गुरुवार, 9 मई 2024

 Institute of Liver and Biliary Sciences एक बड़ा नाम है और इसके साथ नाम है डॉ एस.के. सरीन का। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ सरीन  विश्व-विख्यात डॉक्टर हैं। इसलिये  उनसे मिलना भी आसान नहीं। मरीज़ हर प्रकार की असुविधा झेलकर भी ILBS पहुँचते हैं, उनसे इलाज की तलाश में।

मैं भी पिछले दिनों अस्पताल में भर्ती थी। फिर सोचा डॉ सरीन को भी दिखा लिया जाए।

डॉक्टर साहब से मिलना हुआ। पहले जूनियर डॉक्टर और फिर डॉ सरीन से। दोनों ही डॉक्टर्स ने पुरानी फाइल देखीं। जो दवाइयाँ ले रही थी, वो भी देखीं। उन्हें दवाइयाँ ठीक लगीं। हां एक दवाई pedamet 120MG पर उन्होंने कहा- ये स्टेरॉयड है हम इसे 80 MG कर रहे हैं। फिर 60, 40, 20 पर लाकर इसे हटा देंगे। ठीक हो जाओगी। कोई परहेज़ नहीं है। रोज़   बैडमिंटन  खेलो और जीतो। ओके? ओके, थैंक यू डॉक्टर साहब कहकर मैं आश्वस्त भाव से बाहर आ गई। सोचा दवाइयाँ भी यहीं से ले लेती हूँ। पर 80 MG का स्टेरॉयड नहीं मिला। अब कॉलेज के पास से दवाई लेने की सोची। दवाइयाँ मिल गईं। तभी बिलिंग सेक्शन पर केमिस्ट ने कहा-  मैडम पेशेन्ट कौन है? Pedamet 80  MG तो आती ही नहीं है। ये बहुत हाई है आपको किसने लिखी है?

8 और 4 MG की दे रहा हूँ। आपको इतनी गोलियां खानी हैं कि टोटल 80 MG हो जाए। अब मेरा माथा ठनका कि 80 MG की नहीं  आती फिर मैं 120 MG की कैसे खा रही हूँ! फौरन घर  फोन किया। सब चिल्लाए, घर आओ। डॉ सरीन से बड़ी डॉक्टर बनने की ज़रूरत नहीं, कैमिस्ट की बात पर यकीन कर रही हो! 

पर मन नहीं माना और मैं उस डॉक्टर के पास पहुँची जिसने 120 MG की स्टेरॉईड लिखी थी। डॉक्टर नहीं था इसलिये अस्पताल की फार्मेसी पर गई जहाँ से अन्य दवाओं के साथ 120 MG की स्टेरॉयड ली थी। वहाँ पता चला कि कि ये दवा 8 MG से ऊपर नहीं आती।  ये गलत लिख गया है। 12 MG लिखना था। 8 और 4 की दो गोली जो दी जा रही थीं, वो यही 12 MG की दवा है। 

आश्चर्य इस बात का है कि पहले डॉक्टर ने जो गलती की उसे डॉ  सरीन नहीं पकड़ पाए! डॉ सरीन  को क्या उस दवा की समझ नहीं थी? और अगर 80 MG का वो स्टेरॉयड मैं खा लेती? शायद अब तक होती ही ना और अगर होती भी तो न जाने किस स्थिति में। 

ये निश्चित तौर पर मेडिकल ब्लंडर है। पर डॉ सरीन जैसे सीनियर डॉक्टर से ये ब्लंडर हो सकता है, सोच के परे है। वो मुझे 80 MG का pedamet कैसे लिख सकते हैं!

मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

हनुमान जयंती पर

 


