गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

मन मंजूषा


मैंने देखा है कि वो व्यक्ति किस क़दर अपनी पत्नी की सेवा करता है. उसकी आँखों से सोता और जागता है, उसके लिए अपने तथाकथित परिजनों से भी उसने रार मोल ले ली, कितनों ने क्या क्या नहीं कहा? बीवी के इशारों पे नाचने वाला, बीवी का गुलाम, बीवी के दो आंसू क्या टपक पड़े कि कलेजा निकाल के रख दिया. ऐसा कहीं होता है क्या? इस प्रुरुष वर्चस्ववादी समाज में भला कोई पुरुष कैसे इस बात को हज्म कर सकता है  कि कोई पुरुष बीवी का गुलाम होकर रह जाए, ठीक है........ मगर ऐसा भी क्या......
मगर ऐसा है. ...माँ ने बताया था कि तुम्हारे सबसे छोटे मामा ने लवमेरिज की थी, बड़ी मामी की सबसे छोटी बहन को बचपन से ही चाहते थे तुम्हारे मामा. वर्ना सोचो, घर में किसी की इतनी हिम्मत कि अपनी पसंद के बारे में खुद तुम्हारे नाना से कह सके, मगर कहा इस नीरव ने. हम सब तो हैरान थे. मगर बात मान ली सबने, लड़की सबको जानी समझी लगी. और बुरा भी क्या है, घर परिवार सब देखा हुआ, उम्र भी ठीक बस ६ महीने का फरक. बस हो गई शादी और देखो अब सुख से हैं.
सुख!! वाकई वह सब सुख ही तो था, मुझे याद है जब मामी शादी के बाद नानाजी के घर आईं थीं, हम सब वहीं थे, और मुझे बहुत तेज़ बुखार था. माँ कुछ खाने की मिन्नतें कर के थक गईं थी और फिर उन्होंने इन्हीं मामी से कहा था, अर्चना अब तुम्ही खिलाओ अपनी जिद्दी भांजी को खाना, दवाएं बहुत गरम हैं, खाली पेट  नहीं दी जा सकती, और तब मामी उठ कर मेरे पास आईं थी. खुबसूरत लाल लहंगे में ढंकी, ढेरों गहनों से सजी मामी को देखकर एक बार तो में चौंक गई थी, मन में सवाल उठा था कि दादी जो परी की कहानी सुनाती हैं, वो परी ज़्यादा सुन्दर है या मेरी नई मामी! कुछ क्षणों के लिए जैसे बुखार-वुखार सब ग़ायब....उन्होंने प्यार से मुझे गोद में उठाया और बोली- निक्की तुमने मेरी गृहस्थी तो देखी नहीं है, आओ तुम्हें दिखाती हूँ...
मैंने कहा था- गृहस्थी माने, और मामी ने मुझे कंधे से लगाते हुए कहा था, आओ तो सही....
मामी मुझे अपने कमरे में ले गईं थी, जहां उनका ढेर सा सामान रखा था. उनकी कई सारी जडाऊ साड़ियाँ, गहने बिस्तर पर रखे थे, एक और बहुत सारे बर्तन और रसोई का सामान भी रखा था,  सारे सामान की और हाथ से इशारा करके उन्होंने कहा था, यही तो है गृहस्थी. पता है मैं हमेशा से यही गृहस्थी चाहती थी, यही घर, यही कमरा और यही निक्की....कहकर उन्होंने मेरे माथे को चूमा था,  फिर बोली, पता है मुझे बहुत भूख लगी है, चलो दोनों मिलकर खाते है, कहकर उन्होंने बगल में रखी मिठाई की प्लेट उठाई और उसमे रखा बड़ा सा रसगुल्ला मेरे मुंह में घुसा दिया, यकीनन उस रसगुल्ले का स्वाद अब तक जैसे मुंह में है. मिठाई के नाम से नाक-भौं सिकोड़ने वाली मैं, उसदिन नई मामी के हाथों न जाने कितनी मिठाई खा गई थी. बेहद शरीफ और अच्छे बच्चों की तरह दवाई भी खा ली थी. पता नहीं मामी ने कब सुला दिया था, सुबह उठी तो बुखार छूमंतर था...
इन नई मामी का जादू हम बच्चों के सर चढ़ कर बोलता था. और यह देखकर मामा जी अति प्रसन्न होते थे, मामी की तारीफ़ सुनकर मुस्कराहट उनके चेहरे पर खिल उठती थी. जैसे उन्हें फक्र होता था अपनी पसंद पर.  भैया लड़ता था मम्मी पापा, नानाजी मामाजी सबसे, बात ही ऐसी थी, कि उसकी शादी क्यों नहीं कराई, आखिर वो भी तो बड़ा है, lkg और kg पार करके सीधे पहली क्लास में आ गया है, फिर भी नहीं कराई, ऐसा क्यों, मुद्दा गंभीर था, अंत में निर्णय हुआ था कि ठीक है शादी करा दी जायेगी मगर लड़की कहा से लायें, तो भैया बोला था- मैं तो मामी से शादी करूंगा, सुनकर सब हँस पड़े थे, और मामाजी, उनके चेहरे पर वही अकलुषित हंसी खिल गई थी..
वक़्त बीतता गया, नई मामी थोड़ी से पुरानी हो गईं, अब उनके साथ उनके तीन प्यारे बच्चे भी थे, तीनों बड़े शैतान. हम उन्हें खिलाते थे कभी गाल खींचकर कभी थोड़ा सा रुला कर, कभी चॉकलेट देकर तो कभी, आईसक्रीम देकर.पर तब अक्सर महसूस होता था कि मामा जी का प्यार हमारे लिए थोड़ा कम हो गया है, शायद वो हमसे ज़्यादा अपने बच्चों को चाहते हैं. और वो जब आते हैं तो मम्मी के लिए कितना काम बढ़ जाता है. मामी मम्मी की मदद क्यों नहीं कराती हैं और मामाजी कुछ कहते क्यों नहीं हैं मामी से, ..हालांकि यह सोचना ग़लत था, पर यह ख़याल मेरे दिमाग में आता था. लगता था मामाजी थोड़े से बदल गए हैं. वैसे पता नहीं कौन बदला था, मैं, मामाजी, या फिर वक़्त. कुछ बदला तो ज़रूर था.
वाकई बहुत कुछ बदला था, वक़्त भी बदल गया था, मैं भी बदल गई थी, पर मामाजी............कुछ कह नहीं सकती....
मैं तो बदली थी, बचपन के गुस्से का स्थान तर्क ने ले लिया था. दिमाग बेवजह सवाल करता था. जैसे- लड़कों को काम करने की शिक्षा क्यों नहीं दी जाती? चाय बनाने के लिए लड़कों से क्यों नहीं कहा जाता? इन सवालों का मुझे कोई युक्ति संगत जवाब नहीं मिलता था. उस पर भी जब माँ को दिन भर काम करते देखती तो अंदर से आग सी लगती कि माँ ही सारा काम क्यों करें, सब उन्हीं को क्यों आवाज़ लगाते हैं? पर मेरे प्रश्न हमेशा से ही सबको अनर्गल लगे, शायद थे भी क्योंकि इन सवालों को जायज़ क़रार तब तो कोई बिलकुल ही नहीं देता था, और अब जायज़ क़रार देगा क्यों? (आखिर सत्ता की राजनीति से परे सब अनीति जो है! खैर...) माँ पिसती रहती और मैं दांत पीसती रहती. पर सवाल अनसुलझे नहीं रहते उनका जन्म ही सुलझने के लिए होता है........

क्रमशः