रविवार, 24 अक्तूबर 2021

जिज्जी


जिज्जी


आजादी से पहले की बात है सन 1939 का समय। उत्तर प्रदेश में बरसाती नदी सुखनई के किनारे बसा एक गाँव। गाँव में अन्य जाति के लोगों की अपेक्षा कोरी जाति के लोगों की संख्या अधिक थी, अतः उस गाँव को कोरियों का गाँव कहा जाता था। वैसे गाँव का असली नाम लुहर गाँव यानी छोटा गाँव था, जिसे बोलचाल की भाषा में सब लोग लौरगुआं कहते थे। 

गाँव अपने नाम के अनुरूप सच में ही छोटा था। कुल 45 घर। जिनमें 36 घर कोरियों के 8 अन्य जातियों के और एक घर एक ब्राह्मणी का था। ब्राह्मणी बाल विधवा थी। जब वो 5 बरस की थीं, तभी उनका ब्याह दस बरस के एक ब्राह्मण पुत्र से हो गया था। गौने से पहले ही पति की मृत्यु की खबर आ गई। अब आठ बरस की उम्र में भला क्या बोध होता है! ईश्वर की कृपा यह रही कि कष्ट और और परिताप उस समय घटा जब उसकी वेदना समझ से परे थी। इसलिए जब सुहाग जाना ही नहीं तो वैधव्य भी कष्टकर नहीं था।

गाँव के लोग ब्राह्मणी को जिज्जी कहते थे। जिज्जी यानी जीजी। ससुराल तो जाना ही न था तो जिज्जी माँ-बाप के साथ मायके में ही रहती थीं। बहुत अरसा हुआ माँ-बाप भी न रहे। एक छोटी बहन थी, जो पास के ही गाँव में ब्याही थी। समय-बखत उसके बाल बच्चे और कभी वो खुद भी जिज्जी के पास आती रहती थी। भगवान की कृपा से वह अपनी गृहस्थी में सुखी थीं  और यहाँ जिज्जी अपनी पुश्तैनी विरासत को संभालतीं थीं। 

पुश्तैनी विरासत में लंबी चौड़ी हवेली भर नहीं थी। पूरा गाँव और गाँव का एक मात्र दिवाला (देवालय) जिसे कोरियों का दिवाला कहा जाता था, भी शामिल था। जिज्जी उस दिवाले की पुजारिन थीं। कहते हैं कि एक बार जिज्जी हमेशा की तरह नदी में नहाने जा रही थीं। तभी उनका पाँव फिसला और जब वो गिरीं तो एक शिला के सहारे संभल पायीं। उस शिला को जब उन्होंने ध्यान से देखा तो वो ढाई हाथ ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा निकली। जिज्जी के कहने से उस प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करा दिया गया। कहते हैं जब से हनुमान जी की प्रतिमा की स्थापना हुई तबसे गाँव में फसल बहुत अच्छी होने लगी और कोई बुरी घटना भी नहीं घटी। इसलिए गाँव भर में हनुमान जी की बड़ी मानता थी और हनुमान बाबा आए थे जिज्जी के कारण इसलिए जिज्जी की मानता भी हनुमान जी से कम न थी। 

जिज्जी के पास 12 गाय और 5 भैंस मिलाकर कुल 17 जानवर भी थे। रोज सुबह जिज्जी दूध दुहकर जानवर ढील देतीं जिन्हें बरेदी कक्का आकर ले जाते थे। गाँव भर के जानवरों के साथ जिज्जी की लायची (भैंस) और पट्टिन (गाय)समेत जब सभी जानवर संझा वेला को लौटकर अपनी निर्दिष्ट जगह पर खड़े हो जाते तो जिज्जी बड़े लाड़ से उनके सिर पर हाथ फेरतीं, दूध दुहतीं और फिर दूध लेने वालों की लाइन लग जाती। हर तीन चार दिन में मठा भी भुमता था। जिज्जी यथासंभव दूध और छाछ में जल मिलाकर बेचतीं। गाँव वाले घिघियाई आवाज में दूध और छाछ में कम पानी मिलाने का आग्रह करते पर न तो जिज्जी टस से मस होतीं और न ही गाँव वाले उनसे दूध लेना छोड़ते। आखिर जिज्जी के सामने कौन कुछ कहता।

गाँव का कोई भी काम जिज्जी के बिना सम्पन्न नहीं होता था। भले ही कितनी देर रुकना पड़ जाए पर जिज्जी के बिना कोई भी काम सधता नहीं था। तीज त्योहार हो या कोई उत्सव या किसी के परिवार में कोई आयोजन जिज्जी हर जगह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहतीं। जिज्जी गाँव के एकमात्र मंदिर की पुजारिन थीं, अतः हर अमावस और पूर्णिमा के दिन उन्हें गाँव के कोरियों से सीधा मिलता। जिसके लिए वो स्वयं कोरियों के हर घर जातीं, उनकी राजी खुशी पूंछतीं और उनके द्वारा दिया गया आटा दाल चावल अपनी पोटली में रख के ले आतीं। महीने में दो बार इतना कुछ मिलने से जिज्जी के पास इतना कुछ हो जाता कि आस पास के गाँव के लोग भी उनसे आटा दाल खरीद कर ले जाते। तो जिज्जी अकेली रहतीं जरूर थीं पर पूरा गाँव ही उनकी गृहस्थी था।

