम कर जाएँ तो बात ही क्या? 

सच तो ये है कि मुझे अपनी सहकर्मी शिक्षिका का नाम जो एक बार भूला फिर याद नहीं आया। वो अगर मेरे विभाग की होतीं तो ऐसी समस्या का प्रश्न तक न था। तब तो चाहकर भी नाम नहीं भूल सकती थी। पर दिक्कत ये थी कि उनका अलग विभाग था। इसलिये दो-एक बार जब नाम सुना भी होगा तब दिमाग में नहीं ठहरा। हालांकि ऐसा नहीं है कि मैंने उनका नाम जानने की कोशिश नहीं की। की बहुत की। पर परिणाम वही था- निल बटे सन्नाटा। कॉलेज में आते-जाते अक्सर ही हमारी मुलाक़ात हो जाती। हम इधर-उधर की बातें करते। एक विशेष रिसर्च प्रोजेक्ट की भी हम योजना बना रहे थे। ऐसे में उनका नाम ही पता न होना मुझे असहज महसूस कराता। विडंबना यह रही कि जब भी हम बात करते, सलाम-नमस्ते करने वाला एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं आता, जो उन्हें नाम से बुलाता। सच, बड़ा संकट था!

कहने को तो मैं उनसे पूछ भी सकती थी कि आपका नाम भूल गई। पर नाम भूलने के अपने पूर्व अनुभव के आधार पर जानती थी कि इससे संबंधों पर कोई अच्छा असर तो बिल्कुल ही नहीं पड़ता। बल्कि कुछ लोग तो इतना आहत होते हैं कि बात तक करना बंद कर देते हैं। यही सब सोचकर मैं बहुत दबाव में थी और चुप थी। उस दिन फिर वही हुआ। हम स्टाफ रूम में मिले, उसी गर्म जोशी के साथ। पर बीच में जैसे एक अपरिचय सा अनुभव कर रही थी। विभिन्न विषयों पर हमारी बातें शुरू हुई। तभी उन्होंने कहा- मेरा नंबर मिलाना ज़रा, पता नहीं फ़ोन कहाँ रख दिया मैंने..

नंबर तो था ही नहीं। इसलिये मैंने कहा- फोन चेंज किया है, इसमें सारे नंबर आये नहीं हैं, आपको बताना पड़ेगा। उम्मीद जगी कि जैसे लोग नंबर के साथ अपना नाम भी दोहरा देते हैं, यहाँ भी वही कुछ होगा। पर न हुआ। वो नंबर बताकर ही चुप हो गईं। बीच में कई ऐसे मौके आये जब उम्मीद जगी। मगर वही- हासिल कुछ नहीं।

क़रीब आधे घन्टे बाद उन्होंने घर जाने के लिये बैग उठाया और उठते हुए कहा- तुम्हारा नाम....भूल गई मैं ...

मैंने मन ही मन हैरत और ऊपरी सहजता से उन्हें अपना नाम तो बता दिया था, पर सोच रही थी कि इस दुनिया में अपने जैसी मैं अकेली नहीं हूँ। और भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो नाम भूल जाते हैं और पूछने की हिम्मत भी रखते हैं और उनमें से एक यही मेरी मित्र भी हैं। 

पर अफसोस इस आत्मज्ञान के बाद भी मैं निराश थी क्योंकि वो अपनी समस्या से पार हो गई थीं, पर मैं?..... वहीं की वहीं थी।




शनिवार, 21 मई 2022

रावण और उसके वंशज




ऋषि पुलस्त्य के नाती

मुनि विश्रवा के पुत्र

राक्षसी संतान

नीच मारीच के भांजे

आज तू आमंत्रित है मेरे प्रश्न क्षेत्र में 

बन पड़े तो उत्तर देना

जो न दे सके तो अपराधी है, मौन रहना।

तो प्रश्न है-

अगाध वैभव का अधिपति था तू,

 महान परम्परा का धनी था तू,

शास्त्रों का ज्ञाता, प्रकांड विद्वान,

शिव का वरद हस्त प्राप्त था तू,

अपूर्व क्षमता का स्वामी क्या नहीं था तेरे पास?

