मंगलवार, 22 नवंबर 2022

एक टुकड़ा दिन




 एक आस भी 

 पूरी जी नहीं पाती

और बीत जाता है!

 लाख बचाती हूँ

पर नहीं बचता

एक पूरी सांस भी नहीं आती

और चवन्नी सा दिन

खर्च हो जाता है!

इस चवन्नी में भी 

 अरमानों के क्रोशिए से

मैं बुन लेती हूँ चाँद 

टाँक देती हूँ सूरज 

सिल देती हूँ ज़िंदगी की कतरनें

पसार देती हूँ सिलवटें 

बो देती हूँ सूखी आँखों में ख्वाब

और बाँध देती हूँ मुट्ठियों में आकाश जैसे-तैसे

मैं भरसक 

रेतीले वक्त को भी समेट लेती हूँ

बचपन की अपनी फ्रॉक के घेर में 

इस उम्मीद में कि

 दिन

चवन्नी से कुछ तो बढ़ेगा

सौदागर कुछ तो पिघलेगा

पर रोज़ ढलते-ढलते

फिर बहुत कुछ

 अनजिया, अनपाया सा रह जाता है

हरी आसें फिर कुम्हला सी जातीं हैं

कुछ बदलता तो नहीं, पर

दिन चवन्नी से भी और छोटा,

और छूटता जाता है

और उसके छूटने के साथ

तिनका-तिनका बिखरती जाती हूँ मैं भी..




गुरुवार, 17 नवंबर 2022

कुतर्क

 आज के समय की सबसे अद्भुत चीज़ है

कुतर्क

जिसके शौर्य के आगे धराशायी और ध्वस्त हैं ब्रह्मांड के सारे तर्क

इसलिये बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है

शास्त्रों को पढ़ना, उन्हें आत्मसात्  करना और ज्ञान की महत्ता स्थापित करके तर्कवान बनना

बल्कि ज़रूरी है अपढ़ रहकर बड़बोला होना, शास्त्रों को थोथा घोषित करना,

 अपने अज्ञान की खूबसूरत इबारत गढ़कर उसे दुनिया का अंतिम सत्य सिद्ध करना 

और क़त्ल कर देना सभी तर्कों को

इशारे में ही।

अगर आपमें है यह खूबी

तो यकीन मानिए

आप हैं इस दौर के सबसे ताक़तवर इंसान...

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

एक सपना ऐसा भी

 




बात उस समय की है जब अध्यापन के क्षेत्र में मैंने अपना पहला कदम रखा था। मैं जानती थी की यह क्षेत्र मेरे लिए जितना रुचिकर है, उतना ही चुनौतियों  से भरा भी है। कारण, यह मेरे अब तक के अर्जित ज्ञान की अध्ययन की, मेरे अनुभव की परीक्षा है। और मुझे इस परीक्षा में सफल होना है। कम से कम सफल होने का प्रयास तो करना ही है। इसी संकल्प के साथ मैंने एक स्कूल टीचर के रूप में अपनी पहली शुरुआत की।

मेरी क्लास में कुल ३५ बच्चे थे। जिनमे से ५ बच्चे क्लास में से अधिकतर अनुपस्थित रहते थे। उन बच्चों का रिकॉर्ड चैक करने पर मैंने पाया कि ये बच्चे इसे क्लास में एक साल फेल भी हो चुके हैं। साथ ही क्लास के बाकी बच्चों से भी उनके संबंध कुछ खासे अच्छे नहीं हैं। क्लास के बच्चे उन ५ बच्चों से दूर ही रहना पसंद करते थे। ये पाँचों बच्चे जब भी क्लास में आते, एक साथ ही आते, साथ-ही-साथ बैठते और एक ही साथ क्लास से अनुपस्थित भी रहते। इनके पास न तो किताबें ही होती और न ही होमवर्क ही पूरा मिलता। कई विषयों की तो इन्होंने कॉपियाँ तक नहीं बनाईं थीं जो कुछेक इनके पास किताबें थीं वो भी फटी सटी और जर्जर हालत में। मैं हैरान थी यह देखकर कि अब तक इन बच्चों पर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया?? इस बारे में मैंने अपनी कुछ अध्यापिका मित्रों से भी बात की। इस दौरान जो तथ्य निकलकर सामने आए वो वाकई चौकानें वाले थे। मुझे बताया गया कि ये बच्चे बहुत बिगड़े हुए हैं। पढ़ाई लिखाई में इनका मन ही कहाँ लगता है। मैंने कहा - इन बच्चों के पेरेंट्स से इस बारे में बात नहीं की? जवाब मिला - अजी पेरेंट्स को कहाँ टाइम है? फीस पहुँचा देते हैं टाइम पर यही क्या कम है?