हनुमान जी के जन्मदिवस पर कुछ बुंदेली में🌹🌹


जब सैं होश सम्भालो हमने

जौई जी मैं जानो 

कै सब मौड़ी-मौड़न के तुम

बड़के बब्बा आनौ।

घर में तुमईं हो सबसे जेठे 

सब बूढ़न बड़कन सैं

सो सब निर्णय तुमईं लैहो

ब्याओ, धरम-करम के

बैसैं भी प्रभु राम सिया के

तुमईं लाड़-लड़ैते

बसे तुमाये रोम रोम में

राम सिया चित चेते

तुमनौं चिट्ठी पाती दैबो

भगवान राम खाँ दैबो

तुमखाँ बिपत सुनाबो

सीधे राम सिया सैं कैबो

ऐसे महाबीर बब्बा तुम

रहियो हम पै सूदे

मूढ़न मैं मूढ़ हम आँएं

करियौ भलो जो सूझे

आज तुमाओ जनमदिवस है

का दै दैं हम तुमखौं 

उलटे हम तौ माँगन बारे

दै दो तुम कछु हमखौं

ज्ञान, प्रेम, बुद्धि और साहस

दो कष्टन सैं मुक्ति

और भली जो तुमैं लगत हो

दै दो ऐसी तृप्ति

जे ई हमाई गोल मिठाई

जे ई सब परसाद

जे ई हमाए लक्ष जीवन के

जे ई लोकाचार

दै दो बब्बा जल्दी सैं

अब और नईं कछु चानैं

हाथ तुमाओ रये मूड़ पै

बस इत्तौ ई चानैं

महाबीर बब्बा तुमैं जन्मदिन की भौत भौत शुभकामनाएँ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏💐💐💐💐💐💐 

चुम्बक





कोर्ट परिसर में लगातार चहल कदमी करते लोग। जिनमें शामिल थी खिचड़ीनुमाँ जमात। कुछ मज़दूर और निम्न वर्गीय लोग, कुछ आम घर परिवारों के नौकरी पेशा क़िस्म के लोग, कुछ उद्यमी और व्यवसायी लोग। अधेड़, उम्रदराज़ हर उम्र के लोग- कहीं कहीं इनके साथ घिसटते बच्चे भी और... इन सबके बीच सफेदी को स्याह रँग ओढ़ाए इधर से उधर भटकती एक खास सियारी क़िस्म भी। 

इन आम लोगों के चेहरों पर एक विचित्र सी मायूसी थी। कुछ के चेहरों पर यह मायूसी मुर्दनी की हद तक जमी दिख रही थी। पर ये लोग न जाने किस प्रतीक्षा में अब तक मुर्दा नहीं हुए थे और न जाने कितने समय से इस परिसर में खिंचे चले आ रहे थे। यह चले आना ऐसा था कि  लगता था कि यहाँ की दीवारें, फ़र्श, बैंचें, सीढ़ियाँ और घूरती छत भी अब उन चेहरों और दौड़ते-भागते क़दमों को पहचानती होगी। लियो तॉलस्तॉय की कहानी द कोब्लर की तरह जिसमें मोची जो अपनी छोटी सी खिड़की से आने- जाने वालों के जूते देखकर उन्हें पहचान लेता था। ये सब भी शायद वैसे ही हर किसी को जानती होंगी। सबके रूप रेख, सफ़ेद सतखिर्रे होते बाल और झुर्रियों को भी पहचानती होंगी.. पर इस पहचान का कोई अर्थ? 

अधिकांश पहचानें निरर्थक होतीं हैं। शायद ये भी उसी प्रकार की हों! 

मेरी घूमतीं निगाहें एक तेज़ चाल से आती महिला पर टिक गईं। उसकी उम्र शायद 35-40 के आस पास होगी। मध्यम कद-काठी, छरहरा शरीर, चेहरा साफ़। सिलेटी पतलून और काला टॉप। गले में सुरुचिपूर्ण ढंग से लपेटा गया बादामी रंग का शॉल। उसके चेहरे पर भी वही भाव। या यूँ कहें भावहीन चेहरा। वो हताश सी कुछ देर कोर्ट रूम के बाहर टहलती रही। साथ ही उसकी आँखें जैसे भरी बेंचों में एक अदद खाली सीट तलाश रहीं थीं।किस्मत से एक सीट खाली हुई, महिला लपककर उस सीट पर बैठ गई। इत्तेफाक़ से उसकी बगल वाली सीट भी खाली हो गई थी, जिस पर एक अधेड़  उम्र की महिला अपने ग्राम्य अंदाज़ में फैलकर बैठ गई। अधेढ़  महिला का शॉल उस 35-40 वर्ष की महिला को छू न जाए, यह सोचकर ही वह थोड़ा सा और खिसक गई। पर ग्राम्य महिला को उससे जैसे कोई फ़र्क न पड़ा, वह और आराम से बैठ गई और अपने मुँह को पूरे विस्तार के साथ खोलकर जम्हाई लेने लगी।अधेड़ आयु की वह महिला  जितनी बार भी जम्हाई लेती, बगल में बैठी महिला कुछ और असहज हो जाती। मैं देख पा रही थी कि जब जब ग्राम्य वेशभूषा की उस महिला का मुँह खुलता, पतलून वाली महिला अपने मुँह और नाक को अपने शॉल से ढँक लेती। साफ़ था कि वो उसे निहायत ही नापसंद कर रही है। मैं सोच रही थी कि कैसी विवशता है। ये महिला उस फूहड़ महिला को नहीं झेल पा रही है। उसके बार-बार खुलते-बंद होते मुँह से निकलती बदबू से त्रस्त हो रही है, फिर भी वहीं बैठी है! 

