गुरुवार, 30 मई 2024

रामचरितमानस की विश्व व्याप्ति

 


भारत ही नहीं, समग्र विश्व साहित्य में रामचरितमानस का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे कालजयी ग्रंथ की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने विक्रमी संवत 1631 में अवधी भाषा में रामनवमी के दिन अयोध्या में आरंभ की थी। उसे  पूरा करने में उन्हें 2 वर्ष 7 माह और 26 दिन का समय लगा था। संवत् 1633 में मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम जानकी विवाह के दिन इसे उन्होंने पूरा किया था। अपनी इस रचना में उन्होंने भक्ति, ज्ञान और लोक कल्याण की भावना के अद्भुत समन्वय को संस्कृत, अवधी, अरबी, फारसी और तुर्की के शब्दों का प्रयोग कर एक अन्यतम अनुकरणीय ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रंथ का महत्व कितना है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि भक्ति, जीवन दृष्टि, साहित्य, दर्शन, लोकोन्मुखता और भाषा, रस, लालित्य, कलात्मकता आदि सभी दृष्टियों से यह ग्रंथ आज भी प्रासंगिक है और विश्व साहित्य में अपनी जगह बनाए हुए है। हिंदी भाषा के विद्वान और बहु चर्चित पुस्तक ‘लोकवादी तुलसीदास’ के रचयिता डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार- 
“रामचरितमानस के महत्व, लोकप्रियता और प्रासंगिकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि विश्व में सर्वाधिक शोध रामचरितमानस पर हुए हैं और विश्व की विविध भाषाओं में इस ग्रंथ का अनुवाद हुआ है।” 
यह सत्य है कि देश विदेश की अनेक भाषाओं में रामचरित मानस पर शोध और अनुवाद दोनों हुए हैं। असल में  मानस का जिसने भी अध्ययन किया वह उससे प्रभावित हुए बिना न रह सका। यही कारण है कि विश्व भर के विद्वानों ने अपनी अपनी भाषाओं में इसका अनुवाद किया। फ्रेडरिक सालमन ग्राउस जिन्होंने सर्वप्रथम रामचरितमानस का अंग्रेजी में अनुवाद किया। एटकिंस ने भी अंग्रेजी में रामचरितमानस का पद्यानुवाद किया। उर्दू में नूरुल हसन नकवी ने रामचरितमानस का अनुवाद किया। फ्रांसीसी विद्वान और ‘द ला लितरेतूर एंदुई एनदुस्तानी’ के लेखक ‘गारसां द तासी’ ने सुंदरकांड का अनुवाद किया, फ्रांसीसी लेखिका शारतोल वादवेली ने भी फ्रेंच भाषा में रामचरित मानस का अनुवाद किया। रूसी विद्वान वरान्निकोव द्वारा किया गया रामचरितमानस का पद्यानुवाद भी बहुत चर्चित रहा। इसी प्रकार जे एम मैंक्फी ने जब रामचरित मानस का अनुवाद किया तो मानस की लोकप्रियता को देखते हुए उन्होंने इसे उत्तर भारत की बाइबिल कहा। उनके अनुसार-
“हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह उत्तर भारत की बाइबिल है और यह आपको हर गाँव में मिलेगी। इतना ही नहीं जिस घर में यह पुस्तक होती है, उसके स्वामी का आदर पूरे गाँव में होता है, जब वह इसे पढ़ता है।”  