कुछ दिन पहले की ही बात है। गाँव में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी न हुआ था। जिज्जी जब दिवाले से लौट रही थीं तो उन्हें एक कुत्ते ने काट लिया। जिस गाँव में एक पत्ता भी जिज्जी की मर्ज़ी के बिना न हिलता हो, वहाँ ऐसी घटना घट जाए? जिज्जी ने चूहे मारने की दवा मिलाकर बनाई रोटी से उस कुत्ते का तो काम तमाम कर दिया पर वो समझ गईं कि गाँव के दिन अच्छे नहीं रहे। कोई विपदा आफ़त आने की पूरी संभावना है। इस घटना के ठीक 4 दिन बाद ही जिज्जी ने आकाश में जो देखा सो देखतीं ही रह गईं! तीन बड़ी चील गाड़ी आगे पीछे सन्नाटा चीरते हुए निकल गईं थीं। जिज्जी का तो मानो कलेजा बैठ गया। समझ गईं कि संकेत ठीक था। आज से ठीक 18 साल पहले जब ऐसे ही आकाश में चील गाड़ियां निकली थीं, तब कितने लोग मरे थे, कैसा अकाल पड़ा था। भगवान फिर न वो दिन दिखाए।

बिना देर किये जिज्जी ने पंचायत बुलाई और अपना फरमान सुना दिया। फरमान कुछ इस प्रकार था- कि गाँव के बाहर की खाली जमीन के नीचे एक कोठरी बनवाई जाए, जिसमें हर घर का पूरा अनाज रखा जाएगा। कोठरी इतनी बड़ी होनी चाहिए कि बखत जरूरत गाँव के सब लोग उसमें ठहर भी सकें और बाहरी किसी को भनक तक न लगे कि यहाँ क्या है? यह काम जितना जल्दी हो उतना ठीक। 

पंचों की मुखिया तो जिज्जी ही थीं अतः हुकुम की तामील होते देर न लगी। रात दिन एक करके काम शुरू हो गया और हफ्ते भर के अंदर बंकरनुमा कोठरी तैयार हो गई। जिज्जी की सख्त ताकीद थी कि गाँव से कोई आदमी बाहर कदम नहीं रखेगा, फिर चाहे कितनी ही बड़ी बात क्यों न हो। सबने जिज्जी की बात मान ली। पर कोरियों ने हिम्मत करके पूछ ही लिया कि बाकी सब तो ठीक पर हाट बाजार में बुना हुआ कपड़ा नहीं बेचेंगे तो खाएंगे क्या? पहली बार जिज्जी से किसी ने कोई सवाल किया था। इसलिए जिज्जी का बिफरना लाज़मी था। बोलीं- पेट की चिंता मत करो, मैं पाल लूँगी। लेकिन जो कह दिया सो कह दिया। जाहिर सी बात है इतना सुनने के बाद कौन क्या बोलता।

यह पहली बार नहीं था जब जिज्जी का अंदाज सही निकला था। देखते ही देखते चील गाड़ियों का गुजरना और बढ़ गया। गाँव वाले छाती पकड़ के रह गए। सभी को जिज्जी के फरमान का अर्थ समझ आने लगा था। चील गाड़ियां क्या आयीं जैसे काल ही बरस रहा था। ठीक 6 महीने के भीतर ही आस पास के सभी बाजार ठप्प हो गए थे। फसल के लिए बीजों की किल्लत हो गई। आस पास के गाँवों में भुखमरी जैसी हालत थी। गोरे गाँव गाँव से आदमियों को पकड़ पकड़कर ले जा रहे थे। फौज और मिलों में भर्ती के नाम पर उनका खून चूसा जा रहा था। जो जा रहा था, वापिस नहीं आ रहा था। बीज खतम हो जाने से खेती भी बदहाल थी। बेचारे लोग कारखानों में काम करने को विवश थे। अंग्रेजी शासन का सबसे बुरा रूप सामने आ रहा था। हर जगह डर और बेचैनी का माहौल था। देश का माल असबाब तक लूटा जा रहा था। देश में खाने को अन्न नहीं और गाँव गाँव से अनाज इकट्ठा कर सेना के लिए भेजा जा रहा था। सुनने में तो यह भी आ रहा था कि अनाज का आयात सरकार ने पूरी तरह से बंद कर दिया था। लोग भूखों मर रहे थे। आलम यह हो गया था कि सड़े और खराब अन्न के लिए भी लोग मरने मारने पर उतारू हो गए थे। भूख ने जैसे जानवर और इंसान का अंतर मिटा दिया था।

