शनिवार, 29 दिसंबर 2012

एक जिंदगी की मौत


 

मैं क्यों रोऊँ, क्यों दुःख व्यक्त करूँ 
उस लड़की की मौत पर 
जो जड़ते हुए एक झन्नाटेदार तमाचा 
हमारे सभ्य और सुरक्षित समाज पर 
हार गई है जिंदगी की जंग 
मौत से लड़ते लड़ते--
जबकि मैं यह जानती हूँ कि 
शोषण सहना, राह चलते, उठते-बैठते,
घर-बाहर, हर जगह, हर कहीं 
खून का घूँट पीकर 
यौनिक वास्तु के रूप में जीना 
और--
बलात्कार सहकर भी 
जीने की नाकाम कोशिश करना 
इस देश की लड़की की नियति है।
और इसके साथ ही--
अपने तथाकथित फिक्र्मंदों की 
'समर्पण कर देने', 'चुप्प रहने' और 'सलीकेदार कपड़े' पहनने की 
बेशर्म सलाह को तेज़ाब की तरह पीना 
इस देश की बेटी की किस्मत!!
तो --
इससे पहले कि मैं सुबक-सुबक के रोऊँ,
उसकी शक्ल में कहीं न कहीं खुद को देख तड़प तड़प के रोऊँ,
बेहतर है 
कि इस घिनौनी, खूंखार मर्दानी व्यवस्था को 
चकनाचूर कर दूं 
ताकि फिर
 कभी न हारे मेरी सपनों से भरी मासूम जिंदगी इस खूंखार मर्दानी मौत से---