ये सब इसी बात के प्रमाण हैं कि रामचरितमानस की ख्याति केवल भारत तक ही सीमित न रही, बल्कि विश्व भर में इस पुस्तक का मान है। हाल ही में मंगोलिया के उलानबटार में ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ की दसवीं आम बैठक में रामचरितमानस को दो अन्य भारतीय ग्रंथों ‘सहृदय लोकन’ और ‘पंचतंत्र’ के साथ यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में सम्मिलित किया गया है। इस संबंध में संस्कृति मंत्रालय के एक बयान के अनुसार –
“इन साहित्यिक उत्कृष्ट कृतियों का सम्मान करके समाज न केवल उनके रचनाकारों की रचनात्मक प्रतिभा को श्रद्धांजलि देता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि उनकी गहन बुद्धि और कालातीत शिक्षाएँ भावी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहें।”   
वास्तव में रामचरित मानस के रूप में गोस्वामी तुलसीदास ने भारतीय संस्कृति का एक ऐसा विश्वकोश प्रस्तुत किया है, जिसमें भारतीय मनीषा की श्रेष्ठता और सौम्यता का साक्षात्कार होता है। यहाँ एक ओर पाठक रामचरित रूपी मानसरोवर में अवगाहन करता है, भक्ति के माध्यम से जीवन दर्शन, करणीय-अकरणीय और विविध जीवन-स्थितियों में व्यावहारिक संतुलन की सीख लेता है तो वहीं दूसरी ओर मानस के अद्भुत विधान से भी रोमांचित होता है। 
इस संबंध में रामचरित मानस के रूसी अनुवादक विद्वान वरान्निकोव ने अपनी पुस्तक मानस की रूसी भूमिका में लिखा है- 
“तुलसीदास की समस्त कृतियों में सबसे अधिक लोकप्रिय रामचरितमानस या रामायण प्रतीत होती है। मध्ययुगीन भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में तुलसीदास का सम्मान इस कृति के आधार पर ही आधारित है। इस कारण तुलसीदास की यह कृति रूसी भाषा में अनुवाद के लिए चुनी गई है। इसके अध्ययन से हम केवल इस कवि की सर्जनात्मक प्रतिभा से ही परिचित नहीं होते, प्रत्युत सामान्यतया भारतीय क्लासिकल साहित्य की विशिष्टताओं से भी परिचित होते हैं।”    
ये वरान्निकोव ही हैं जो रामचरित मानस में प्रतिपादित शाश्वत भारतीय जीवन मूल्यों से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने रूसी जनता को भी उससे परिचित कराने के लिए इस ग्रंथ के अनुवाद का निश्चय किया और अपने अनुवाद के द्वारा रामचरितमानस को रूस में भी लोकप्रिय बनाया। इनके द्वारा किया गया रामचरितमानस का पद्यानुवाद 1948 में प्रकाशित हुआ था जिसके लिए वरान्निकोव को सोवियत संघ के सर्वोच्च पुरस्कार ऑर्डर ऑफ लेनिन से भी सम्मानित किया गया था। 
‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ के लेखक फादर कामिल बुल्के ने भी रामचरितमानस की महत्ता को रेखांकित किया है। बेल्जियम में जन्मे इस विद्वान ने अपनी उक्त पुस्तक में पृष्ठ संख्या 250 में डॉ रामकुमार वर्मा को उद्धृत करते हुए कहा है -
“हिंदी रामकथा साहित्य में तुलसीदास का एक प्रकार से एकाधिकार है। तुलसी की प्रतिभा और काव्यकला इतनी उत्कृष्ट प्रमाणित हुई कि उनके बाद किसी भी कवि की रामचरित संबंधी रचना उनके मानस की समानता में प्रसिद्धि प्राप्त न कर सकी, मानस के सामने कोई भी प्रबंध काव्य आदर की दृष्टि से न देखा गया।”   