ओह! क्या ये वाकई सच है कि कई बार विवशताएँ ऐसी असहज स्थितियाँ उत्पन्न कर देती हैं कि इंसान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। इंसान वाकई कठपुतली ही तो नहीं?

मैं चहल कदमी करते हुए कुछ दूर निकल आई। ऐसी जगह पर कोई कब तक ठहर सकता है भला? शायद तब तक जब तक नियति ही उसे किसी स्थान से न जोड़ दे। घड़ी 11 बजा रही थी। मुझे वापस उसी परिसर में लौटना था। लौटकर जो देखा वो हैरान करने वाला था। पतलून वाली महिला अब उस ग्राम्य महिला के हाथ को अपने हाथ में लिये उसे सांत्वना दे रही थी! ओह ये तो अभी कुछ देर पहले तक...

मैं फिर सोच में डूब गई कि इसे क्या कहेंगे नियति या जीवन?



रविवार, 21 अप्रैल 2024

बुन्देली में रामकथा

 


  

रामाख्यान विश्व का सबसे बड़ा आख्यान है। विश्व की विभिन्न भाषाओं में राम कथा अपने अलग-अलग कलेवर के साथ उपस्थित है। ऐसा इसलिए क्योंकि राम कथा लोक से जुड़ा हुआ आख्यान है। इसमें जिस सौन्दर्य के साथ लोक, जीवन और आदर्श का निदर्शन है, वह ऐसे ही गांभीर्य और औदात्य के साथ अन्यत्र दुर्लभ है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय जनमानस के संस्कार राम से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि राम लोक की भाषा में हैं। लोक के मुहावरे में हैं, जन जीवन, जगत में राम हैं। भारत के प्रत्येक अञ्चल में राम हैं। जब हर स्थान राममय है तो पुण्य भारत की वह पुण्य भूमि जहाँ आदि कवि वाल्मीकि ने विश्व के प्रथम महाकाव्य में लोक के राम को लोक के समक्ष प्रस्तुत किया था, वह अञ्चल विशेष भला राममय कैसे न होगा! 


     चित्रकूट गिरि यहाँ,

 जहाँ प्रकृति प्रभुताद्भुत 

वनवासी श्री राम

 रहे सीता लक्ष्मण युत

हुआ जनकजा स्नान

 तीर से जो अति पावन

जिसे लक्ष्य कर रचा गया

 धाराधर धावन

यह प्रभु पद

 रजमयी पुनीत प्रणम्य भूमि है

रमे राम बुंदेलखंड

 वह रम्य भूमि है


ओरछा के अंतिम राजकवि स्व. मुंशी अजमेरी, जिनका वास्तविक नाम श्री प्रेम बिहारी था, की उपर्युक्त पंक्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि बुंदेलखंड के कण-कण में राम बसते है। 

सप्तकुल पर्वतों में ज्येष्ठ विंध्याचल, जिसकी महिमा का वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व में भी है, से आच्छादित भारत का हृदयस्थल जिसके उत्तर में यमुना, दक्षिण में नर्मदा, पश्चिम में काली सिंध, चम्बल और बेतवा नदी के साथ और पूर्व में टोंस और सोन नदी प्रवाहित है, बुन्देलखंड है। चंदेल और फिर बुन्देल राजाओं की शासनस्थली होने के कारण इस क्षेत्र का नाम बुंदेलखंड पड़ गया और यहाँ बोली जाने वाली बोली बुन्देलखंडी कही जाने लगी। 

