गुरुवार, 26 जनवरी 2023

🌷माँ शारदा🌷





प्रणम्य माँ वागीश्वरी 

श्वेतांबरी माँ भगवती 

है प्रार्थना आशीष दो🙏

भय, क्लेश से माँ मुक्ति दो

अज्ञान आच्छादित हृदय में 

तेजस्विता संचार दो🙏

बल प्राण दो🙏

माँ शारदा वरदान दो🙏

शब्द रूठे, अर्थ निष्प्रभ 

विशृंखलित लय भाव हैं

  माँ साध दो🙏

माँ शारदा वरदान दो🙏

शत्रुओं से त्रस्त, हारा हृदय है

माँ प्रेम-वीणा के स्वरों से ऊर्जस्विता झंकार दो🙏

निज चरण मध्य स्थान दो, माँ शारदा वरदान दो🙏

हूँ अभागी, मूढ़ अनपढ़, बोध, बुद्धि, ज्ञान, मेधा 

माँ नहीं मुझमें कहीं

ज्ञान के संगीत से माँ आत्मा को तार दो

माँ भक्ति दो, विश्वास दो🙏

माँ शारदा आशीष दो, वरदान दो

माँ अनुग्रह दान दो 

वरदान दो🙏🙏



शनिवार, 21 जनवरी 2023

पृथ्वी राज रासो का काव्य सौन्दर्य

 


आदिकाल की महत्वपूर्ण रचना है पृथ्वीराज रासो, जिसके रचयिता चंद बरदाई ने अपने इस महाकाव्य में अद्वितीय प्रतिभा का परिचय दिया है। भले ही इस ग्रंथ की प्रामाणिकता विवादास्पद हो किन्तु भाव और उसके प्रस्तुतीकरण में कवि को जो सफलता प्राप्त हुई है वह अप्रतिम है। यही कारण है कि विद्वान मुक्त कंठ से हिंदी के प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो के काव्य सौन्दर्य की प्रशंसा करते हैं। हालांकि पृथ्वीराज रासो का अंतिम खंड या समय पृथ्वी राज रासो के रचयिता चंदबरदाई के द्वारा नहीं बल्कि उनके पुत्र जलहण के द्वारा रचित है, किन्तु भाषा और भाव प्रवाह की दृष्टि से यहाँ किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं है, बल्कि महाकाव्यात्मक प्रवहशीलता पाठक और विद्वतजनों को प्रभावित करती है।

निम्न लिखित विशेषताओं के आधार पर पृथ्वीराज रासो के काव्य सौन्दर्य को समझा जा सकता है-

कला पक्ष

रासो काव्य –

रासो, रासा, रास, रासौ समानार्थक शब्द हैं। इसका विकास रास नामक नृत्य से माना जाता है। तो वहीं अपभ्रंश के कवि स्वयंभू ने रासक छंद का उल्लेख किया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रासक छंद में रचे जाने के कारण इन रचनाओं को रासो नाम से अभिहित मानते हैं।  पृथ्वीराज रासो ऐतिहासिक एवं वीरतापरक रासो काव्य है। प्रस्तुत महाकाव्य का विधान संस्कृत महाकाव्य के अनुसार नहीं प्रत्युत अपभ्रंश कालीन प्रबंध काव्यों के समान हुआ है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन महाकाव्यों के आधार पर कुछ कथानक रूढ़ियों का उल्लेख किया है, जिनमें से अधिकांश का प्रयोग पृथ्वीराज रासो में हुआ है। ये कथानक रूढ़ियाँ हैं- कथा वाचक तोता, गुणश्रवण से अनुराग, षड ऋतु वर्णन, नख शिख सौन्दर्य वर्णन, वयः संधि वर्णन, पक्षी आदि से संदेश कथन वर्णन।

 छंद विधान

काव्य में स्थायित्व और लय की स्थापना हेतु आरंभ से ही छंद विधान का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। नाद व लय से युक्त रचना पाठक के मनोजगत का हिस्सा बन जाती है तथा इस प्रकार रस की सृष्टि में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पृथ्वीराज रासो भी इस दृष्टि से अप्रतिम है।

पृथ्वीराज रासो मूलतः वीर रस का काव्य है। अतः वीर रस के अनुकूल महाकवि चंद बरदायी ने छप्पय, कवित्त, दूहा, आदि का प्रयोग किया है। कई विद्वान चंदबरदाई को छप्पय सम्राट भी कहते हैं। इस पूरे ग्रंथ में 72 प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है। छप्पय, कुण्डलिया, आर्या, दंडक, मोदक, सोरठा, रोला आदि। कह सकते हैं कि कवि ने डिंगल पिंगल तथा लोक में प्रचलित सभी छंदों का प्रयोग भावानुरूप तथा रसानुरूप किया है।