यह वास्तविकता है कि जो प्रभाव रामचरितमानस का रहा, अन्य रामकथाओं और राम आख्यानों में कोई भी उसकी समता न कर सका। यही कारण है कि विश्व भर में रामचरित मानस का प्रचार और प्रसार हुआ। रामचरित मानस की दार्शनिकता, रसात्मकता, भाषा-सौष्ठव, भाव-पक्ष निरूपण की सरल, सौम्य और कलात्मक शैली, भक्ति भावना और लोक संग्रह का भाव इसे अपढ़ से अपढ़ और ज्ञानी से ज्ञानी, सभी के लिए एक समान प्रिय बना देता है। इसी कारण भारत और भरत वंशियों में रामचरितमानस को पूजा भाव के साथ पढ़ा जाता है और इसकी एक-एक पंक्ति को मंत्र के समान माना  जाता है। राम चरितमानस के बालकांड में तुलसीदास स्वयं कहते हैं-  
“मंत्र महामनि बिषय ब्याल के  
मेटत कठिन कुअंक भाल के
 (विषय रूपी सांप का विष उतारने के लिए मंत्र और महामणि हैं। ये ललाट पर लिखे हुए कठिनता से मिटने वाले बुरे लेखों (दुर्भाग्य) को मिटा देने वाले हैं)” 
रामचरितमानस की एक-एक पंक्ति मंत्र के समान इसी कारण प्रभावकारी है क्योंकि इसमें विशुद्ध चित्त से समग्र जगत को ही ‘सियाराम मय’ मानकर अपने भक्तिमय उद्गारों के साथ प्रणाम निवेदित किया गया है। साथ ही तुलसी का यह भी मानना है कि ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहँ हित होई’। कीर्ति, साहित्य और ऐश्वर्य गंगा के समान सबका हितकारी होना ही चाहिए। रामचरितमानस में आद्यंत यही भाव व्याप्त है। यही लोकमंगल रामकथा और रामचरित मानस का सार है। यही कारण है कि मानस में आम आदमी अपनी सभी समस्याओं का समाधान पाता है। गाँव का एक अनपढ़ किसान और मजदूर भी बात बात में मानस की चौपाइयों का उदाहरण देता है। विश्व भर के मानस मर्मज्ञ भी इसे अपने हृदय के निकट पाते हैं। इसकी एक-एक पंक्ति जैसे उनकी जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर देती है। 
इस संबंध में जगद्गुरु रामभद्राचार्य कहते हैं कि-
“रामायण तो बहुत लिखी गईं हैं, लेकिन तुलसीदास ने जो रामायण लिखी है, उससे ऐसा लगता है जैसे राष्ट्र की समस्याओं को ध्यान में रखकर ही रामायण लिखी गई है। रामचरितमानस भारतवर्ष की समस्त ज्वलंत समस्याओं के समाधान का शोध स्रोत है।”  
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रामचरितमानस में व्याप्त लोकमंगल और रचयिता की विशेषता को बताते हुए, अपने इतिहास ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के अंतर्गत भक्ति काल प्रकरण चार में कहा है कि- 
“इनकी भक्ति रस भरी वाणी जैसी मंगल कारिणी मानी गई है वैसी और किसी की नहीं। तुलसी की भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता है सर्वांगपूर्णता। भक्ति की चरम सीमा पर पहुँचकर भी उन्होंने लोक पक्ष को नहीं छोड़ा, लोक संग्रह उनकी भक्ति का एक अंग था।” 