बुंदेलखंड तपस्वियों की धरती है। यही कारण है कि इस भूमि का रामकथा से भी गहरा नाता है। कहते हैं कि यदि श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या नगरी है तो बुन्देलखंड ही वह प्रदेश है, जहाँ श्री राम ने पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अपने वनवास का समय बिताया। अयोध्याकाण्ड का वह प्रसंग जब श्री राम जानकी, अनुज लक्ष्मण और गुह के साथ ऋषि भरद्वाज जी के आश्रम में पधारते हैं और उनसे मार्ग पूछते हैं-

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं

नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं

तब भरद्वाज जी मन ही मन हँसकर श्री राम जी से कहते हैं कि आपके लिए तो सभी मार्ग सुगम हैं और अपने चार ब्रह्मचारियों को उन्हें मार्ग बताने के लिए साथ भेजते हैं। जहाँ गाँव जंगल होते हुए, गाँव के लोगों से बोलते-बतियाते राम वाल्मीकि आश्रम पहुंचते हैं। वहाँ जाकर वे वाल्मीकि जी से कहते हैं-

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ

सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ

तहँ रचि रुचिर परन तृन साला

बासु करौं कछु काल कृपाला

और वाल्मीकि जी कहते हैं-

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ 

मैं पूँछत सकुचाउँ

जहँ न होहु तहँ देहु 

कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ 

और फिर वे चित्रकूट जहाँ अत्रि आदि मुनियों का निवास है, पवित्र मंदाकिनी नदी जहाँ प्रवाहित है, का महात्मय बताते हैं और वहीं निवास करने के लिए राम को कहते हैं-

चित्रकूट गिरि करहु निवासू

तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू


और फिर राम पधारते हैं इस विन्ध्याचल की भूमि पर। बुंदेलखंड की भूमि पर। विंध्याचल पर्वत शृंखला से घिरी यह बुंदेलखंड की भूमि जितनी वन संपदा से आच्छादित है, उतनी ही ऊबड़-खाबड़ और पथरीली भी है। इन घने जंगलों और पर्वतों की गहन दुर्गम कन्दराओं में न जाने कितने योगी, यति, तपस्वी साधनारत रहते हैं। जो श्री राम के आगमन से स्वयं को बड़ा ही पुण्यभागी मानते हैं। कवितावली के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास जी बड़े ही रोचक ढंग से, रस लेकर यह वर्णन करते है कि किस प्रकार राम के आने से सब तपस्वी प्रसन्न हो गए है।   


बिंध्य के बासी उदासी

तपोब्रतधारी महा बिनु नारी दुखारे

गौतमतीय तरी तुलसी,

सो कथा सुनि भे मुनिबृंद सुखारे

ह्वै हैं सिला सब चंद्रमुखी 

परसे पद मंजुल कंज तिहारे 

कीन्हीं भली रघुनायक जू 

करुना करि कानन को पगु धारे 

तो कहने का तात्पर्य राम और रामकथा से बुंदेलखंड का गहरा संबंध है। बल्कि यदि यह कहा जाए कि बुन्देलखड़ ही राम कथा का उत्पत्ति का केंद्र है तो अन्यथा न होगा।  

वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों का ही इसी भूमि से संबंध रहा। आदि कवि वाल्मीकि का आश्रम लालापुर गाँव में चित्रकूट से कुछ पहले ही स्थित है और तुलसीदास भी चित्रकूट में राजापुर के निवासी थे। 

इन्हीं की परंपरा में ग्वालियर निवासी विष्णुदास का भी नाम आता है। विष्णुदास ने तुलसीदास से लगभग 100 वर्ष पूर्व बुन्देली मिश्रित ब्रज भाषा में ‘रामायन कथा’ लिखी। ‘रामायन कथा’ में तीन कांड (बाल कांड, सुंदरकांड और उत्तरकाण्ड) और 51 सर्ग हैं। ‘रामायन कथा’ के प्रथम कांड में राम जन्म से किष्किन्धा कांड तक की कथा है। सुंदरकांड में राज्याभिषेक तक की कथा है और उत्तरकाण्ड में राम के स्वर्गारोहण तक की कथा का वर्णन है। कह सकते हैं कि ‘रामायन कथा’ बुन्देलखंड का पहला महाकाव्य है। रामायन कथा से एक उदाहरण दृष्टव्य है-

