मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

फागुन और ज़िंदगी

 




जब आती है झमकती फागुन

खिंच जाता है चित्र सा निगाहों में

पीली सरसों में जब धरती खिलखिलाती है

रूई के फाहों से सजा आकाश जब मुस्कुराता है

सुनहरे गेहूं की खुशबू जब किसान की आँखों में चमकती है

और

नई दुल्हन सी सजी धरती जब गुलाल और अबीर से सँवरती है

तब तब हर बार लगता है जैसे

हर कठोर चीज़ पिघल गई हो

फिर चाहे वो दिल हो या पत्थर

और क्योंकि

पिघल चुकी है हर बुरी और कठोर चीज़ 

इसलिए अब नहीं होंगे आँसू

नहीं होंगे मुरझाए चेहरे

हर ओर पीली सरसों जैसी खिली होगी मुस्कान

पर

इस स्वप्निल चित्र से

जगा देता है मुझे कोई

कि ज़िंदगी ऋतु नहीं है

बल्कि वो तो है

तमाम ऋतुओं की पनाहगाह 

जिसमें ठहरी हैं

स्याह, सफेद, ज़र्द, लाल, सुनहरी और न जाने कितनी ही ऋतुएँ

 जिन्हें

 पूरे दम से जिवाना ज़िंदगी की ज़िद है

 तब एहसास होता है और पाती हूँ कि

फागुन बस एक ऋतु नहीं

ज़िंदगी की replika है

जो रंगों में गहरे उतर कर

सिखाती है ज़िंदगी जीना

पूरे दम से, पूरे रंग से...

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

यथार्थ

  • सुना था, 
  • प्रेम, सौंदर्य, सद्भावनाएँ
  • शुभाशीष हैं प्रभु की
  • पर दुर्गंध की तरह पसरी रहतीं हैं
  • ईर्ष्याएँ, दुर्भावनाएँ, कुदृष्टि, और अकर्मण्यताएँ 
  • लालच और खूंखार लालसाएंँ हर जगह!
  • और इन सबको साधतीं, सहारा देतीं स्वार्थ और कुतर्क की बैसाखियाँ!
  • कोमल भावनाएँ कब तक रहें जीवित
  • जबकि उनका स्थान रह गया है सिर्फ किताबों या उपदेश में,
  • या कि वो अब नहीं रहीं प्रासंगिक
  • बीते ज़माने की घिस चुकी वस्तुओं की तरह
  • और त्याग दी गईं हैं हटात ही
  • या कि वो खुद ही छुप गईँ हैं किसी खोह में!
  • क्योंकि दुर्गंध में वो ठहरतीं ही कहाँ हैं
  • और लड़ना, कुछ सिद्ध करना, फ़िज़ूल के तर्क से अपनी जगह बनाना, खुद को ज़रूरी साबित करना उन्हें आता ही कहाँ है!
  • सोचती हूँ उनसे मुलाक़ात यदि स्वप्न नहीं
  • तो किसी और सृष्टि या किसी और जन्म की बात है


 

बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

दौड़




 दूर तक घिसटती जाती है देह

भागते, दौड़ते मन के पीछे

टक टक टक गिनती 

गिनता रहता है जादूगर 

देह के लड़खड़ाते क़दमों की

टूटी थकी देह सुस्ता लेना चाहती है

पल-दो पल, घड़ी-दो-घड़ी

रोक लेना चाहती है वो

टक टक की चाबुक

पर नहीं कर पाती कुछ

बेचैन, भागता, 

न जाने क्या खोजता मन 

नहीं समझता देह का दर्द

और  घसीटता जाता है, पूरी बेरुखी से

अनंत की ओर

आह!

मन और देह का अलगाव शायद

इस सृष्टि की सबसे बुरी घटना है..