फीस कौन पहुंचाता है?

कौन पहुंचाता है? यही बच्चे लेकर आते हैं और कौन?

मेरा माथा ठनका! मैंने फ़िर पूंछा - फीस लाने में ये बच्चे कोई आना कानी नहीं करते?

मेरी बात सुनकर मेरी मित्र मुस्कुराई और बोली - कैसी बच्चों जैसी बातें करतीं हैं आप भी... फीस नहीं लायेंगें समय पर तो, स्कूल से बाहर न निकाल दिए जाएंगे?

मेरी मित्र अनजाने में ही स्कूल में चल रहे शिक्षा के व्यवसायीकरण का संकेत दे रही थीं। स्कूल प्रशासन का सम्बन्ध केवल और केवल फीस बटोरने से था। बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं, उनके न पढ़ने के पीछे कारण क्या हैं? और उन कारणों को दूर कैसे किया जाए, इस बारे में सोचने का वक़्त किसे था। मैं समझ गई कि मेरी असली परीक्षा की घड़ी अब आयी है। इस पूरे प्रकरण को सुलझाना और उन बच्चों को सही राह पर लाना जैसे मेरा लक्ष्य बन चुका था। इसलिए एक दिन लंच टाइम में मैंने उन बच्चों में से एक बच्चे को जिसका नाम निशांत था, को अपने पास बुलाया। दरअसल, उन बच्चों की गतिविधियों का निरीक्षण करने पर मैंने पाया था कि निशांत इस पाँच के ग्रुप का केन्द्र था। जैसे- स्कूल आते या जाते वक़्त वह हमेशा बीच में चलता। क्लास में भी वह अपने ग्रुप के बीच में ही बैठता, यानी दो बच्चे उसके दायीं ओर और दो बायीं ओर। मुझे ऐसा भी लगा कि उसकी बात उसके ग्रुप में ज़्यादा सुनी और मानी जाती है। यही सोचकर मैंने निशांत को अपने पास बुलाया था। मैंने निशांत से कहा - " निशांत तुम रोज़ स्कूल क्यों नहीं आते? " निशांत ने लापरवाही से जवाब दिया- आता तो हूँ और कैसे आते हैं? मैंने निशांत के गाल पर हलकी सी थपकी देते हुए कहा- अच्छा सच्ची में... मेरी बात सुनकर निशांत झेंप गया और धीरे से बोला- " मेरे दोस्त बुला रहे हैं" कहकर उसने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे चेहरे पर टिका दी. मैंने उसे सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा  करते हुए  कहा- "बस वही तुम्हारे दोस्त हो सकते हैं। मुझे अपना दोस्त नहीं बना सकते???" मेरी बात सुनकर निशांत सकुचा गया। उसने कुछ कहा नहीं पर उसके चेहरे पर आश्चर्य का भाव साफ झलक रहा था। मैंने फिर कहा - निशांत चेयर ले लो। उसने एक बार फिर मेरी ओर हैरानी से देखा और शर्माते हुए कुर्सी पर बैठ गया। मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा- तो स्कूल में ..... अच्छा नहीं लगता? "नहीं " उसने अपनी पलकें भींचते हुए कहा। "क्यों??" " बस नहीं लगता।" कहकर उसने मेरी ओर देखा और सिर झुका लिया। मैंने देखा कि उसकी आंखों में एक अजीब सा भाव झलक रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे जो कुछ वह कह रहा था, बात शायद उससे कुछ अलग ही है। पर इससे पहले कि मैं उससे कुछ कह पाती, वह उठकर बाहर चला गया। उस दिन के बाद लगातार तीन दिन तक वह स्कूल नहीं आया और न ही उसके चारों दोस्त ही। मुझे लग रहा था कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है। शायद कुछ ऐसा जिसे हम लोग समझ नहीं पा रहे हैं। इसके ठीक तीन दिन बाद एक अजीब घटना घटी। निशांत ग्रुप के चारों बच्चे तो स्कूल आए पर निशांत स्कूल नहीं आया। मेरे लिए यह वाकई हैरान करने वाली बात थी। इसलिए मैंने उन चारों बच्चों में से एक बच्चे शुभम को बुलाया और निशांत के बारे में पूछा। पता चला कि निशांत को तेज़ बुखार है। बुखार !! कब से??? उसी दिन से। उसी दिन से!!!! यानी पिछले ६ दिन से उसे बुखार हैशुभम ने गंभीरता से हामी में सिर हिला दिया। मैंने शुभम से कहा " तुम्हें पता है वो कहाँ रहता है?? मुझे ले चलोगे उसके पास?? शुभम ने एक बार आश्चर्य से मेरी ओर देखा और फिर हामी में सिर हिला दिया। छुट्टी होने पर जब में निशांत के घर पहुँची तो उसके घर का दरवाजा खुला था और सामने एक झीना सा पर्दा पड़ा था, जिसमें से घर की तस्वीर साफ़ झलक रही थी। घर बहुत ही साधारण था। सामान के नाम पर एक निवार का पलंग, एक सन्दूक, छाता, स्कूल बैग और पानी का घड़ा ही मुझे दिखा दिया। सामने निशांत बिस्तर पर बेसुध पड़ा था और उसके सिरहाने बैठी उसकी माँ, उसके तपते माथे पर गीली पट्टियाँ बदल रही थीं।