रोग शोक आपदा न होई विधवा नारि न दीखत कोई

परजा चरन सकल विधि धरै परधन लोभ न कोउ करै

मीत्रु अराज होइ नहिं काल नित माँगे धन बरसै धन माल

कछू अनीति न होइ अकाज, सात दीप मँह पाजत राज

15 वी शताब्दी में ही ग्वालियर के ही जैन कवि रईधू ने सोनगिरि में रहकर पद्मपुराण नाम से अपभ्रंश में रामकथा की रचना की। कविवर कन्हरदास जिनका समय 1580 माना जाता है, की फुटकर रचनाएँ भी महत्वपूर्ण हैं। इनके बाद गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के विषय में तो कहा ही क्या जाए, वो तो बुंदेलखंड ही नहीं, पूरे भारत का कंठकार है। इसके पश्चात संवत 1658 में ओरछा के राजकवि केशवदास ने राम चंद्रिका नामक प्रबंध काव्य का सृजन किया। अपनी पुस्तक रसिक प्रिया में वे राजा राम की नगरी ओरछा का महत्व बताते हुए कहते हैं

नदी बेतवै तीर जहँ तीरथ तुंगारन्य

नगर ओढछों बहुबसै धरनीतल मैं धन्य

केशवदास का ग्रंथ रामचंद्रिका तो है ही महत्वपूर्ण, जिसमें एकदम अलग ढंग से उन्होंने रामकथा का प्रणयन किया है। इसी प्रकार कवि मोहन दास मिश्र कृत रामअश्वमेध, मुंशी अजमेरी कृत श्री रामचरित नाटक भी उल्लेखनीय हैं। जानकी प्रसाद रसिक बिहारी का राम रसायन ग्रंथ भी उल्लेखनीय है। गोप कवि कृत रामचंद्राभरण जैसा ग्रंथ भी महत्वपूर्ण रचना है जिसमें राम के ऐश्वर्य का चित्रण है। इस प्रकार से और भी कई ग्रंथ राम कथा को आधार बनाकर लिखे गए। ओरछा की रानी वृषभानु कुंअरि कृत राम भक्ति परक पद भी बुन्देलखंड में बहुत उत्साह से गाए जाते हैं। 

कुछ ऐसा भी संयोग है कि 4 अप्रैल सन् 1574 ई. के दिन ही जबकि रामभक्त तुलसीदास जी ने रामचरित मानस का प्रणयन आरंभ किया था, उसी दिन ओरछा की महारानी गणेश कुंअरि ने अयोध्या से लाई गई राम लला की प्रतिमा की अपने महल में प्रतिष्ठा कराई थी। तभी से राम लला ओरछा के राम राजा सरकार बने। प्रसिद्ध कवि गदाधर भट्ट ने इसे कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया है-

   


मधुकर महीप महिमा विसाल

सु गनेस कुँवर रानी नृपाल

तिहि न्हात अवध सरजू अमंद

प्रगटे सुभक्ति लखि रामचंद्र

ऐसी भी मान्यता है कि भगवान श्री राम प्रातः से संध्याकाल तक ओरछा में निवास करते हैं और रात्रि समय अयोध्या में निवास करते हैं। कहा जाता है कि जब सरयू में रानी जी को श्री राम का विग्रह प्राप्त हुआ तो ओरछा चलने हेतु उन्होंने तीन शर्तें रखीं थीं। एक तो अयोध्या से ओरछा तक की यात्रा पुष्य नक्षत्र में ही होगी, राम जी एक बार जिस स्थान पर स्थापित हो जाएंगे, वहाँ से फिर कहीं नहीं जाएंगे और तीसरी शर्त यह थी कि जहाँ वो रहेंगे, वह स्थान उजाड़ हो जाएगा। ऐसी स्थिति में गोस्वामी तुलसीदास जी के साथ पंचायत हुई। इस पंचायत में यह निर्णय लिया गया कि राम अकेले ही ओरछा पधारें। माता सीता अयोध्या में ही विराजेंगी अतः प्रभु श्री राम को वापस अयोध्या पधारना ही होगा। तभी से यह कहा जाता है कि-