भक्ति की यही सर्वांगपूर्णता और लोकनिष्ठा रामचरितमानस में सतत् प्रवहमान है जो उसे एक श्रेष्ठ ग्रंथ सिद्ध करती है। तुलसी के राम अत्यंत सरल और सौम्य हैं। वे शील, शक्ति और सौन्दर्य का समन्वय हैं। नकारात्मकता उन्हें छू तक नहीं गई है। यही कारण है कि वे सबके प्रिय हैं और सबके अपने हैं। इतने अपने हैं कि उनके राजा न बन पाने और वनवास की सूचना मात्र से अयोध्या के सभी निवासी व्याकुल हो जाते हैं। रथ के घोड़े तक आँसू बहाते हैं। यह हैं राम। राजा बनते-बनते जिसे 14 वर्ष का वनवास मिल जाए, वो भला प्रसन्न कैसे हो सकता है? उसके हृदय में खिन्नता भला कैसे न होगी? पर राम के मन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं क्योंकि वे राम हैं। अयोध्याकाण्ड के आरंभ में गोस्वामी तुलसीदास अपने आराध्य राम की स्तुति करते हुए कहते हैं-
“प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। 
मुखाम्बुजश्री रघुनंदनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा।।”    
राम तो हर स्थिति में सहज प्रसन्न रहने वाले हैं, वनवास उनके लिए दुःखकारक नहीं है। अतः वे अपने पिता दशरथ को ढाँढ़स बँधाते हुए कहते हैं-
“आयसु पालि जनम फलु पाई
ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई
बिदा मातु सन आवउँ मागी
चलिहउँ बनहिं बहुरि पग लागी
(आपकी आज्ञा पालन करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा। अतः कृपया आज्ञा दीजिए। माता से विदा माँग आता हूँ फिर आपके पैर लगकर वन को चलूँगा।)” 
जब हृदय में विषाद और खिन्नता नहीं तो फिर किसे के प्रति वैर का भी प्रश्न नहीं पैदा होता। इसीलिए भरत के प्रति उनके हृदय में किसी भी प्रकार से स्नेह कम नहीं होता, साथ ही माता कैकेयी के प्रति भी उनके हृदय में सम्मान और प्रेम कम नहीं होता। भरत जब तीनों माताओं सहित राम को लौटाने वन को जाते हैं तो राम तीनों माताओं में सबसे पहले माता कैकेयी से ही मिलते हैं। वन में भी राम सबके हृदय के राजा हैं। राम के वन आगमन के विषय में जानकर वन निवासी कोल-किरात ऐसे प्रसन्न हो जाते हैं मानो उन्हें नवनिधि प्राप्त हो गई हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि राम राजा राम हैं। वे लोक के हृदय के राजा हैं। लोक हृदय ही उनकी वास्तविक अयोध्या है। इसीलिए अयोध्याकाण्ड में जब लक्ष्मण माता सुमित्रा से वन-गमन की अनुमति के लिए आते हैं, तो वे उन्हें राम जानकी को माता पिता जान साथ जाने की अनुमति देती हैं और सीख भी देती हैं कि- “अवध तहाँ जहँ राम निवासू।”  
वस्तुतः राजा वही होता है जिसका चरित्र सात्विक और सरल हो, जिसके हृदय में सदैव ही लोक और लोक के प्रति प्रेम बसता हो। यही अथाह प्रेम राम का वैशिष्ट्य है जो सबको आकर्षित करता है और त्वरित भाव से अपना बना लेता है। यही लोक नायकत्व है, जो राजा राम को सबका प्रिय, सबके हृदय का राजा बनाता है। इसीलिए तुलसीदास कहते हैं-
रामहि केवल प्रेमु पिआरा जानि लेउ जो जाननिहारा 
राम श्रेष्ठ नायक हैं। उन्हें उनके जीवनकाल में ही लोग ईश्वर का अवतार मानने लगे थे। इस लोकमान्यता के बाद भी वे विनम्र हैं। कुछ भी निर्णय करने से पहले वे नीति निपुण राजा की भाँति सबकी सम्मति लेते हैं। जहाँ रावण अप्रिय सलाह पर सलाह देने वाले का उपहास करके उन्हें अपमानित करता है, वहीं राम विभीषण की समुद्र से विनती करने की और सुग्रीव की विभीषण को बंधक बनाने की अनुपयुक्त सलाह को भी सम्मान देते हैं। वे किसी का उपहास नहीं करते, बल्कि सबका मान रखते हैं। रामचरितमानस का पूरा कथ्य इसी प्रकार के अद्भुत प्रसंगों से भरा हुआ है। मानस के सभी पात्र अनूठे हैं। कथा का मुख्य खलनायक रावण भी राम से इसीलिए उलझता है क्योंकि कहीं न कहीं उसे भी राम के ईश्वरत्व का आभास है। 