इतना कुछ कि कोई भी ईर्ष्या करे तुझसे,

फिर ऐसा क्या हुआ 

कि नष्ट हो गया तू?

धूल खाता भग्न खंडहर हो गया तू?

रक्षा न कर पाए शिव भी तेरी,

न ब्रह्मा का वरदान ही काम आया,

तेरी अपार शक्ति भी क्षण में हवा हो गई,

और नहीं शेष रहे-

'अहो रूपम अहो ध्वनि' का अनुगमन करते तेरे एक भी चाटुकार!

ऐसा भयावह पराभव!

कि समय आज भी सुनाता है तेरी कथा,

संवेदना नहीं मसखरी के साथ।

 हँसते हैं बालक तुझ पर,

फूँक डालते हैं तुझे खेल-खेल में ही,

अपनी धनुलियों से चीर देते हैं तेरा सीना,

और फटाक धुएँ में उड़ा

झाड़ू से बुहार मलबे के ढेर में बदल दिया जाता है तुझे क्षण में ही।

बोल, कैसा लगता है तुझे दशानन

अपनी मृत्यु का नित्य उत्सव मनते देख?

तू तो विद्वान है, बता

 क्या नहीं जानता था

कि स्त्री होती है अग्निरूपा 

और

अग्नि की प्रकृति ही है राख करना 

दानवी संस्कृतियों को, कुदृष्टि की जननियों को

अपनी एक लपट मात्र से।

और नहीं जानता था 

कि स्त्री के प्रति अपमान, वंचकता और शृगाल वृत्ति 

आत्महत्या है पुरुषत्व की

जो मिटा देती है

तेरे जैसे 'शास्त्रज्ञों' का अस्तित्व, कुल नाम तक

और 

फिर जो कलंक देती है

उसे नहीं छिपा पाता है कैसा भी प्रायश्चित, कैसा भी पांडित्य!! 

बोल दशानन क्या तू नहीं जानता था इतनी छोटी सी बात?

मैं समझ गई हूँ तेरा अर्थहीन मौन 

इसलिये 

अब प्रश्न नहीं अफसोस है 

कि न तू जान पाया न तेरे शृगाल बुद्धि शास्त्रज्ञ वंशज

कि स्त्री के अपमान के साथ

श्रीहीन हो जाते हैं सभी देव, उनके वरदान

और सारी शक्तियाँ।

और श्रीहीनता फूँक देती है समग्र वैभव, शास्त्र ज्ञान और पांडित्य

  पर हाय रे! तेरे सत्य से अनजान वंशज 

 तुझे फुँकते देख

वे नहीं करते स्वयं में तेरे जीवित होने का

प्रायश्चित बल्कि तुझसे ही मद में चूर उत्सव मनाते, देखते रहते हैं 

   तुझ सी ही अपनी भी अटल पराभव की भविष्य  कथा.... 





बुधवार, 18 मई 2022

नक्षत्र

 





ऊँचाइयों से मुझे हमेशा ही प्यार था। मन होता था आकाश को अपनी पलकों में समेट लूँ। मुट्ठियों में भर लूँ या फिर अपने हाथों को पंख बना कर आकाश को नाप आऊँ। मैं सोचता था कि आकाश कितना बड़ा है! क्या इसका भी कोई ओर-छोर होगा? मेरी आंखें अक्सर आकाश का छोर ढूँढने की कोशिश करतीं और तब दादी हँसते हुए कहतीं- आकाश भगवान है और भगवान का कोई ओर-छोर होता है? दादी की बात सुन मैं सोचता- पर मैंने तो भगवान को नहीं देखा!!

दादी जैसे मेरे मन के भाव पढ़ लेतीं और कहतीं- आकाश ही  भगवान है। सब देव भी यहीं विराजते हैं। फिर उंगली से इशारा करके कहतीं- देखो वहाँ विराजते हैं अपने शंकर भगवान ईशान कोण में।रामान में आता है न नमामीशमीशान निर्वाणरूपम कहते हुए दादी  शिव स्तुति गुनगुनाने लग जातीं। मैं यह सब देखता, सुनता और सोचता कि आखिर दादी को इतना कुछ कैसे पता है! क्या कुछ भी ऐसा होगा जो दादी को न पता  हो? 