दूह छंद

हम अबुद्धि सुरतान इह, भट्ट भाष सुष काज

नव रस में रस अप्प रस इहै जोग सुष काज

कवित्त-

भयो एक फुरमान, बान जोगिनीपुर संध्यो

सुई सबद अरु बान अग्र अबिचल हुई बंधयो

... सुरतान परयो षान पुक्करे, भयो चंद राजन मरण

अलंकार –

महाकवि चंद ने पृथ्वीराज रासो में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक तथा सहज रूप से किया है। अनुप्रास-

मधु ऋतु मधु ऋतु मधुर सुष, मधु संगत कटि गोप

यमक –

गौरीय स्तौ तुव धरनि, तूं गौरी अनुरत्त

उत्प्रेक्षा-

अरिमंझिबिंति मिलीमनु सहाय

ध्वनि प्रवाह-

चंद बरदाई की भाषा द्वित्व ध्वनि युक्त है। चंद चाहे देवी-देवताओं की स्तुति करें, युद्ध का वर्णन करें या रूप सौन्दर्य का वर्णन करें, सभी में ध्वनि प्रवाह है। वर्णानुप्रास के सिद्ध कवि हैं चंद बरदाई।

वीर रस वर्णन-

 तामन्स रज्ज तन तामतेन धन बीरत्त उभार तन    

भाषा-

पृथ्वीराज रासो हिंदी साहित्य के इतिहास की आदिकालीन रचना है। इस रचना के विषय में विद्वानों के अलग अलग मत हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि पृथ्वीराज रासो की भाषा के आधार पर कई विद्वानों ने इसे अप्रामाणिक सिद्ध किया है।

पृथ्वीराज रासो की भाषा न तो ब्रज भाषा है, न पूरी तरह से राजस्थानी है और न ही इसे मिश्रित भाषा कहा जा सकता है। यह अपभ्रंश से विकसित आदिकालीन हिंदी का ही एक रूप है, जिसमें एक साथ कई भाषाओं के शब्द मिलते हैं। कवि चंद बरदाई ने सरस्वती देवी की स्तुति करते हुए उन्हें छह भाषाओं की ज्ञातृ देवी कहा है, देवी का वरद हस्त प्राप्त चंद स्वयं को भी छह भाषाओं का ज्ञाता मानते हैं। इन 6 भाषाओं के विषय में संस्कृत में कहा गया है-

प्राकृत संस्कृत मागध पिशाच भाषाश्च क्षौरसेनी च

कवि चंद ने पृथ्वीराज रासो में इन छह भाषाओं को प्रयोग करने का प्रयास किया है-

संस्कृत-

त्वमेव इष्ट दिष्ट मुष्ट जुष्ट रुष्टय पतिपतें

प्राकृत

अप्प, वच्छ, अच्छार, जार, डिबमल

अपभ्रंश

वैन, कन्ह, नेह, पुन्य, जुबवन, हय, पंग

ब्रज (पिंगल)-

औकारांत बहुला भाषा

राजस्थानी (डिंगल)-

म्हे, म्हावे, गुज्जर, अम्ह, भेरी, घना

पैशाची (पंजाबी)-

कम्म, कन्न, अज्ज, सद्ध, रह

पृथ्वीराज रासो के भाषा विषयक मत-

मुनि जिनविजय इस ग्रंथ को अपभ्रंश भाषा में लिखा मानते हैं, जिसे कालांतर में राजस्थानी भाषा का रूप दे दिया गया। इस मत को मथुरा प्रसाद दीक्षित, मुनि कान्ति सागर, डॉ सुनीति प्रसाद चटर्जी एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मानते हैं।

मोती लाल मेनरिया, डॉ रामकुमार वर्मा पृथ्वीराज रासो को चारण युग की डिंगल भाषा का ग्रंथ मानते हैं।

जॉर्ज ग्रइयरसन, जॉन बीम्स, आचार्य शुक्ल, डॉ श्यामसुंदर दास, मिश्र बंधु, डॉ उदय नारायण तिवारी डॉ धीरेन्द्र वर्मा इस ग्रंथ को पिंगल भाषा का ग्रंथ मानते हैं।

डॉ बिपिन बिहारी त्रिवेदी पृथ्वीराज रासो की भाषा को मिश्रित भाषा मानते हैं। अपने ग्रंथ चंद बरदाई और उनका काव्य में उन्होंने रासो की भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण कर शोध पूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। जिसमें संस्कृत, पालि, मागधी, शोरसेनी, गुजराती, पंजाबी ब्रज, राजस्थानी, अरबी, फारसी भाषाओं का मिश्रण कहा है।

शनिवार, 14 जनवरी 2023

हाइकू कविता

ठंड की ठिठुरन

एक प्याली

चाय में मिठास सी।

ठंड की ठिठुरन

एक बीड़ी मेँ 

दम सुलगती सी।

ठंड की ठिठुरन

लकड़ियों मेँ 

झुलसती आत्मा सी।

ठंड की ठिठुरन

फुटपाथ पे

लपलपाती मौत! 

ठंड की ठिठुरन

समेटे सुख

और सिसकियाँ भी।

ठंड की ठिठुरन

अंतर्कथा सी 

अटल प्रारब्ध की।