रविवार, 28 अप्रैल 2013

उफ़ !! कब तक पैदा होती रहेंगी बेटियां इस पुरुषवादी समाज में 
जहाँ उसके बाप की टोपी उसके जनमते ही गिर जाती है 
और 
झुक जाता है उसका सर पुरुषवादी विचारों के तले 
उफ़ कब तक जीने की हिमाक़त करती रहेंगी बेटियां इस मर्दाने समाज में 
जहाँ जब जी चाहे कुचल दी जाती है उसकी जुबां पुरुषवादी रिवाजों के नीचे 
और मसल दिया जाता है उसका कोमल मन पुरुष के कट्टर, स्वार्थी अहम् के तले 
उफ़ कब तक आखिर कब तक---- 
तथाकथित इज्ज़त के प्रपंच में जकड़ी जाती रहेंगी बेटियां और
पुरुशिया रिवाजों में खुद को खोने पर मजबूर होती रहेंगी बेटियाँ
कब तक आखिर कब तक बलात्कार सह कर भी
जीने की नाकाम कोशिश करती रहेंगी बेटियां
जब कि वो जान चुकी हैं भले से कि
इस समाज में अपने आप को सहेज कर बने रहना अब मुश्किल हो गया है
और अब वो जी ही नहीं सकती इस तरहा खुद को रौंदे जाते देखकर
तो इसलिए..
कहीं बेहतर है कि इस दलदल को धता कर
पैदा होने से ही इनकार कर दें बेटियां
और पैदा हो भी गईं तो जीने से इनकार कर दें बेटियां ......