इधर जिज्जी के गाँव की स्थिति सबसे अलग थी। वीरानगी तो यहाँ पर भी थी पर एक अलग किस्म की। आस पास के गाँवों से इस गाँव का संपर्क एकदम बंद था। पिछले छः महीनों से गाँव से किसी ने बाहर कदम न रखा था। पूरा अनाज गाँव में बने बंकर में सुरक्षित था। समय को देखते हुए जिज्जी की सख्त ताकीद थी कि किसी घर में चूल्हा नहीं जलेगा। भोजन का सब इंतजाम बंकर में ही होगा। यह सिलसिला आगे एक साल तक चलता रहा। जिज्जी को छोड़ गाँव भर का खाना बंकर में ही बनता। जिज्जी का तो ऐसा था कि अंग्रेज भी उनका क्या बिगाड़ सकते थे और फिर गाँव की मुखिया तो वही थीं, तो उनका सामने रहना जरूरी था। न रहतीं तो किसी को भी शक होता।

इस बीच तीन बार तहसीलदार के साथ गोरों का भी गाँव में आना हुआ। पूरे गाँव का मुआयना किया गया। घरों, गोदामों को खंगाला गया। पर मजाल कि किसी को अन्न का एक दाना भी मिलता। सब हैरान कि क्या खाकर ऐसे हट्टे कट्टे हो? जवाब मिला शकरकंदी खाकर। कंदमूल खाकर। आखिर जब हाट बाजार तक में बीज नहीं तो कौन सी खेती कौन सा अनाज? बात भी सही थी। अनाज तो सचमुच नहीं था पर उनकी चौड़ी देह देखकर बात सच लगती नहीं थी।

गोरे सिर खुजलाते रह गए। उनके लिए हैरानी की बात यह भी थी कि गाँव में कोई भी युवा नहीं था! सब बुजुर्ग, बूढ़ी औरतें और बच्चे ही थे। बच्चे भी पाँच साल से कम आयु के। अब ये कौन जान सकता था कि जिज्जी ने सबको बंकर में तैनात कर दिया था। जिससे मिल या सेना में भरने के लिए उन्हें कोई युवा मिले ही ना। लगभग तीन वर्षों तक ऐसा माहौल था कि कुछ कहते नहीं बनता। भय का माहौल तो सब जगह था पर जिज्जी के गाँव में भय से अधिक कर्फ्यू जैसा माहौल था। जिज्जी ने बड़ी चतुराई से हर ओर व्याप रहे भय को गाँव का सुरक्षा कवच बना दिया था। यह सब ऐसे हो गया कि आस पास के गाँवों को खबर तक न हुई।

इतना सब हो गया था। जिज्जी के रौब और उनकी दिनचर्या में भला कोई अंतर आना था? रौब जरूर बढ़ गया थाजिज्जी कुछ और महत्वपूर्ण हो गई थीं। पर उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया। नदी जाना, नहाकर वही गीली धोती पहनकर आना। आकर डोर पर टँगी अनछुई धोती पहनकर पहनी हुई, राह चली धोती को फिर से धोना और धोकर डोर पर अगले दिन के लिए बांध देना। फिर दिवाले जाकर पूजा अर्चना करना, हनुमान बाबा को भोग लगाना। घर आकर खाना पका खा कर गाँव में निकल जाना। सब कुछ वैसा का वैसा ही तो रहा। कुछ नहीं बदला। 

हाँ माहौल अब धीरे धीरे शांत हो रहा था। आकाश में अब चील गाड़ियों का निकलना बंद हो गया था। पर आस पास जो मनहूसियत सी पसरी थी, वह कम न हो पाई थी। आलम यह था कि इतने दिन बाद जब कोरियों का कपड़ा बाजार लगा तो कोई खरीददार तक न था। कंगाली की बदतर स्थिति! इतने पर भी गाँव वालों का पक्का विश्वास हो गया था कि यह उनके पुण्य कर्म ही थे जो जिज्जी उनकी मुखिया थीं। नहीं तो इस विपत्ति में क्या वे सब बच पाते? आस पास के गाँवों की बात करें तो अकेला उनका ही गाँव था, जिसमें एक जन भी कम न हुआ था। नहीं तो हर ओर ऐसी स्थिति थी कि कुछ कहते नहीं बनता। लंबे अरसे बाद गाँव का फिर से अन्य गाँवों से मेल जोल बढ़ रहा था। आस पास के गाँवों के लिए यह हैरानी की बात थी कि कोई अनहोनी इस गाँव में कैसे न घटी थी? न तो किसी ने बताया न जिज्जी से किसी के पूछने की हिम्मत पर अंदाज सबको था कि हो न हो ये नद्दी वाले हनुमान बाबा की कृपा है जिनके आशीर्वाद से विकट परिस्थिति में भी गाँव सुरक्षित बच गया था। 


गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

शून्य


 


