शनिवार, 10 मार्च 2012

मन मंजूषा--3

वरुण  क्या. सभी के मन में यही बात चल रही थी. मामा जी कितने अच्छे हैं. वो तो सब की मदद करते हैं फिर भगवान् उन्हें इतनी टेंशन क्योँ दे रहे हैं. वो क्या करेंगे, कैसे संभालेंगे सब कुछ? और वो खुद बच्चों की तरह नाज़ुक मन वाले हैं. जरा सा मन दुखा नहीं कि आँखों से टप-टप  आंसू बह चलते हैं. पिछली बार जब हम लोग झाँसी गए थे और मेरे लिए वो मेरे मन कि ड्रेस नहीं ला पाए थे, तो इसी बात पर उनकी आँखें भर आईं थीं.  माँ ने मामा जी के सर पर हलकी सी चपत लगाकर कहा था-- नीरव क्या हो गया. अक्कल आएगी तुम्हे  कभी....
ये क्या ज़रा सी बात पर उदास हो जाते हो. उठो चलो...
मामा जी माँ की बात पर सुबक कर बोले थे. नहीं दीदी, मुझे बस इस बात का बुरा लग रहा है कि मैं कैसा मामा हूँ., अपनी भांजी की छोटी सी इच्छा पूरी नहीं कर सकता..
मामा जी को यूँ सुबकते हुए देख मैंने भी कहा था कि मामा जी, इसमें आपका क्या दोष मुझे पसंद ही नहीं आईं कोई ड्रेस. इसमें तो दुकानदार की गलती है.. पर आप चिंता मत करना. अगली बार आउंगी न तो आपसे एक साथ  तीन ड्रेस लूंगी.ठीक है न????
मेरी बात सुनकर मामा जी के चेहरे पर कुछ चमक आई.. फटाफट अपने गालों पर ढुलक आये आंसू पोंछकर मामा जी बोले- हाँ ये बात ठीक है. मैं तुम्हे तीन नहीं बल्कि चार ड्रेस दिलाऊंगा. पक्का. पर....
मामा जी कुछ उदास होकर बोले- लेकिन अगर तुम्हे फिर पसंद नहीं आई तो???
मामा जी की बात सुनकर मैंने उनके गले में हाथ डालकर कहा - अरे!! मामा जी. आप चिंता क्योँ करते हैं., नहीं पसंद आईं तो उस से अगली बार आठ ड्रेसिस ले लूंगी आपसे. बस. अब तो खुश हो जाइए.
मामा जी समझ गए थे कि मैं मज़ाक कर रही हूँ. इसलिए फिर से उदास हो गए और बोले- ऐसे नहीं होता.
फिर कुछ सोच कर बोले- एक काम करते हैं.
मामा जी बड़ी फुर्ती से उठे और मामी के पास रसोई में चले गए.और जोर से बोले- ज्योति  सुनो २००० रुपये दो अभी.
करीब १ घंटे के वार्तालाप के बाद मामा जी आये और मेरे हाथ में १००० रुपये रखते हुए बोले- तुम दिल्ली से अपने मन की ड्रेस खरीद लेना. ठीक है.
उफ़ मैंने मन में कहा फिर नया तमाशा. मैंने पैसे वहीँ बेड़ पर पटक दिए और माँ को आवाज़ लगाईं. मम्मी ने  मामाजी को बहुत समझया पर मेरे जिद्दी मामा मुझे वो पैसे देकर ही माने. ऊपर से डांट अलग- मामा का मतलब पता है तुम्हे? दो माँ के बराबर होता है मामा. उनसे तो तुम्हे कोई भी चीज़ लड़कर लेनी चाहिए. और तुम कहती हो नईं... नईं ..........ये क्या है? अच्छी मार लगाऊंगा जो आगे से किसी चीज़ के लिए मना  किया.....
ऐसे मेरे मामा. बिलकुल बच्चों जैसे.. डर यही लग रहा था कि जो खुद बच्चों की तरह हैं, वो अपने बच्चों को कैसे समझायेंगे जो  अपनी माँ की बीमारी का नाम सुनते ही घबरा गए होंगे..
और सच यही हुआ. माँ ने जब मामाजी को फोन किया तो पता चला कि  मामा जी और बच्चे खूब रो रहे थे. उनके बीच बस मामी ही समझदार थीं, वो अपनी बीमारी भूल के समझा रहीं थीं कि इसमें चिंता की क्या बात है. सब ठीक हो जाएगा. आजकल तो हरेक बीमारी का इलाज है..
नाना जी बता रहे थे कि पता ही नहीं चल रहा था कि असल में बीमार कौन है....क्रमशः