 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

फागुन

 



पलाशी हवा है

खिली धूप महकी

धरा इंद्रधनुषी सुहानी हुई है

लदी डाल बॉरें सुनहरा है गेहूँ

सरसों सजीली धरा हो चली है

लदे फूल टेसू, खिले बाग उपवन

अल्हड़ महकती हवा हो चली है

चहक पक्षियों की महक कोपलों की

भँवर तितलियों की कहानी हुई है

नए सौम्य रंग है, नया नील अम्बर

मौसम में रस की फुहारी पड़ी है

नए वृक्ष पौधे, नए गुल्म कलियाँ

हरेक जीव जन में कहानी घुली है

अल्हड़ हँसी है, चंचल निगाहें,

होठों पे मोहक शरारत छिपी है

हर इक मन है प्रेमी हर इक मन कवि है

दिलों में मुहब्बत सुहानी हुई है

वही कृष्ण राधा, वही कृष्ण गोपी

उसी प्रेम में ज़िंदगानी घुली है

रंगीला है तन मन, रंगीली है दुनिया

फागुन ने बदली कहानी हुई है

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

ग्रीन टी





चाय पीनी है? पत्नी ने पति से पूछा। 
अरे तुम भी सठिया गई हो पूरी!... चार बज गए हैं, रोज़ पीता हूँ तो आज क्यों तुम्हारे दूध, पत्ती और चीनी की बचत करूँगा? बोलो तो?
आ हा हा... कितना मीठा बोलते हो तुम! कहाँ से लाते हो इतनी मिठास? पत्नी ने चिढ़ते हुए कहा।
तुम्हारी चाय का ही तो असर है, पति ने हँसते हुए कहा। 
अच्छा? क्या कहने...इतना ही है तो बना लो खुद! पति का जवाब आ पाता कि इतने में पास बैठी पोती बोली- अरे लड़ाई बंद करो मैं बनाती हूँ चाय।
हां बेटा तू बना दे, तेरी दादी तो बहुत झगड़ती है मुझसे। बना दे बढ़िया सी चाय..और हाँ बस मेरे लिये ही बनाना अपनी झगड़ालू दादी के लिये मत बनाना।
हाँ-हाँ नहीं पीनी मुझे, बेटा बना दे अपने झगड़ालू दादाजी के लिये।
ओह हो लड़ाई बंद करो आप दोनों। दादाजी मैं ऐसी चाय बनाऊँगी कि आप दादी की चाय भूल जाओगी कहते हुए कुछ ही क्षणों में पोती रसोई में थी। 
दादी- ग्रीन टी कहाँ रखी है?
ग्रीन टी का नाम सुनते ही दादा जी के माथे पर शिकन आ गई। पत्नी की ओर देखा, वो मुँह पर हाथ रखे मुस्कुरा रही थी। आखिर जानती थी कि पतिदेव को ग्रीन टी ज़रा नहीं भाती, पर बेचारे पत्नी पर चाहे जितनी धौंस जमा लें, पोती का दिल नहीं तोड़ सकते।
पत्नी आँखों-आँखों में पति के खूब मज़े ले रही थी कि पोती फिर चिल्लाई- दादी ग्रीन टी .....
बेटा वहीं सामने रखी है
इतने में दादाजी बोले- बेटा क्यों परेशान हो रही है, मैं तो तेरी दादी को यूँ ही कह रहा था..सेहत के लिये चाय अच्छी नहीं होती, मुझे चाय पीनी नहीं है..
अब क्यों नहीं पीनी? बना दे बेटा। दादी मुस्कुराते हुए बोली।
हाँ दादाजी, अभी तो कह रहे थे आप? और मैं तो ग्रीन टी बना रही हूँ, वो हैल्थ के लिये बहुत अच्छी होती है...
हाँ, वो पी लेंगे बेटा, तू बना दे, पत्नी ने पोती से कहा। उधर पति ने खिसियायी नज़र से पत्नी की ओर देखा कि कहाँ फँसा रही हो भाग्यवान!
कुछ ही क्षणों में चाय बनकर तैयार थी। दादाजी ने एक घूँट पिया कि पोती चिल्लाई- कैसी बनी है, दादाजी?
पति ने कड़वी दवा पी हुई शक़्ल से पत्नी को देखा फिर दबी सी आवाज़ में पोती से बोले- बहुत अच्छी है बेटा।
पोती नाच उठी। बोली- अब तो रोज़ मैं ही आपके लिये चाय बनाऊँगी। दादाजी बेचारे सकपका कर रह गए यह सब देख दादी अब खुद को और न रोक सकीं और ज़ोर से हँस पड़ीं।