मां कहते कहते थक जाती कि बेटा कुछ घर का काम भी सीख ले, शादी के बाद काम आएगा। तेरा दूल्हा जो कहेगा कि एक कप चाय बना दे तो तेरा ये गणित का फार्मूला काम नहीं आएगा। पर रूज़ा को कुछ समझ आए तब न। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी जो ठहरी। सबके सब उसके नाज़-नखरे उठाने वाले। मजाल कि किसी ने एक कप भी उसे उठाकर रखने को कहा हो। उल्टे मां जब कुछ कहती तो भैया तक उठ खड़ा होता कि मां तू मुझे बता दे क्या करना है, उसे अपना काम करने दे। मां बेचारी अपना सा मुंह लेकर रह जाती और फिर खीझते हुए कहती-तुम्हीं ने इसे सिर चढ़ा रखा है। कल को ससुराल में सास जब ताना मारेगी तो क्या कर लेगा तू। भाई हंसते हुए कहता-अरी मां तू चिंता क्यों करती है? तेरा बेटा अपनी बहन के लिए ऐसा घर ढूंढेगा जहां सास उसे चाय बना के पिलाएगी।

चल हट। बेशरम। ये संस्कार दे ेभेजेगा तू अपनी बहन को? दुनिया क्या कहेगी मुझे कि कैसी बेटी जनी है जो सास से सेवा कराती है? यही चाहता है तू कि दुनिया मुझे नाम रखे? और तुझे भी कोई बख्श नहीं देगी।बहन तो तेरी ही है वो।

अच्छा ऐसा है तो बहुत अमीर घर में शादी करूंगा उसकी। जहां इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे काम करने की कोई ज़रूरत ही नहीं होगी।

ना इतने अमीर घर में नहीं करनी जहां इतनी माया हो कि इंसान की क़ीमत ही न समझे कोई। रुपये-पैसों और गहने-जेवरों से न तो पेट भरता है और न संस्कार ठहरते हैं। इसलिए ऐसे रईसी घर में तो नहीं करनी।

मां तो ऐसे बात कर रही थी जैसे अभी ही रिश्ता तय हो रहा हो और भैया आकाश भी ऐसी ही तन्मयता से बात कर रहा था जैसे अभी ही रिश्ता तय करने जा रहा हो। पर मां को तो उसकी कोई बात जैसे पसंद ही नहीं आ रही थी। इसलिए चिंतित होकर बोला कि मां अब तू ही बता कि तुझे अपनी बेटी के लिए कैसा दूल्हा चाहिए?

दूल्हा? रूज़ा के लिए? मां के चेहरे पर मुस्कान खिल गई।सांवला चेहरा दमक उठा। माथे की बिंदी जैसे थोड़ी और लाल हो गई और काजल रेखी आंखे ंचंचल हो उठीं। उसने आकाश का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा-बताउं मुझे कैसा दूल्हा चाहिए अपनी रूजा के लिये?

हा न मां बता  न।आकाश ने भीउत्सुक्ता से कहा।

तो सुन। ज़्यादा कुछ नहीं। खूब पढ़ा-लिखा हो। देखने का अच्छा हो। एकदम राजकुमार जैसा। आखि़र हमारी रूजा भी तो सबसे सुंदर है।पर अच्छा संस्कारी भी हो। कुछ खाता-पीता भी न हो। कोई ऐब न हो और सबसे ज़रूरी बात कि तेरे पापा की तरह सरकारी नौकरी करता हो। ये प्राइवेट फ्राइवेट या बिज़नेस वाला नहीं चाहिए।

ठीकहै मां जैसा तू चाहती है, वैसा ही सही। पर एक बात अपनी तरफ से भी जोड़ दूं। मेरी बहन को जो बहुत प्यार करे। इतना कि उसे कोई काम न करने दे।

अबके मां हंस पड़ी। बोली जैसी तेरी मर्ज़ी बेटा। ये तो मुझे पता है कि  जितनी मुझे उसकी चिंता है उससे कहीं ज़्यादा तू उसकी फ़िकर करता है।

मां की बात सुनकर आकाश भावुक हो आया। बोला- मां जब तू जानती है तो क्यों परेशान होती है? जना तूने उसे है पर मेरे लिए भी वो बेटी से कम नहीं है। तू देखना उसके लिए ऐसा दूल्हा ढंूढंूगा कि तेरी आत्मा तृप्त हो जाएगी। उसे जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं आने दूंगा।

मां बेटा दोनों कुछ पल के लिए ऐसे भावुक हो गए जैसे उनकी लाडली रूजा अभी ही विदा हो रही हो।

त्रिपाठी परिवार के चारभाई-बहनो ंमे ंसबसे छोटी थी रूजा। तीन बहनें और एक भाई। भाई तीसरे नंबर का और रूजा चैथे नंबर की। रूजा और आकाश में कोई बहुत लंबा-चौड़ा अंतर नहीं था। बस चार साल। पर दोनों भाई बहन में ऐसा प्यार कि कोई माने ही न कि दोनों तर उपरी के हैं। प्यार तो चारों भाई बहनों में ही ख़ैर खूब था पर सब भाई बहनों का प्यार भी सबसे ज़्यादा रूजा पर ही बरसता था। सबसे छोटी जो थी। उस पर भी सिर चढ़ी अलगसे। मुंह से बात निकली नहीं कि मन चाही चीज़ हाज़िर। शादी लायक हा ेर्गइ थी फिर भी बच्ची ही थी अभी। उसे बड़ा भी किसने होने दिया था। पर रूज़ा भी निरी बुद्धू नहीं थी। स्त्री सुलभ इच्छा-आकांक्षाएं उसके मन में भी पनपने लगी थीं। मां की बात वो सबके सामने तो अनसुना कर देती पर अकेले में अपने मोबाइल पर नए-नए व्यंजन बनाने की खूब विधियां देखती और कई बार तो खाली रसोई मेें घुसकर कुछ-कुछ बनाकर भी ले आती। और तब सब देखते रह जाते कि रूई के फाहे सी नाज़ुक हमारी रूज़ा के अंदर ये सयानी लड़की कहां से आ गई?