“सुर रंजन भव भंजन भारा, जौ भगवंत लीन्ह अवतारा।
तौ मैं जाइ बयर हठ करिहऊँ, प्रभु सर प्रान तजें भव तरिहऊ।”
राम के चरित्र का यही औदात्य इस ग्रंथ को विशिष्ट बनाता है और इसी ने उसे विश्व भर में लोकप्रियता प्रदान की है।  इसी ने रामचरित मानस की चौपाइयों को अनपढ़ ग्रामीणों का कंठहार बनाया और इसी के प्रभाव के विषय में हिंदी साहित्य के इतिहास ‘लिंगविसटिक सर्वे ऑफ इंडिया’ के लेखक जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने रामचरित मानस को करोड़ों लोगों की बाइबिल कहा था। 
रामचरित मानस की वैश्विकता के संबंध में इसके अंग्रेजी अनुवादक एवर्ट ग्राउस द्वारा मानस के अनुवाद का उल्लेख करना भी आवश्यक है। ग्राउस के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना एशियाटिक सोसायटी जर्नल में 1876 में प्रकाशित हुई तथा 1877 में पश्चिमोत्तर शासन के सरकारी प्रेस से इसके पहले खंड बालकांड का प्रकाशन हुआ। 1880 तक मानस का पूरा अनुवाद छपते ही वह लोकप्रिय हो गया था। किसी भी भारतीय और मानस प्रेमी के लिए निश्चित तौर से यह गर्व की बात थी। श्रीधर पाठक ने उनके विषय में लिखा था-
“संस्कृत हिंदी रसिक विविध विद्यागुन मंडित
निज वानी में कीन्हीं तुलसीकृत रामायन
जासु अमी रस पियत आज अंग्रेजी बुधगन” 
 उन्हीं ग्राउस ने अपनी पुस्तक द रामायण ऑफ तुलसीदास में लिखा है- 
“तुलसीदास मिल्टन की तरह एक कवि मात्र नहीं थे, वह एक कानून निर्माता एवं मुक्तिदाता थे। जब देश मुस्लिम आतताइयों के अत्याचारों से पीढ़ित था और हिंदुओं पर न जाने कैसे-कैसे अत्याचार हो रहे थे, तो यह तुलसी ही थे जो आशा और मुक्ति लाए थे।”  
जब एक बड़ा लेखक लिखता है तो, वह अपने समय को भी अपनी लेखनी के माध्यम से शब्दबद्ध करता है। रामचरितमानस में भी वह युग उतर आया है, जिसमें संघर्ष था, पीड़ा थी, असह्य वेदना थी। इस सबके भोक्ता थे तुलसीदास और लोक में रमा हुआ उनका भक्त चित्त। अंग्रेज़ी विद्वान ग्राउस ने मानस के अध्ययन में उसी रमे हुए चित्त को समझा और व्यापक लोक को उससे जोड़ने के लिए मानस का अनुवाद किया। 
तुलसी ने भी जब राम रामचरितमानस को लिखा तो लोक कल्याण, भक्ति की सर्वजन सुलभता और भक्ति का वास्तविक अर्थ समझाना उनका मन्तव्य था। वे धर्म, नीति, भक्ति से सम्बद्ध व्यापक विभ्रमों को समाज से दूर करना चाहते थे। यही कारण है कि मानस लिख भर देना ही उनका उद्देश्य नहीं था। अतः उन्होंने रामलीला के माध्यम से इसे लोक-मानस के हृदय में उतारने का भी काम किया। इसी सब का प्रभाव था कि रामचरितमानस से प्रभावित होकर बहुत से ग्रंथ लिखे गए, विविध बोलियों में भी मानस के आधार पर लोकगीत और आख्यान रचे गए। यहाँ तक कि संतान के जन्म, विवाह आदि शुभ अवसरों पर घरों की दीवारों को मानस की चौपाइयाँ लिखकर सजाया जाने लगा। अखंड मानस पाठ, सुंदरकांड का पाठ, मानस अंताक्षरी और इन सबके माध्यम से लोक की जुबान पर राम, लोकभाषा में राम और लोक के मुहावरों में राम रमते चले गए। 