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

एक दृश्य जिंदगी

बगल में रखे सुन्न से मोबाइल फोन पर उसने एक सरसरी सी निगाह डाली और अपनी आँखें भींचकर चेहरा दूसरी तरफ ऐसे घुमा लिया जैसे घर के अंदर घुसने को आतुर अपने किसी बेहद अन्तरंग के मुंह पर अनायास ही दरवाज़ा पटककर सहज होने की बेहद नाकाम सी कोशिश की जाए. इसी कोशिश के तहत उसने अपनी निगाह खिड़की से बाहर बिल्डिंगों से तराशे गए आकाश पर टिका दी जहाँ कितने ही बेचैन परिंदे इधर से उधर न जाने किस फ़िक्र में भटक रहे थे. उसकी निगाहें देर तक उन परिंदों की फ़िक्र के साथ कुछ तलाशने का बहाना करती रहीं और फिर न चाहते हुए भी वापस मुर्दा हो चुके मोबाइल पर आकर टिक गईं.नज़र टिक जाती है मगर ख़याल नहीं टिकते. अदृश्य परिंदों की तरह जिंदगी से तराशे गए दिमागी आसमान में न जाने किस फ़िक्र में चक्कर लगाते रहते हैं, इधर से उधर और हासिल कुछ भी नहीं.  वही बदहवासी, वही फिक्रमंदी और वही बेवजह की उड़ान इधर से उधर. शायद यही जिंदगी है. मोबाइल पर टिकी निगाह ने जैसे एक पूरी उम्र का फलसफा पेश कर दिया था उसके सामने. एक पूरी उम्र जो उसने इन दो वर्षों में बिताई थी एक चित्रपट के समान आँखों के सामने से गुज़र गई.
पहली बार जब वो कुसुम से मिला था. कितना अजीब सा था वो मिलना. पूरी तरह से उन्रोमंटिक. पर आज वही सब कुछ कितना ख़ास और कितना अलग लगता है.लगता तो ऐसा भी है कि काश जिंदगी को rewind किया जा सकता तो वो अपनी टिकी हुई निगाह की तरह थाम लेता वक्त के उस टुकड़े को और जिंदगी वहीं ठहर जाती न कोई बदहवास और फिक्रमंद उड़ान होती न ही कुछ और तलाशने और पाने की इच्छा..
उसे याद आता है मस्तिष्क पर खिंचता उसकी खूबसूरत सी उस नई जिंदगी के चित्रपट का वो पहला दृश्य जिसका दिन और तारीख तो उसे याद नहीं पर इतना ज़रूर याद है कि ऑफिस में 'उसका' वो पहला दिन था. खूबसूरत हरे रंग की साड़ी में कितनी खिल रही थी वो ये उसने नहीं देखा था क्यूंकि वो एक निर्लिप्त और वीतरागी व्यक्ति के समान अखबार पढ़ रहा था. उसका ध्यान कुसुम की तरफ तब गया था जब वो अचानक उसके बगल में आकर बैठी और उसकी साड़ी के पल्लू का किनारा उसके हाथ पर आ गिरा. उसे याद है कि किस तरह उसने गुस्से में एक झटके से उसके पल्लू को वापस उसकी और उछाल दिया था और तब कुसुम ने कहा था ओह आई एम सो सॉरी. उसने तभी उसकी और नज़र घुमाकर देखा था. उस वक्त उसकी सहमी हुई सी आँखें देखकर उसे पहली बार एहसास हुआ कि जैसे उसका निर्लिप्त और वीतरागी ह्रदय किसी अदृश्य राग में रम गया है. बस यहीं से हो गई थी शायद एक नई जिंदगी की शुरुआत.
नई जिंदगी... कितने कमाल की बात है कि एक उम्र की इस जिंदगी में टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी न जाने कितनी जिंदगियां बसती हैं. छोटी-बड़ी जिंदगी, रंगीन तो कभी बदरंगी जिंदगी, धूप सी उजली रौशन जिंदगी तो कभी स्याह काली जिंदगी. और भी न जाने कितनी अनगिनत जिंदगियां. रोज़ जीती और दम तोडती जिंदगियां. इन्हीं ज़िन्दगियों में इन्सान गुज़रता रहता है. एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी में गोता लगाता रहता है और इसी बीच अपने दिल से अपने हाथ में थामी हुई उसकी अपनी जिंदगी कब उसके हाथ से फिसल जाती है उसे खुद पता नहीं चलता...
दृश्य ख़त्म हुआ नहीं कि विचारों की एक बेवजह की उठापटक शुरू. शरद इसी झुंझलाहट में जोर से  अपना हाथ मेज पर पटक देता है, पर इससे क्या होता है. सवाल तो सवाल हैं उठेंगे ही. बे सर-पैर के सवाल जिनका जवाब पाने की न तो खुद उसकी तरफ से कोई कोशिश है और न ही कोई इच्छा. पर जवाब मिले न मिले सवाल तो उठेंगे ही, उठ ही रहे हैं. कोई बेगाना पूंछे तो और बात है पर यहाँ तो अपना दिमाग पीछा नहीं छोड़ता. फ़िज़ूल के सवालों की रस्साकशी आखिर पटक ही देती हैं उसे उस भंवर में जहाँ वो सोचने लग जाता है कि आखिर कुसुम में ऐसा क्या था जिसने उसकी जिंदगी को अचानक ही एक नई जिंदगी से नवाज़ दिया था. शायद उसकी सादगी, उसका भोलापन, उसके चेहरे पर खिली हुई मुस्कराहट या फिर खुद उसके अपने मन के खालीपन को भरने की एक अनवरत तलाश जो एक अनजानी सी चाह में कुसुम के आस-पास सिमट आई थी. या कुछ और... पता नहीं. एक बार फिर वह सवालों के पुलिंदे को उठा कर जैसे खिड़की से बाहर फेंक देता है इस एक जवाब के साथ कि कुसुम में कुछ ऐसा था जिसने एक उम्र से सोये पड़े उसके बचपन को मासूम सी अंगडाई के साथ जगा दिया था.
और इसके साथ ही फिर एक दृश्य शुरू जिसमे उसकी आँख एक नई सुबह में खुलती है. जिंदगी वाकई कितनी बदल सी गई थी इस दृश्य में. रोज़ ही की तरह सूरज का निकलना, पक्षियों का चहचहाना. ऑफिस निकलने की भाग दौड़, वही खाना, वही पीना वही सोना. सब कुछ वही पहले जैसा ही तो था लेकिन उस सब में एक नए किस्म का बदलाव आ गया था. जिसके बारे में वो खुद बहुत हैरान था.
