सोमवार, 4 अगस्त 2008

तुम और मैं

याद तुम्हे क्या करती हूँ मैं,
बस कुछ पल जी लेती हूँ मैं,
चाह नहीं हैं मुझको तुमसे अब कुछ भी बतियाने की,
हर दिन कुछ पल तुम्हे सोचकर ख़ुद से बतिया लेती हूँ मैं,
और बतियाऊँ भी क्या तुमसे??
प्रश्न नहीं हैं कोई,
होगा भी तो भी नहीं चाहिए मुझको तुमसे उत्तर कोई,
हाँ अगर दे सको तो दे दो तुम मुझको केवल एक मौन,
मेरी आंखों का एक शब्द,
जो बने तुम्हारा विनत मौन,
पर छोड़ो सबकुछ छोडो,
मैंने उस जीवन को छोड़ा ,
तुम मेरे वो क्षण भी छोडो,
जिनमें अक्सर जी लेती हूँ,
और अक्सर थोड़ा थोड़ा सा ,
ख़ुद से कट लेती हूँ मैं...................................

आत्महत्या के विरुद्ध

मेरी माँ रोया करती हैं मेरी आंखों में भर भर के,
पापा गुमसुम से रहते हैं हाथों की रेखाएं गिनते,
बहन शांत सुनसान दिशा में खोजा करती है कुछ मुझसा,
भाई बिचारा सोचा करता,
क्यूँ गुमसुम सा घर बचपन का,
और मैं बोलूँ तो क्या बोलूँ,
मरकर कोई बोल सका है?
बोलूँ जो कोशिश कर के भी,
तो बस अंधियारा बढ़ता है,
रोती हैं पुरज़ोर दिशाएँ,
पौधे मुरझाये लगते हैं,
उगते-ढलते सूरज में भी,
बादल से छाये लगते हैं,
ऐसे में हर क्षण हँसता है,
क्यों जीवन मंहगा लगता है?
हाय कितना करुण दृश्य मृत्यु का ,
जीवन सचमुच ही अच्छा है......

सोमवार, 28 जुलाई 2008

प्रमाणपत्र

वह ईश्वर है, महान है,
स्वामी है पुरूष यूँ ही नहीं है वह!
वह शुद्ध है, पवित्र है, निर्दोष है,
वह रक्षक है, कर्ता है भर्ता भी है,
हाँ ताकतवर भी है, इस्सीलिये.......
औरत की जिंदगी का नियामक है वह,
कुछ भी उसके लिए निषिद्ध नहीं
क्यूंकि वह कभी भी ग़लत नहीं,
यह सच है। हाँ ! हाँ! यह सच है!
प्रमाण चाहिए ????????
लो अभी देती हूँ....
प्रमाण है पुरुषों को सतीत्व के प्रमाण पत्र के ज़रूरत नहीं पड़ती
क्यूंकि.......
कीचड़ में खिले कमल की तरह uska चरित्र भी निर्मल, पावन और पवित्र होता है....
परमेश्वर का दर्जा उसे यूँ ही नहीं मिल जाता.


बुधवार, 25 जून 2008

जिंदगी और मौत




वक़्त का एक छोर थामे अलसाई सी मौत खड़ी है, 
वक्त को धीरे धीरे अपनी ओर खींचते हुए,
ज़िंदगी को वो बुला रही है 
मासूम सी ज़िंदगी उसे पाती है अपरिचित 
इसलिए छिटक देना चाहती है उसे एक ओर 
पर मौत को तो आदत है ज़िंदगियों से खेलने की 
तड़पती साँसों को अपनी मुट्ठियों में भींचकर उन्हें लील लेने की 
इसलिए मौत 
अपने हाथों को नर्मीला बना
  जिंदगी को सहलाती है गुदगुदाती है 
  उसके साथ हंसती मुस्कुराती उसके नजदीक आती है  
उसकी सबसे प्यारी दोस्त उसकी आत्मीय बन जाती है
और फिर धीरे धीरे उसे 
 सुख के इंद्रजाल में कातर बना
खेल ही खेल में  खूब जिताती है, 
आत्मविश्वास से हरी भरी ज़िंदगी
 जब सीख सा लेती है काली रातों से लड़ना 
तब एक दिन
रौशनी और अंधेरे की लुकाछिपी में 
गहराते अँधेरों और टूटती बिजलियों के बीच 
अक्कड़ बक्कड़ खेलती ज़िंदगी को
चुपके से धप्पा कर जाती है मौत... 
और तब ज़िंदगी ऐसे तड़पती है जैसे 
वो अचानक मिट गई हो 
और अब ज़िंदगी तो न रही 
ज़िंदगी कहलाने के काबिल भी न रही हो 
क्षणिक संज्ञा भर वो देखती है खुद को 
मरते जाना, 
मौत के आगोश में खोते जाना 
और आहिस्ता आहिस्ता  सदा के लिए मौन होते जाना  ...........

सोमवार, 9 जून 2008

वर्तमान शैक्षिक संवेदना का हाल!!

राष्ट्रीय स्तर की शैक्षिक संस्था जो न केवल पहली क्लास से लेकर बारहवीं क्लास के लिए किताबें तैयार करती है बल्कि शिक्षा के स्तर को जांचने- परखने के लिए अनुसंधान भी करती है, dरोप आउट के कारण तलाशने की भी कोशिश की जाती है। शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए, उस पर खुले तौर से बात करने के लिए तमाम तरह की पत्रिकाएँ भी इस संस्थान से निकलती हैं, देखने से तो ऐसा लगता जैसे बच्चों को पूरी लगन के साथ यह संस्था शिक्षा प्रदान करने को प्रतिबद्ध है। पर जब इसी संस्था के केंटीनों में नन्हें- नन्हें बच्चों को काम करते हुए देखती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे, बच्चों के प्रति जिस प्रतिबद्धता की बात यह संस्था कहती है, उसका दायरा केवल किताबें ही हैं। व्यवहारिक जीवन से उसका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। अन्यथा जिस केन्टीन में छोटे-छोटे बच्चे अपना बचपन भूलकर रोज़ी रोटी की उधेड़बुन में फंसे हुए एन सी ई आर टी के प्रबुद्ध शिक्षकों को चाय परोसते न देखे जाते। पर होता है, ऐसा ही होता है, दीपक तले अँधेरा ही होता है, यहाँ तो अँधेरा इतना घना है की दीपक की रौशनी ही अंधेरे में खोती नज़र आती है,,,,,,,,,शेष ........

बुधवार, 4 जून 2008

चन्द अक्षर

इतनी शिद्दत से कभी चाहा न था हमने,
आँख भर उसको कभी देखा न था हमने ,
सच कहें तो जिंदगी भी क्या शे है समझा ही न था हमने ,
मगर उस दिन सुबक पड़ीं थी खामोशियाँ इन बेखोफ आंखों में,
टपकती बूंदों को उन्ही हथेलिओं में गुम हुआ पाया था हमने .....