बचपन में दादी ने मुझे खूब कहानियाँ सुनाईं। चाँद, सूरज और तारों की कहानियाँ। आठ प्रहर में ध्रुव तारे की एक परिक्रमा पूरी करते सप्तर्षि मंडल और उत्तर दिशा में ध्रुव होकर विराजमान ध्रुव तारे की  कहानी। सप्तऋषि मंडल में बीच में जो तीन तारे हैं दादी उन्हें हिन्नी (हिरणी) कहती थीं। वो कहती थीं कि इन्हें ही देख कर पता चलता था कि रात्रि का कौन सा प्रहर चल रहा है। आखिर पुराने समय में सबके पास आज की तरह घड़ी या केलेंडर तो होते नहीं थे। तब इन्हीं तारों से समय और दिशा का पता चलता था। ध्रुव तारे से भी मेरा परिचय दादी ने ही कराया था। एक रात जब मैं दादी से कोई नई कहानी सुनाने की ज़िद कर रहा था, तब दादी ने मुझे राजा उत्तानपाद, उनकी दो रानियों सुनीति और सुरुचि तथा पुत्र ध्रुव की कहानी सुनाई थी और फिर सप्त ऋषियों की चौकड़ी में अंतिम दो तारों की तरफ़ इशारा करके बताया था- कि देखो इन दो तारों की सीध में उत्तर दिशा की तरफ़ जो चमकीला सा तारा दिख रहा है न वह है ध्रुव तारा। ध्रुव का मतलब जो स्थिर रहे। पुराने समय में जब राही रस्ता भूल जाते थे तो इसी तारे को देख उन्हें दिशा का ज्ञान होता था। मेरे लिये यह सच में बहुत ही रोचक जानकारी थी।

 इसी तरह आकाश में दक्षिण दिशा की ओर 7 तारों का एक मंडल भी मेरी स्मृतियों में गहरा बसा है। आज भी जब उसे देखता हूँ तो बचपन की यादें और दादी की बातें ताज़ा हो उठती हैं। तारों के उस मंडल में 7 तारे हैं। 2 तारे एक तरफ़ और दो तारे दूसरी तरफ़। बीच में एक तिरछी रेखा की आकृति में तीन छोटी छोटी तारिकाएँ। दादी कहा करतीं थीं कि ये आठ बहनें थीं। सबकी सब बहुत सुंदर। पर इनकी छोटी बहन इन सबमें सुंदर थी। एक दिन आठों बहनें आकाश की यात्रा कर रही थीं, तभी एक राक्षस आया और सबसे छोटी बहन को उठा ले गया। बहनों ने बहुत कोशिश की पर छोटी बहन को बचा नहीं पाईं। राक्षस ने अपने जादू से राजकुमारियों के साथ आए सैनिकों को भी बर्फ का बना दिया था और अट्टहास करता हुआ वहाँ से चला गया। सातों राजकुमारियाँ कुछ न कर सकीं। कहते हैं तभी से जैसे ही रात होती है ये बहनें अपनी खोई हुई बहन को ढूँढने निकल पड़ती हैं। ये तो थी कहानी पर इससे यह भी पता चलता था कि रात्रि का दूसरा पहर शुरू हो गया है।

तो कुछ ऐसा था दादी का कहानी सुनाने का अन्दाज़। इतना निराला कि मैं खो जाता था आकाश के तारों में ही कहीं। कई बार जब कहानी सुनते सुनते सो जाता तो सपने में भी वही राजकुमारियाँ, राक्षस, तारे और भी न जाने क्या क्या दिखाई देते। 

मुझे आकाश लुभाने लग गया था। मैं सोचता था कि धरती आकाश में होती तो कितना अच्छा होता! एक तारे से उछलकर दूसरे तारे पर जाता। फिर तीसरे, चौथे, पाँचवे और ऐसे पूरा आकाश घूम आता। एक दिन मैंने दादी से कहा- हम भी आकाश के किसी तारे पे होते तो कितना अच्छा होता! मेरी बात सुनकर दादी हँसते हुए बोलीं- तारे तो सूरज देवता जैसे आग के गोले हैं उन पर हम कैसे रहते? अपनी धरती ही सबसे भली है। तो क्या अपनी धरती जैसी कोई और धरती नहीं है इस आकाश में? मैंने उत्सुकतावश दादी से पूछा।

हैं न बहुत सारी हैं।

अच्छा? तुम्हें कैसे पता दादी? 