दृश्य आगे बढ़ता है जहाँ वो खुद को कुसुम के ख्यालों में कहीं गुम पाता है..... शायद कुसुम भी ऐसा ही कुछ महसूस करती रही होगी. शायद जैसा बदलाव उसकी जिंदगी में आया है वैसा ही बदलाव उसकी जिंदगी में भी आया हो और शायद वह भी उसके बारे में ऐसा ही कुछ सोचती होगी जैसा कि वह. और इसी उधेड़बुन में अनगिनत सुबह, शाम और रातों का गुज़र जाना और इसके साथ ही वक्त का सूखे पत्ते की तरह झुर्र हो जाना. और इसके साथ ही जिंदगी का अचानक सिकुड़ सा जाना....
इसी दृश्य में उसे याद आता है कि बिल्कुल पहली मीटिंग की तरह पूरी तरह से फ़िज़ूल और अनरोमेंटिक अंदाज़ में उन दोनों का रोज़ ऑफिस में मिलना. उसकी रोज़ हैलो से आगे बढ़कर कुछ कहने की नाकाम कोशिश करना और आखिर एक बेतुकी सी मुस्कान के साथ संवाद की प्रक्रिया का शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाना. खूबसूरत जिंदगी के अनगिनत टुकड़ों को समेटे आखिर ये दृश्य एक उजाले के साथ ढल जाता है. एक ऐसा उजाला जिसने बंद कमरे में चुपचाप बैठे शरद की आँखों में एक नई चमक भर दी. गुनगुनी धूप से भरा यह दृश्य जैसे एक पूरी जिंदगी नहीं बल्कि न जाने कितनी जिंदगियों की चमक को अपने समेटे हुए था. और फिर इसी उजले दृश्य के साथ  स्मृतियों  के अदृश्य चित्रपटल  पर एक और दृश्य उभर आता है. उसे याद आता है वो वाक्य जो उसने शर्माजी की रिटायरमेंट पार्टी के वक्त चुपके से कुसुम से कहा था और जिसने उसकी जिंदगी को एक और खूबसूरत सी जिंदगी से नवाज़ दिया था. उसे याद आता है कि कैसे उसने बहुत हिम्मत जुटाकर कांपती सी आवाज़ में कुसुम से कहा था कि  "मैं अपनी पूरी जिंदगी तुम्हारे साथ गुजारना चाहता हूँ इसमें तुम्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं". उसे यह भी याद आता है कि किस तरह उसका दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था और उसे लग रहा था कि कुसुम के साथ उसका वह मुस्कराहट का रिश्ता, जिसने उसकी कोमा में पड़ी हुई जिंदगी को अचानक जिंदगी से नवाज़ दिया था, वो उसके इस कदम से शायद अब ख़त्म हो जाएगा. कुसुम शायद उससे अब हैलो भी नहीं करेगी. और हैलो तो क्या उसकी तरफ देखेगी भी नहीं और अगर ऐसा हुआ तो.. तो..वो जियेगा कैसे....उसकी जिंदगी फिर किसी अँधेरी खोह में गुल हो जायेगी......नहीईई..पर ऐसा हुआ नहीं. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसका उसे डर था. उसे याद आता है कि कैसे उसकी बात सुनकर कुसुम ने आश्चर्य से उसकी ऑर देखा था ऑर मुस्कुराकर कहा था नहीं. मुझे कोई ऐतराज़ नहीं.
स्मृतियाँ क्या कमाल की चीज़ होती हैं. अतीत को ऐसे सजीव बना देती हैं जैसे आज, अभी, बिल्कुल हाल की ही बात हो शरद की अदृश्य पटल पर टिकी दृष्टि से टपकी हुई एक बूँद मुस्कान इसका प्रमाण थी जो उसके चेहरे पर अचानक से चमक उठी थी.
आह उस वक्त उसे ऐसा लगा था जैसे एक ही छलांग में वो आकाश के सारे सितारे तोड लेगा. कितना ख़ास था वह दिन. उसके चहरे की ख़ुशी छिपाए नहीं छिप रही थी. उसकी और कुसुम की चुपचाप सी, खूबसूरत सी जिंदगी में संवादों का एक नया अध्याय जो जुड़ गया था.  जिंदगी की फिर से एक नई शुरुआत हो गई थी. जिंदगी में से निकलती एक सतरंगी. एक इन्द्रधनुषी  किर्णीली जिंदगी जिसके हर स्पर्श में हर रंग में वह खो जाना चाहता था.
 चित्रपट की रील एक बार फिर घिर्र से घूम जाती है और इस बार एक साथ कई सारे दृश्य दृष्टि के फ्रेम में फिट हो जाते हैं. सुबह से शाम शाम से रात रात से अगली सुबह तक के ऐसे अनगिनत दृश्य और यूँ ही लगातार...
 वो छोटा सा दृश्य जिसमें मोबाइल के की-पैड पर थिरकती उसकी उँगलियाँ कुसुम और उसके मन के राग का अनुगमन कर रही थीं, अचानक सबसे बड़ा हो जाता है सारे दृश्य उस छोटे से दृश्य के पीछे छिप जाते हैं, धुंधले पड़ जाते हैं. और  वह देखता है कि किस प्रकार उसके और कुसुम के होठों पर एक मुस्कराहट खिली है. कैसे दोनों ऐसी बातों पर भी हँस रहे हैं जिनके पीछे हंसी की कोई वजह ही नहीं. कैसे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे घंटों पार्क में टहल रहे हैं. और इसी क्रम में वक्त बहा जा रहा है बहुत तेज़ी से. इतनी तेज़ी से कि वक्त की एक बूँद भी नहीं बाकी नहीं रह गई और दृश्य ख़त्म. बिना किसी पूर्व सूचना के दृश्य ख़त्म.
इस दृश्य की समाप्ति उसे जितना साल रही थी उतना ही शायद उस नए दृश्य की अनचाही उपस्थिति भी जिसमें वो सिसकता हुआ कैंसर हॉस्पिटल में खुद को कुसुम के सिरहाने बैठा हुआ पाता है. उसके आंसू पानी की तरह बह रहे हैं. वह बच्चों की तरह बिलख रहा है और कुसुम अपने सिरिंज लगे हाथ से उसके आंसू पोंछ रही है.. और....और  बहुत दूर तक घिसटता ये शब्दहीन दृश्य उस दृश्य में गुल हो जाता है जहाँ सुलगती एक तेज़ आग में उसका अपना मन भी राख हो गया था और उसके साथ ही उसकी एक दृश्य जिंदगी भी.  