राम राजा सरकार के दो निवास हैं खास

दिवस ओरछा में रहत रैन अयोध्या वास

कहते हैं कि ओरछा में राम लला के आगमन पर ओरछा के राजा श्री मधुकर शाह जू देव ने अपना राज्य श्री राम राजा के चरणों में समर्पित कर दिया था। कारण कि एक राज्य के दो अधिपति होना असंभव है। अतः भगवान श्री राम ओरछा के राम राजा सरकार हो गए और ओरछा के राजा मधुकर शाह जू देव ओरछा के कार्यवाहक नरेश। यही कारण है कि आज भी राम राजा की आरती के समय पुलिस गार्ड द्वारा विधिवत् सलामी दी जाती है। 

तुलसीकृत रामचरित मानस और ओरछा में राम राजा की प्रतिष्ठा ये दो ऐसी घटनाएँ थीं, जिन्होंने बुंदेलखंड को राम कथा का क्षेत्र ही घोषित कर दिया। बुन्देली लोक मानस की वाणी में यह कथा विविध रूपों में बसी हुई है-

एक राम एक रवन्ना

वे छत्री वे बाभन्ना

उन्ने उनकी नार हरी

उन्ने उनकी कुगत करी

बातन बड़ गयो बातन्ना

तुलसी रच दओ पोथन्ना

बुन्देली लोक कवि ईसुरी ने भी रामभक्ति परक चौकड़ियाँ लिखी हैं-

जाके राम चंद्र रखवारे को कर सकत तगारे

बड़े भए प्रह्लाद बचाये हिरनाकुस खों मारे

राना जहर दओ मीरा खों प्रीतम मान समारे

मसकी जाय ग्राह की गर्दन गह गजराज निकारे

ईसुर प्रभु ने गाज बचायी सिर पै गिरत हमारे

पन्ना दरबार के राजकवि पंडित कृष्णदास ने जिस प्रकार का काव्य रचा उसका विषय या तो श्री राम रहे या राम भक्त हनुमान जी। इनकी रचनाएँ भी लोक में अत्यंत प्रसिद्ध हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य है-

राजन के राजा महराजन के महाराज

साहन के शाह बात ऐन के लखैया हौ

देवन के देव सर्व सेवन के महासेव

धर्मिन के धर्म कर्म कर्म के रखैया हौ

कृष्ण कवि वीरन के वीर, धीर धीरन के

परम कृपालु दीन दास के सहैया हो

भानुकुल तिलक सुजान वरदायक हौ

भानुकुल तिलक भानु सो हमारे रघुरैया हौ

इसी प्रकार राम कथा गायक रामसखे, रसिकबिहारी कृत राम रसायन आदि भी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। लोक काव्य और लोकगीतों में भी राम कथा विषयक प्रसंगों को आधार बनाकर जीवन की व्याख्या की गई है। बुंदेलखंड के भित्तिचित्रों लोककथाओं यहाँ तक कि स्थापत्य में भी रामकथा से सबंधित वृत्तान्त मिलते हैं। फिर भला लेखकों-साहित्यकारों की लेखनी रामकथा से कैसे अछूती रह सकती है। 





संदर्भ ग्रंथ 


साक्षी : अंक 20, भारतीय भाषाओं में रामकथा: बुन्देली, संपादक डॉ योगेंद्र प्रताप सिंह, वाणी प्रकाशन 

तुलसीदास कृत रामचरितमानस :  गीताप्रेस गोरखपुर  

कवितावली, गीताप्रेस गोरखपुर

विश्वनाथ मिश्र, संपादक केशव ग्रंथावली, खंड 2, हिन्दुस्तानी अकादमी इलाहाबाद  

ईसुरी, महक बुन्देली माटी की, गोइल गौरव ग्रंथ, पृष्ठ संख्या 421 

बुंदेलखंड की छंदबद्ध काव्य परंपरा, डॉ बहादुर सिंह परमार, आदिवासी लोककला अकादमी 


रविवार, 14 अप्रैल 2024

चलते- चलते

 सुनिये, सम्भल के बोलिये

वरना नहीं दिक्कत कोई   

बात करना छोड़िये।

आज की तारीख में

 मँहगा सलीका हो गया

जानते हैं हम, तो अब 

सलीकेदार बनना छोड़िये

है किसे अब वक्त

देखे दोष भी अपने कभी

दूसरों के दोष गढ़-गिन 

भगवान बनना छोड़िये

रात अंधियारी अगर है

वक्त की दरकार ये

हर सुबह और रोशनी को

 जागीर कहना छोड़िये

हो बहुत ऊँची

 मगर है रेत की दीवार ही

आंधियों से वैर लेकर

सर छुपाना छोड़िये

मुट्ठियों में ले चले हम 

भूमि और आकाश भी

हम से अब यूँ दायरों की

बात करना छोड़िये


शनिवार, 9 मार्च 2024

जगन्नाथ पुरी


  