तुलसी ने रामचरित मानस के माध्यम से लोक को श्रद्धा और विश्वास से भी जोड़ा और भक्ति का सही अर्थ समझाया। इस संबंध में मानस के बालकांड का दूसरा छंद जो कि मानस में वर्णित 7 anushtup छंदों में से एक है, उल्लेखनीय है, जिसके अनुसार श्रद्धा और विश्वास ही शिव और पार्वती हैं। जब तक हृदय में श्रद्धा-विश्वास रूपी भवानी-शंकर की कृपा नहीं होती, तब तक सिद्ध महात्मा लोग भी अपने अंदर स्थित परमात्म तत्त्व का साक्षात्कार नहीं कर पाते। - 
“भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणो
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वांतः स्थमीश्वरम”
इसी सब का प्रभाव रहा कि किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचाव और शुभ की प्राप्ति के लिए अथवा किसी भी मंगल आयोजन के अवसर पर रामचरितमानस के अखंड पाठ की परंपरा चल पड़ी। अखंड मानस पाठ के लिए मंडलियाँ भी बनीं। यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि निरंतर आगे बढ़ता गया। इस प्रकार केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के कई देशों में रामलीला और अखंड मानस पाठ की परंपरा पहुंची। फ़िजी, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिटाड, इंडोनेशिया, जमैका, मलेशिया गुयामा आदि देशों में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गए हजारों श्रमिकों के लिए विदेशी भूमि पर और आततायी शासन में रामचरितमानस की यह पोथी ही उनकी संजीवनी बनी रही। गिरमिटियों के लिए राम और रामचरितमानस का क्या महत्व है, इस संबंध में विदेश में अंग्रेज़ी समेत विभिन्न विदेशी भाषाओं में रामकथा कहने वाले ‘संत ब्रह्मदेव उपाध्याय’ का यह कथन उल्लेखनीय है-
“अंग्रेज समुद्री टापुओं पर उपनिवेशों में मुफ़्त की मजदूरी के लिए भारतीयों को गुलाम बनाकर पानी के जहाज से ले गए। वे अपनी मातृभूमि छोड़ते वक्त जो सबसे कीमती वस्तु थी, उसे सीने से लगाकर ले गए और वह थी श्री रामचरितमानस या रामायण।”  
इस संबंध में मॉरीशस में प्रधानमंत्री के सलाहकार रहे श्री सुरेश रामवर्ण का कथन भी उल्लेखनीय है-
“दादा जी तो अब नहीं रहे लेकिन वह अपने बचपन की बात बताया करते थे। वे लोग खेत में काम कर रहे थे, तभी अंग्रेज गाड़ियों से आए और खेतों में काम करने वालों को रस्सी से बांध दिया। जबरन उनको उनके खेत, घर, गाँव देश से सुदूर ले जाने की प्रक्रिया आरंभ हुई तो हड़बड़ी में जो मिला, ले लिया। ज्यादातर लोगों ने अपने हाथ में रामचरित मानस की पोथी उठाई और पानी के जहाज में बैठा दिए गए... अपनी मातृभूमि, अपने तीर्थ ओझल होते गए लेकिन हमने अपने आराध्य, अपनी परंपराओं और संस्कृति को अपने सीने से लगाए रखा।”  