बुधवार, 11 जुलाई 2012

रस सिद्धांत



मेरी दादी. दादी को अपने मोबाइल फोन से बड़ा प्रेम है. कहती हैं कि जब अकेलापन सताता है, मन घबराता है तो ये फोन मेरा जीवन साथी बनकर मेरी सारी घबराहट, सारा अकेलापन दूर कर देता है. जब जिसकी जिस वक्त भी याद आती है, उसे उसी वक्त मेरा ये साथी मेरे पास ला देता है. इसलिए दोस्त नहीं जीवनसाथी है ये मेरा. पहाड़ सी जिंदगी को मुट्ठी में समेंटे कुछ खूबसूरत पलों में बदल देता है ये मेरा दोस्त. 
दादी की बात सुनकर मैं हँस पड़ती हूँ. सच में जीवन साथी की कितनी अच्छी परिभाषा है. दादी जब जीवन साथी की बात करतीं हैं तो दादाजी की याद आना भी बहुत स्वाभाविक है. मुझे याद आ जाता है दादा-दादी का वो मजेदार किस्सा जिसने मुझसे रस सिद्धांत बहुत अच्छे से समझा दिया था. किस्सा कुछ ऐसा है
एक बार मेरा छोटा भाई गन्ना खा रहा था. गन्ना खाने का उसका अपना ही तरीका था. गन्ने को दांत से से छीलता, थोड़ा सा चूसता और फिर खोई को ज़मीन पर डाल देता. मेरे दादा और दादी जी भी वहीं बैठे हुए थे और बड़े गौर से उसके रस-चूषण का आनंद ले रहे थे. दादा जी कुछ देर तक तो यह सब देखते रहे फिर उनसे रहा नहीं गया और बोले- मूरख!! गन्ना चूसना भी नहीं आता देखो तो अभी भी इसमें कितना रस है, कहकर उन्होंने ज़मीन पर पड़ा हुआ गन्ने का चुसा हुआ एक टुकड़ा उठाया और मुंह में डाल कर चूसने लगे. दरअसल दादा जी के दांत नहीं थे पर गन्ना चूस कर खाने का मन तो था. तो बस उनके लाडले मूरख ने अपने दूध के दांतों के हलके आघातों से गन्ने की कठोरता को दादा जी की दन्त विहीनता के आगे स्वाद से धराशाई कर दिया था. तो भला दादा जी लुत्फ़ क्यूँ न उठाते?
मेरे लिए ये सब थोड़ा सा अस्वीकारणीय. आखिर जूठा. मुंह से निकाला गया कोई कैसे खा सकता है. मैं तो सोच भी नहीं सकती थी. पर इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती मेरे सामने एक और आश्चर्य घटित हुआ. और वो ये था-
दादाजी अपने दन्त विहीन मुंह से गन्ने का स्वाद ले रहे थे और अपने कार्य को सही साबित करते हुए कह भी रहे थे कि देखो कितना रस है. आहा......
दादाजी के बगल में दादी भी बैठी हुईं थीं. दादा जी द्वारा रसास्वादन पर अपनी चटपटी प्रतिक्रिया देते हुए बोलीं--- उहं... खुद को बड़ा आता है गन्ना चूसना. उसे बता रहे हो ज़रा ये तो देखो कितना रस है इसमें. कहते हुए दादी ने दादा जी का उगला हुआ गन्ने का चूसा हुआ टुकड़ा उठाया और मुंह में डालकर चूसते हुए बोलीं- देखो-- कितना रस है इसमें आःह्ह
निश्चित रूप से मेरे लिए ये सब बड़ा विचित्र था. इसलिए मैंने मुंह बनाते हुए कहा---- ई..... अम्मा ये क्या है आपको घिन नहीं आती?
मेरी बात सुनकर दादाजी बड़ी जोर से हँसे और दादी मुस्कुरा कर बोलीं- पेड़ को कभी अपने पत्तों से घिन आती है..................