भारत के पूर्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से आठवां बड़ा राज्य है उड़ीसा। इसी उड़ीसा का एक प्रमुख नगर है जगन्नाथ पुरी।

 आम बोलचाल में इसे पुरी भी कहते हैं। हालांकि युगों से जगन्नाथ जी की इस नगरी के कई  नाम रहे हैं। जैसे- नीलगिरी, नीलाद्रि, नीलांचल, पुरुषोत्तम, शंखक्षेत्र, श्रीक्षेत्र, जगन्नाथ धाम, ‘स्वामी जू’ की नगरी और जगन्नाथ पुरी। आस्था की यह नगरी सनातन धर्म में चार धामों में से एक धाम के रूप में भी ख्यात है। 

 जगन्नाथ जी की इस नगरी से मेरा प्रथम परिचय मेरे घर से ही हुआ। चैत्र माह आने से पूर्व ही घर में भले बिराजे जू की चर्चा आरंभ हो जाती थी। यह भले बिराजे जू कोई और नहीं, बल्कि पुरी में विराजमान भगवान जगन्नाथ अर्थात् कृष्ण जी का ही हमसे परिचय था जो, अपने बड़े भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ युगों का भ्रमण करते हुए (सतजुग छोड़ी मथुरा नगरी, द्वापर छोड़ी काशी, कलियुग में तौ आन बिराजे बिन्द्राबन के बासी) उड़ीसा में आन विराजे हैं। हिंदू वर्ष यानी चैत्र मास का आरंभ हमारे यहां जगन्नाथ जी के आगमन और उनकी पूजा से ही होता है। जबसे स्मृति है चैत्र मास के हमारे प्रमुख अतिथि होते भगवान जगन्नाथ। जिनकी आवभगत में प्रति सोमवार भगवान जी का अलग भोग होता। पहला चना गुड़, फिर गुरधानी, फिर पंचमेर (5 प्रकार का मिष्ठान्न), चौथा छप्पन भोग और पांचवा सोमवार यदि पड़ता था, तो भटा गकरिया। इसके साथ चुरुआ (गुड़ का पानी) ज़रूर होता, जो पुरी से लाए बड़े से पीतल के लोटे में रखा जाता, उसमें पुरी से ही लाए गए,पाँच बेंत रखे जाते जो कथा के दौरान खड़काए जाते और पूजा के बाद पाँच-पाँच बार भेँटे जाते। एक पीतल की थाली भी पूजा में पुजती, जिस पर लोटे के समान ही भगवान जगन्नाथ जी का चित्र अंकित होता। खास टेसू के फूलों से भगवान को सजाया जाता और फिर विधि-विधान से पूजा होती। बाई (पड़दादी) कथा सुनातीं स्वामी जू की, प्रभु श्री जगन्नाथ जी की। इस पूरी कथा में भाट-भाटिन, राजा-रानी, किसान, श्रमिक, और न जाने कितने जीव-जन्तु, वृक्ष और तालाब अपनी व्यथा और पीड़ाओं के साथ आते। अपनी अक्षमता या असमर्थता के कारण वे तो जगन्नाथ जी के धाम  न जा पाते पर यात्रा पर निकले भाट को अपने संदेसे भेजते और अंततः समाधान पाते। अन्ततः बाई कहतीं जैसे भाट भिखारी की सुनी, सबकी सुनी सो ऊसी हमाई भी सुनियो।