इस प्रकार भी मानस की विश्व यात्रा जारी रही। अब आज की स्थिति में देखें तो विदेशों में व्यापक स्तर पर रामचरित मानस पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की गोष्ठियाँ होती हैं। वहाँ कई मंडलियाँ भी हैं जो विभिन्न अवसरों पर रामचरितमानस का पाठ करती हैं। रामलीलाओं का आयोजन भी वहाँ बहुत ही भव्य ढंग से किया जाता है। मानस के प्रति प्रवासी भारतीयों का लगाव और पूजा भाव इतना है कि निरंतर इस पर शोध कार्य और रामचरित मानस को आधार बनाकर कुछ न कुछ करने का भाव उनमें रहता है। भारतीय मूल के एक अंग्रेजी विद्वान जिनका नाम प्रोफेसर शिवप्रकाश के अग्रवाल है,उन्होंने रामचरित मानस की शब्द अनुक्रमणिका तैयार की है। इस इंडेक्स में उन्होंने रामचरितमानस के प्रत्येक शब्द का सुलभ एवं विस्तृत संदर्भ दिया है। इस पुस्तक में लेखक ने ऐसी अनूठी पद्धति का प्रयोग किया है, जिससे मानस के किसी भी संस्करण में शब्दों को आसानी से खोजा जा सके।   इस प्रकार के कई रचनात्मक कार्य रामचरितमानस को आधार बनाकर किए जा रहे हैं। 
ऐसा माना जाता है कि तुलसी के रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने का भी प्रयास किया गया था। यह तो सर्व विदित ही है कि तुलसी को अपने समय में बहुत विरोध सहना पड़ा था। तो पांडुलिपि को नष्ट करने के प्रयास की बात अविश्वसनीय नहीं लगती। इस संबंध में भारत के पूर्व राजनयिक और भारतीय समाज और संस्कृति के गहन अध्येता श्री पवन कुमार वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेटेस्ट ‘ओड टु लॉर्ड राम :तुलसीदास राम चरितमानस’ में लिखा है-
“तुलसीदास ने रामचरित मानस की पांडुलिपि की एक कॉपी अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक और वित्त मंत्री टोडरमल को दे दी थी ताकि वह सुरक्षित रहे। काशी के पंडे इस बात से नाराज थे कि तुलसीदास राम को देवभाषा संस्कृत से अलग क्यों कर रहे हैं। तुलसीदास का जीवन सफर एक अनाथ और आम रामबोला से गोस्वामी तुलसीदास बनने का है।”  
सीधी सी बात है कि तुलसीदास को बहुत विरोध भी सहन करना पड़ा किन्तु मानस में व्याप्त लोकमंगल और भक्ति साधना का जो मार्ग उन्होंने प्रशस्त किया, उसने मानस के महत्व को कम नहीं होने दिया बल्कि इसकी लोकप्रियता को वैश्विक आधार प्रदान किया और यही भाव मानस प्रेमियों में भी निरंतर व्यापता रहा। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि यह वैश्विक आधार यूँ ही नहीं है। राम विश्व रूप हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में राम के विश्व रूप की ही परिकल्पना प्रस्तुत की है। राम सम्पूर्ण चराचर विश्वरूप है। लंका कांड में मंदोदरी राम के विषय में कहती है-
“पद पाताल सीस अज धामा, अपर लोक अंग अंग विश्रामा...” 
स्वयं राम भी अपने अनन्य भक्त की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि-
“सो अनन्य जाकैं अस मति न टरई हनुमंत, मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत” 
कहने का तात्पर्य यही है कि जब कथा नायक स्वयं परमात्म तत्त्व ‘रामाख्यम् जगदीश्वरम् ’ हैं तो उनकी कथा राम चरितमानस की विश्वव्याप्ति भी स्वयं सिद्ध और स्वाभाविक ही है। 