दादी हँसते हुए बोलीं- तुलसी बाबा ने मानस में बताया है कि एक बार

 बाल रूप राम जी के मुँह में काक्भुशुंड जी  घुस गए तो उन्होंने  देखा कि राम जी के मुँह में तो पूरी सृष्टि समाई हुई है। न जाने कितने सूरज, धरती और आकाश हैं वहाँ। वहीं से पता चला। तुम पढ़ोगे  तो तुम्हें भी पता चल जाएगा।

सच कहूँ तो उस दिन से ही आकाश के बाद तुलसीदास मेरे प्रिय हो गए। मैंने उन्हें पढ़ा। खूब पढ़ा। जुनून की तरह दिन रात पढ़ा। पर यकीन मानिए मैंने किसी भक्ति भाव से तुलसी को नहीं पढ़ा। मैं केवल एक महान कवि को जानना चाहता था, हाँ जानने के बाद उनके समक्ष सम्मान से नतमस्तक ज़रूर हुआ।

यूँ ही जीवन चलता रहा पर आकाश से प्रेम तो कम न हुआ। एस्ट्रो फिज़िक्स पढ़ कर चाँद तारों की सैर तो न कर सका पर पायलट ज़रूर बन गया। गहराई ऊंचाई, ज़मीन पर धागे सी नदियाँ, डिब्बियों से लगते घर, रूई के फाहों से बादल और उन पर इन्द्रधनुष से कोण बनातीं सूर्य किरणें और इन सबके बीच मन की गति से उड़ा जाता मेरा हवाई जहाज मुझे रोमांचित करते। ऐसा लगता जैसे दुनिया मेरे क़दमों में है। अब ज़िंदगी सितारों से दूर बादलों में उड़ रही थीं। एयरक्राफ्ट मेरी दुनिया बन चुके थे। पाँव ज़मीन पर टिकने को राज़ी न थे। मैं एक बहुत बढ़िया पायलट बन चुका था। मैं सच कहूँ तो मुझे गुरूर था खुद पर। ज़मीन पर दो पल भी ठहरना मुझे गवारा न था। इस बीच मैंने खूब पैसा कमाया और उड़ाया भी। मेरी मज़बूत क़द काठी बहुत रौबदार थी। आईने में खुद को देख मुझे खुद पर गर्व होता। 

मानस की पंक्तियाँ मेरे मस्तिष्क़ में थीं पर अफसोस मैं उन्हें अपने जीवन में उतार नहीं पाया। शायद यही मेरा दोष था। कितना भला होता अगर मैंने खुद से आगे भी कुछ सोचा होता! मुझे याद है मेरे बचपन के दोस्त का वो फोन जिसमें उसने मुझसे 5000 रुपये माँगे थे कैंसर हॉस्पिटल खोलने के लिए एक सहयोग राशि के रूप में। मेरे लिए वो कोई बहुत बड़ी रक़म नहीं थी। पर मैंने मना कर दिया। यह सोचकर कि ज़रूरत क्या है। पत्नी को भी उस वक़्त मेरी बात ही सही लगी थी। आखिर किसे पता था कि अबसे कुछ समय बाद ही वह सब कुछ महत्वपूर्ण हो जाएगा जिसे मैंने कभी महत्व नहीं दिया था। मेरी इकलौती बेटी मेरी एकमात्र संतान को मैंने कैंसर से खो दिया था।

आह! मेरा हृदय! कितना कठोर था। इतने पर भी उसका धड़कना बंद न हुआ। पत्नी भी न रही। हाँ कुछ रहा तो वो पैसा जिसे मैंने केवल अपने लिये कमाया। जिसे मैंने बेतहाशा प्यार किया। शायद अपनी पत्नी और बेटी से भी ज़्यादा। पर मुझे क्या मिला? सिर्फ अकेलापन, उजाड़ जीवन!

नहीं मैं ऐसा कुछ भी नहीं चाहता था। पर अफसोस ....

