गुरुवार, 15 सितंबर 2022

पुस्तक समीक्षा

 

रत्नकुमार सांभरिया ज़मीन से जुड़े रचनाकार हैं। ज़मीनी महक, देसी गमक उनकी कहानियों को एक खास बानगी देती है और कहानियों को अधिक संजीदा अधिक रोचक और कहीं अधिक पठनीय भी बनाती है। डॉ0 लोकेश कुमार गुप्ता द्वारा संपादित ‘पुस्तक रत्न कुमार संभरिया की प्रतिनिधि कहानियां’ कुछ ऐसी ही कहानियों का संग्रह है, जिसमें संपादक  ने बहुत कुशलता से कहानियों का चुनाव किया है। लेखकीय क्षमता से प्रभावित सम्पादक का यह कथन उल्लेखनीय है- 

“अगर मैं एक पंक्ति में कहूं तो रत्न कुमार सांभरिया का लेखन एक महाकाव्यात्मक पीड़ा, संघर्ष, वेदना, वंचना और अभिजन-समाज में व्यक्ति जीवन के नवीन मूल्य और मानदंडों को स्थापित करता है।“ 

यह नवीन मूल्य और मानदंड हमें इन चुनिंदा कहानियों में मिलते हैं। 

इस पुस्तक में संपादक ने कुल 11 कहानियों को संगृहीत  किया है जो अपने मिजाज अपनी कलेवर और अपनी कहन में एकदम अलग किस्म की हैं। मतलब कोई भी कहानी पैटर्न को फॉलो करती नज़र नहीं आती। हर कहानी में एक अनूठापन है, जो पाठक को एक कथालोक से दूसरे कथालोक की सैर कराता है। हां यह ज़रूर है कि कहानियां पैटर्न बनाती ज़रूर हैं। मतलब सरलता से बात कैसे कही जाए और उसे कहानी में कैसे ढाला जाये, ये  कहानियां यह सिखाती हैं। अब ‘मियां जान की मुर्गी’ को ही देख लीजिए। कहानी प्यार से पाली-पोसी गई मुर्गी की है, जो क्योंकि जीना चाहती है, इसलिए मियां जान की बहुत गालियाँ खाती है पर मियाँ जान की लाख कोशिशों के बाद भी वह हाथ नहीं आती। ज़िंदगी जीत जाती है मौत हार जाती है। बेचारे मियां जान अपनी जवानी का द्म याद करते रह जाते हैं। और कहानी कहती क्या है कि इंसानी स्वार्थपरकता सारे मोहजनित संबंधों को ज़िबह कर देती है। ये तो मुर्गी थी पर इस स्वार्थपरकता के आगे इन्सान भी क्या चीज़ है।

आज के राजनीतिक कूटनीतिक और षड्यंत्रकारी जमाने में कहानी विधा किस विधान से अपने मूल चरित्र को बचाए रख सकती है, यह कहानियां उसका भी एक खूबसूरत फॉर्मेट प्रस्तुत करती हैं अपनी बयानगी में एक खास सरलता से। इन कहानियों की एक और खास बात है,  और वह यह कि हर कहानी में एक यथार्थ प्रस्तुत किया गया है और इस यथार्थ की विशेषता है कि यहाँ कोई तल्खी नहीं, कोई आक्रोश नहीं, जातिवादी या जातिसूचक तल्ख-बयानी नहीं। कुछ है तो केवल यथातथ्य चित्रण। साम्भरिया जी भली-भांति जानते हैं कि बयानबाजी से कुछ नहीं होता। सहानुभूति या संवेदनात्मक पक्ष के मार्मिक चित्रण से भी कुछ नहीं होता। कहानी बनाने के लिये कुछ चीज़ें अगर काम करती हैं तो वह हैं बदलते वक्त को उसके बदलावों के साथ कागज पर उतारने की कला। अतीत और वर्तमान को साथ रखकर भविष्य की बुनावट करने की कला। बदलते समीकरणों को बिना किसी लाग-लपेट के सहज रूप में कह जाने की कला। और इन समग्र कलाओं का समुच्चयगत रूप जो कहानी को नदी के पानी सी रवानगी देता है, वह पाठक को वर्तमान से और मजबूती से जोड़ता है। सान्भरिया  जी की कहानियाँ यही करती हैं,  जिससे पाठक वर्तमान से और मज़बूती से जुड पाता है।