 और... इन सबके साथ आता लहराता विशाल समुद्र। समुद्र का जो वर्णन बाई करतीं, वो हमें भी यात्री बनाने के लिये बहुत था। क्योंकि समुद्र हमारे लिये साधारण नहीं था, वो तो समुद्र देवता थे जो जगन्नाथ जी के चरण पखारते थे। उनके दर्शन को मंदिर तक खिंचे चले आते थे। पर जब समझाने पर भी न माने तो हनुमान जी की  हर ओर तैनाती कर दी गई। पर जब वह भी जगन्नाथ जी के आकर्षण में मंदिर चले आए और पीछे-पीछे नगर को बहाता समुद्र भी। तो जगन्नाथ जी ने हनुमान जी को बेड़ी में बांध दिया। मतलब यह तय था कि वहाँ भगवान जगन्नाथ जी मिलते हैं। इसलिये समुद्र बचपन से ही मेरी स्मृतियों में अपने हेड़ों (लहरों) के साथ बस गया था। यही कारण था कि बचपन की जो पहली यात्रा स्मृति में सजी वो पुरी की ही थी। पहला समुद्र दर्शन भी पुरी का ही था, विशाल लहराता सुंदर पुरी का समुद्र। या भूगोल की भाषा में कहें तो तीन ओर भू भाग से घिरी बंगाल की खाड़ी। जहाँ मिलते हैं सबका न्याव करने बैठे, सबकी सुनने वाले, जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ। 

जगन्नाथ पुरी के विषय में हरि अनंत हरि कथा अनंता के समान ही अनंत कथाएँ हैं। रथ यात्रा और 6 बार के भोग की भी कथाएँ हैं, मंदिर में उल्टी लटकी एकादशी की भी कथा है और भी न जाने कितनी कथाएँ हैं जो पुरी में प्रवेश के साथ ही अनुभव जगत का जीवंत अंग बन जाती हैं। रक्षक की भूमिका में अलग-अलग दिशाओं में जगन्नाथ जी की आज्ञा से तैनात बैठे हनुमान जी, और उनमें भी बेड़ी हनुमान जी मन में जो भाव भरते हैं, उसे अनुभव करने के लिये भाट सी गठरियन संदेसे भरी यात्रा ज़रूरी है।  भाट तो पैदल चला था और महिनों बाद स्वामी जू नौं पहुँचा था। पर आज कुछ घंटों में ही पुरी की यात्रा संभव है। पर हाँ कहते हैं कि पुरी में तीन दिन और तीन रात से अधिक ठहरे तो स्वामी जी की छड़ी लगना तय है और जो इतना ही रुके तो जगन्नाथ जी की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति सुनिश्चित है। अत: कहते हैं कि  समय से लौट आएं पर संदेसे ज़रूर लेकर जाएं और स्वामी जू को सब सुनाकर भी आएं। नहीं तो पता है न भाट भिखारी की कहानी का वो अंश जब वो संदेसे भूल गया था?

एक अनुभव यह भी रहा कि मुझे लगता था, समुद्र से सुंदर कुछ नहीं, मंदिर भी इतना आकर्षक नहीं हो सकता। कभी गरजती, कभी नाचती, कभी हिंडोले सी बन जातीं लहरों का ऐसा मोहक नृत्य दुर्लभ है। पर सत्य यह है कि मंदिर में जगन्नाथ जी का जो आकर्षण समाया हुआ है, वह अवर्णनीय है। मंदिर दर्शन और जगन्नाथ जी के दर्शन के सामने समुद्र इस विश्व के समान कृष्ण की मुरली की तान पर थिरकता सा लगता है। ऐसे में अभिभूत आत्मा नतमस्तक हो कह उठती है- स्वामी भले बिराजे जू।

  


रविवार, 14 जनवरी 2024

 आज जीवन के उस पड़ाव पर हूँ, जब विगत को विश्लेषक बुद्धि के साथ देख रही हूँ। क्या खोया, क्या पाया सब समझ पा रही हूँ। अपनी मूर्खताओं को भी समझ और देख पा रही हूँ। दुनिया को अब थोड़ा बेहतर समझ पा रही हूँ। और अब जब समझी हूँ, तो कष्ट होता है कि पहले क्यों नहीं समझी? समझ का विकास इतना धीमी गति से क्यों होता है? पर साधारणत: यही होता है।

ईश्वर से यही प्रार्थना है कि नीच और पापी बुद्धियों का विनाश हो। शुभ कर्म फलें-फूलें। सरलता का मार्ग प्रशस्त हो।