मैंने धीरे से कुंडी खटखटाई। आवाज़ सुनकर निशांत की माँ ने मेरी ओर देखा। चिंता की रेखाओं से भरा उनका चेहरा उन्हें 35-36 वर्ष की वृद्धा सिद्ध करने के लिए काफी था। मुझे देखते ही वो उठीं। इससे पहले कि वो कुछ कहतीं, मैंने कहा- जी नमस्ते, मैं निशांत की टीचर।

मेरी बात सुनकर एक दबी सी मुस्कुराहट के साथ वो बोलीं- जी मैंने पहचान लिया। आपके बारे में इसने इतना कुछ बताया था कि देखते ही समझ गई थी कि आप ही मैडम जी हैं, कहते हुए उन्होंने सिर झुका लिया। फिर जैसे कुछ याद आया और जैसे भूल सुधार करते हुए बोलीं- आप अंदर आइए न !

मैं पलंग के एक किनारे बैठ गई। मैंने निशांत के माथे पर हाथ रखकर देखा, उसका शरीर बिल्कुल तप रहा था। मैंने कहा – इसे अभी भी बहुत तेज़ बुखार है, दवाई दी इसे?

हाँ... कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं।

मैंने उनका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा- क्यों परेशान होतीं हैं, शाम तक उतर जाएगा...कहिए तो हम किसी और डॉक्टर के पास चलते हैं...

जी ... डॉक्टर कह रहा था कि उतर जाएगा शाम तक... अच्छी दवाई दी है...

निशांत की माँ का उतरा चेहरा देख मैंने विषय बदलते हुए कहा- निशांत का दिमाग तेज़ है। आप देखना एक दिन बहुत आगे जाएगा ये। पर स्थिर नहीं है इसका मन। स्कूल से ही कई कई दिन गायब रहता है..

मेरी बात सुनकर निशांत की माँ ने मेरी ओर देखकर कहा-

जितना आता है, शायद उतना ही बहुत है।

मतलब?? मैंने हैरत से कहा।

ब्रेन ट्यूमर! ब्रेन ट्यूमर है इसे ... निशांत को ..कहते हुए उन्होंने हँथेलियों से चेहरा ढँक लिया और फफक पड़ीं।

मैं अवाक थी।

कुछ देर बाद वो बोलीं- पिछले साल इसके पिता एक्सीडेंट में.. अब तो बस...

मैंने कहा- इसका इलाज कैसे कराती हैं?

कपड़े सिलती हूँ, पर उससे क्या होता है...

यह सुनकर अनायास ही मेरे मुँह से निकला- ओह तभी यह स्कूल...