 अब फुलवा कहानी को ही देख लीजिए यहां जाति है। ऊंच-नीच का प्रपंच भी है। पर अतीत में। स्मृतियों में जो कभी आंख के कोर में ढुलकते पानी में, तो कभी जमीदारी दिमाग में उमड़ते ज्वार के रूप में तो दिख जाता है।  पर जैसे ही स्थान बदलता है, स्थितियां बदलती हैं, जाति भी बदल जाती है। अब यह जाति जिस नए रूप में है, उसे कहते हैं अमीर और गरीब की जाति। यह नई किस्म की जाति अब तक चली आती जातिवादी सामंती व्यवस्था से नितांत भिन्न है। इसलिए यह स्थिर भी नहीं है। यह असल में साँचे वाली जाति है, जिसमें किसी भी परंपरागत जाति का व्यक्ति फिट हो सकता है। इसलिए जाति आधारित परंपरागत व्यवहार यहां मैच नहीं करता। इसीलिये  पुरातन जाति संस्कार भरे रामेश्वर को फुलवा कहानी की पंडिताइन डपटती हुई कहती हैं -

“तू तो कुएं का मेंढक ही रहा रामेसरिया। अब तो पद और पैसा का जमाना है, जात पांत का नहीं।” 

पर दुनिया का क्या करें,  जो इस बदलाव को स्वीकार न कर पाये उसका क्या करें। ऐसे अतीतजीवी लोगों के लिए कोई क्या करे और क्या उन्हें समझाएं? मांडी कहानी भी कुछ ऐसी ही विवशता प्रस्तुत करती है जहाँ बेचारे बाम्भन दानीदास गौमाता को मान्डी खिलाने के लिये तरस जाते हैं क्योंकि नीच जात के घर बंधी गाय को मान्डी खिलाने में धर्म जो आड़े आता है और जब जैसे-तैसे वो खुद्को तैयार कर लेते हैं तो गाय की मालकिन का स्वाभिमान आड़े आ जाता है। और त्योहार हो जाता है निल बटे सन्नाटा।

वक़्त आगे गुज़र गया पर पुराने पंडित जी वहीं के वहीं। इस तरह की अतीत और वर्तमान के टकराव की ये कहानियाँ, आज के समय को प्रस्तुत करती कहानियाँ हैं, जिनमें एकदम सहजता है और बदलती स्थितियों को कहने की समझ है।

ज़िंदगी ‘इत्तेफाक’ है। कब क्या हो जाए, आज कुछ है, कल कुछ है, परसों कुछ और हो जाए,  किसे पता? जिंदगी ऐसे ही चालें चलती है और बहुत कुछ उलटती-पलटती, कुछ का कुछ करती चलती है। स्तब्ध पात्र केवल इस उलट-पलट के प्रभावों के साक्षी बनते हैं। यहाँ 40 साल का वियोग एक ऐसा सुखद संयोग बन जाता है कि ज़िंदगी की ढलान पर बैठी बुढ़िया फिर से दुल्हन बन जाती है। ऐसी कहानी को पढ़कर लगता है मानों वक्त कोई जीवंत शक्ति है जिसे ज़िंदगी से मसखरी करने में बड़ा मज़ा आता है। यह मसखरी कभी तो बहुत खूबसूरत होती है और कभी ऐसी कि ज़िंदगी का सिक्का बदलते देर नहीं लगती। इन्सान को मालकिन से ‘चपड़ासन’ बनने में देर नहीं लगती। स्थिति बदलने पर इन्सान की बदलती फितरत का भी खुलासा हो जाता है और तब पता चलता है कि 

“आदमी गिरगिट से भी बदतर रंग-बदलू होता है।“ और तब इस बात का एहसास होता होता है कि “औरत की चुप का आदमी अपना नियत अर्थ निकाल लेता है”... लोग बदल जाते हैं और उनके साथ वक्त भी बदल जाता है और तब समझ आता है कि “वक्त बहरूपिया है।“