रविवार, 8 जुलाई 2012

मियां कक्कन





मियां कक्कन के बारे में बहुत सुना था. कस्बे के लोग बताते हैं कि किसी ज़माने में सूरज पश्चिम से निकलता था पर मियां कक्कन को ये गवारा न था कि सूरज पश्चिम से निकले आखिर उनकी माशुका का घर भी तो पश्चिम में ही पड़ता है. खुदा न खुआस्ता कभी सूरज और उनकी माशुका के नैन लड़ गए तो उनका क्या होगा. बैठे-बिठाये चप्पलें तोड़कर कमाई बदनामी बेकार न हो जायेगी. तो बस सूरज का रास्ता बदलवा दिया. कहने-सुनने वालों की तो बोलती ही बंद हो गई. मुंह खुला का खुला रह गया. ऊपर के दांत ऊपर और नीचे के दांत नीचे. सब इशारों-इशारों में एक दूसरे से पूछते कि लाहौल विला कुव्वत !! ये हुआ तो हुआ कैसे? न चूँ न चाएँ  न ताली न धायँ ये गज़ब कैसे हो गया. पूरे क़स्बे में चुप्प सा हल्ला गुल्ला हो गया पर मियां कक्कन??.... मियां कक्कन  ठहरे मियां कक्कन उन्हें कोई फरक नहीं पड़ाफुसफुसाती कितनी ही हवाएं उनके कान के बगल से निकल जातीं पर मियां कक्कन उन हवाओं की बदगुमानी को नज़रंदाज़ करते हुए सुड़कदार अंदाज़ में चाय पीते और मूछों ही मूंछों में मुस्कराते. खुदा जाने कि उनकी इस बेपरवाही की राजदार ऐसी कौन सी बात थी जो उनकी मूंछों से निकलकर चाय की सुडकियों में तो गुल हो जाती पर बगल से गुजरने वाली हवा को भी उसका गुमां नहीं हो पाता. 
लोग कहते हैं कि अपनी ही दुनिया में मशगूल आज के मियां कक्कन जो इस छोटे से कसबे में झोपड़ी बनाकर रहते हैं, एक ज़माने में उनकी बात ही अलग थी. मथुरा के पास के ही किसी इलाके के खानदानी ज़मीदार थे हमारे मियां और ज़मींदार क्या पूरी नवाबी शान थी उनकी. बाप-दादों की बड़ी जायदाद के अकेले वारिस. ज़मीन-जायदाद, नौकर-चाकर, ऐशो-आराम और खानदानी इज्ज़त का नशीला रुतबा जो अब मियां की बस सतखिर्री मूंछों में ही चमकता है. न जाने कहाँ हवा हुआ. कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि मियां अपने ज़माने के बड़े दिलफेंक किस्म के आशिक थे. जहाँ भी नाज़नीन नज़रे-नगीच हुई नहीं कि मियां का दिल रुखसत और साथ ही दौलत भी. ऐशो-आराम भी. ज़मींदारी भी. शाम के वक्त चिलम का लम्बा कश भरते कुछ बुजुर्गों को यह भी कहते सुना है कि काके शाह मालिक उर्फ़ हमारे मियां कक्कन ज़मीदार तो थे पर जेहनी तौर पर एक बेहद भले और मासूम किस्म के इंसान भी थे. किसी दर्दमंद या ज़ईफ़ को देखा नहीं कि बस दौड़ पड़े उसकी मदद को. इनकी चौखट से कोई खाली हाथ नहीं जाता था. ब्याह भी हुआ था, बाल-बच्चे और सलीकेदार बेग़म क्या कुछ नहीं था इनकी गृहस्थी में पर नसीब का खेल कौन जानता है. मियां कक्कन एक खूबसूरत हूर की गिरफ्त में आ गए. अब हूरें इंसानों की तरह पांच तत्वों की पैदाइश तो होती नहीं हैं कि उनमें जज़्बात हों, बस क्या था अपने हुस्न का दीवाना बनाकर राख कर गई मियां कक्कन की जन्नत. 
क़स्बे की मिट्टी में रेत के जितने कण होंगे शायद उतनी ही अलग-अलग तरह की कहानियां मियां कक्कन को लेकर प्रचलित थीं. पर एक बात पर सबका यकीन था और वो ये कि साठे की उम्र पार करके भी मियां कक्कन बड़े पाठे हैं. दिल भी पूरी जवानी के साथ धड़कता है. तभी तो इस उम्र में भी इनकी एक खूबसूरत माशूका है. अब माशुका कौन है, कहाँ है, ये किसी को नहीं पता पर है ज़रूर और बेहद खूबसूरत है यह सबको पता है. भोला हलवाई जिसकी बनाई चाय को कुरान की आयत की तरह मियां अपने ज़ेहन में उतारते हैं, ने एक बार बताया था कि मियां की जेब में एक बार एक चूड़ी देखी गई थी. जेब से झांकती गोल गोल चूड़ी हो न हो इनकी माशूका की ही थी. भोला हलवाई की ही तरह दीनू महंत ने भी कक्कन मियां के कुरते की जेब से रंगीन रूमालों के झाँकने की बात कई बार बड़े गर्व