मैंने अपनी पूरी सम्पत्ति उसी कैंसर हॉस्पिटल के नाम कर दी है,  जिसकी तब मदद नहीं की थी। मुझे समझ आ गया है कि अब तक मैंने जो कमाया शायद उसी हॉस्पिटल का था, नतमस्तक हो लौटा रहा हूँ..

 मैं अब लौट रहा हूँ उन सितारों की तरफ़ जिनमें बचपन में खोया रहता था। क्या पता मुझे मेरी खोई असली सम्पत्ति मिल जाए..  

अलविदा।

मंगलवार, 17 मई 2022

नीम का पेड़









क्लास रूम के पीछे लगा नीम का पेड़
कितना सुंदर आँगन है
कितने ही पक्षियों का
पेड़ की डालियों पर अपना अपना कोना थामे
बैठे थे कई कबूतर
कुतर कुतर कर रहीं थीं कुछ गिलहरियाँ 
एक डाल पर बैठे थे 
पेड़ की चटर पटर और हलचलों से बेखबर 
शुक युगल 
एक सूनी डाल पर पत्तों के झुरमुट में छिपा सा बैठा था 
ऊँघता सुस्ताता कौआ
बिना ही काम चीं-चीं करती
किसी को खोजती, बुलाती एक पागल सी गौरैया
और हर तरह की आवाज़ों से बेखबर 
 पत्तों से बतियाता सा नटखट नीलकंठ
पेड़ के सबसे ऊपर बैठी थी
इधर-उधर नज़रें घुमाती बदहवास सी चील
मैं देखती हूँ
सब हैं अपने ही आप में गुल
अपने में ही मस्त
एक दूसरे के होने को
एक साथ ही स्वीकारते और अस्वीकारते 
कितनी बड़ी सीख दे जाते हैं
हम  मनुष्यों को...

शुक्रवार, 13 मई 2022

प्रिय सांप






 सांप तुम अब तक भी सभ्य नहीं हुए

नगर में बसने की बात तो कब की खत्म हुई

आस्तीनों में छिपना तक तुम्हें नहीं आया

केंचुली बदल के भी जो थे वही के वही रह गए

केंचुली छोड़ बहरूपिया बनना भी तुम्हें नहीं आया

तुम्हें नहीं आया फुफकार से एक क़दम आगे

ज़बान में खंजर उगाना 

और मुँह में शहद और दुलार रख 

चुपके से डंक मारना भी तुम्हें नहीं आया

तुम विष के धात्र तो बने

पर विष उगलना असल में होता क्या है

 यह भी तुम्हें नहीं आया

 सांप तुम तो कहने भर के ज़हरीले रहे

पर अफसोस कि 

ज़हर होता क्या है यह तुम्हें कभी समझ नहीं आया

सभ्यता के सोपान चढ़ते

इंसानों की तरक्की देखते तो जानते

कि असल सांप होना होता क्या है

पर तुमसे अब कहूँ भी तो क्या

 तुम्हें तो अपना नाम बचाना तक नहीं आया

एक जानकारी के लिये बता दूँ

मन मैला न करना 

 अब कुछ इंसानों ने इतनी तरक्की कर ली है

कि अब तुम्हें कोई नहीं पूछता

न ही डरता है अब तुमसे कोई 

क्योंकि अब कुछ इंसान तुमसे बहुत आगे बढ़ गए हैं

तुम तो कहने भर को सांप रह गए

पर असलियत यह है कि वो आदरणीय इंसान 

तुमसे कहीं अधिक बेहतर और ज़हरीले नाग हो गए हैं






शनिवार, 7 मई 2022

अस्तित्व की तलाश..





