मंगलवार, 30 मई 2023

तजुर्बा

 बात निकली थी कि

तजुर्बा ज़िंदगी जीना सिखाता है

ज़िंदगी का क्या सलीका है, यह बताता है

तजुर्बेकार होना फ़क्र की है बात

क्योंकि तजुर्बा आदमी को आदमी होना सिखाता है

सही सब कुछ,

नहीं इसमें शिकायत है ज़रा सी भी

मगर क्यों चाल मंथर है तजुर्बे की, असर क्यों देर से अपना दिखाता है

नज़र के सामने अक्सर यही है

कि जब ज़िंदगी जीने की पक्की चाह होती है,

सहज निश्छल हृदय की ऊँची उड़ान होती है,

तजुर्बेकार मिलते हैं मगर तजुर्बा ढूँढने से भी नहीं मिलता

खुशी से नाचता मन जब किसी की भी नहीं सुनता,

तजुर्बा किस गुफा में, कंदरा में है छुपा रहता

मगर जब चोट खाता है सरल मन

वृद्ध सा उपदेश देता होता प्रकट है

समय के साथ जो आता, भला क्या तब नहीं होता

 समय के बाद आने का मनुज को लाभ ही क्या है?

द्वेष रखता है सरल चंचल हृदय से

आह! कैसा है तजुर्बा!


 



रविवार, 28 मई 2023

उफ ये मटर का दाना!

...तो समझ आया स्टूडेंट्स, हमें सबकी रिस्पेक्ट करना चाहिये। कभी किसी का दिल नहीं ब्रेक करना चाहिये। नहीं तो हमें भी उसका इम्पैक्ट झेलना ही होगा, ओके?.... बाकी अब अगली क्लास में। 

कहते हुए हिंदी की शिक्षिका नीरू खेड़ा चेयर से उठ खड़ी हुईं, जिस पर आराम से पसर कर वे बच्चों का ज्ञान-वर्धन कर रही थीं। बच्चों ने भी ओके मैम कहते हुए राहत की सांस ली। आखिर यह वह क्लास थी जिसमें सिलेबस से ज़्यादा नीतिशास्त्र पढ़ाया जाता था वो भी अधकचरी अंग्रेज़ी में। 

हिंदी की शिक्षिका होकर भी खेड़ा जी हिंदी से पल्ला झाड़ती नज़र आती थीं और भरसक अपने पहनावे और ज़बान पर जम चुके बनावटी लहज़े से खुद को इन्ग्रेजी की असली वारिस घोषित करने का प्रयास करती थीं। ये अलग बात है कि इस चक्कर में बेचारी न तो हिंदी की ही रह पायी थीं और अंग्रेज़ी ने तो उन्हें कभी पूछा ही नहीं। 

क्लास से निकल कर नीरू अभी आगे बढ़ी ही थीं, कि परम मित्र मीता वर्मा जैसे उन्हीं का इन्तज़ार कर रही थीं। दोनों एकदम सगी मित्र। इसलिये दोनों एक दूसरे को देख बच्चों सी प्रसन्न हो गईँ। 

नीरू खेड़ा- तू क्या मेरा ही वेट कर रही थी?

और नहीं तो क्या? मीता ने मुस्कुराते हुए कहा। अच्छा सुन वो जो नया लड़का आया है न, क्या नाम है.... अरे यार क्या नाम है....

नीरू खेड़ा- अरे मनोज.. वही तो आया है, तेरी भूलने की बड़ी बीमारी है, कुछ कर इसका। अब  बता क्या हुआ?

मीता वर्मा- अरे हाँ वही तो मनोज, मुझे तो बिल्कुल नहीं पसंद। अजीब सा लगता है, पता नहीं क्या सोचता रहता है!

नीरू- मुझे भी नहीं पसंद। मुझे तो उसकी शकल ही नहीं पसंद। वैसे तो मुँह बना के बैठा रहेगा और कुछ बात हो तो अचानक से बड़ा खुश हो जाएगा। मैंने तो उसे बोल भी दिया था कि ज़्यादा खुश मत हुआ कर।

मीता- हाँ ठीक किया ...पता नहीं क्या है! सुना है कुछ परेशान है, घर की हालत कुछ ठीक नहीं है, इसीलिये रोता रहता है बैठकर!

नीरू- भाड़ में जाए मेरी तरफ़ से। कल मैंने कहा कि ज़रा मेरी क्लास ले ले, मुझे ज़रा शॉपिंग  पर जाना है, तो साफ़ मना कर दिया! बोला आज मैम ज़रूरी काम है! बताओ है किसी कोंटरेक्ट पर काम करने वाले की इतनी हिम्मत कि मना कर दे! मेरा बस चले तो लात मार के निकाल दूँ इसे।

मीता- रमेश को रखना चाहिये था, पर इसे रख लिया, मैंने तो रमेश का नाम भी भेज दिया था, पर मिसिज़ चन्दानी कह रहीं थीं कि इंटरव्यू बड़ा अच्छा गया था इसका। अच्छा है लड़का, टॉपर है, अपने समय का, लिखता पढ़ता भी है कुछ....

नीरू- एँह...छोड़ो न, मुझे तो एकदम बचकाना लगता है,  कोई उन्हीं का जानकार होगा। फैमिली प्रॉब्लम के नाम पर लगा लिया..हमने कोई अनाथाश्रम थोड़े ही खोला हुआ है कि रख लें किसी को भी...