से कुबुली थी. कसबे के आवारा  लड़के भी बड़े चटकारे लेकर मियां कक्कन की मोहब्बत की ऐसी कई दास्ताने सुनातें हैं और कद्रदानों से वाहवाहियां बटोरते हैं पर एक बात जो हैरान करती है वो ये कि किसी की भी ज़ुबान या निगाहों में इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वो मियां के सामने अपनी करामात दिखा सकें हालाँकि मियां कक्कन को इन दस्तानों से कोई फर्क नहीं पड़ता वो तो बस एक पक्के मुसलमान की तरह दिन में तीन बार भोला हलवाई की दुकान की चाय से गला तर्र करते हैं, दमड़ी थमाते हैं और निकल पड़ते हैं कसबे के पहाड़ी इलाके की तरफ किसी अज्ञात स्थान की ओर.
ख़ैर कसबे के लोग भी आखिर कब तक अपने सवालों के जवाबों का इंतज़ार करते.इसलिए पहुँच गए मियां का पीछा करते-करते उसी अज्ञात स्थान पर जहाँ हमारे मियां कक्कन सर्दी-गर्मी, बरसात, आंधी, तूफ़ान की फ़िक्र किये बगैर जाया करते थे. पर ये क्या? खोदा पहाड़ निकली चुहिया भी नहीं! सोचा था कि........
यहाँ तो खेल ही उल्टा पड़ गया क्या देखते हैं कि मियां कक्कन एक बहुत बड़ी हवेली के सामने के मैदान में करीब दर्ज़न भर बच्चों के साथ बच्चे बने हैं. उनके साथ दौड़ रहे हैं. उछल कूद रहे हैं. छोटी सी एक बच्ची तोतली ज़बान में कह रही है काका आप जो चूली लाये ते न तूलज बैय्या ने तोल दी. काका आप बैय्या ती पिट्टी पिट्टी लदाओ. और हमारे कक्कन मियां तुतला कर कह रहे थे, मुनिया तेले लिए ऑल चूली लाऊंगा. काका आज यहीं रुक जाओ न. ११-१२ साल की बच्ची ने काका का हाथ पकड़ते हुए कहा. इतने में बाकी बच्चे भी शोर मचाते हुए कहने लगे के काका रुक जाओ, काका रुक जाओ.  पास कुछ लोग हाथ बांधे खड़े थे जिनमें से एक मियां के नज़दीक आकर बोला. साब आज बच्चों के साथ हवेली में ही रुक जाइए बच्चों की बड़ी इच्छा है. आप रुकेंगे तो आपकी ये हवेली भी धन्य हो जायेगी. पर मियां कक्कन सिर हिलाते हुए बोले- न सुखना न. अब हवेली बच्चों की है. अपनी तो बस वही झोपड़ी भली. अपनी माँ को सुखना वचन दिया था मैंने कि तेरी हवेली को खुशियों से भर दूंगा.तुझे पता है न सुखना कि मेरी माँ ने यशोदा बनकर मुझ जैसे बिन माँ-बाप की औलाद को अपनाया. जब माँ ने मुझे ये बताया तो दिल तो मेरा बहुत टूटा पर उस दिन मुझे घर का मतलब समझ आ गया. मैंने भी सोच लिया था कि अपनी शादी करके घर तो सभी बसाते हैं पर मैं अपने जैसे हर उस बच्चे को घर दूंगा जिसका अपना कोई नहीं है. . .....कहते-कहते कक्कन मियां अचानक रुक गए और बोले...क्या सुखना वही पुरानी बातें.. चल अब खेलने दे मुझे. अपने बच्चों के साथ.. कहते हुए कक्कन मियां ने अपने कुरते से अपनी पलके पोंछी और बच्चों के साथ फिर से मस्त हो गए.
सुना है कि उसदिन दीनू महंत और भोला हलवाई जो कस्बे की ओर से  मियां कक्कन का पीछा करते करते हवेली तक पहुंचे थे. कक्कन मियां और बच्चों के साथ रात की ब्यारी करके ही लौटे. पर दोनों की आँखों में ढेर भरे आंसू ज़रूर जमा थे. लोगों ने बहुत पूछा पर मुहं से कोई बात ही नहीं फूटी. शायद कक्कन मियां ने उन्हें कोई कई कसम दे दी थी. ख़ैर खुदा जाने क्या था पर कमाल की बात ये हुई कि भोला हलवाई ने पता नहीं क्यों कक्कन मियां से दमड़ी लेना बंद कर दिया और कक्कन मियां को अब वह काका कहने लगा है. और पक्के ब्राह्मणवादी दीनू  महंत कक्कन मियां के पाँव छूने लगे हैं.इतना ही नहीं कसबे के आवारा लड़के जब कक्कन मियां को लेकर चटकारेदार बयानबाजियां करते हैं तो ये दोनों उन्हें अपनी अपनी बारी आँखों से बरज देते हैं और कई बार तो डांटकर या गालियाँ देकर भगा भी देते हैं. उधर मियां कक्कन पहले की ही तरह अपने में मस्त हैं लेकिन क़स्बा??  क़स्बा वाकई हैरान है.......