स्थितियां बदलती हैं, समाज बदलता है और उसके साथ बदल जाता है बहरूपिया वक्त भी। अपने इस बदलने की प्रक्रिया में वह किसी पर भी रहम नहीं खाता फिर चाहे वह कोई नेत्रहीन जोड़ा ही क्यों न हो। कहानी सवाखें समाज की इसी सच्चाई को उजागर करती है कि जातीय शुद्धिकरण और जातिवाद नेत्रहीनों को भी नहीं बख्शता। परिणामत: जमन और वीमा की ज़िंदगी समाज के ठेकेदारों की भेंट चढ़ जाती है। पर हाँ एक आशा है और आशा कभी नहीं मरती।

मातृत्व महत्वपूर्ण है। फिर चाहे वह ‘हिरणी’ ही क्यों न हो। हर माँ की आत्मा अपने बच्चे में बसती है। हिरणी भी एक माँ है जो अपने शावक को शिकारी के पंजों से भी बचा लेती और तब ज़िंदगी एक और जादू करती है। भक्षक को रक्षक बना देती है। लछिनाथ भी द्रवित हो जाता है भाव की उस भाषा से जिसमे मानो हिरणी के रूप में एक माँ कह रही थी-

‘यह बच्चा मेरी वंशबेल है। इसे मत मारो। मैं ढलती उम्र हूँ। मेरा गला रेत ले।‘

समाज के एक अन्तर्समाज सपेरा समाज की कहानी है टोकरे में गांठ। जिसमें प्रेम,  वासना और षड्यंत्र को पूरी तल्खी के साथ उभारा गया है।

इसी तरह भारतीय दलित समाज की भी विडम्बना है। वह एक ओर जाति मुक्त भी होना चाहता है और ऊंची जात का भी कहलाना चाहता है। चमरवा इसी सामाजिक विरोधाभास को व्यक्त करती कहानी है जहाँ चमरवा बाम्भन न तो पूरे चमार रहे और बाम्भन तो उन्हें बाम्भन मानें ही क्यों?। यहाँ प्रश्न भी है कि समाज का दलित वर्ग असल में चाहता क्या है? जातिमुक्त समाज, ऊंची जाति का समाज या फिर खुद को ऊँची जाति में देखना। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह ऊपर से कुछ भी कहे पर अंदर उसके भी ब्राह्मण समाज का हिस्सा बन जाने की अदम्य इच्छा है?

 संग्रह में कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं जिनमें ऊँची जातियां एक अलग किस्म से चुनौतियां पाती नज़र आ रही हैं।  सत्ता और पद अस्पृश्य को भी सम्मानित बना देते हैं। और कहानी की बानगी देखिये कि चमार सीधा चौधरी बन जाता है। पंडित जी जाति का दंभ भूल जाते हैं और जिससे छूत मानते थे, उसके घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं। और तब एक बार फिर यह स्थापित होता है कि ज्ञान के आगे सत्ता है और सत्ता के आगे जाति नहीं टिकती। ज्ञान ही एकमात्र ऐसा तत्व है जो सारे समीकरण उलट-पलट कर देता है। ज्ञान ऐसी संपदा है जो किसी को भी राजा बना दे। निम्नता को सहज ही उच्चता में बदल दे। ऐसे में यानी ज्ञान और सत्ता के प्रभाव में जाति एक ऐसा क्षुद्र संबोधन मात्र बन कर रह जाती है जिसका होना ना होना एक गैर जरूरी चीज लगता है।

ज्ञान से ही सत्ता प्राप्ति का रास्ता खुलता है और सत्ता से जाति का दंश मिटता है यही वजह है कि डॉ0 भीमराव अंबेडकर ने अपनी त्रिदेव की अवधारणा में प्रथम देव ज्ञान को मानते हुए कहा है-

“मेरा प्रथम देवता ज्ञान है मैं ज्ञान की उपासना करता हूं बगैर ज्ञान के मनुष्य को मानवता तथा शांति नहीं मिलती।“