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मंगलवार, 6 मार्च 2012

मन मंजूषा भाग- २



वाकई सवाल अनसुलझे नहीं रहते. उन्हें सुलझना ही होता है.यही उनकी नियति है, पर अपने सुलझने की प्रक्रिया में सवाल दिमाग को घोटकर रख देते हैं, अन्दर और बाहर बहुत कुछ टूटता है चरमराता है. और फिर जो कुछ सामने आता है उसे चाहे हम कितना ही झुठलाने या नज़र अंदाज़ करने की कोशिश क्योँ न करलें,  उससे मुक्त नहीं हो सकते..    
खैर तो कुछ समय बाद अचानक पापा के पास मामाजी का फोन आया. वो लगभग चीख रहे थे, कुछ क्षणों के लिए तो हम सभी सन्न से रह गए की आखिर हो क्या गया? पापा बार- बार कह रहे थे कि तुम चिंता मत  करो. अब यह बीमारी लाइलाज नहीं है. तुम चिंता मत करो. और तुम ऐसे कमज़ोर पड़ोगे तो कैसे होगा. अरे तुम...तुम.... मेरी बात सुनो जो भी अगली गाड़ी मिलती है उस से तुम दिल्ली आ जाओ. तुम चिंता मत करो मैं यहाँ किसी अच्छे डॉक्टर से तुम्हारी यहाँ बात करा दूंगा सब ठीक हो जाएगा. बस अब तुम आ जाओ... जल्दी से... सब ठीक हो जायेगा......तुम चिंता मत करो.
पापा ने फोन रखा ही था कि माँ ने पूछा क्या बात है? नीरव का फोन था????
किसकी तबियत ख़राब है?? बताओ जल्दी से. मां बदहवास सी हो रहीं थीं. 
रसोई में रखे कुकर की सीटी लगातार बज रही थी. सड़क पर घड़घडाता हुआ कोई ट्रक कानों के पर्दों को बेंधता हुआ गुज़र गया था. इसी बीच पापा ने कहा कि नीरव  का फोन था  ज्योती को  कैंसर है!!
क्या??? ज्यो ... ज्योति  को..............कै.....कैंसर.........
हैं ?? ये क्या कह रहे हो. अब तक तो ठीक थी. ये अचानक!!
अचानक ही होता है सब कुछ  चौथी स्टेज है.. झाँसी में डॉक्टरों ने मना कर दिया है.  हो सकता है कल सुबह तक आ जाएँ वो लोग..पापा ने एक अजीब से निराशा भरे स्वर में कहा. 
हम सब अवाक थे. सबके दिमाग में उस समय एक ही बात चल रही थी कि सब कुछ कितना ठीक ठाक चल रहा था ये अचानक क्या हो रहा है... ऐसा लग रहा था जैसे हम सबकी जिंदगी कुछ समय के लिए थम गई हो.  पता नहीं क्या-क्या बीत गया था जैसे उस वक्त. कैंसर के संभावित परिणाम की आशंका से मन काँप गया था. चौथी स्टेज पर तो कैंसर के रोगी का बचना लगभग असंभव सी बात है. फिर मामा जी का क्या होगा?  उनकी अभी ये हालत है तो बाद में क्या होगा? और उनके वो तीन बच्चे जिन्हें वो अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं उनका क्या होगा?? उफ्फ्फ!!!! प्लीज़ भगवान जी मामी को ठीक कर देना. ....प्लीज़ प्लीज़ प्लीज़... मेरी तरह वरुण का मन भी शायद यही कह रहा था......
क्रमशः .....