विभा नायक 





मंगलवार, 15 मई 2012

मैंने महसूस किया है हर मोड़ पर कि 
मेरी मुसकुराहट, मेरी हंसी और उसमें खिलते अनगिनत गुलाबों की पौध 
तुम्हारी रोपी हुई ही तो है 
मेरी धमनियों में दौड़ता रक्त मेरी आँखों की चमक 
सब तुम्हारी नफासत से सजाई इबारतें ही तो है
और मेरी हर तक़लीफ़ हर दर्द जैसे तुम्हारी अपनी तकलीफ अपनी नाकामी....
मैंने डूबकर देखा है खुद में और अक्सर महसूस किया है कि तुम....
जैसे घुली हो मेरी सांस में मेरी आवाज़ में, मुझमें पूरी तरह.
मैं तुमसे कुछ कहूँ या न कहूँ तुम सब जानती हो
क्योंकि तुम मेरा प्रतिबिम्ब नहीं मेरी मां हो ...

शनिवार, 10 मार्च 2012

मन मंजूषा--3

वरुण  क्या. सभी के मन में यही बात चल रही थी. मामा जी कितने अच्छे हैं. वो तो सब की मदद करते हैं फिर भगवान् उन्हें इतनी टेंशन क्योँ दे रहे हैं. वो क्या करेंगे, कैसे संभालेंगे सब कुछ? और वो खुद बच्चों की तरह नाज़ुक मन वाले हैं. जरा सा मन दुखा नहीं कि आँखों से टप-टप  आंसू बह चलते हैं. पिछली बार जब हम लोग झाँसी गए थे और मेरे लिए वो मेरे मन कि ड्रेस नहीं ला पाए थे, तो इसी बात पर उनकी आँखें भर आईं थीं.  माँ ने मामा जी के सर पर हलकी सी चपत लगाकर कहा था-- नीरव क्या हो गया. अक्कल आएगी तुम्हे  कभी....
ये क्या ज़रा सी बात पर उदास हो जाते हो. उठो चलो...
मामा जी माँ की बात पर सुबक कर बोले थे. नहीं दीदी, मुझे बस इस बात का बुरा लग रहा है कि मैं कैसा मामा हूँ., अपनी भांजी की छोटी सी इच्छा पूरी नहीं कर सकता..
मामा जी को यूँ सुबकते हुए देख मैंने भी कहा था कि मामा जी, इसमें आपका क्या दोष मुझे पसंद ही नहीं आईं कोई ड्रेस. इसमें तो दुकानदार की गलती है.. पर आप चिंता मत करना. अगली बार आउंगी न तो आपसे एक साथ  तीन ड्रेस लूंगी.ठीक है न????
मेरी बात सुनकर मामा जी के चेहरे पर कुछ चमक आई.. फटाफट अपने गालों पर ढुलक आये आंसू पोंछकर मामा जी बोले- हाँ ये बात ठीक है. मैं तुम्हे तीन नहीं बल्कि चार ड्रेस दिलाऊंगा. पक्का. पर....
मामा जी कुछ उदास होकर बोले- लेकिन अगर तुम्हे फिर पसंद नहीं आई तो???
मामा जी की बात सुनकर मैंने उनके गले में हाथ डालकर कहा - अरे!! मामा जी. आप चिंता क्योँ करते हैं., नहीं पसंद आईं तो उस से अगली बार आठ ड्रेसिस ले लूंगी आपसे. बस. अब तो खुश हो जाइए.
मामा जी समझ गए थे कि मैं मज़ाक कर रही हूँ. इसलिए फिर से उदास हो गए और बोले- ऐसे नहीं होता.
फिर कुछ सोच कर बोले- एक काम करते हैं.
मामा जी बड़ी फुर्ती से उठे और मामी के पास रसोई में चले गए.और जोर से बोले- ज्योति  सुनो २००० रुपये दो अभी.
करीब १ घंटे के वार्तालाप के बाद मामा जी आये और मेरे हाथ में १००० रुपये रखते हुए बोले- तुम दिल्ली से अपने मन की ड्रेस खरीद लेना. ठीक है.
उफ़ मैंने मन में कहा फिर नया तमाशा. मैंने पैसे वहीँ बेड़ पर पटक दिए और माँ को आवाज़ लगाईं. मम्मी ने  मामाजी को बहुत समझया पर मेरे जिद्दी मामा मुझे वो पैसे देकर ही माने. ऊपर से डांट अलग- मामा का मतलब पता है तुम्हे? दो माँ के बराबर होता है मामा. उनसे तो तुम्हे कोई भी चीज़ लड़कर लेनी चाहिए. और तुम कहती हो नईं... नईं ..........ये क्या है? अच्छी मार लगाऊंगा जो आगे से किसी चीज़ के लिए मना  किया.....
ऐसे मेरे मामा. बिलकुल बच्चों जैसे.. डर यही लग रहा था कि जो खुद बच्चों की तरह हैं, वो अपने बच्चों को कैसे समझायेंगे जो  अपनी माँ की बीमारी का नाम सुनते ही घबरा गए होंगे..
और सच यही हुआ. माँ ने जब मामाजी को फोन किया तो पता चला कि  मामा जी और बच्चे खूब रो रहे थे. उनके बीच बस मामी ही समझदार थीं, वो अपनी बीमारी भूल के समझा रहीं थीं कि इसमें चिंता की क्या बात है. सब ठीक हो जाएगा. आजकल तो हरेक बीमारी का इलाज है..
नाना जी बता रहे थे कि पता ही नहीं चल रहा था कि असल में बीमार कौन है....क्रमशः