11 कहानियों में से यह तो सिर्फ गिनी-चुनी कहानियां है। शेष कहानियां  भी इसी रवानगी पर हैं। जिनका लब्बोलुआब यह है कि कहानियाँ जीवन परोसती हैं और जीवन परोसने की प्रक्रिया में जीव विशेष का अंतर भी मिट जाता है। बकरी के बच्चे, हिरणी, मुर्गी सबके सब दास्ताँने ज़िंदगी कहते हैं और यह दास्ताँ इंसानी दास्ताँ से बिल्कुल अलग नहीं। जीवन जीवन है फिर फिर चाहे यह इन्सान का हो या किसी का भी। किसी हिरणी, मुर्गी बकरी या फिर सांप का भी। अब इस पर दुखी होना चाहिए या विचार करना चाहिए, ये लेखक ने पाठक पर छोड दिया है।

इस संग्रह को केवल ‘दलित-कहानियों’ के चश्में से नहीं देखा जा सकता। कथ्य की विविधता पाठक के समक्ष ऐसे अंतर-समाजों का उद्घाटन करती है कि जिसके बारे में उसने शायद ही पहले कभी सुना या पढ़ा हो। एक या दो नहीं संग्रह की अधिकांश कहानियों की ये विशेषता है।

 यह तो रही कहानियों के विचार तत्व की बात। पर विचार तब तक किसी मतलब का नहीं होता जब तक शिल्प से उसे सँवारा न गया हो। भाषा में उसे प्यार से सहेजा न गया हो। इस लिहाज से भी साम्भरिया जी बहुत सजग रहे हैं। सजगता के साथ सहजता भी ऐसी है कि कहीं कुछ भी अटकता भटकता नहीं है। देसी राजस्थानी संस्कृति अपनी सौंधी सुगंध वाले भावमय शब्दों के जरिए दिल तक उतर जाती है और व्यक्ति को सहज ही पाठक बना देती है। इस संबंध में संपादक महोदय का कथन उल्लेखनीय है-

“लेखक की विशेषता है कि वह अपने कथानक के अनुसार आरंभ से ही कथ्य की भाषा का सगुम्फन करता है। वेदना और वर्चस्व के विरोध में प्रतिरोध, प्रतिशोध, अधिकार, विद्रोह और चेतना की भाषा है। राजस्थान और हरियाणा के सीमा क्षेत्र की  भाषा है।”

भाषा में देसीपन बहुत लुभाता है। किवाड़, सान्कल, गूदड़-गाबा, मटका, बेंत, सिल, चूल्हा, चिमटा, फ़ूंकनी जैसे शब्द शहर की चारदीवारी से निकालकर पाठक को गांव की खाट पर बैठा देते हैं। ये शब्द गांव-देहात को मन में रमा देते हैं।

कुल मिलाकर कहें तो ये कहानियाँ एक अलग किस्म का दस्तावेज़ हैं जो पाठक को अपने समय की समझ देती हैं, समाजों में बसे अन्तर्समाजों से जोडती हैं और समय की नब्ज़ टटोलती हुईं दलित शब्द की परिभाषा को भी बदलती नज़र आती हैं।


10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2022) को  "भंग हो गये सारे मानक"   (चर्चा अंक 4554)  पर भी होगी।
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कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया सर🙏

मन की वीणा ने कहा…

पुस्तक के प्रति रोचकता बढ़ाती सार्थक समालोचनात्मक पोस्ट ।
सुंदर।

Gajendra Bhatt "हृदयेश" ने कहा…

सार्थक समीक्षा!... “आदमी गिरगिट से भी बदतर रंग-बदलू होता है।“ और तब इस बात का एहसास होता होता है कि “औरत की चुप का आदमी अपना नियत अर्थ निकाल लेता है”... लोग बदल जाते हैं और उनके साथ वक्त भी बदल जाता है और तब समझ आता है कि “वक्त बहरूपिया है।“... अद्भुत व सटीक विवेचन!

मुन्नी देवी ने कहा…

अच्छा लिखा है।

डॉ विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया सर।

डॉ विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया🙂🌹

विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया🙂🌹

बेनामी ने कहा…

सार्थक समीक्षा विभा।

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

शुक्रिया🙂🙏