गुरुवार, 6 जून 2024

गर्मी की छुट्टियाँ




गर्मियों की छुट्टियाँ हुईं तो हमेशा की तरह दादा-दादी के पास गाँव जाना तय हुआ। हर साल जिस दिन स्कूल का आखिरी दिन होता, उसी शाम का रिजर्वेशन होता। बिट्टू को इस समय का खासा इन्तज़ार रहता था। शहर में तो माँ स्कूल के अलावा कहीं जाने ही नहीं देती थीं। घर में भी बस पढ़ाई पढ़ाई और खेल के नाम पर लूडो या साँप सीढ़ी, 20 मिनिट के लिये मोबाईल और बस हो गया खेलना। पर गाँव में तो क्या खूब मस्ती होती! दादाजी के साथ खेत में जाना, खेत से सब्ज़ी तोड़कर लाना, पेड़ पे चढ़ना, नदी में मस्ती करना, बैलगाड़ी और ट्रैक्टर में बैठना, मेले में जाना और खूब खाना। दादी पता नहीं क्या क्या बनाकर खिलातीं! रात को कहानी भी सुनातीं। इतना सब शहर में कहाँ? यहाँ तो बस पढ़ाई और डांट। पर वहाँ तो पापा मम्मी को भले ही डांट पड़ जाए पर बिट्टू को? सवाल ही नहीं। दादा-दादी का चहेता जो था। यही सब सोच के बिट्टू फूला नहीं समा रहा था। उसका बस चले तो वो तो हमेशा गाँव में ही रहे।

छुक छुक करती ट्रेन भागी जा रही थी। पेड़, खेत, खंबे और पता नहीं क्या क्या सब पीछे छूटता जा रहा था। पर ये क्या ट्रेन की स्पीड कम हो रही थी और धीरे-धीरे ट्रेन रुक गई। कोई स्टेशन आया था। इधर पापा को पता नहीं कैसे पता चल गया था कि उसे आईस्क्रीम खानी है! वो तीन आईस्क्रीम और उसकी फेवरिट चिप्स भी ले आए थे। वाह! मज़ा आ गया था। पर ट्रेन चल क्यों नहीं रही थी! अब दादा जी के पास कब पहुंचेंगे! बिट्टू बेचारा उदास होकर बोला। तभी पापा ने उसे गोद में बिठाकर कहा- गाड़ी बेचारी थककर सो गई है। तुम ऐसा करो कि अपनी सीट की तरफ़ से गाड़ी को धक्का लगाओ, गाड़ी जाग जाएगी। 

अच्छा ऐसा भी होता है, अभी लगाता हूँ और बिट्टू ने गाड़ी को जैसे ही धक्का लगाया, कुछ ही क्षणों में गाड़ी चल पड़ी। मम्मी-पापा और पास बैठे अंकल आंटी ने भी बिट्टू की बहुत तारीफ़ की। बिट्टू की आँखों में भी खुशी की चमक आ गई। आज पहली बार उसे अपनी ताकत का एहसास जो हुआ था।

ट्रेन फिर चल पड़ी। लेकिन पता नहीं कब उसे नींद आ गई थी। सुबह हुई तो.. ये क्या? अरे वाह! बिट्टू अपनी दादी की गोद में था। दादाजी, मम्मी पापा सब वहीं बैठे थे। बिट्टू खुशी के मारे अपनी दादी से लिपट गया। दादाजी बोले- दादू के पास नहीं आना तुझे? मैं तो मेले में जाने के बारे में सोच रहा था..

चलना है ना दादाजी, कहते हुए उसने दादाजी का हाथ पकड़ लिया।

तो अब उठकर दादी से नहा-धो लो, कुछ खा लो, दादी ने बहुत बढ़िया चीज़ बनाई है तुम्हारे लिये।

बस फिर क्या था बिट्टू कुछ ही देर में राजा बेटा बन गया था। दादी ने उसे मलाई बर्फी खिलाई, पुलाव और मज़ेदार आम की चटनी। दादी ने अपने हाथ से बनाए हुए, नये कपड़े भी पहनाए। अब बस मेले जाने की देर थी। बैलों के गले की घन्टियाँ बज रहीं थीं मतलब बैलगाड़ी तैयार थी। मम्मी, पापा दादी के पास रुके रहे, पूरे साल भर बाद जो मिले थे। इसलिये बिट्टू और दादाजी अकेले ही मेले को चल पड़े। मेले में झूला सबसे बड़ा आकर्षण था। ऊँचा हिंडोले वाला। बिट्टू झट से उसमें बैठ गया। पर जैसे ही झूला चला, बिट्टू चिल्लाया- दादाजी..दादाजी मुझे उतारो, मुझे डर लग रहा है... दादाजी इशारा करते रहे कि बैठो कोई डर की बात नहीं है पर बिट्टू कहाँ मानने वाला था। आखिरकार झूले वाले ने उसे उतार दिया। पर ये क्या? दादाजी बोले- यहीं रुको मैं अभी आता हूँ, और झूले में बैठ गए। 

बिट्टू विस्फारित आँखों से झूला झूलते दादाजी को देखता रहा। कुछ ही देर में झूले के चक्कर पूरे हो गए और दादाजी झूले से उतर आये।

आश्चर्यचकित बिट्टू बोला- दादाजी आप झूले पर बैठे? आपको डर नहीं लगा?

दादाजी हँसकर बोले- डर किस बात का? झूले पर तो सबको अच्छा लगता है..और फिर अपन ने उसे पैसे भी तो दिये हैं, तो वो न वसूल करते! बिट्टू को दादाजी की जितनी भी बात समझ आई, पर वो दादाजी के साथ  खिलखिलाकर हँस पड़ा।

 

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