इधर रूजा मन ही मन अपनी गृहस्थी संजो रही थी उधर भाई आकाश की नौकरी भी लग गई थी। पर नौकरी लगी भी तो कहां गुजरात। यूपी के एक छोटेगांव से सीधे गुजरात! पिताजी ने तो सख़्त मना कर दिया कि इतनी दूर नौकरी के लिए नहीं जाना। बड़ी डाक्टरी करनी है इन्हें। यहीं क्लिीनिक खोलो और चलाओ मेहनत से। पैसा हम लगाते हैं। पर इससे पहले कि आकाश कुछ कहे मां पिताजी से बोलीं-तुम्हें लगता है कि यहां रहकर अच्छी तरक्की कर सकता है तुम्हारा बेटा? ठीक है सारी सुविधाएं हैं यहां। लेकिन वहां से जो सीखकर आएगा न पूरे गांव का नाम रौशन कर देगा। पत्नी की बात पर पिता चकित होकर बोले-और जो बिना बताए ब्याह लाया तो? ऐसा कर सकता है तुम्हारा बेटा? तुम खुद सोचो। और जो कर भी लिया तो मैं उसके लिए भी तैयार हूं। पर इत्ता पढ़ा-लिखाने के बाद यहां गांव में न पड़ा रहने दूंगी।

पिता ने हिक़ारत भरी नज़रों से पत्नी की ओर देखा और बोले-तू एक बेटे को नहीं पाल सकती। दुनिया चार-चार को रख लेती है। पिता का वात्सल्य जैसे हिलोरें ले रहा था। खुद बैंक मैनेजर, अच्छे-खासे पढ़े-लिखे पर बेटे को इतनी दूर भेजने को मन न मानता था। ऐसा नहीं था कि बेटे के लिए ही ऐसे विह्वल हो रहे थे, बेटियों के लिए भी उनका कलेजा ऐसा ही लरजता था। दोनों बेटियों की जब विदा हुई तो ऐसे फूट-फूटकर रोए कि मां और अम्मा को समझाना पड़ा। मर्द होकर भी बड़े कच्चे कलेजे के हैं पिताजी। तो ऐसे में कुछ कठोर होना मां की ज़िम्मेदारी भी थी और मजबूरी भी। अगर वो कठोर न बनतीं तो न तो उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई-लिखाई कर पाते और न ही उनका लाडला डाक्टर बन पाता। ये सब हुआ तो मां की ही बदौलत। पिताजी भी यह बात समझते थे इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बोले। बस इतना ज़रूर कहा- चाहे जितने बिज़ी क्यों न हो दिन में तीन बार बात ज़रूर करोगे।

जी कहते हुए आकाश ने मुस्कुराकर मां की ओर देखा और पिताजी के पांव छू लिये।

आकाश को गुजरात गए सात महिने हो गए थे। इस बीच वह दो बार गांव भी आया था। एक बार दस दिन की छुट्टी पर और एक बार आठ दिन के लिए। वहां भी जब भी उसे समय मिलता फोन तो कर ही लेता। ऐसे ही एक दिन रात को दस बजे आकाश का फोन आया। उसने मोबाइल पर एक फेाटो भेजी थी। मां और पिताजी दोनों फोन से चिपक कर बैठ गए थे और उनकी आंखें जैसे फोन की स्क्रीन पर चिपक गई थीं। और भला क्यों न चिपकतीं? बात ही कुछ ऐसी थी। आकाश ने अपनी प्यारी बहन रूजा के लिए एक लड़के की तस्वीर जा े भेजी थी। लड़का बड़ा संुदर। हाईट भी बहुत अच्छी छह फुट दो इंच। रूजा के हिसाब से एकदम सही। वो भी तो पांच फुट आठ इंच की है। किसी माॅडल से कम नहीं लगती। और नौकरी? माता पिता की सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा। पर आकाश ने जैसे हीरा ही खोज लिया था बहन के लिए। बोला-लड़का रेलवे में इंजीनियर है। कोई किसी तरह का ऐब नहीं है। परिवार भी अच्छा है। इसका बड़ा भाई यहीं मेरे साथ डाॅक्टर है। चार जनों का छोटा परिवार है। दो भाई और मम्मी.पापा। अभी जनवरी में भाई की शादी हो गई है अब इसकी करनी है।