मीता वर्मा- और क्या?

नीरू खेड़ा-  तू छोड़! ऐसी उतारकर रखेंगे कि दो दिन में ही भाग जाएगा। 

मीता वर्मा- अरे तुझे पता है शनिवार को मिसिज़ चंदानी ने सेमिनार रखा है और सारा काम इसे ही सौंपा है?

नीरू खेड़ा-  हाँ कल कह तो रहीं थीं, देखते हैं क्या करता है, कहते हुए दोनों स्टाफ रुम की ओर चल दीं।

सेमिनार वाला दिन भी आ गया। मनोज अपने भरसक प्रयत्न से इस कार्यक्रम को सफल बनाना चाहता था। आखिर उसका आगे का सफ़र आज के कार्यक्रम पर ही तो तय था। इधर से उधर भाग-दौड़ करता मनोज सोच रहा था कि आज अपने विरोधियों के भी दिल जीत लेगा। उधर विरोधी खेमा इस ताक में था कि कैसे उसे नीचा दिखाए। 

कुछ ही पलों में अतिथि महोदया का आना हुआ। मनोज उनके साथ ही था। उधर प्राचार्या महोदया, वरिष्ठ और अति विशिष्ट अतिथि साहित्यकार के साथ मनोज उन सठियायी महिलाओं को कहाँ रास आने वाला था? अत: मीता वर्मा ने चिढ़ते हुए नीरू खेड़ा से कहा- तू देख रही है, कितने मिजाज़ चढ़ गए हैं इसके... कितना लपर-लपर कर रहा है..

नीरू- हाँ, तू चिंता मत कर, अभी इसकी औकात दिखाती हूँ। चल वहीं चलते हैं। कहते हुए नीरू और मीता अपनी सधी चाल में वहाँ पहुँचीं जहाँ, मनोज समेत बाकी सभी लोग थे। अपनी कुटिल मुस्कान पर सौम्यता का परदा डाले दोनों ने अतिथि महोदया को नमस्कार किया और बहुत सहज भाव से नीरू खेड़ा ने मनोज की ओर इशारा करते हुए कहा- आजकल के बच्चों में इतनी भी तहज़ीब नहीं रह गई है कि पहले बड़े लोगों को मिल लेने दें, बस बिना आगे पीछे देखे चापलूसी में लग जाते हैं।  अतिथि महोदया कुछ कह पातीं कि मीता वर्मा ने चतुराई से दूसरी बात छेड़ दी-  आपकी ये टसर सिल्क की साड़ी बहुत सुंदर है, मेरे पास भी बिल्कुल ऐसी साड़ी  है। टॉपिक अचानक से चेंज!

दोनों अधेड़ औरतें अतिथि महोदया के निकट बैठ गईं थीं। मनोज स्तब्ध था उसे नहीं समझ आ रहा था कि क्या कहे। कुछ समझ पाता, इससे पहले ही नीरू खेड़ा अपने पैर के पास पड़े मटर के दाने की ओर इशारा करके बोलीं- मनोज ये मटर का दाना, मुझे बहुत देर से परेशान कर रहा है, इसे उठाकर बाहर फेंक दो...मनोज स्तम्भित सा, कुछ समझ पाता, इससे पहले ही मीता वर्मा बोलीं-  अरे बेटा, तूने सुना नहीं, फेंक दे न उठाकर। अच्छा लगता है, गैस्ट के सामने गंदा? अतिथि महोदया के चेहरे पर भी एक विस्मय मिश्रित मुस्कान थी।

आत्मा तक अपमान से तर-बतर मनोज ने कांपते हाथों से ज़मीन पर पड़े मटर के दाने को उठाया और अपनी उँगलियों के बीच भींच लिया। 

इस अप्रत्याशित घटना से मनोज का चेहरा तीखी धूप में मुरझाई कोंपल सा हो गया।

उधर अपने शत्रु का बिना हथियार के ही ज्यों काम-तमाम कर दिया हो, उसी प्रसन्नता से दोनों अधेड़ महिलाओं ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुरा दीं।


 


शुक्रवार, 12 मई 2023

कविता बुनते हाइकू





 विनम्रता है

ज़रूरी बहुत ही

तुम्हारे लिये।

तभी तो रौब  

झेलोगे हमारा यूँ

 सदा के लिये।

नहीं हमको

सुहाता है शुरू से 

सुख तुम्हारा।

रहो चुप यूँ

जैसे मिट गया हो

मन बेचारा।

तुम्हारी हँसी 

चुभती है आँखों को

रहो क्लांत ही।

खिलोगे गर

तो मर जाएंगे यूँ

बेवजह ही।

सरल मन 

टूटता बेचैन हो

करे अब क्या?

समझता है

विषैली आत्माओं को

तड़प कर।

समझता है

अंतिम समय ये

   यातनाओं का।   

पिशाची आत्मा

होती सदा से रुग्ण,

कुंठित प्राण।

पिशाची आत्मा

कष्ट देना जानती 

यही सच है।

मगर सच

आखिरी एक यह  

मिटेगा पाप।

जलेंगी आत्मा

बेचैन होकर, जो

कलुषित हैं।

अस्तित्वहीन 

भटकेंगी व्याकुल

चिर-समय।

पश्चाताप में 

जलतीं निरंतर

माँगतीं क्षमा..