स्कूल? इतने पैसे कहाँ हैं कि पढ़ाई और इलाज का खर्च एक साथ... पर ये माने तब न...

हफ्ते में 4 दिन स्टेशन पे सामान उठाता है..

मैं कहती हूँ, बेटा तू ठीक हो जा पहले.. फिर ... पर ये मानता कहाँ है! कहते हुए उन्होंने पल्लू से अपनी पलकें रगड़ीं और बोलीं- कहता है माँ पढ़ना भी जरूरी और मेरा ठीक होना भी। नहीं तो... नहीं तो तुम्हारी देखभाल कौन करेगा... कहते कहते वे फिर सुबक पड़ीं।

मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा- आप चिंता मत कीजिए, इसका इलाज हो जाएगा..आप बस हिम्मत रखिए।

उन्होंने हामी में सिर हिलाया और बोलीं- आपको यहाँ का पता..?

शुभम। शुभम ने बताया था मुझे।

हाँ मुझे लग रहा था कि ... शुभम, हर्षित, राघव और चेतन ये चारों भी स्टेशन पर उसके साथ सामान... निशांत के लिए। कभी अकेले नहीं जाते स्कूल, आज मैंने ही ज़बर्दस्ती भेजा, उनकी माँ से कहके...

निशांत की माँ के रुँधे गले से निकले अधूरे वाक्य मुझे सब समझा गए थे। तस्वीर बिल्कुल साफ थी। मैं और मेरे साथ बाकी लोग भी जैसा समझ रहे थे, स्थिति उससे इतनी अलग होगी, सोचा न था!

निशांत की माँ से ही बात करके मुझे पता चला कि अगले साल तक यदि निशांत का ऑपरेशन नहीं हुआ, तो यह उसके लिए जानलेवा हो सकता है।

अगले दिन ही स्कूल पहुँचकर मैंने प्रिंसिपल को पूरी बात बताई। प्रिंसिपल ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि उन्हें पहले निशांत की स्थिति का पता चल पाता तो निशांत और उसके साथियों का एक साल बर्बाद न होता। इसके बाद तय हुआ कि निशांत के इलाज का खर्च स्कूल उठाएगा।

फिर क्या था हम सबने मिलकर निशांत के लिए फंड इकट्ठा किया और छह माह के अंदर ही उसका सफल ऑपरेशन हो गया।

इस घटना को कई वर्ष हो चुके हैं। निशांत अब बड़ा हो गया है और डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा है। मुझे वो अपनी डायरी कहता है, जहाँ वो अपना पूरा मन लिख देता है। इस लिखावट का उसका जो सपना मुझे सबसे सुंदर लगता है, वो है - सबको मुफ़्त और अच्छे से अच्छा इलाज उपलब्ध कराना, ताकि किसी निशांत को अपने दोस्तों के साथ स्कूल छोड़ काम पर न जाना पड़े..       

 

शनिवार, 5 नवंबर 2022

बिल्ली का बच्चा

 छत के कोने में बिल्ली के दो बच्चे। उन्हें देखकर  बचपन की एक घटना याद आ गई।  बिल्ली का 




एक बच्चा हमारे साथ खूब खेलता था। वो चतुर भी बहुत था। सुबह 5 बजे जब अम्मा और पिताजी(दादा-दादी) चाय पीते तो पता नहीं कहाँ से प्रकट हो जाता था। वो पलंग पर बैठे पिताजी की गोद में चढ़ता फिर कंधे पर और फिर सिर पर। सिर पर चढ़ते ही पिताजी उसे प्यार से उठाकर नीचे रख देते। पर वो बिलौटा मानता नहीं था। और तब तक यह क्रम जारी रखता जब तक पिताजी अम्मा से कहकर उसे चाय नहीं दिलवा देते। चाय पीते ही वो छू मंतर हो जाता। 

एक बार मैंने पिताजी से पूछा- आपको डर नहीं लगता, आप उसे सिर पर चढ़ा लेते हो? मेरी बात सुनकर पिताजी ज़ोर से हँसे। जवाब अम्मा ने दिया- बच्चे तो सिर पर चढ़ते ही हैं, तुम क्या उससे अलग हो!