अब दूसरा प्रश्न पिता की ओर से-मांग क्या है? 20 लाख से कम तो क्या ही होगी? नहीं पापा ऐसा कुछ नहीं है। मैंने सब पता कर लिया है। उन्हें लड़की पढ़ी-लिखी चाहिए और कुछ नहीं। चाय न भी बनानी आती हो तो कोई बात नहीं पर पढ़ी-लिखी होनी चाहिए। बिल्कुल हमारी रूज़ा जैसी। पिता ने कहा- रूजा की फोटो भेज दे उन्हें फिर। पापा उन्होंने रूजा की फोटो देख ली है और उसे पसंद भी कर लिया है। बस अब देखने आना चाहते हैं। आप चाहो तो लड़के से मिल लो वो अभी अपने बगल के गांव में ही है। वहां उसकी बुआ रहती हैं।

हैं? कहां पर? पिता ने आश्चर्य से पूछा। निवाड़ी में। पिताजी हतप्रभ से रह गए। पत्नी की ओर देखकर बोले-तुम्हारे बेटे ने तो बहन का दूल्हा भी बगल में ही खोज लिया। आकाश फोन पर मुस्कुरा उठा। अबकी मां बोलीं-बेटा दो-चार दिन की छुट्टी लेकर घर आ जाओ फिर तुम दोनों लड़का देख आओ। इनके अकेले के बस की बात नहीं है।

ठीक है मां मैं जल्दी ही आता हूं। लड़के का नाम नीरज है वह भी 5 दिन है वहां पर उससे बात करके समय तय कर लेता हूं और फिर आपको बताता हूं।

जैसा फोटो में देखा था लड़का उससे कहीं जादा सुंदर और स्मार्ट। बस फिर क्या था शादी की तारीख भी तय होगई। और देखते ही देखते रूजा दुल्हन बन गई। धूमधाम से शादी हुई। मांग नहीं थी पर भाई और घर भर की लाडली जो ठहरी। इतना दान दहेज दिया कि ससुरालवालों का तो कहना ही क्या रिश्तेदारों और अगल बगल वालों की भी आंखें फटी की फटी रह गईं। रूजा मना करती। क्या करते हो भैया पूरा घर ही खाली कर दोगे क्या? मेरी भाभी का स्वागत क्या सूने घर से करोगे? उसकी तू चिंता मत कर। सब अपनी किस्मत लेकर आते हैं और मैं हूं न सब कर लूंगा। तू बस अपनी नई जिंदगी पर ध्यान दे। और हां मैंने नीरज को कह दिया है कि मेरी बहन का वैसे ही ध्यान रखना जैसे पलकें आंखों का।

रूजा अपने दूल्हे के साथ विदा हो गई। जाते समय अपने भैया से बोली भैया आप मेरी चिंता मत करना। आपके आशीर्वाद से मुझे कभी कोई कष्ट नहीं होगा। आप अपना और मम्मी पापा का खूब ध्यान रखना। बहन की बात सुनकर उसका भाई तो देखता ही रह गया। कैसे उसकी छुटकी अचानक से इतनी बड़ी हो गई! समझ और अक्कल के घोड़े जिसकी बगल से भी कभी न गुज़रे थे वो अचानक से इतनी सयानी कैसे हो गई? आकाश समझने की कोशिश कर रहा था कि रूजा में इस परिवर्तन से वही हैरान है या मां पापा भी। पर नहीं उसके जैसा हैरान कोई भी नहीं था।

मां इसलिए हैरान नहीं थी क्योंकि वह समझती थी कि एक लड़की चाहे जितनी भी पढ़ लिख क्यों न जाए, अपनी गृहस्थी बसाकर ही पूर्ण अनुभव करती है और फिर रूजा ने भी तो गृहस्थियां बनती देखी हैं। अपनी दोनों बहनों की। और रिश्तेदारियों में भी। तो भला कब तक उसके अंदर नारीत्व नहीं जागता। यूं भी आकाश के जाने के बाद वो मां के साथ रसोई में हाथ बटाया करती। घर के काम-काजकरती। जैसे अपने आपको स्त्रीत्व की टे्रनिंग दे रही हो। रही बात पापा की तो उनके लिए तो रूजा का जाना चहकते घर का चुप हो जाना था। दोनों बेटियों की शादी हो गई तो आकाश और रूजा घर में थे। घर इतना खाली नहीं लगा। फिर आकाश के भी गुजरात जाने के बाद रूजा से घर में चहल-पहल थी। पर अब उसके भी चले जाने से इतने बड़े घर में दो अकेले जीव कैसे रहेंगे? यह सोच के ही उनका जी दुखता था। उनका बस चले तो अपने कलेजे के टुकडे को कभी दूर न करें। पर बेटी को आखिर कब तक घर में बिठाया जा सकता है? एक न एक दिन तो उसे विदा करना ही होता है। सो जा रही है और अच्छे घर जा रही है सोचकर अपने मन को उन्होंने समझा लिया था। पर न समझा पाते अगर आकाश जैसे बेटे के मज़बूत कंधों का सहारा उन्हें न मिला होता। आखिर शादी में सबकुछ आकाश ने ही तो किया था। उसने अपनी तरफ से कोइ कसर नहीं छोड़ी थी। पिता पर कोई बोझ न पड़े इसलिए सब अपने कंधों पर संभाल कर किया। मन में एक सुकून भी था कि बहन के लिए जैसा वर चाहिए थाए सो मिल गया।लड़का था भी बहुत अच्छा। सब कुछ बहुत बढ़िया। सब प्रसन्न सब बहुत खुश।