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मंगलवार, 6 मार्च 2012

मन मंजूषा भाग- २



वाकई सवाल अनसुलझे नहीं रहते. उन्हें सुलझना ही होता है.यही उनकी नियति है, पर अपने सुलझने की प्रक्रिया में सवाल दिमाग को घोटकर रख देते हैं, अन्दर और बाहर बहुत कुछ टूटता है चरमराता है. और फिर जो कुछ सामने आता है उसे चाहे हम कितना ही झुठलाने या नज़र अंदाज़ करने की कोशिश क्योँ न करलें,  उससे मुक्त नहीं हो सकते..    
खैर तो कुछ समय बाद अचानक पापा के पास मामाजी का फोन आया. वो लगभग चीख रहे थे, कुछ क्षणों के लिए तो हम सभी सन्न से रह गए की आखिर हो क्या गया? पापा बार- बार कह रहे थे कि तुम चिंता मत  करो. अब यह बीमारी लाइलाज नहीं है. तुम चिंता मत करो. और तुम ऐसे कमज़ोर पड़ोगे तो कैसे होगा. अरे तुम...तुम.... मेरी बात सुनो जो भी अगली गाड़ी मिलती है उस से तुम दिल्ली आ जाओ. तुम चिंता मत करो मैं यहाँ किसी अच्छे डॉक्टर से तुम्हारी यहाँ बात करा दूंगा सब ठीक हो जाएगा. बस अब तुम आ जाओ... जल्दी से... सब ठीक हो जायेगा......तुम चिंता मत करो.
पापा ने फोन रखा ही था कि माँ ने पूछा क्या बात है? नीरव का फोन था????
किसकी तबियत ख़राब है?? बताओ जल्दी से. मां बदहवास सी हो रहीं थीं. 
रसोई में रखे कुकर की सीटी लगातार बज रही थी. सड़क पर घड़घडाता हुआ कोई ट्रक कानों के पर्दों को बेंधता हुआ गुज़र गया था. इसी बीच पापा ने कहा कि नीरव  का फोन था  ज्योती को  कैंसर है!!
क्या??? ज्यो ... ज्योति  को..............कै.....कैंसर.........
हैं ?? ये क्या कह रहे हो. अब तक तो ठीक थी. ये अचानक!!
अचानक ही होता है सब कुछ  चौथी स्टेज है.. झाँसी में डॉक्टरों ने मना कर दिया है.  हो सकता है कल सुबह तक आ जाएँ वो लोग..पापा ने एक अजीब से निराशा भरे स्वर में कहा. 
हम सब अवाक थे. सबके दिमाग में उस समय एक ही बात चल रही थी कि सब कुछ कितना ठीक ठाक चल रहा था ये अचानक क्या हो रहा है... ऐसा लग रहा था जैसे हम सबकी जिंदगी कुछ समय के लिए थम गई हो.  पता नहीं क्या-क्या बीत गया था जैसे उस वक्त. कैंसर के संभावित परिणाम की आशंका से मन काँप गया था. चौथी स्टेज पर तो कैंसर के रोगी का बचना लगभग असंभव सी बात है. फिर मामा जी का क्या होगा?  उनकी अभी ये हालत है तो बाद में क्या होगा? और उनके वो तीन बच्चे जिन्हें वो अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं उनका क्या होगा?? उफ्फ्फ!!!! प्लीज़ भगवान जी मामी को ठीक कर देना. ....प्लीज़ प्लीज़ प्लीज़... मेरी तरह वरुण का मन भी शायद यही कह रहा था......
क्रमशः .....