 अनस्तित्व कोई स्थिति नहीं 

यह मात्र शब्द भी नहीं 

बल्कि कहानी है अनवरत अजस्र 

अंतहीन शृंखला की

जिसमें कड़ियों की तरह जुड़ते-टूटते हैं असंख्य अस्तित्व 

 विस्मृति और स्मृति के अथाह सागर में 

डूबते उतराते 

उठती गिरती लहरों से चंचल और उद्विग्न

अनंत के सागर में गोते लगाते हैं ये अस्तित्व

बुलबुलों से क्षण भंगुर

अस्तित्च में आते ही अनस्तित्व की करते हैं साधना

 महाशून्य के अदृश्य तंतुओं से बँधे 

अदृष्ट में डूबते उतराते हैं ये अस्तित्व

विकल्पों  के निर्विकल्प विकल्प बनते

हर बार अनस्तित्व में विलीन हो जाते हैं ये अस्तित्व

इसलिये 

अनस्तित्व कोई स्थिति नहीं हैं

यह मात्र शब्द भी नहीं है

यह है अज्ञेय ब्रह्मांडीय विराट सत्य...

जिसकी तपस्या में अस्तित्वहीन होती जाती हैं सृष्टि

 अपने समस्त अस्तित्वों के साथ...



 



मंगलवार, 3 मई 2022

मज़दूर औरतें

 




जो औरतें मज़दूर होती हैं

वो शायद कुछ और ही होती हैं

माथे से पाँव तक धोती में ढंकी छुपी

भर-भर चूड़ियाँ और गिलट की पायलों की रुनक झुनक 

उनके हाड़ तोड़ काम में व्यवधान नहीं डालतीं 

पिघलाती धूप और बर्फ बनाती ठंड में भी

कमर पर टँगे रिन रिन करते

धोती पकड़े, या फुटपाथ पर टुकड़े चबाते

छे-छे बच्चे उन्हें तंग नहीं करते

न ही लगते हैं आफत

बल्कि वो तो करती जातीं हैं झटपट सारे काम

बिना थके बिना रुके

जैसे खून की जगह दौड़ता हो उनमें करंट

और धड़कते दिल की जगह फिट हो उनमें बैटरी

उनके  सिर पर भी जैसे उगे होते हैं अदृश्य हाथ 

जो रोप लेते हैं भारी गठरी, पत्थर और फौलादी सामान 

बिना दोनों हाथों को रोके-टोके।

इन औरतों को भी लगती है भूख

और वो बड़े स्वाद से नमक, अचार या थोड़ी सी सब्ज़ी और सूखी रोटी के साथ फांक जाती हैं धूल भी

पानी के साथ पीती जाती हैं मोटरों का धुआँ भी

अधपेट खाकर भी खुलकर हँसती, चुहल करतीं हैं ये मज़दूर औरतें

पाँव की ठेल से स्त्रीत्व के साँचे को तोड़तीं जोड़तीं  

  कितना छोटा कर जाती हैं हम शहराती, स्त्रीत्व का पाठ पढ़ातीं 

तथाकथित पढ़ी लिखी औरतों को

 अपनी एक दिहाड़ी में ही

 ये मज़दूर औरतें....













सोमवार, 2 मई 2022

कुछ अपने साथ भी...






 चुपचाप निराश और सौ कमियाँ 

कुछ भी तो अच्छा नहीं मुझमें 

न बैठने का शऊर न चलने-फिरने 

ओढ़ने-पहनने की अकल

और तो और बात करना तक नहीं आता मुझे

घमंडी  कहीं की 

न जाने क्या समझ के रक्खा है खुद को

एकदम मिस मैच आज के ज़माने के हिसाब से

यही सब तो थी मैं 

जब तक मैं देख परख रही थी खुद को

अनचाही नज़रों से

एक अरसा गुज़र जाने के बाद

खुद को अनचाही दृष्टियों और

गंधाते विचारों की पनाहगाह बना देने के बाद

अचानक खुद पर नज़र पड़ी तो पाया

कि ऐसी तो हूँ ही नहीं 

मैं तो हूँ बहुत प्यारी, मासूम और जीवन की बहुत सारी 

खुशबुओं से भरी हुई

मैं तो मिल ही नहीं पायी थी खुद से

उन अपंग कुबड़ी खार खाई

अनचाही क़ाबिज़ दृष्टियों के कारण 

जो न जाने क्यों इतनी महत्वपूर्ण हो गई थीं मेरे लिये?

पर अब जबकि स्वाहा कर दिया है उन 

बिलबिलाती दृष्टियों को मैंने

मेरी छोटी सी दुनिया फिर से खूबसूरत हो गई है

और मुझे प्यार हो गया है खुद से

गहरा बहुत गहरा