सबने चैन की सांस ली कि चलो बेटी अच्छे घर पहुंच गई। इधर अभी सालभर ही हुआ था कि रूजा के मां बनने की खबर आ गई। सब बहुत खुश। इधर भाई आकाश की भी शादी पक्की हो गई और फिर क्या था इधर चांद सी भाभी का रूजा ने स्वागत किया पर शायद खुद रूजा के नसीब में अभी खुशी नहीं लिखी थी। आठवें महिने में ही गर्भपात हो गया। रूजा के प्राण जाते जाते बचे। सबने बड़ी मुश्किलों और मिन्नतों से रूजा को संभाला ही था कि नीरज की तबियत खराब। गाॅल ब्लेडर की पथरी और पथरी का दर्द कोई बताने की चीज़ है? जिसे होता है सो जानता है। पर ठीक कैसे हो जबतक पथरी निकले न। पर रूजा की सास को कौन समझाए। कहतीं इत्ते बड़े शरीर में दो एक कंकड पत्थरों से शरीर नहीं गलता। नहीं कराना आपरेसन। बेचारा मातृभक्त नीरज मां की बात सुनकर रह जाता। हालत तब खराब हो गई जब आयुर्वेद की दवाओं और दर्द निवारक दवाओं ने भी काम करना बंद कर दिया। अकेली रूजा क्या करती फौरन भाई से कहकर इलाज का इंतजाम किया। पर ये क्या होगया? कैंसर! नहीं।

देखते ही देखते रूजा की दुनिया उजड़ गई। शादी की तीसरी सालगिरह से पांच दिन पहले ही नीरज चल बसा और नियति तो देखिए यह सब हुआ उसी अस्पताल में जहां उसका अपना भाई डाॅक्टर था।

रूजा जैसे पत्थर की घिसी हुई मूरत। पति को बचाते बचाते खुद को भूल गई। पर जिसे बचना ही नहीं था वो कैसे बचता। न चाहते हुए भी बच गई तो अकेली रूजा। भाई आकाश को नहीं समझ आ रहा था कि क्या करे। कैसे रूजाको समझाए? या खुदको समझाए। ये वही तो था जिसने मां से कहा था कि अपनी रूजा को कभी कष्ट नहीं होने देगा। पर अब क्या करे? सब उसी ने तो किया था। लड़का भी तो उसी ने ही ढूँढा था। अब किसे क्या समझाए? मां बाप तो विक्षिप्त के समान हो गए थे। आंखों में ढेरों समुंदर भरे रूजा उनकी आंखों के सामने थी पर किंकत्र्तवयविमूढ और नियति के सामने बेबस आकाश आज पहली बार अपनी रूजा को उसकी सबसे प्यारी चीज़ नहीं लौटा पाया।

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

गुड़िया मिल गई


 


 

पापा मैं भी आपकी तरह खूब पढ़ाई करूंगी।

अच्छा?

क्या बनोगी पढ़-लिखकर?

बहुत बड़ी अफसर बनूँगी।

बहुत बड़ी? कितनी बड़ी?

इतनी बड़ी... छोटी लड़की ने अपने दोनों हाथ फैलाते हुए कहा- इतनी बड़ी।

इतनी बड़ी हो जाओगी तो मैं तुम्हें गोद में कैसे उठाऊँगा?

नहीं पापा मैं इतनी बड़ी हो जाऊँगी कि आपको गोद में उठा लूँगी।

अच्छा??? कहते हुए पिता ठहाका लगा कर हंस पड़े और उन्होंने बेटी को अपने कंधों पर बिठा लिया।

इतना लाड़ करोगे, तो जब अफ़सरी की पढ़ाई करने तुमसे दूर जाएगी तो कैसे रह पाओगे इसके बिना, पत्नी ने टोकते हुए कहा।

जब जाएगी तब जाएगी। अभी तो खेल लेने दो मुझे, पिता ने झूमते हुए कहा।

पत्नी ने दुलार से कहा -मैं कब मना कर रही हूँ, फिर जैसे कुछ याद करते हुए बोली- अच्छा सुनो- बाबूजी की चिट्ठी आई है। कृष्णा के बेटे का नामकरण है।

ठीक है चले चलेंगे। कार्यक्रम कब का है?