सोमवार, 13 मई 2024

कविता




 मैं जब चुपचाप होती हूँ

वो बोलती है

अन्तर्मन के गहरे कपाट खोलती है

वो घूम आती है विश्व

और उसकी परतों की बुनावट

और बे-क़लम ही 

उन्हें उकेर देती है

वो अंदर बहुत अंदर उतर

चेतनाओं को भी सुन आती है

और गढ़ देती है उनके संवाद 

वो तैरती भी है और

हवाओं सी घुल 

पहुँच जाती है हर ओर

वो बरस पड़ती है रेगिस्तानों में छमाछम 

और खिल उठती है 

रुके हुए पानी में भी

वो बहती है आत्माओं में भी

और उभर आती है 

सशरीर

वो बोलती है न जाने कितनी बोलियाँ गुपचुप

और मैं पकड़ती रह जाती हूँ

उनमें छिपी कितनी ही 

अनसुनी ध्वनियाँ 

जो कविता  

 बोलती है

 अनगिनत भाषाओं में...



 

गुरुवार, 9 मई 2024

 Institute of Liver and Biliary Sciences एक बड़ा नाम है और इसके साथ नाम है डॉ एस.के. सरीन का। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ सरीन  विश्व-विख्यात डॉक्टर हैं। इसलिये  उनसे मिलना भी आसान नहीं। मरीज़ हर प्रकार की असुविधा झेलकर भी ILBS पहुँचते हैं, उनसे इलाज की तलाश में।

मैं भी पिछले दिनों अस्पताल में भर्ती थी। फिर सोचा डॉ सरीन को भी दिखा लिया जाए।

डॉक्टर साहब से मिलना हुआ। पहले जूनियर डॉक्टर और फिर डॉ सरीन से। दोनों ही डॉक्टर्स ने पुरानी फाइल देखीं। जो दवाइयाँ ले रही थी, वो भी देखीं। उन्हें दवाइयाँ ठीक लगीं। हां एक दवाई pedamet 120MG पर उन्होंने कहा- ये स्टेरॉयड है हम इसे 80 MG कर रहे हैं। फिर 60, 40, 20 पर लाकर इसे हटा देंगे। ठीक हो जाओगी। कोई परहेज़ नहीं है। रोज़   बैडमिंटन  खेलो और जीतो। ओके? ओके, थैंक यू डॉक्टर साहब कहकर मैं आश्वस्त भाव से बाहर आ गई। सोचा दवाइयाँ भी यहीं से ले लेती हूँ। पर 80 MG का स्टेरॉयड नहीं मिला। अब कॉलेज के पास से दवाई लेने की सोची। दवाइयाँ मिल गईं। तभी बिलिंग सेक्शन पर केमिस्ट ने कहा-  मैडम पेशेन्ट कौन है? Pedamet 80  MG तो आती ही नहीं है। ये बहुत हाई है आपको किसने लिखी है?

8 और 4 MG की दे रहा हूँ। आपको इतनी गोलियां खानी हैं कि टोटल 80 MG हो जाए। अब मेरा माथा ठनका कि 80 MG की नहीं  आती फिर मैं 120 MG की कैसे खा रही हूँ! फौरन घर  फोन किया। सब चिल्लाए, घर आओ। डॉ सरीन से बड़ी डॉक्टर बनने की ज़रूरत नहीं, कैमिस्ट की बात पर यकीन कर रही हो! 

पर मन नहीं माना और मैं उस डॉक्टर के पास पहुँची जिसने 120 MG की स्टेरॉईड लिखी थी। डॉक्टर नहीं था इसलिये अस्पताल की फार्मेसी पर गई जहाँ से अन्य दवाओं के साथ 120 MG की स्टेरॉयड ली थी। वहाँ पता चला कि कि ये दवा 8 MG से ऊपर नहीं आती।  ये गलत लिख गया है। 12 MG लिखना था। 8 और 4 की दो गोली जो दी जा रही थीं, वो यही 12 MG की दवा है। 

आश्चर्य इस बात का है कि पहले डॉक्टर ने जो गलती की उसे डॉ  सरीन नहीं पकड़ पाए! डॉ सरीन  को क्या उस दवा की समझ नहीं थी? और अगर 80 MG का वो स्टेरॉयड मैं खा लेती? शायद अब तक होती ही ना और अगर होती भी तो न जाने किस स्थिति में। 

ये निश्चित तौर पर मेडिकल ब्लंडर है। पर डॉ सरीन जैसे सीनियर डॉक्टर से ये ब्लंडर हो सकता है, सोच के परे है। वो मुझे 80 MG का pedamet कैसे लिख सकते हैं!