सोमवार, 13 मई 2024

कविता




 मैं जब चुपचाप होती हूँ

वो बोलती है

अन्तर्मन के गहरे कपाट खोलती है

वो घूम आती है विश्व

और उसकी परतों की बुनावट

और बे-क़लम ही 

उन्हें उकेर देती है

वो अंदर बहुत अंदर उतर

चेतनाओं को भी सुन आती है

और गढ़ देती है उनके संवाद 

वो तैरती भी है और

हवाओं सी घुल 

पहुँच जाती है हर ओर

वो बरस पड़ती है रेगिस्तानों में छमाछम 

और खिल उठती है 

रुके हुए पानी में भी

वो बहती है आत्माओं में भी

और उभर आती है 

सशरीर

वो बोलती है न जाने कितनी बोलियाँ गुपचुप

और मैं पकड़ती रह जाती हूँ

उनमें छिपी कितनी ही 

अनसुनी ध्वनियाँ 

जो कविता  

 बोलती है

 अनगिनत भाषाओं में...



 

12 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" बुधवार 15 मई 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

आलोक सिन्हा ने कहा…

सुन्दर

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" आज मंगलवार 14 मई 2024 को भी लिंक की गई है ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

Anita ने कहा…

मौन से उपजी कविता वास्तव में बहुत मीठी होती है, सुंदर रचना

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया अनीता जी🌹

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया यशोदा अग्रवाल जी🌹

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया आलोक सिन्हा जी

NITU THAKUR ने कहा…

बहुत खूब 👌

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

बहुत ही उम्दा .

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

Shukriya Nitu Thalur ji

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया दीपक जी🙏

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया यशोदा जी🌹🌹