आज से चौथे दिन।

ठीक है। चलो इस बहाने हमारी गुड़िया से भी मिल लेंगे सब लोग।

मैं नहीं ले जाना चाहती गुड़िया को। पाँच साल हो गए कोई देखने तक नहीं आया। किसी को यह तक नहीं लगा कि ठीक है बेटी है तो क्या हुआ, है तो उन्हीं का खून।

अब ये सब बातें मत करो। मुझे लगता है हम तीनों को ही चलना चाहिए।

दादा दादी हैं, देखना, अपनी गोद से उतारेंगे ही नहीं गुड़िया को।

आपके माता पिता हैं, इसलिए मैं भी उनका बहुत सम्मान करती हूँ। पर अपनी बेटी के लिए उनकी ये बेरुखी मेरा बहुत दिल दुखाती है, पत्नी ने उदास होते हुए कहा।

ऐसा नहीं है। बहुत सी बातें होतीं हैं, तुम तो बस एक बात पकड़ के बैठ जाती हो। वैसे भी तुम्हारे घर से कितनी बार पूछ लिया गुड़िया के बारे में? तुम्हारी माँ तो मुंह पर बोल गई थी कि चलो सब अच्छा है पर बेटा होता तो और ज्यादा खुशी होती...

उनकी बात छोड़ो। सबकी सोच इतनी जल्दी नहीं बदलती, पर वो गुड़िया को बहुत चाहती हैं और ये आप भी जानते हो।

वही मैं कह रहा हूँ कि हर बात पर दिमाग खराब करने की जरूरत नहीं होती। मेरे लिए मेरी बेटी सबकुछ है, वो मेरी जिम्मेदारी है और मेरा सबकुछ है। कोई क्या सोचता है, क्या कहता है, मुझे उससे कोई मतलब नहीं।

पत्नी के पास कोई उत्तर नहीं था।

तीसरे दिन वे तीनों गाँव में थे। अनीता की देवरानी के चेहरे का गर्व देखते ही बनता था। आखिर बेटे को जो जन्म दिया था। सासु माँ भी पोते को देख वारी जा रही थीं। गुड़िया भी अपनी भाई के पास ही बैठी थी। वह बार बार उसे छूने की कोशिश करती पर चाची उसका हाथ छिटक देती। एक बार तो दादी ने भी बरजते हुए कहा- अरे क्या कर रही है, जब थोड़ा बड़ा हो जाएगा न, तब खेल लियो उसके साथ, अभी रहने दे।

गुड़िया बेचारी मुंह बना कर रह गई। कोई उसे प्यार ही नहीं कर रहा था। ठीक से बात तक नहीं कर रहा था। पर उपेक्षा-अपमान से बेपरवाह बाल मन को शांत होना कहाँ आता है अतः कुछ क्षण चुप रहने के बाद वो फिर बोली- अच्छा मैं भाई के खिलौने देख लूँ?

अरे नहीं, टूट जायेगे। तेरे खेलने के नहीं हैं, छोटे बच्चों के हैं। तू जा, जाके अपनी माँ का हाथ बँटा।

गुड़िया ने इधर-उधर देखने के बाद कहा- माँ कहाँ हैं?

अब की दादी ने झिड़कते हुए कहा- कितना बोलती है... सुरेश तू क्या खिलाता है अपनी बेटी को कितना बोलती है, चुप ही नहीं होती।

सुरेश हँसते हुए बोला- माँ लगता है तूने ही इसे अपना जूठा खिला दिया है, तभी तो तेरी ही तरह बात कर रही है..

चल हट, बाप बेटी दोनों एक जैसे... दादी ने खीझते हुए कहा।

इतने में गुड़िया अपनी माँ को ढूँढने निकल चुकी थी।

नामकरण संस्कार विधि विधान से पूरा हो गया था। बाहरी लोगों का खाना पीना हो रहा था तभी अनीता ने इशारे से पति को बुलाकर कहा कि गुड़िया को खाना खिला दो।

ठीक है। पर है कहाँ गुड़िया?

है कहाँ मतलब?  वहीं तो थी, तुम्हारे साथ।

मेरे साथ? पर माँ ने तो उसे तुम्हारे पास भेजा था?

कब भेजा? यहाँ तो आई नहीं, फिर कहाँ गई?  अनीता और सुरेश का चेहरा सफेद पड़ गया। पूरे घर में भगदड़ मच गई। हर जगह गुड़िया गुड़िया की पुकार, गुड़िया की तलाश। पर गुड़िया कहीं नहीं थी।

अनीता का रो रोकर बुरा हाल था, बार बार पति से कह रही थी कि सब तुम्हारी वजह से हुआ। क्यों लाए यहाँ जब ध्यान नहीं रख सकते थे, मैं रसोई में काम कर रही थी, पता होता कि तुम ध्यान नहीं रख पाओगे तो कभी न छोड़ती तुम्हारे पास।

सुरेश के पास सिवाय आंसुओं के कोई जवाब न था।

पुलिस में रिपोर्ट करा दी गई। तीन दिन बीत गए। घर में मातम जैसा माहौल। इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई- पुलिस के एक आदमी ने इशारे से सुरेश को बुलाकर कुछ कहा और सुरेश बदहवास सा उसके साथ चल पड़ा।

घर के पीछे एक पाँच साल की लड़की की खून से लथपथ लाश मिली थी। लाश को देखकर साफ था कि उसके साथ बीभत्स घटना को अंजाम दिया गया था और बाद में उसकी हत्या कर दी गई थी, अफसोस ...... गुड़िया मिल गई थी...